Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 12 Mar 2026, 01:45 am IST
Taj News Political Desk
विशेष राजनीतिक आलेख
राजेंद्र शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक
वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘लोकलहर’ के संपादक राजेंद्र शर्मा ने अपने इस विशेष राजनीतिक आलेख में बिहार के ताज़ा घटनाक्रम और नीतीश कुमार की ‘राज्यसभा विदाई’ का बेबाक विश्लेषण किया है। उन्होंने भाजपा की ‘यूज एंड डाइजेस्ट’ वाली उस आक्रामक रणनीति का खुलासा किया है, जिसके तहत वह धीरे-धीरे अपने ही क्षेत्रीय सहयोगियों को निगल जाती है। पढ़िए उनका यह प्रखर आलेख:
मुख्य बिंदु
- जदयू कार्यकर्ताओं के भारी विरोध के बावजूद नीतीश कुमार का राज्यसभा के लिए पर्चा भरना और अमित शाह की ‘चाणक्य नीति’।
- पुत्र निशांत कुमार की जदयू में धूमधाम से एंट्री और उन्हें सत्ता (उप-मुख्यमंत्री पद) सौंपने की पृष्ठभूमि।
- महाराष्ट्र (शिंदे मॉडल) की तर्ज पर बिहार में भाजपा का अपना मुख्यमंत्री बनाने का आक्रामक ‘गेम प्लान’।
- क्षेत्रीय दलों (अकाली दल, शिवसेना आदि) के साथ गठबंधन कर अंततः उन्हें पंगु बनाने की भाजपा की ‘अरब और ऊंट’ वाली पुरानी रणनीति।
बिहार की राजनीति में इन दिनों एक बहुत बड़ा नाटक चल रहा है। इस नाटक के पहले अंक में एक चौंकाने वाली घटना हुई। बिहार के मुख्य मंत्री पद पर बने रहते हुए, नीतीश कुमार ने अचानक राज्यसभा की सदस्यता के लिए अपना पर्चा भर दिया। यह पर्चा भरे जाने के संंबंध में दो बातें खास तौर पर गौर करने वाली थीं। पहली बात यह थी कि यह पर्चा नीतीश कुमार की अपनी ही पार्टी, जदयू के मंझले दर्जे के नेताओं और ज़मीनी कार्यकर्ताओं के मुखर विरोध के बावजूद भरा गया। इस व्यापक विरोध की शुरूआत उसी दिन हो गयी थी, जब राज्यसभा के रास्ते से नीतीश कुमार की बिहार से हमेशा के लिए विदाई की खबरें सामने आने लगी थीं। वास्तव में अपने कार्यकर्ताओं के इस मुखर विरोध को किसी तरह शांत करने के लिए नीतीश कुमार ने एक चाल चली। उन्होंने बिहार में अपनी गठजोड़ सरकार में सहयोगी पार्टी भाजपा को अपने ही समर्थकों का निशाना बनने से बचाने के लिए एक अजीबो-गरीब बयान दिया। उन्होंने कहा कि यह उनकी ही खुद की इच्छा थी कि वे राज्यसभा के सदस्य के रूप में भी देश की सेवा करें। उन्होंने यह भी कहा कि वैसे बिहार में सरकार और पार्टी को उनका मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहेगा। जाहिर है कि उनके इस गोलमोल बयान का जदयू कार्यकर्ताओं की गहरी निराशा पर कोई असर नहीं पड़ा। हां, भाजपा को जरूर इस बयान से आलोचनाओं से बचने के लिए कुछ तात्कालिक सहारा मिल गया।
नीतीश कुमार के राज्यसभा का पर्चा भरने के संबंध में दूसरी खास बात भी बहुत अहम थी। इस मौके पर देश के गृहमंत्री और भाजपा में नंबर दो माने जाने वाले अमित शाह खुद वहां मौजूद थे। वे पर्चा भरते समय नीतीश कुमार की बगल में खड़े हुए थे। इस मौके पर अमित शाह की उपस्थिति के कई गहरे राजनीतिक मायने हैं। यह उपस्थिति एक प्रकार से इस बात की याद दिलाने के लिए भी थी कि बिहार की सत्ता में आम तौर पर तथा जदयू में खासतौर पर यह जो संक्रमण हो रहा है, वह उनकी ही ‘चाणक्य नीति’ के लक्ष्यों के पूरे होने का सीधा इशारा कर रहा था। जाहिर है कि अमित शाह खुद अपने हाथों से फैसलों को लागू कराने में विश्वास करते हैं। इस मौके पर खुद उपस्थित रहकर वे यह तो खैर सुनिश्चित कर ही रहे थे कि भाजपा की मनमाफिक कार्ययोजना बिना किसी दिक्कत के अमल में लाई जाए। वे चाहते थे कि इसे जमीन पर उतारने में आखिरी वक्त पर कोई अड़चन बिल्कुल नहीं आने पाए। इस तरह भाजपा ने अपना पहला दांव बहुत ही सफाई से खेल लिया।
