संपादकीय डेस्क, 🌐 tajnews.in | गुरुवार, 3 सितंबर 2026, 01:40:00 PM IST

प्रधान संपादक की कलम से
सिंधु का पानी और भारत का फैसला: अदालत के आदेश से आगे की असली लड़ाई
(विशेष संपादकीय : पवन सिंह, प्रधान संपादक, ताज न्यूज़)
प्रमुख अंश (Highlights):
- हेग अदालत का फैसला और भारत का कड़ा रुख: परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले और उसकी अधिकार क्षेत्र की वैधता को सिरे से खारिज करने का भारतीय कूटनीतिक निर्णय।
- आतंकवाद और संधि साथ-साथ नहीं: पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को स्थगित करने का ठोस आधार—जब तक सीमा पार आतंकवाद बंद नहीं होता, तब तक सामान्य रिश्ते असंभव।
- पश्चिमी नदियों पर बुनियादी ढांचे का विस्तार: सिंधु, झेलम और चेनाब पर रतले व अन्य जलविद्युत परियोजनाओं के जरिए संधि-स्वीकृत जल संसाधनों के अधिकतम दोहन की रणनीति।
- पाकिस्तान के समक्ष चौतरफा संकट: अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दांवपेचों के बावजूद आंतरिक जल कुप्रबंधन, भंडारण की कमी और जलवायु परिवर्तन की विकराल चुनौतियां।

Thakur Pawan Singh
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि का विवाद अब केवल पानी के बंटवारे का मामला नहीं रह गया है। इसमें आतंकवाद है, राष्ट्रीय सुरक्षा है, अंतरराष्ट्रीय कानून है, कूटनीति है और सबसे बढ़कर भारत की बदलती रणनीतिक सोच है।
हाल में हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने भारत के खिलाफ सिंधु जल संधि और रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े फैसले दिए हैं। अदालत का कहना है कि भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित करने का निर्णय संधि और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है। लेकिन भारत का जवाब भी उतना ही स्पष्ट है—वह न केवल इन फैसलों को मानने से इनकार करता है, बल्कि इस अदालत की वैधता को भी स्वीकार नहीं करता।
यहीं से इस पूरे विवाद की असली कहानी शुरू होती है।
भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित करने का निर्णय लिया था। भारत का तर्क है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को विश्वसनीय और स्थायी रूप से समाप्त नहीं करता, तब तक सामान्य संबंधों की तरह इस संधि को चलाना संभव नहीं है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाना चाहता है। उसके लिए अदालत के ये फैसले केवल कानूनी दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि भारत के खिलाफ कूटनीतिक हथियार भी हैं।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। अदालत का फैसला आ जाने और पानी का प्रवाह रुक जाने में बहुत बड़ा अंतर है।
भारत ने अभी पाकिस्तान की ओर बहने वाला पानी बंद नहीं किया है। और सच यह भी है कि मौजूदा ढांचे में भारत के लिए अचानक ऐसा कर पाना आसान नहीं है। सिंधु, झेलम और चेनाब जैसी पश्चिमी नदियों का पानी विशाल प्राकृतिक प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है। पानी रोकने के लिए केवल राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि विशाल जल भंडारण और अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
यही कारण है कि भारत की असली रणनीति शायद अदालत के फैसले का जवाब देने से कहीं अधिक व्यापक है।
भारत अब पश्चिमी नदियों पर अपनी संधि-स्वीकृत क्षमताओं और जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना चाहता है। वर्षों से पाकिस्तान की आपत्तियों, तकनीकी विवादों और अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं के कारण कई परियोजनाएं धीमी पड़ी रहीं। अब भारत का रुख अधिक स्पष्ट दिखाई देता है—यदि पानी राष्ट्रीय संसाधन है तो भारत अपनी भौगोलिक और तकनीकी क्षमता के अनुसार उसका उपयोग बढ़ाएगा।
रतले परियोजना और विश्वास का संकट
रतले परियोजना का विवाद भी इसी बड़े संघर्ष का हिस्सा है।
पाकिस्तान ने भारत की कुछ जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन पर आपत्ति जताई है। उसका तर्क है कि बांधों और जल नियंत्रण संरचनाओं का स्वरूप संधि की शर्तों के अनुरूप होना चाहिए। भारत का तर्क है कि उसकी परियोजनाएं जलविद्युत उत्पादन के लिए हैं और संधि के प्रावधानों के भीतर हैं।
यहां विवाद केवल इंजीनियरिंग का नहीं है। इसके पीछे विश्वास का संकट है।
1960 में हुई सिंधु जल संधि को दुनिया के सबसे सफल जल समझौतों में गिना जाता रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुए, सीमाओं पर तनाव बढ़ा, राजनीतिक संबंध टूटे, लेकिन यह संधि लंबे समय तक चलती रही। इसलिए आज जब भारत इसे स्थगित स्थिति में रख रहा है, तो इसका संदेश केवल इस्लामाबाद तक सीमित नहीं है।
भारत यह संकेत दे रहा है कि आतंकवाद और सामान्य सहयोग एक साथ नहीं चल सकते।
अदालत के फैसले के बाद कूटनीतिक दिशा
अब सवाल यह है कि अदालत के फैसले के बाद आगे क्या होगा?
