70 मंजिल के एक टावर की योजना से शुरू हुआ था वर्ल्ड ट्रेड सेंटर; 110 मंजिला ट्विन टावर्स बने इंजीनियरिंग की मिसाल, 9/11 में तबाह हुए और अब उसी जगह 1,776 फीट ऊंचा वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर खड़ा है
स्पेशल डेस्क, 🌐 tajnews.in | शुक्रवार, 11 सितंबर 2026, 07:24:04 AM IST

tajnews.in | स्पेशल डेस्क। न्यूयॉर्क के लोअर मैनहैटन की पहचान कभी आसमान को छूते दो विशाल टावरों से होती थी। 110 मंजिला वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर्स सिर्फ अमेरिका की आर्थिक ताकत का प्रतीक नहीं थे, बल्कि आधुनिक इंजीनियरिंग की ऐसी मिसाल भी थे, जिसने दुनिया का ध्यान खींचा। फिर 11 सितंबर 2001 की सुबह सब कुछ बदल गया। आतंकी हमले में दोनों टावर ढह गए और करीब 3,000 लोगों की जान चली गई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जिस जगह कभी ट्विन टावर्स खड़े थे, वहां बाद में स्मारक, संग्रहालय, परिवहन केंद्र और नई गगनचुंबी इमारतों वाला नया वर्ल्ड ट्रेड सेंटर विकसित हुआ। आज 9/11 की 25वीं बरसी पर इस जगह की कहानी सिर्फ आतंक और तबाही की कहानी नहीं है। यह एक विशाल निर्माण परियोजना, असाधारण इंजीनियरिंग, विनाश और उसके बाद हुए पुनर्निर्माण की भी कहानी है।
70 मंजिल के एक टावर से शुरू हुआ था सपना
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की कल्पना 1960 के आसपास आकार लेने लगी थी। मकसद था न्यूयॉर्क के लोअर मैनहैटन में ऐसा अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र विकसित करना, जो दुनिया भर के कारोबार को आकर्षित कर सके। शुरुआती योजना में करीब 70 मंजिल के एक टावर की बात थी। लेकिन योजना धीरे-धीरे बड़ी होती गई और आखिरकार दो विशाल 110 मंजिला टावरों का डिजाइन तैयार हुआ। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के वास्तुशिल्प डिजाइन में मिनोरू यामासाकी और एमरी रोथ एंड सन्स की भूमिका रही। नतीजा यह हुआ कि न्यूयॉर्क के क्षितिज पर ऐसी इमारतें खड़ी हुईं, जो उस दौर में अपनी ऊंचाई और डिजाइन के कारण दुनिया का ध्यान खींचने लगीं।
1,300 फीट से ज्यादा ऊंचे थे ट्विन टावर्स
नॉर्थ टावर की ऊंचाई 1,368 फीट और साउथ टावर की 1,362 फीट थी। दोनों में 110-110 मंजिलें थीं। बाद में नॉर्थ टावर पर एंटीना लगाया गया, जिससे उसकी कुल ऊंचाई करीब 1,728 फीट तक पहुंच गई। लेकिन इन इमारतों की असली खासियत केवल ऊंचाई नहीं थी। इनका डिजाइन इस तरह तैयार किया गया था कि इतनी ऊंची इमारतें तेज हवाओं और अपने विशाल भार को संभाल सकें।
नदी के किनारे बनी इतनी गहरी नींव
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का निर्माण जिस इलाके में हुआ, उसका एक बड़ा हिस्सा लैंडफिल से विकसित किया गया था। इतनी ऊंची इमारतों के लिए मजबूत आधार जरूरी था और इसके लिए बेडरॉक तक पहुंचना पड़ा, जो जमीन की सतह से करीब 70 फीट नीचे था। निर्माण के दौरान 10 लाख घन गज से अधिक मिट्टी और चट्टान हटाई गई। इस सामग्री का एक बड़ा हिस्सा हडसन नदी के किनारे बैटरी पार्क सिटी के लिए जमीन तैयार करने में इस्तेमाल हुआ।
निर्माण क्षेत्र में हडसन नदी का पानी न घुसे, इसके लिए करीब 3,500 फीट लंबी भूमिगत स्लरी वॉल बनाई गई। इसमें 158 पैनल थे। इसके बाद अंदर की जमीन हटाकर बेडरॉक तक पहुंच बनाई गई और उसी मजबूत आधार पर टावरों का निर्माण हुआ।
1966 में शुरू हुआ निर्माण