अब इस राजनीतिक नाटक के दूसरे अंक की शुरुआत होती है। पूर्व-योजना के अनुसार, पटना में जदयू कार्यालय में बड़ी धूम-धाम के साथ एक नया ऐलान किया गया। नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की औपचारिक राजनीतिक पारी की शुरूआत का ऐलान किया गया। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलायी। हालांकि, औपचारिक तौर पर यह मौका सिर्फ निशांत कुमार के पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने का था। लेकिन इसमें न तो निशांत कुमार को कोई शक था और न उन्हें पार्टी का सदस्य बनाने वाले वरिष्ठ नेताओं को। वे सब जानते थे कि वास्तव में यह निशांत कुमार के पार्टी का नेतृत्व संभालने का ही मौका था। इस मौके पर अपने पहले संबोधन में निशांत कुमार ने बहुत सधी हुई बातें कहीं। उन्होंने नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में ही काम करने का आश्वासन दिया। इसके बाद उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं की राय के अनुसार, पार्टी को मजबूत करने का भरोसा भी दिलाया। उनका यह पूरा अंदाज़ पार्टी का नया नेतृत्व संभालने के मौके के बिल्कुल अनुरूप था। उन्होंने जनता के दिल में घर बनाने की कोशिश करने का जो आश्वासन दिया, वह यह साफ ही कर देता था कि वे इस आयोजन को पार्टी की गद्दी सौंपे जाने के मौके की तरह ही देख रहे थे।
हम सभी को यह याद दिला दें कि बिहार में यह सत्ता परिवर्तन अचानक नहीं हुआ है। यह भाजपा द्वारा पूरी तरह अनुमोदित एक बड़े पैकेज के हिस्से के तौर पर हो रहा है। इसी पैकेज के तहत निशांत कुमार को बिहार सरकार में बहुत महत्वपूर्ण पद सौंपे जाने की चर्चा पहले ही चल रही थी। इन राजनीतिक अनुमानों में आम तौर पर जानकारों की यह राय रही है कि निशांत को जल्द ही उप-मुख्यमंत्री पद सौंपा जा सकता है। क्योंकि मुख्यमंत्री पद भाजपा को दिलवाया जाना तो इस पूरी कसरत का असली और अंतिम मकसद ही है। प्रसंगवश इसका जिक्र भी कर दें कि निशांत कुमार के इस ‘राज्यारोहण’ के समय तक, जदयू के जमीनी कार्यकर्ताओं का असंतोष बिल्कुल भी शांत नहीं हुआ था। इस मौके पर भी पटना के जदयू कार्यालय में भारी बवाल देखने को मिला। पार्टी कार्यकर्ताओं के एक बड़े हिस्से और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के समर्थकों में बाकायदा जमकर मार-पीट हुई। याद रहे कि जदयू कार्यकर्ताओं का एक अच्छा-खासा हिस्सा इस सारे बदलाव को एक बड़ी साज़िश मानता है। वे इसे नीतीश कुमार और जदयू के खिलाफ एक खतरनाक साजिश के रूप में देखते हैं, जिसे पर्दे के पीछे से सीधे केंद्र सरकार तथा भाजपा संचालित कर रही है। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की जदयू और नीतीश कुमार के प्रति वफादारी पर भी अब खुलेआम संदेह जताए जाते रहे हैं।
