छिपकलियों, कॉकरोचों और मेंढकों को भी समझना होगा: मौजूदा निज़ाम की निरंतरता क्यों ज़रूरी है : बृज खंडेलवाल

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आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | शनिवार, 29 अगस्त 2026, 03:55:00 PM IST

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छिपकलियों, कॉकरोचों और मेंढकों को भी समझना होगा: मौजूदा निज़ाम की निरंतरता क्यों ज़रूरी है

बृज खंडेलवाल

प्रमुख अंश (Highlights):

  • सियासी स्थिरता और नीतियों का परिणाम: 2014 के बाद देश में नीतियों को लंबा समय मिलने और बार-बार सत्ता परिवर्तन की उथल-पुथल से बचने का लाभ।
  • संवैधानिक संस्थाएं और लोकतांत्रिक सहनशक्ति: विरोध, आंदोलनों और वैचारिक असहमति के बावजूद राष्ट्रपति शासन के हथियार से बचते हुए व्यवस्था का निरंतर चलना।
  • वैश्विक मंच पर रणनीतिक स्वायत्तता: किसी एक महाशक्ति का पिछलग्गू बनने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति, ‘Brand India’ का विस्तार और कूटनीतिक संतुलन।
  • स्थिरता बनाम राजनीतिक प्रयोग: बिना सोचे-समझे व्यवस्था को प्रयोगशाला बनाने के बजाय निरंतरता के साथ सुधार करने की व्यावहारिक आवश्यकता।

किसी भी मुल्क की सियासत में बदलाव ज़रूरी है, लेकिन हर बदलाव बेहतर हो, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी जो व्यवस्था मुश्किलों के बावजूद स्थिर हो गई हो, उसे अचानक बदलना खुद एक बड़ा जोखिम बन जाता है। भारत के लिए 2014 के बाद का दौर इसी सवाल को बार बार उठाता है। क्या निरंतरता को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाए कि बदलाव आकर्षक लगता है?

2014 के बाद भारत के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी खूबी सियासी स्थिरता रही है। सरकारें अपना कार्यकाल पूरा कर रही हैं और नीतियों को समय मिल रहा है। पहले की तरह बार-बार सत्ता बदलने और नीतियों के पलटने की बेचैनी अपेक्षाकृत कम हुई है।

निरंतरता का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी नीति को नतीजा देने का मौका मिलता है। हर नई सरकार अगर पुरानी लकीर मिटाकर नई लकीर खींचे, तो देश आगे बढ़ने के बजाय फाइलों में ही उलझा रहेगा।

भारत जैसे विशाल और विविध देश में केंद्र और राज्यों के रिश्ते बेहद अहम हैं। पिछले बारह वर्षों में विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों के साथ केंद्र के रिश्तों को लेकर बहस और आरोप जरूर हुए हैं, लेकिन राष्ट्रपति शासन को सामान्य राजनीतिक हथियार बनाने की कोई परंपरा नहीं बनी।

संवैधानिक संस्थाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई है। संसद, अदालतें, चुनाव व्यवस्था और पंचायतों से लेकर राज्यों तक लोकतांत्रिक संस्थाएं लगातार काम करती रही हैं। असहमति भी रही, विरोध भी हुआ और सड़कों पर आंदोलन भी हुए। मगर लोकतंत्र का पहिया चलता रहा।

यही किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा है। सरकार से सहमत होना लोकतंत्र नहीं है। असहमति के बावजूद व्यवस्था का चलते रहना लोकतंत्र है।

पिछले बारह साल फूलों की सेज नहीं रहे। आतंकवादी हमले हुए, नागरिक आंदोलनों ने सरकार को चुनौती दी और विपक्ष ने कई मुद्दों पर तीखा विरोध किया। संसद में भी खूब हंगामा हुआ और सियासी बयानबाज़ी ने कई बार मर्यादा की सीमा छुई।

फिर भी व्यवस्था बिखरी नहीं। विरोध अपनी जगह रहा और शासन अपनी जगह। आंदोलन हुए, लेकिन देश चलता रहा। यही सिस्टम की सहनशक्ति है।

लोकतंत्र कोई ऐसा पंखा नहीं है जिसे स्विच दबाते ही चलना शुरू कर दें। इसे चलाए रखने के लिए संस्थाओं, परंपराओं और जनता के भरोसे की जरूरत होती है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की हैसियत बदली है। Brand India को लेकर आत्मविश्वास बढ़ा है। विदेशों में बसे भारतीयों ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं और समाजों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।