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का निर्माण 5 अगस्त 1966 को शुरू हुआ। शुरुआती वर्षों में भूमिगत हिस्से पर बड़े पैमाने पर काम किया गया और 1968 के बाद टावरों का ऊर्ध्वाधर निर्माण तेजी से आगे बढ़ा। नॉर्थ टावर दिसंबर 1970 में और साउथ टावर जुलाई 1971 में पूरा हुआ। पूरे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर का आधिकारिक उद्घाटन 4 अप्रैल 1973 को हुआ।
परियोजना पर हजारों लोगों ने काम किया। निर्माण के सबसे व्यस्त दौर में एक समय करीब 7,000 से 8,000 लोग तक इसमें जुटे थे। शुरुआती करीब 57.5 करोड़ डॉलर का लागत अनुमान बढ़कर 1973 तक लगभग 80 करोड़ डॉलर हो गया था।
बाहरी ढांचा ही था टावरों की बड़ी ताकत
ट्विन टावर्स को फ्रेम्ड-ट्यूब स्ट्रक्चर के सिद्धांत पर तैयार किया गया था। इसका मतलब था कि इमारत का बाहरी ढांचा उसकी संरचनात्मक ताकत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। इस डिजाइन में बाहरी स्तंभ हवा से पैदा होने वाले क्षैतिज दबाव को संभालने में मदद करते थे, जबकि केंद्रीय कोर में लिफ्ट, सीढ़ियां और दूसरी जरूरी सुविधाएं थीं। इस तकनीक का एक बड़ा फायदा यह था कि कार्यालयों के अंदर बहुत ज्यादा स्तंभों की जरूरत नहीं पड़ी। इससे अपेक्षाकृत बड़े और खुले कार्यालय क्षेत्र तैयार किए जा सके।
110 मंजिल तक पहुंचने के लिए बनी खास लिफ्ट व्यवस्था
इतनी ऊंची इमारतों में हर मंजिल तक अलग लिफ्ट चलाना व्यावहारिक नहीं था। इसलिए ट्विन टावर्स में एक्सप्रेस और लोकल लिफ्ट की व्यवस्था की गई। यात्री एक्सप्रेस लिफ्ट से स्काई लॉबी तक जाते और वहां से लोकल लिफ्ट के जरिए अपनी मंजिल तक पहुंचते थे। दोनों टावरों में मिलाकर कुल 198 लिफ्ट थीं और लिफ्ट शाफ्ट की कुल लंबाई करीब 15 मील बताई जाती है।
लाखों टन स्टील और हजारों खिड़कियां
इतनी विशाल परियोजना में स्टील और कंक्रीट का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर हुआ। आधिकारिक दस्तावेजों में दो टावरों और संबंधित भूमिगत हिस्सों के निर्माण के लिए करीब 1,92,000 टन स्टील के निर्माण और इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है। पूरे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर में चार लाख घन गज से ज्यादा कंक्रीट का इस्तेमाल हुआ। दोनों टावरों में करीब 43,600 खिड़कियां थीं। यह केवल दो इमारतों का परिसर नहीं था। ट्विन टावर्स के आसपास प्लाजा, भूमिगत कॉनकोर्स और दूसरी इमारतें भी थीं, जो मिलकर एक विशाल कारोबारी परिसर बनाती थीं।
2001 तक 430 से ज्यादा कंपनियों का ठिकाना
9/11 से पहले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर में सात इमारतें थीं। यहां 430 से अधिक कंपनियां और 28 देशों से जुड़ी कारोबारी संस्थाएं मौजूद थीं। परिसर में करीब एक करोड़ वर्ग फीट किराये योग्य कार्यालय क्षेत्र था। इस वजह से वर्ल्ड ट्रेड सेंटर न्यूयॉर्क के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था का भी एक प्रमुख केंद्र बन चुका था।
फिर आई 11 सितंबर 2001 की वह सुबह
11 सितंबर 2001 को चार यात्री विमानों को आतंकवादियों ने हाईजैक किया। इनमें से दो विमानों को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर्स से टकराया गया। सुबह 8:46 बजे अमेरिकन एयरलाइंस की फ्लाइट 11 नॉर्थ टावर से टकराई। इसके करीब 16 मिनट बाद, सुबह 9:02 बजे, यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 175 साउथ टावर से टकराई। दोनों टावर विमानों की टक्कर के तुरंत बाद नहीं गिरे। लेकिन टक्कर से इमारत के कई हिस्सों को गंभीर नुकसान पहुंचा। कई स्थानों पर स्टील की फायरप्रूफिंग भी क्षतिग्रस्त हुई और विमान के ईंधन से लगी भीषण आग ने कई मंजिलों पर तापमान बेहद बढ़ा दिया।
क्या आग से स्टील पिघल गया था?