यह बात भी याद दिला दें कि बिहार में यह सत्ता संक्रमण किसी भी तरह से अप्रत्याशित नहीं है। वास्तव में, पिछले साल राज्य में विधानसभा चुनाव के मौके पर विपक्ष ने एक बड़ा सवाल उठाया था। विपक्ष की ओर से लगातार यह सवाल पूछा जाता रहा था कि क्या भाजपा, चुनाव के बाद गठबंधन के कामयाब होने की सूरत में, अगले पांच साल के लिए मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का नेतृत्व स्वीकार करेगी? विपक्ष ही नहीं, बल्कि अनेक राजनीतिक टिप्पणीकारों ने भी इस आशय के सवाल पूछे थे। इसके बावजूद, भाजपा चुनाव प्रचार के दौरान काफी वक्त तक इस सवाल का स्पष्ट उत्तर देने से हमेशा बचती ही रही थी। इसके बजाय भाजपा सिर्फ यह कहती रही कि वह नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ रही है। लेकिन महाराष्ट्र के कड़वे अनुभव की रौशनी में, चुनाव में जीत के बाद भी नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने पर भारी संदेह बना हुआ था। इसे राजनीति का एक बड़ा इशारा ही माना जा रहा था।
पाठकों को महाराष्ट्र का वह पूरा खेल याद ही होगा। वहां गठजोड़ सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधानसभाई चुनाव लड़े गए थे। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद, विधानसभा में अपनी ताकत ज्यादा होने के तर्क से भाजपा ने अचानक अपना रुख बदल लिया। उसने मुख्यमंत्री पद खुद अपने नाम कर लिया था और शिंदे को धकेल कर सिर्फ उप-मुख्यमंत्री पद पर पहुंचा दिया था। स्वाभाविक रूप से बिहार में भी यह पूछा जा रहा था कि यह मानने का आखिर क्या आधार है कि भाजपा, महाराष्ट्र के इस पैंतरे को बिहार में भी नहीं आजमाएगी। उल्टे नीतीश कुमार के गिरते स्वास्थ्य को लेकर बढ़ते सवालों के बीच, इन अटकलों को और ज्यादा बल ही मिल रहा था। सबको लगने लगा था कि चुनाव में जीत मिली तो भाजपा हर हाल में अपना ही मुख्यमंत्री बनवाएगी।
वास्तव में ये सभी आशंकाएं बिल्कुल सच साबित हो रही हैं। बिहार में 2020 के आखिर में हुए चुनाव के नतीजे में, सत्ताधारी जदयू-भाजपा गठजोड़ में ताकतों के संतुलन में एक बड़ा बदलाव हुआ था। यह बिहार के इतिहास में पहली गठजोड़ सरकार थी, जिसमें एक साथ दो उप-मुख्यमंत्री बनाए गए थे, जो दोनों ही भाजपा से थे। कार्यकाल के बीच में ही जब नीतीश कुमार ने अचानक भाजपा का साथ छोड़ दिया और राजद के साथ गठबंधन सरकार बनाई, तो वह सरकार भी कुछ महीने ही चल सकी। उसके बाद नीतीश कुमार ने एक बार फिर पल्टी मारी और वापस भाजपा के साथ गठजोड़ में पहुंच गए। लेकिन इस पलटी के बाद सिर्फ नीतीश कुमार के प्रति भाजपा का अविश्वास ही नहीं बढ़ा था, बल्कि गठजोड़ सरकार में ताकतों का संतुलन भाजपा ने अपने पक्ष में और भी ज्यादा झुका लिया था। इसके बावजूद, चार महीने पहले विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के फौरन बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री पद पर अधिकार की मांग नहीं की। पर उसने सरकार में ताकत का संतुलन पूरी तरह अपने पक्ष में झुका लिया। इसमें विधानसभा के स्पीकर का अहम पद हासिल करने का विशेष रूप से रणनीतिक महत्व था।
और अब चार महीने बाद ही भाजपा ने अपना आखिरी दांव चल दिया है। उसने मुख्यमंत्री पद हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी है। फिर भी यह सिर्फ नीतीश कुमार की बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में, बीस साल लंबी राजनीतिक पारी के अंतत: खत्म होने का ही मामला नहीं है। यह इसका भी मामला नहीं है कि बिहार में मुख्यमंत्री पद जदयू के हाथ से निकलकर, अब हमेशा के लिए भाजपा के हाथ में पहुंच गया है। दरअसल यह उस दिलचस्प और मारक पैटर्न का एक बड़ा हिस्सा है, जो हर जगह क्षेत्रीय पार्टियों के साथ भाजपा