जब आस्था शोर बन जाए: त्योहारों के प्रदूषण का बढ़ता खतरा
बृज खंडेलवाल द्वारा | 8 सितंबर 2026
प्रमुख अंश (Highlights):
- डेसिबल में सिमटती भक्ति: सादगी और सामुदायिक सहभागिता से दूर होकर कानफोड़ू डीजे, लाउडस्पीकर और शक्ति प्रदर्शन की होड़ में तब्दील होते पारंपरिक उत्सव।
- ध्वनि प्रदूषण नियमों की अनदेखी: नॉइज़ पॉल्यूशन रूल्स 2000 और साइलेंस जोन के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद रात 10 बजे के बाद भी बजते डीजे और कमजोर प्रशासनिक कार्रवाई।
- मरीजों, बुजुर्गों और बच्चों पर असर: तेज ध्वनि और रासायनिक मूर्तियों के विसर्जन से स्वास्थ्य, नींद और पढ़ाई पर सीधा आघात; आस्था का दूसरों की असुविधा से टकराव।
- मूल भावना की ओर लौटने का आह्वान: बाल गंगाधर तिलक के सामाजिक चेतना के आदर्श, प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमाओं और शांत वातावरण के साथ जिम्मेदार उत्सव मनाने की अपील।

बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरणविद् व नागरिक सरोकार विश्लेषक
पर्यावरण संरक्षण, ध्वनि व जल प्रदूषण, विरासत संवर्धन और नागरिक अधिकारों पर दशकों से निरंतर मुखर व निर्भीक स्तंभकार।
त्योहार खुशियाँ लाते हैं। वे लोगों को जोड़ते हैं और रिश्तों में मिठास घोलते हैं। लेकिन जब भक्ति का वॉल्यूम इतना बढ़ जाए कि पूरा मोहल्ला परेशान हो जाए, तो सवाल उठना लाज़िमी है।
कभी त्योहार सादगी, श्रद्धा, लोक संगीत और सामुदायिक भागीदारी से जुड़े थे। मिट्टी की मूर्ति बनती थी और श्रद्धा के साथ उसका विसर्जन होता था। आज तस्वीर काफी बदल गई है।
ऊँचे लाउडस्पीकर, डीजे, बड़े साउंड सिस्टम, रीमिक्स गाने और लंबी शोभायात्राएँ त्योहारों का हिस्सा बनते जा रहे हैं। कई बार भक्ति कम और शोर ज्यादा सुनाई देता है।
त्योहारों का प्रदूषण केवल पानी और मूर्तियों तक सीमित नहीं है। शोर भी अब गंभीर प्रदूषण बन चुका है।
कर्नाटक के कोडागु जिले में पुलिस ने हाल ही में आयोजकों को ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का पालन करने की चेतावनी दी है। संदेश साफ है: उत्सव मनाइए, लेकिन कानून की हद में।
कानून स्पष्ट है, फिर अमल कहाँ है?
कानून भी बिल्कुल स्पष्ट है।
Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत बनाए गए हैं। इनमें अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ध्वनि की सीमा तय है। लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल पर भी नियम लागू होते हैं। सामान्यतः रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक तेज आवाज पर रोक रहती है।
अस्पतालों, स्कूलों और रिहायशी इलाकों में तो और ज्यादा एहतियात जरूरी है। आखिर किसी मरीज की बीमारी, किसी बच्चे की नींद और किसी विद्यार्थी की पढ़ाई पर डीजे की मर्जी क्यों चले?
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है: कानून है, फिर अमल कहाँ है?
हर त्योहार पर अक्सर वही कहानी दोहराई जाती है। आयोजक अनुमति लेते हैं और नियम मानने का भरोसा देते हैं। फिर डीजे शुरू होता है। आवाज बढ़ती जाती है और पूरा मोहल्ला बिना अपनी मर्जी के कार्यक्रम का हिस्सा बन जाता है।
शिकायत करने पर कभी पुलिस आती है, कभी नहीं। कई बार चेतावनी देकर मामला खत्म हो जाता है। इससे गलत संदेश जाता है कि त्योहारों में नियम थोड़े ढीले चल सकते हैं।
यही सोच असली समस्या है।
प्रशासन की अपनी मुश्किलें भी हैं। एक साथ कई कार्यक्रम होते हैं। पुलिस बल सीमित होता है। ध्वनि मापने के उपकरण भी हर जगह तुरंत उपलब्ध नहीं होते। लेकिन इन परेशानियों का अर्थ यह नहीं कि कानून को ताक पर रख दिया जाए।
सामाजिक चेतना बनाम शक्ति प्रदर्शन
गणेश चतुर्थी का इतिहास हमें उत्सव की असली ताकत भी याद दिलाता है। 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप दिया। इसका उद्देश्य लोगों को जोड़ना और सामाजिक चेतना पैदा करना था।
आज वही उत्सव कई जगह शक्ति प्रदर्शन की होड़ में बदलता दिखाई देता है। बड़े मंच, बड़े स्पीकर, बड़े जुलूस और उससे भी बड़ा शोर, मानो भक्ति की गहराई डेसिबल से मापी जाने लगी हो।
यह भी भूलना नहीं चाहिए कि विसर्जन के दौरान भीड़, यातायात, पर्यावरण और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियाँ पैदा होती हैं। उत्सव जब दूसरे नागरिकों के अधिकारों से टकराने लगे, तब आत्ममंथन जरूरी है।
मूल भावना और पर्यावरण की रक्षा
इसका अर्थ त्योहार बंद करना नहीं है। जरूरत त्योहारों की मूल भावना वापस लाने की है।
आयोजकों को अनुमति पहले लेनी चाहिए। तय रास्ते, समय और ध्वनि सीमा का पालन होना चाहिए। डीजे मनोरंजन करे, पड़ोसियों को परेशान न करे।
मरीज को शांति चाहिए। बच्चे को नींद चाहिए। बुजुर्ग को सुकून चाहिए। विद्यार्थी को पढ़ाई के लिए खामोशी चाहिए। इन जरूरतों का सम्मान करना भी धर्म और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
पर्यावरण की चिंता भी उतनी ही जरूरी है। पीओपी की मूर्तियाँ, रासायनिक रंग और प्रदूषित जल विसर्जन हमारी आस्था की कीमत नहीं हो सकते। मिट्टी की मूर्ति, प्राकृतिक रंग और जिम्मेदार विसर्जन उत्सव को सुंदर भी बनाते हैं और टिकाऊ भी।
आस्था और सार्वजनिक मर्यादा
आखिर भक्ति वह नहीं, जो दूसरों को बेचैन कर दे। धर्म वह नहीं, जो पड़ोसी की नींद हराम कर दे।
गणेश को विघ्न विनाशक कहा जाता है, बाधाओं को दूर करने वाला। उनके प्रति सच्ची श्रद्धा यही होगी कि हमारा उत्सव खुद किसी के लिए नया विघ्न न बने।
आस्था और पर्यावरण साथ चल सकते हैं। आस्था और कानून भी साथ चल सकते हैं। लेकिन आस्था और सार्वजनिक परेशानी का कोई मेल नहीं।
त्योहार हमारी खुशी हैं। उन्हें किसी और की सजा नहीं बनना चाहिए।
त्योहार श्रद्धा के हों, प्रदूषण के नहीं।
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