9/11 के बाद सबसे ज्यादा पूछे गए तकनीकी सवालों में से एक यही था कि क्या आग की गर्मी से टावरों का स्टील पिघल गया था। राष्ट्रीय मानक एवं प्रौद्योगिकी संस्थान यानी NIST की जांच के मुताबिक, स्टील का पिघलना जरूरी नहीं था। विमान की टक्कर से संरचनात्मक नुकसान और फायरप्रूफिंग को हुई क्षति के बाद लगी भीषण आग ने फर्श और स्टील की संरचना को कमजोर किया। गर्मी के कारण फर्श झुकने लगे और उन्होंने बाहरी स्तंभों को अंदर की ओर खींचा। इसके बाद बाहरी स्तंभ ऊपर का भार संभालने में असमर्थ होने लगे और ढहने की प्रक्रिया शुरू हुई। NIST की जांच में नियंत्रित विस्फोट से टावर गिराए जाने का कोई प्रमाण नहीं पाया गया।
बाद में हमला हुआ, फिर भी साउथ टावर पहले गिरा
9/11 की घटनाओं में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस टावर पर विमान बाद में टकराया था, वही पहले गिरा। सुबह 9:58 बजे साउथ टावर ढह गया। विमान की टक्कर के करीब 56 मिनट बाद। इसके बाद सुबह 10:28 बजे नॉर्थ टावर भी ढह गया। यानी विमान के टकराने के करीब 102 मिनट बाद। ट्विन टावर्स के साथ वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर का बड़ा हिस्सा भी तबाह हो गया।
विनाश के बाद शुरू हुई पुनर्निर्माण की लंबी यात्रा
ट्विन टावर्स के नष्ट होने के बाद सवाल था—इस जगह का भविष्य क्या होगा? आखिरकार लोअर मैनहैटन के इस इलाके के व्यापक पुनर्विकास की योजना तैयार हुई। पुराने टावरों की जगह सीधे वैसी ही दो इमारतें खड़ी करने के बजाय यहां स्मारक, संग्रहालय, परिवहन केंद्र और नई ऊंची इमारतों वाला पूरा परिसर विकसित किया गया। जहां कभी ट्विन टावर्स खड़े थे, वहीं आज दो विशाल जलकुंड हैं। ये 9/11 मेमोरियल का हिस्सा हैं। इनके किनारों पर 11 सितंबर 2001 के हमले और 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम धमाके में मारे गए लोगों के नाम अंकित हैं। यानी जिस स्थान को कभी व्यापार और ऊंची इमारतों के लिए जाना जाता था, उसका एक बड़ा हिस्सा अब स्मृति और श्रद्धांजलि का स्थल भी है।
1,776 फीट ऊंचा वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर
नए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर की सबसे प्रमुख इमारत है वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर। इसकी ऊंचाई 1,776 फीट रखी गई। यह संख्या प्रतीकात्मक है और 1776 में अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा की ओर संकेत करती है। इमारत में 104 मंजिलें हैं और इसका निर्माण 2014 में पूरा हुआ। इस तरह पुराने ट्विन टावर्स की जगह विकसित नए परिसर में एक ऐसी गगनचुंबी इमारत खड़ी हुई, जिसकी ऊंचाई खुद अमेरिकी इतिहास के एक महत्वपूर्ण वर्ष को प्रतीक के रूप में सामने रखती है।
ट्विन टावर्स से नई पहचान तक
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की कहानी को सिर्फ दो इमारतों के निर्माण और उनके ढहने तक सीमित करना मुश्किल है। यह कहानी उस दौर की है जब न्यूयॉर्क ने दुनिया के सामने इंजीनियरिंग की एक नई ऊंचाई पेश की। फिर 11 सितंबर 2001 को वही स्थान आतंकवादी हमले की भयावहता का प्रतीक बन गया। और इसके बाद उसी जमीन पर स्मृति, पुनर्निर्माण और नई वास्तुकला की एक पूरी दुनिया खड़ी हुई। ट्विन टावर्स अब नहीं हैं, लेकिन उनकी जगह खड़ा नया वर्ल्ड ट्रेड सेंटर उस इतिहास को मिटाता नहीं, बल्कि उसके साथ खड़ा दिखाई देता है। यही वजह है कि 9/11 की 25वीं बरसी पर न्यूयॉर्क के इस हिस्से को देखना सिर्फ अतीत को याद करना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि एक शहर किस तरह अपनी सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक के बाद खुद को दोबारा गढ़ता है।
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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