Taj News Opinion Desk, Taj News | Tuesday, March 24, 2026, 07:55:00 PM IST

Taj News Opinion Desk

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
मुख्य बिंदु
- सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के मासिक धर्म अवकाश की जनहित याचिका खारिज कर दी है।
- पीठ का तर्क है कि इस अवकाश के कारण नियोक्ता (मालिक) महिलाओं को रोज़गार देने से बच सकते हैं।
- संजय पराते के अनुसार, यह टिप्पणी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के बिल्कुल विरुद्ध और पूरी तरह महिला विरोधी है।
- मोदी राज में संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण हो रहा है; नागरिकों को अधिकारविहीन ‘प्रजा’ बनाने की खतरनाक साज़िश जारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के मासिक धर्म अवकाश की एक अहम जनहित याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्या बागची की पीठ ने इस पर एक अजीब टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि इस अवकाश से महिलाओं के रोजगार की संभावनाओं पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ेगा। क्योंकि, ऐसी बाध्यताओं के चलते मालिक महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की यह अवधारणा एक कल्याणकारी राज्य की मूल अवधारणा के बिल्कुल विरुद्ध है। इसके अलावा, यह टिप्पणी समाज में शोषण की प्रक्रिया और रूढ़िवादी विचारों को बहुत मजबूत करती है। इसलिए, यह एक सरासर महिला विरोधी और बेहद निराशाजनक टिप्पणी है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह महिला विरोधी टिप्पणी कोई पहली बार बिल्कुल नहीं की है। इससे पहले भी इसी पीठ ने एक अन्य महत्वपूर्ण याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था। वह याचिका घरेलू कामगार महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी देने का कानून बनाने के लिए दायर हुई थी। उस समय भी पीठ ने बहुत ही अजीब और हैरान करने वाली टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि न्यूनतम पारिश्रमिक का कानून बनाने से घरेलू कामगारों को काम मिलना बिल्कुल बंद हो जाएगा। दरअसल, हमारे संविधान का अनुच्छेद-14 और अनुच्छेद-21 नागरिकों को समानता का पूरा अधिकार देता है। इसके अलावा, यह उन्हें एक गरिमा पूर्ण जीवन जीने का पक्का अधिकार भी देता है।
इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास एक बहुत बड़ा अधिकार मौजूद है। वह केंद्र और राज्य सरकारों को नीतिगत विषयों पर कानून बनाने का सीधा आदेश दे सकती है। लेकिन, इन दोनों जनहित याचिकाओं की खारिजी से एक बहुत अलग और डरावना संदेश मिलता है। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अब अपने इस विशेष अधिकार को पूरी तरह त्याग दिया है। हालांकि, इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने खाद्यान्न सुरक्षा और मध्यान्ह भोजन जैसे कई विषयों पर कड़े आदेश दिए थे। उस समय कोर्ट ने सरकारों को तुरंत नई नीति बनाने का सख्त आदेश दिया था। इसलिए, महिलाओं के हित वाली जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने आज बहुत अजीब तर्क दिए हैं।
यह भी पढ़ें
कोर्ट ने जिन तर्कों का सहारा लिया है, वे अत्यंत ही आपत्तिजनक और निराशाजनक हैं। यदि समाज में हमेशा इन कुतर्कों का ही सहारा लिया जाता, तो दुनिया कभी नहीं बदलती। तब अतीत में इस दुनिया से गुलामी की क्रूर व्यवस्था का कभी खात्मा नहीं होता। इसके अलावा, समाज से बंधुआ गुलामी भी कभी खत्म नहीं होती। मजदूरों को 8 घंटे के काम का अधिकार भी कभी नहीं मिलता। और, उन्हें जीवन जीने के लिए न्यूनतम मजदूरी पाने का अधिकार भी कभी हासिल नहीं होता। दरअसल, ये सभी अधिकार दुनिया के लोगों को एक समतापूर्ण समाज के निर्माण के लंबे संघर्ष से ही मिले हैं। और, एक सभ्य समाज की ओर बढ़ने के लिए यह ऐतिहासिक संघर्ष आज भी लगातार जारी है। इन कड़े संघर्षों ने मेहनतकशों को गुलामी और भारी शोषण की बेड़ियों से पूरी तरह मुक्त किया है।
उसी अनुपात में इन संघर्षों ने शोषक वर्ग के सकल मुनाफों पर भी बहुत गहरी चोट की है। हम समानता के अधिकार को तब तक बिल्कुल सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं। जब तक कि हम समाज के कमजोर तबकों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते हैं। इसीलिए, हमारा संविधान सरकारों को विकलांगों की विशेष देखभाल करने का सख्त निर्देश देता है। ठीक इसी प्रकार, जो गरीब लोग दूसरों के घरों में काम करते हैं। वे आठ घंटे काम करने के बाद जीवन निर्वाह योग्य न्यूनतम मजदूरी ज़रूर प्राप्त करें। लेकिन, यदि संविधान की रक्षक सुप्रीम कोर्ट और सरकारें इसकी निगरानी नहीं करेंगी, तो फिर कौन करेगा? क्या हम इन घरेलू मजदूरों के भारी शोषण की खुली इजाजत दे सकते हैं?
