Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 17 Mar 2026, 08:35 PM IST
Taj News Opinion Desk
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा
मुख्य बिंदु
- संविधान के आदर्शों को ज़मीन पर उतारने और सामाजिक न्याय को सत्ता से जोड़ने में कांशीराम का अहम योगदान।
- बामसेफ (BAMCEF), डीएस4 (DS4) और बसपा (BSP) के जरिए बहुजन समाज को एक मजबूत राजनीतिक शक्ति बनाना।
- “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” के ऐतिहासिक नारे से प्रतिनिधित्व की बहस को नया आयाम।
- मायावती जैसे नए नेतृत्व का निर्माण और भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की सफल वैचारिक क्रांति।
भारतीय लोकतंत्र का वैचारिक आधार हमेशा समानता, स्वतंत्रता और न्याय के महान सिद्धांतों पर निर्मित माना जाता है। किन्तु हमारी सामाजिक संरचना की ऐतिहासिक जटिलताओं के कारण यह महान आदर्श लंबे समय तक व्यवहारिक जीवन में पूर्णतः साकार नहीं हो सका। जाति-आधारित असमानता, सामाजिक बहिष्कार और संसाधनों के भारी असमान वितरण ने भारत में लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप को बहुत सीमित कर दिया था। इस परिप्रेक्ष्य में सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल एक नैतिक आग्रह नहीं रह गया था। बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता और उसकी विश्वसनीयता का सबसे मूल प्रश्न बन गया था। ठीक इसी ऐतिहासिक संदर्भ में मान्यवर कांशीराम का भारतीय राजनीति में उदय हुआ। उन्होंने सामाजिक न्याय के प्रश्न को केवल सामाजिक सुधार के सीमित दायरे में नहीं रखा। बल्कि उन्होंने उसे राजनीतिक सत्ता की प्रत्यक्ष भागीदारी से जोड़ते हुए एक बहुत व्यापक बहुजन आंदोलन का रूप दे दिया। कांशीराम की राजनीतिक दृष्टि इसी विचार पर आधारित थी कि लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब समाज के बहुसंख्यक किन्तु वंचित समुदाय सत्ता संरचनाओं में अपना वास्तविक प्रतिनिधित्व प्राप्त करेंगे。
कांशीराम का अपना जीवन अनुभव और उनका वैचारिक विकास भारतीय समाज की गहरी संरचनात्मक असमानताओं की समझ से जुड़ा हुआ था। उन्होंने यह बहुत करीब से देखा कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के बावजूद सामाजिक वास्तविकताओं में परिवर्तन की गति अत्यंत धीमी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट अनुभव किया कि सामाजिक न्याय के आदर्श को केवल नैतिक अपीलों या कुछ सुधारवादी आंदोलनों के माध्यम से स्थापित करना बहुत कठिन है। क्योंकि सत्ता-संरचनाएँ प्रायः हमेशा उन वर्गों के नियंत्रण में रहती हैं जिनके अपने हित वर्तमान और पुरानी व्यवस्था से सीधे जुड़े होते हैं। इसीलिए उन्होंने अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि सामाजिक परिवर्तन के लिए सीधे राजनीतिक शक्ति प्राप्त करना अनिवार्य है। इस मजबूत विचारधारा की प्रेरणा उन्हें विशेष रूप से डॉ. बी. आर. आंबेडकर (B. R. Ambedkar) के लेखन और उनके ऐतिहासिक संघर्ष से प्राप्त हुई थी। डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना हमारा राजनीतिक लोकतंत्र हमेशा अधूरा रहेगा。
मान्यवर कांशीराम ने भारतीय समाज की जटिल संरचना का विश्लेषण करते हुए “बहुजन” की एक नई अवधारणा को एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। इस बहुजन शब्द के अंतर्गत उन्होंने मुख्य रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को सम्मिलित किया। ये सभी वर्ग संख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद सत्ता और राष्ट्रीय संसाधनों से पूरी तरह वंचित थे। उनके अनुसार भारतीय लोकतंत्र में वास्तविक असंतुलन इस कड़वे तथ्य से उत्पन्न होता है कि राजनीतिक सत्ता हमेशा उन वर्गों के हाथों में केंद्रित रही है जो सामाजिक रूप से बहुत अल्पसंख्यक हैं। जबकि देश का बहुसंख्यक समाज हमेशा निर्णय-प्रक्रियाओं से बाहर रहता है। समाज की इस अन्यायपूर्ण स्थिति को बदलने के लिए उन्होंने राजनीतिक संगठन, वैचारिक जागरूकता और सामाजिक एकजुटता को अपने आंदोलन का सबसे बड़ा आधार बनाया。