के रिश्तों में हमेशा देखने को मिलता है। जिन राज्यों में मुख्य राजनीतिक विभाजन, कांग्रेस और उसके विरोध में सामने आयी क्षेत्रीय पार्टियों के बीच रहा है, उन राज्यों में अपना पांव जमाने के लिए भाजपा एक खास रणनीति अपनाती है। वह पहले जूनियर पार्टनर के तौर पर इन क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठजोड़ करती है। उसके बाद, ऐसे हरेक मामले में ‘अरब और उसके ऊंट’ वाले मशहूर किस्से को दोहराया गया है। जिसमें ऊंट सर्दी के बचने के लिए थोड़ा-थोड़ा कर के अरब के तंबू में घुसने की इजाजत मांगता है और होते-होते अंत में होता यह है कि पूरा ऊंट तंबू में आ जाता है और तंबू का मालिक अरब तंबू के बाहर कर दिया जाता है।
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, असम में असम गण परिषद, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और महाराष्ट्र में शिव सेना का बिल्कुल यही कड़वा अनुभव रहा है। यही पुराना पैटर्न अब बिहार में भी जदयू के साथ पूरी तरह दोहराया जा रहा है। हां! यह खेल हमेशा समान रूप से कामयाब ही रहा हो, ऐसा भी नहीं है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु में, ये प्रयोग संघ-भाजपा के लिए कहीं ज्यादा मुश्किल साबित हुए हैं। फिर भी कुल मिलाकर, उनका राजनीतिक पैटर्न यही है कि क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ कर के सत्ता तक पहुंच बना ली जाए। सत्ता में आने के बाद, संघ-भाजपा जोड़ी अपने उन्हीं क्षेत्रीय सहयोगियों के वोट बैंक और आधार को धीरे-धीरे हड़प कर जाती है। वह अपने सहयोगी पार्टियों को पूरी तरह निगल ही जाती है या उन्हें राजनीतिक रूप से पूरी तरह सेे पंगु बनाकर छोड़ देती है। यह कोई हैरानी की बात नहीं होगी कि नीतीश कुमार की विदाई के बाद, संघ-भाजपा जोड़ी विभिन्न हथकंडों से जदयू को भी पूरी तरह इसी खत्म होने के रास्ते पर लगा दे।
लेकिन, किसी एकाधिकारी प्रकृति की, वास्तव में फासीवादी प्रकृति की राजनीतिक पार्टी से हम और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। जहां गठबंधन का आधार ही किसी न किसी तरह सिर्फ सत्ता में हिस्सा हासिल करना होता है। इन गठबंधनों का मकसद सहयोगी पार्टियों के साथ मिलकर जनहित के किसी साझा कार्यक्रम को पूरा करना बिल्कुल नहीं होता है। इन तमाम वर्षों में हमारे देश में वामपंथी पार्टियों के नेतृत्व वाले गठबंधन ही वैचारिक प्रकृति के मजबूत गठबंधन साबित हुए हैं। वामपंथी दल अपने सहयोगियों के आधार की कीमत पर अपना विस्तार करने की रणनीति पर नहीं चलते हैं। वे सहयोगियों के साथ मिलकर अपने साझा आधार को बढ़ाने की नीति पर चलते हैं। इसीलिए, वामपंथी नेतृत्ववाले गठबंधन हमेशा ज्यादा मजबूत तथा राजनीति में सदाबहार साबित होते हैं। जबकि इसके ठीक विपरीत भाजपा के गठबंधन सिर्फ ‘यूज एंड थ्रो’ (इस्तेमाल करो और फेंको) और ‘यूज एंड डाइजेस्ट’ (इस्तेमाल करो और निगल जाओ) के ही बेहतरीन उदाहरण साबित हुए हैं। नीतीश कुमार जिस सत्ता को अपने बेटे को उत्तराधिकार में सौंपने के लिए, शाह द्वारा प्रायोजित संक्रमण योजना के साझीदार बने हैं, वह सत्ता पूरी तरह संघ-भाजपा के कब्जे में आने में अब शायद ज्यादा समय नहीं लगेगा। बिहार की राजनीति का यह ऊंट अब पूरी तरह से तंबू में प्रवेश कर चुका है।
Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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