संभवतः पाकिस्तान इन फैसलों को संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाएगा। वह भारत को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करेगा जो अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं को स्वीकार नहीं कर रहा।
लेकिन भारत की स्थिति अलग है। भारत कहता है कि जिस प्रक्रिया से यह अदालत बनी, वही विवादित है। भारत का तर्क है कि संधि में विवाद समाधान के लिए पहले से निर्धारित तंत्र मौजूद था और एक ही मुद्दे पर समानांतर प्रक्रियाएं नहीं चलाई जा सकतीं।
इसलिए भारत के लिए यह केवल किसी फैसले को न मानने का मामला नहीं है। भारत मूल प्रश्न उठा रहा है—क्या जिस मंच ने फैसला दिया है, वह स्वयं वैध अधिकार रखता है?
यही कानूनी बहस आने वाले समय में और तेज होगी।
लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अदालतों में नहीं, जमीन पर तय होगा।
भारत को यह देखना होगा कि वह अपनी जल परियोजनाओं, जलविद्युत उत्पादन, जल भंडारण और नदी प्रबंधन की क्षमता कितनी तेजी से बढ़ा सकता है। यदि भारत के पास पश्चिमी नदियों के पानी का अधिक प्रभावी उपयोग करने के लिए पर्याप्त परियोजनाएं और संरचनाएं होंगी, तभी उसका रणनीतिक विकल्प वास्तव में मजबूत होगा।
पाकिस्तान के सामने गंभीर आंतरिक चुनौतियां
दूसरी तरफ पाकिस्तान के सामने भी गंभीर चुनौती है।
पानी की समस्या को केवल भारत के कदमों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी, भूजल का अत्यधिक दोहन, अपर्याप्त जल भंडारण और कमजोर जल प्रबंधन पाकिस्तान के सामने पहले से बड़ी चुनौतियां हैं। भारत के साथ अनिश्चितता बढ़ने से पाकिस्तान पर अपने जल संसाधनों को बेहतर ढंग से संभालने का दबाव और बढ़ सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सिंधु जल संधि फिर पहले की तरह सामान्य रूप से लागू हो सकेगी?
फिलहाल इसके आसार कमजोर दिखाई देते हैं। भारत ने अपनी शर्त स्पष्ट कर दी है। पाकिस्तान के लिए भी मौजूदा संधि एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है, इसलिए उसके लिए नए सिरे से बातचीत करना आसान निर्णय नहीं होगा।
इस बीच सबसे बड़ी विडंबना यह है कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव चाहे जितना बढ़ जाए, नदियां अपनी दिशा में बहती रहेंगी।
पानी सीमाओं को नहीं पहचानता, लेकिन पानी की राजनीति सीमाओं को और कठोर बना सकती है।
सिंधु जल विवाद अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां केवल अदालत का फैसला अंतिम उत्तर नहीं दे सकता। असली जवाब भारत की कूटनीति, पाकिस्तान की रणनीति और दोनों देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति में छिपा है।
भारत के लिए चुनौती साफ है—अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करते हुए अपनी कानूनी स्थिति मजबूत रखना और साथ ही अपनी जल परियोजनाओं को गति देना।
पाकिस्तान के लिए चुनौती भी उतनी ही गंभीर है—कूटनीतिक जीत को वास्तविक जल सुरक्षा में बदलना।
और अंततः, इस पूरी लड़ाई के केंद्र में कोई अदालत या कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि वह पानी है जिस पर करोड़ों लोगों का भविष्य निर्भर करता है।
सिंधु की धाराएं अभी बह रही हैं। लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों में पानी का प्रवाह अब पहले जैसा नहीं रहा।
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