आरटीआई या रंगदारी का नया धंधा?
सूचना का अधिकार (RTI) कानून कभी भारतीय लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ आम नागरिक का सबसे बड़ा और मारक विधिक हथियार माना जाता था। इसे प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए ‘जनता की आंख और कान’ कहा गया। इस दूरगामी कानून से उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में दबाकर रखे गए कड़वे सच बाहर आएंगे और मनमानी करने वाले अफसर व जनप्रतिनिधि जनता के प्रति सीधे जवाबदेह बनेंगे। लेकिन आज दो दशकों के बाद इस ऐतिहासिक कानून की जो तस्वीर उभरकर सामने आ रही है, वह बेहद चिंताजनक है। देश भर में कई जगह आरटीआई का इस्तेमाल जनहित या भ्रष्टाचार मिटाने के लिए नहीं, बल्कि निजी स्वार्थ, संगठित ब्लैकमेलिंग और खुलेआम धन उगाही के सुनियोजित औजार के रूप में हो रहा है। कानून की पवित्र आड़ में कुछ आपराधिक किस्म के तत्वों ने एक पूरा समानांतर रंगदारी का कारोबार खड़ा कर लिया है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता और इस दुरुपयोग के खिलाफ आवाज उठाना वक्त की जरूरत बन गया है। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
मैसूर विश्वविद्यालय में आयोजित एक राज्यस्तरीय थिंक-टैंक कार्यक्रम में कर्नाटक के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त डॉ. एल. कृष्णमूर्ति ने इस गंभीर खतरे की ओर बहुत ही स्पष्ट शब्दों में इशारा किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि फर्जी और ब्लैकमेलर आरटीआई कार्यकर्ताओं की तेजी से बढ़ती संख्या इस कानून की मूल आत्मा को ही पूरी तरह खत्म कर रही है। उनके अनुसार, जिस ऐतिहासिक कानून ने 2जी स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेलों जैसे देश के सबसे बड़े महाघोटालों को उजागर किया था, उसी कानून का इस्तेमाल अब सरकारी दफ्तरों को बेवजह परेशान करने, ईमानदार अधिकारियों पर दबाव बनाने और हजारों पन्नों की निरर्थक सूचनाएं मांगकर ब्लैकमेल करने के लिए धड़ल्ले से हो रहा है।
देश के कोने-कोने से लगातार सामने आ रहे फर्जीवाड़े के अदालती और पुलिस मामले इस राष्ट्रीय चिंता को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में एक तथाकथित स्वयंभू आरटीआई एक्टिविस्ट पर गंभीर आरोप लगा कि उसने स्थानीय पत्थर खदान संचालकों से बकायदा 75 लाख रुपये की मोटी रंगदारी की मांग की। उसने पहले आरटीआई से रणनीतिक दस्तावेज जुटाए और फिर पर्यावरण नियमों के उल्लंघन की झूठी-सच्ची शिकायतें करने की धमकी देकर ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू किया। राज्य के सतर्कता विभाग (विजिलेंस) ने जाल बिछाकर उसे पहली किश्त के रूप में लाखों रुपये लेते हुए रंगे हाथों रंगे हाथ गिरफ्तार किया।
असम राज्य में दुलाल बोरा का बहुचर्चित मामला तो और भी ज्यादा चौंकाने वाला और भयावह है। उस पर ब्लैकमेलिंग, उगाही और धोखाधड़ी के दर्जनों आपराधिक मुकदमे पुलिस दर्ज कर चुकी है। पुलिस जांच में यह खौफनाक सच सामने आया कि उसने दो हजार से अधिक दूसरी अपीलों का अंबार खड़ा कर दिया था और कई बार एक ही दिन में सौ-सौ से ज्यादा आरटीआई आवेदन अलग-अलग सरकारी विभागों में भेज दिए। उसका असली खेल यह था कि बाद में डरे हुए अधिकारियों, बिल्डरों और ठेकेदारों से मोटी रकम वसूलकर मामलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता था।
हरियाणा के हाइटेक शहर गुरुग्राम में भी एक आरटीआई एक्टिविस्ट और एक कथित यूट्यूबर पर एक प्रतिष्ठित स्कूल प्रबंधन से लाखों रुपये की रंगदारी ऐंठने का आरोप लगा। उन्होंने पहले स्कूल के निर्माण और मान्यता को लेकर लगातार एक के बाद एक आरटीआई अर्जियां लगाईं, फिर अदालती मुकदमों और आयकर विभाग के छापों का खौफ दिखाया। अंत में सभी शिकायतों को वापस लेने के एवज में लाखों रुपये की सीधी मांग की गई।