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कांशीराम की राजनीतिक रणनीति का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि उन्होंने इस आंदोलन को केवल भावनात्मक या प्रतीकात्मक विरोध तक ही सीमित नहीं रखा। बल्कि उन्होंने उसे एक बहुत ही संगठनात्मक और व्यावहारिक स्वरूप दिया। उन्होंने समाज के शिक्षित और सरकारी सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम माना। इसी सोच के साथ उन्होंने 1970 के दशक में ‘बामसेफ’ (BAMCEF) की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य बहुजन समाज से आने वाले शिक्षित वर्ग को उनके सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक करना था। कांशीराम का यह पक्का मानना था कि यदि शिक्षित वर्ग सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाए, तो समाज में वैचारिक परिवर्तन की गति बहुत तेज हो सकती है। इस संगठन ने देश के विभिन्न हिस्सों में बहुजन चेतना के प्रसार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने एक ऐसे बड़े नेटवर्क का निर्माण किया जिसने आगे चलकर उनके राजनीतिक आंदोलन को एक मजबूत आधार प्रदान किया。
इसके कुछ समय बाद कांशीराम ने अपने आंदोलन को अधिक व्यापक सामाजिक आधार देने के लिए 1981 में ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ (DS4) की स्थापना की। इस संगठन ने बहुजन समाज में ज़मीनी स्तर पर राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इसने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध एक बहुत संगठित सामाजिक अभियान चलाया। कांशीराम का मुख्य उद्देश्य यह था कि बहुजन समाज अपनी दयनीय सामाजिक स्थिति को केवल अपनी नियति के रूप में स्वीकार न करे। बल्कि उसे सदियों के ऐतिहासिक अन्याय के परिणाम के रूप में समझते हुए परिवर्तन के लिए संगठित प्रयास करे। इस संगठन ने बहुजन समाज के विभिन्न वर्गों और जातियों के बीच संवाद और सहयोग की भावना को विकसित किया। कांशीराम की राजनीतिक दृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक चरण 1984 में आया। जब उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) की ऐतिहासिक स्थापना की। यह केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि यह पूरे बहुजन आंदोलन का एक संस्थागत रूप था। कांशीराम का मानना था कि यदि बहुजन समाज को असल में सामाजिक न्याय प्राप्त करना है तो उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी ही होगी। उन्होंने चुनावी राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का एक मजबूत उपकरण बनाया। उन्होंने यह सिद्ध करने का सफल प्रयास किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक संगठित मतदाता समूह राजनीतिक शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है。
कांशीराम की राजनीतिक सोच का एक केंद्रीय सिद्धांत ‘प्रतिनिधित्व’ की अवधारणा से गहराई से जुड़ा था। उनका वह प्रसिद्ध नारा “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” आज भी गूंजता है। यह नारा लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को सीधे जनसंख्या के अनुपात से जोड़ता है। इस नारे के माध्यम से उन्होंने देश के सामने यह यक्ष प्रश्न उठाया कि यदि लोकतंत्र का आधार जनसंख्या ही है, तो फिर सत्ता और संसाधनों में भी उसी अनुपात में भागीदारी क्यों नहीं होनी चाहिए? यह विचार भारतीय राजनीति में प्रतिनिधित्व की बहस को एक बिल्कुल नया और आक्रामक आयाम प्रदान करता है। क्योंकि यह केवल राजनीतिक अधिकारों की ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक संसाधनों के उचित वितरण की भी बात करता है। बहुजन आंदोलन का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक महत्व इस तथ्य में निहित है कि उसने भारतीय राजनीति में हमेशा हाशिए पर रहे समुदायों को सक्रिय राजनीतिक भागीदारी के लिए प्रेरित किया। लंबे समय तक दलित और पिछड़े वर्ग राजनीतिक प्रक्रिया में बहुत सीमित भूमिका निभाते थे। अक्सर वे केवल मतदान के दिन वोट डालने तक ही सीमित रहते थे। कांशीराम ने इस पुरानी स्थिति को बदलते हुए उन्हें राजनीतिक नेतृत्व और नीति-निर्माण में प्रत्यक्ष भागीदारी के लिए प्रेरित किया। इस प्रक्रिया ने भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और सच्चा बनाने की दिशा में एक बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया。
कांशीराम की राजनीतिक परियोजना का एक और बहुत महत्वपूर्ण पहलू ‘नेतृत्व निर्माण’ भी था। उन्होंने केवल आंदोलन चलाने तक ही अपने प्रयासों को सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज में नए नेतृत्व को विकसित करने पर भी भारी बल दिया। इसी संदर्भ में मायावती (Mayawati) का राजनीतिक उदय एक बहुत महत्वपूर्ण उदाहरण है। कांशीराम ने मायावती को नेतृत्व की इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हुए यह सिद्ध किया कि बहुजन समाज से आने वाले युवा नेता भी देश के सबसे बड़े राज्य (उत्तर प्रदेश) की राजनीति को प्रभावी ढंग से संचालित कर सकते हैं। मायावती का उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनना केवल एक साधारण राजनीतिक घटना नहीं था। बल्कि यह पूरे बहुजन आंदोलन की वैचारिक सफलता का एक बहुत बड़ा प्रतीक भी था। फिर भी कांशीराम की इस आक्रामक राजनीति को लेकर कई आलोचनाएँ भी सामने आईं। कुछ राजनीतिक आलोचकों का मत था कि बहुजन आंदोलन की राजनीति ने जातीय पहचान को ‘पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन’ का आधार बना लिया है। इससे समाज में एक नई प्रकार की पहचान-आधारित राजनीति को बढ़ावा मिला है। उनके अनुसार यह प्रक्रिया कभी-कभी सामाजिक विभाजन को पाटने के बजाय उसे और अधिक स्पष्ट कर सकती है। लेकिन दूसरी ओर बहुजन विचारकों का एक बहुत मजबूत तर्क है। उनका कहना है कि जब तक समाज में जातिगत असमानता मौजूद है, तब तक उसके विरुद्ध राजनीतिक संगठन और लामबंदी बहुत आवश्यक है। उनके अनुसार यह कोई पहचान-आधारित राजनीति नहीं है, बल्कि यह सदियों के ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध न्याय की एक सच्ची राजनीति है。
व्यावहारिक दृष्टि से अगर देखा जाए तो कांशीराम की राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र में कई बहुत महत्वपूर्ण और स्थायी परिवर्तन किए हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र में सत्ता केवल पारंपरिक अभिजात वर्ग (एलीट क्लास) का कोई विशेषाधिकार नहीं है। बल्कि संगठित सामाजिक समूह भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सर्वोच्च सत्ता तक आसानी से पहुँच सकते हैं। इस क्रांतिकारी विचार ने भारत के विभिन्न राज्यों में सामाजिक न्याय आधारित राजनीति को भारी रूप से प्रेरित किया। इसने कई अन्य क्षेत्रीय दलों को भी एक नई दिशा दी। इसके साथ ही इस आंदोलन ने समाज में शिक्षा, राजनीतिक जागरूकता और संगठन के असली महत्व को रेखांकित किया। आज के समसामयिक परिप्रेक्ष्य में कांशीराम की राजनीतिक दृष्टि का मूल्यांकन करते समय यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि भारतीय समाज में सामाजिक न्याय का प्रश्न आज भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण और नई सामाजिक चुनौतियों के बीच प्रतिनिधित्व, समान अवसर और सामाजिक सम्मान के प्रश्न लगातार नए और जटिल रूपों में सामने आते रहे हैं। ऐसे समय में कांशीराम की यह पुरानी अवधारणा कि सामाजिक परिवर्तन के लिए ‘राजनीतिक शक्ति’ सबसे आवश्यक है, आज भी पूरी तरह प्रासंगिक प्रतीत होती है。
इसके अतिरिक्त, बहुजन आंदोलन का एक व्यापक प्रभाव यह भी रहा कि उसने भारत में लोकतंत्र के नैतिक आधार को बहुत मजबूत करने का प्रयास किया। लोकतंत्र केवल एक पांच साला चुनावी प्रक्रिया का नाम नहीं है। बल्कि यह सामाजिक समानता और न्याय की एक निरंतर खोज भी है। कांशीराम की राजनीति ने इस बात पर हमेशा जोर दिया कि यदि हमें अपने लोकतंत्र को जीवंत और प्रभावी बनाना है तो समाज के उन सभी वर्गों को भी सत्ता-संरचनाओं में शामिल करना होगा जो बहुत लंबे समय से हाशिए पर रहे हैं। इस प्रकार सामाजिक न्याय से लेकर सत्ता-भागीदारी तक की इस कठिन यात्रा में कांशीराम की राजनीतिक दृष्टि एक बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रयोग के रूप में सामने आती है। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती रखी कि क्या यह लोकतांत्रिक व्यवस्था वास्तव में समाज के सभी वर्गों को एक समान अवसर प्रदान कर सकती है? अपने बहुजन आंदोलन के माध्यम से उन्होंने इस कठिन प्रश्न का उत्तर खोजने का जीवन भर प्रयास किया। और उन्होंने यह दिखाया कि संगठित सामाजिक चेतना और राजनीतिक सहभागिता के माध्यम से कोई भी परिवर्तन संभव है。
अंततः यह पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि मान्यवर कांशीराम का योगदान केवल एक राजनीतिक दल की स्थापना करने तक सीमित बिल्कुल नहीं था। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की संरचना में निहित गहरी असमानताओं को उजागर करते हुए सामाजिक न्याय की अवधारणा को एक नई और आक्रामक दिशा दी। उनकी राजनीतिक दृष्टि ने यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र की असली सफलता केवल संवैधानिक प्रावधानों के लिखे होने से नहीं होती है। बल्कि यह समाज के सबसे वंचित वर्गों की सत्ता में वास्तविक भागीदारी से ही सुनिश्चित होती है। भारत का बहुजन आंदोलन इस दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया रहा है। जिसने भारतीय राजनीति को अधिक समावेशी बनाने का शानदार प्रयास किया और लोकतांत्रिक विमर्श में सामाजिक न्याय के अहम प्रश्न को हमेशा के लिए केंद्र में स्थापित कर दिया。
Pawan Singh
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