बड़ी ताकतों के दबाव के बीच भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश की है। अमेरिका हो, रूस हो या कोई और ताकत; नई दुनिया में भारत ने किसी एक खेमे का पिछलग्गू बनने के बजाय अपने विकल्प खुले रखने की नीति अपनाई है।

बहुध्रुवीय दुनिया में यही रणनीतिक स्वायत्तता है। कभी दोस्ती, कभी दूरी और कभी दो टूक बात; कूटनीति में यही तो हुनर है।

अर्थव्यवस्था में चुनौतियां कम नहीं हैं। निर्यात पर दबाव है, वैश्विक बाजार अनिश्चित है और रोजगार से लेकर महंगाई तक कई सवाल हैं। फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने झटकों को झेलने की क्षमता दिखाई है।

कारोबार को आसान बनाने, उद्यमिता को बढ़ावा देने और नए कारोबारियों को अवसर देने की कोशिशों के नतीजे दिखाई देने लगे हैं। करोड़ों युवाओं की महत्वाकांक्षाएं भी अब नौकरी से आगे बढ़कर कारोबार और स्टार्टअप की ओर देख रही हैं।

अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा जरूरत होती है भरोसे और स्थिर माहौल की। कारोबारी यह नहीं चाहते कि आज बनाई गई नीति कल किसी नए राजनीतिक प्रयोग के साथ कूड़ेदान में चली जाए।

इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ ठीक है

मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने की बात का अर्थ यह कतई नहीं कि सरकार से सवाल न पूछे जाएं। लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है। गलत नीतियों पर सवाल उठना चाहिए और जहां सुधार की जरूरत हो, वहां सुधार होना चाहिए।

सरकार कोई दूध की धुली संस्था नहीं होती। सत्ता में रहते हुए गलतियां भी होती हैं और फैसलों पर बहस भी होनी चाहिए। मगर आलोचना और अराजकता में फर्क है।

देश को मजबूत विपक्ष भी चाहिए और जवाबदेह सरकार भी। लेकिन सिर्फ सरकार बदलने के लिए सरकार बदलना कोई नीति नहीं हो सकती।

सियासत में कुछ लोग हर पांच साल बाद नई बोतल में पुरानी शराब बेचने निकल पड़ते हैं। कोई कहता है सब बदल दो, कोई कहता है पूरा सिस्टम उलट दो। छिपकलियां दीवार पर चढ़ती-उतरती रहें, कॉकरोच इधर-उधर भागते रहें और मेंढक तालाब में टर्राते रहें; देश को आखिर आगे तो बढ़ना है।

बदलाव लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन बदलाव अपने आप में उपलब्धि नहीं है। सवाल यह होना चाहिए कि बदलाव से देश मजबूत होगा या कमजोर।

बारह साल में कोई व्यवस्था परिपूर्ण नहीं हो जाती। लेकिन अगर संस्थाएं काम कर रही हों, चुनाव हो रहे हों, सत्ता संवैधानिक दायरे में चल रही हो, अर्थव्यवस्था झटके झेल रही हो और दुनिया में भारत की आवाज पहले से ज्यादा सुनी जा रही हो, तो अचानक सब कुछ दांव पर लगाने की जरूरत क्या है?

मौजूदा निज़ाम को जारी रखने का तर्क किसी पार्टी के प्रति अंधभक्ति नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच का सवाल है। निरंतरता का अर्थ यह नहीं कि सरकार को खुली छूट दे दी जाए। इसका अर्थ है: जो अच्छा हुआ है, उसे आगे बढ़ाया जाए; जो गलत है, उसे सुधारा जाए।

देश बनाना कोई पांच साल का प्रोजेक्ट नहीं। यह पीढ़ियों का काम है। संस्थाएं और नीतियां बनने में साल लगते हैं, लेकिन उन्हें बिगाड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन आएगा? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था बनी है, उसे कौन संभालेगा?

भारत को प्रयोगशाला बनाने से पहले यह देखना होगा कि प्रयोग की कीमत कौन चुकाएगा।

स्थिरता को बचाना जड़ता नहीं है। कभी-कभी यही सबसे समझदार बदलाव होता है; बिना व्यवस्था बदले, व्यवस्था को बेहतर बनाना।

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व पर्यावरणविद्
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने समकालीन राजनीति, शासन प्रणाली, विकास नीतियों और राष्ट्रीय विमर्शों पर निरंतर प्रामाणिक व शोधपरक स्तंभ लिखे हैं।

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