गुजरात के सूरत शहर में तो इस धंधे का पूरा का पूरा एक संगठित सिंडिकेट नेटवर्क बन गया था। सूरत पुलिस ने इस संबंध में दर्जनों आपराधिक एफआईआर दर्ज की हैं। आरोप था कि इस गिरोह के शातिर लोग नगर निगम से व्यावसायिक और आवासीय भवनों के नक्शों की जानकारी आरटीआई के जरिए हासिल करते, फिर हाथ में मापने वाला फीता लेकर खुद को निगम का अधिकृत निरीक्षक बताकर अवैध निर्माण स्थलों पर धमक जाते। वे बिल्डरों और गरीब मकान मालिकों को बुलडोजर चलाने और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक की उगाही करते थे।
आंध्र प्रदेश में तो दो व्यक्तियों के कारनामों से तंग आकर राज्य सूचना आयोग ने भविष्य में उनके द्वारा किसी भी तरह की आरटीआई लगाने पर ही पूर्ण प्रतिबंध (ब्लैकलिस्ट) लगा दिया। आयोग ने जांच में पाया कि वे दोनों एक के बाद एक दर्जनों बेबुनियाद अपीलें और शिकायतें दायर कर सरकारी दफ्तरों का कामकाज ठप कर रहे थे और अधिकारियों को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। उनके कई आवेदनों में दशकों पुराने ऐसे रिकॉर्ड मांगे जाते थे, जिनका आम जनहित से कोई दूर-दूर तक संबंध नहीं था।
तमिलनाडु के थेनी जिले में एक ही व्यक्ति ने 781 आरटीआई आवेदन केवल जिला न्यायालय के प्रशासनिक ढांचे के खिलाफ दायर कर डाले। नतीजा यह हुआ कि पूरे अदालत का दैनिक कामकाज और न्याय वितरण प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होने लगी। तमिलनाडु सूचना आयोग ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए आवेदक पर भारी जुर्माना लगाया और इसे कानून के खुले और आपराधिक दुरुपयोग का खतरनाक मामला माना।
ये कोई अलग-थलग या छोटी घटनाएं नहीं हैं। देश भर में ऐसे आरटीआई ब्लैकमेलरों का तरीका बिल्कुल एक जैसा और ढर्रा सेट है। पहला कदम: किसी लक्षित विभाग या व्यक्ति पर आरटीआई अर्जियों का बम फोड़ो। दूसरा कदम: फाइलों से कोई छोटी-मोटी कमी या तकनीकी त्रुटि ढूंढकर दस्तावेज जुटाओ। तीसरा कदम: शिकायत दर्ज कराने, जांच बिठाने या सोशल मीडिया-मीडिया में बदनामी करने का खौफ पैदा करो। और अंतिम कदम: समझौते के नाम पर टेबल के नीचे से लाखों रुपये ऐंठ लो। कई जगह आपसी रंजिश और निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी आरटीआई को हथियार बनाया गया है, जहाँ एक ही विषय पर सैकड़ों आवेदन भेजकर पूरे विभाग को कागजों के ढेर में दबा दिया जाता है।
देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) भी समय-समय पर इस बिगड़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जता चुकी है। सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसलों में स्पष्ट रूप से कहा है कि आरटीआई का इस्तेमाल देश के ईमानदार प्रशासनिक अधिकारियों को डराने, उनका मनोबल गिराने या सरकारी कामकाज की गति रोकने के लिए कतई नहीं होना चाहिए। एक अन्य तल्ख टिप्पणी में शीर्ष अदालत ने यहाँ तक कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म देश में कुछ समाजविरोधी तत्वों के लिए एक नया ‘सुरक्षित और आकर्षक कारोबार’ बनता जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद पहलू यह है कि ऐसे आपराधिक इरादे वाले लोग खुद को समाज सेवक, एक्टिविस्ट और ‘भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा’ का नकाब पहनाकर इस पवित्र कानून की जन-साख को सबसे गहरी चोट पहुँचाते हैं। इससे आम जनता का व्यवस्था से भरोसा कमजोर होता है। नतीजे के तौर पर, सरकारी दफ्तरों के लोक सूचना अधिकारी (PIO) अब हर आम और सच्चे आवेदक को भी शक व संशय की नजर से देखने लगे हैं। इसके कारण असली जरूरतमंदों और फर्जी ब्लैकमेलरों के बीच की विभाजक रेखा दिन-प्रतिदिन धुंधली होती जा रही है।
सुशासन की दिशा में सूचना अधिकार कानून का जन्म आम नागरिक को ताकतवर बनाने के लिए हुआ था, लेकिन कुछ स्वार्थी और गिरोहबंद तत्वों ने इसे प्रशासनिक दबाव, धमकी और वसूली के धंधे में बदलने की आपराधिक कोशिश की है। जब लोकतांत्रिक अधिकार की आड़ में रंगदारी का कारोबार शुरू हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी कानून की गरिमा और विश्वसनीयता को होता है। आज सबसे बड़ा कड़वा सवाल यही खड़ा है कि सूचना मांगने का यह बुनियादी अधिकार कहीं कुछ अपराधियों के लिए डर बेचने और सौदेबाजी करने का लाइसेंस तो नहीं बनता जा रहा।
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