क्या हम उन्हें इसी बदतर स्थिति में जीवन यापन करने के लिए आसानी से छोड़ सकते हैं? सिर्फ इस आधार पर कि इससे अमीर घर के मालिकों पर कोई आर्थिक चोट पहुंचेगी? दरअसल, महिलाओं के मासिक धर्म के मामले में भी बिल्कुल यही बात पूरी तरह लागू होती है। प्राकृतिक रूप से महिलाओं की शारीरिक संरचना पुरुषों से बहुत भिन्न होती है। यह अंतर विशेषकर प्रसव के मामले में बहुत ज्यादा होता है। इसलिए, सरकार को महिलाओं की शारीरिक संरचना को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। यदि शिक्षा और रोजगार में उनके लिए कोई विशेष प्रावधान बिल्कुल नहीं किए जाएंगे। तो महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता की बात केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।
इसलिए, आज महिलाओं को मुफ्त पैड देने की मांग बहुत तेजी से उठ रही है। इसके अलावा, मासिक धर्म के दिनों में उन्हें विशेष अवकाश देने की मांग पर भी एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो रहा है। क्योंकि, महिलाएं इन दिनों थकान, बुखार, उल्टी और भंयकर दर्द झेलती हैं। वे अत्यधिक रक्तस्राव जैसी स्वास्थ्य समस्याओं में थोड़ा आराम कर सकें, इसलिए यह अवकाश बहुत जरूरी है। आज जापान, इंडोनेशिया, जांबिया, स्पेन, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे कई देशों में यह नियम लागू है। दुनिया के बहुत से देशों में मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं के लिए अवकाश की पक्की व्यवस्था मौजूद है। इसके अलावा, दुनिया आज मातृत्व अवकाश से आगे बढ़कर पितृत्व अवकाश की ओर भी तेजी से बढ़ रही है।
हमारे भारत में भी बिहार और कर्नाटक में मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं को अवकाश मिल रहा है। इसके साथ ही, कुछ निजी कंपनियां भी अपने स्तर पर यह शानदार सुविधा दे रही हैं। जोमैटो, स्विगी, एकर इंडिया, एलएनटी और ओरिएंट इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियां मासिक धर्म पर अवकाश खुशी-खुशी दे रही हैं। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट का यह मानना पूरी तरह से असंगत और तथ्यों से बिल्कुल परे है। कोर्ट का यह सोचना गलत है कि इस सुविधा की मांग करने पर नियोक्ता महिलाओं को रोजगार नहीं देंगे। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के जीवन से जुड़े इस बड़े अधिकार पर कोई भी हस्तक्षेप करने से सीधा इंकार कर दिया है। जबकि, आज राष्ट्रीय स्तर पर मासिक धर्म अवकाश के लिए एक कड़े कानून का बनना सबसे बड़ी जरूरत है।
क्योंकि, यह अहम कदम पुरुषों और महिलाओं के बीच फैले लैंगिक भेदभाव को पूरी तरह दूर करेगा। और, यह समाज को समानता की ओर ले जाने वाला एक बहुत बड़ा कदम साबित होगा। दरअसल, मोदी राज में संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का बहुत तेजी के साथ क्षरण हो रहा है। इसलिए, आज हमारी सुप्रीम कोर्ट भी इस भारी गिरावट से बिल्कुल अछूती नहीं है। हमारे देश में संघी गिरोह एक खतरनाक सांप्रदायिक-कॉर्पोरेट राज को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। वह राज नागरिकों के बुनियादी अधिकारों और मानवाधिकारों को कुचलकर ही आगे बढ़ सकता है। यही कारण है कि आज देश में एक बहुत बड़ी और गहरी साजिश हो रही है। सरकार अधिकार प्राप्त नागरिकों को सिर्फ एक आज्ञापालक प्रजा में तब्दील करना चाहती है।
ताकि वे नागरिक सरकार से कोई भी तीखे सवाल खड़े न करें। वे किसी भी प्रकार के संवैधानिक अधिकारों की कोई बात न करें। और, वे बिना किसी ना-नुकूर के सिर्फ अमीर मालिकों की तिजोरियों को भरते रहें। सरकार इसे ही उनका नया ‘राष्ट्रीय कर्तव्य’ मानती है। दरअसल, आज्ञापालक प्रजा कभी कोई असहमति व्यक्त नहीं करती है, वह केवल कर्तव्य का चुपचाप पालन करती है। वह पूरी तरह से राष्ट्रभक्ति का अंधानुसरण करती है। पूंजीवाद की इस कॉर्पोरेट व्यवस्था में आम नागरिक केवल एक ‘माल’ (वस्तु) होते हैं। जिनकी मुनाफा पैदा करने के इस महायज्ञ में सिर्फ आहुति ही दी जानी है। इसलिए, महान साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन अगर आज ज़िंदा होते, तो वे भी बिल्कुल यही बात कहते। वे दुखी होकर कहते कि: ऐसे सुप्रीम कोर्ट का पूरी तरह क्षय हो!

Pawan Singh
7579990777












