बृज मंडल की हरियाली कौन निगल रहा है? फैंसी प्रोजेक्ट बढ़ रहे हैं, पेड़ घट रहे हैं!

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Friday, 24 July, 2026, 02:41:23 PM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

बृज मंडल की हरियाली कौन निगल रहा है? फैंसी प्रोजेक्ट बढ़ रहे हैं, पेड़ घट रहे हैं!

— बृज खंडेलवाल

पावन ब्रज मंडल और संवेदनशील ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (TTZ) पर पर्यावरणीय तबाही का एक नया और भयानक ख़तरा फिर से मंडरा रहा है। इस बार हमारी प्रकृति पर यह जानलेवा हमला कारखानों के चिमनियों से निकलने वाले विषैले धुएँ या औद्योगिक कचरे से भी कहीं ज्यादा गहरा है। इस ऐतिहासिक अंचल के सबसे पुराने और निष्ठावान प्राकृतिक पहरेदार—हमारे सदियों पुराने विशाल वृक्ष—तेजी से कटकर हमेशा के लिए गायब हो रहे हैं।

हालिया विधिक घटनाक्रमों के तहत देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने ताज ट्रेपेजियम ज़ोन की बेहद संवेदनशील परिधि के भीतर 10,700 से अधिक पूर्ण विकसित और छायादार पेड़ों की कटाई को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी है। इन हज़ारों जीवनदायी पेड़ों की बलि विभिन्न बुनियादी ढांचागत निर्माणों, नए एक्सप्रेसवे, सड़कों के चौड़ीकरण, रेलवे लाइनों के विस्तार, एयरपोर्ट रनवे और कई फैंसी व्यावसायिक प्रोजेक्टों के नाम पर चढ़ाई जाएगी। देश और क्षेत्र के लिए ढांचागत विकास जरूरी है, इसमें किसी भी विवेकशील नागरिक को दो राय नहीं हो सकती। लेकिन बुनियादी और सुलगता सवाल यह है कि क्या यह तथाकथित विकास हमारी शाश्वत हरियाली और ऑक्सीजन की कीमत पर ही संभव होगा? धर्म नगरी मथुरा, पावन वृंदावन और गोवर्धन के पावन धामों में पिछले कुछ ही वर्षों के दौरान पहले ही हज़ारों हरे-भरे पेड़ों की बलि दी जा चुकी है।

विधिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो टीटीज़ेड का गठन 1990 के दशक में देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद एम.सी. मेहता के ऐतिहासिक मामले में सुनाए गए मील के पत्थर आदेशों के बाद किया गया था। लगभग 10,400 वर्ग किलोमीटर के विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल में फैला यह संरक्षित क्षेत्र आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस और राजस्थान व हरियाणा के सीमावर्ती अंचलों को समेटता है। इसका मुख्य विधिक और पर्यावरण संरक्षण उद्देश्य विश्व प्रसिद्ध स्मारक ताजमहल को रासायनिक प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण से सुरक्षित रखना था। परंतु आज हमारा वही संवैधानिक सुरक्षा कवच प्रशासनिक अनदेखी और कॉरपोरेट लालच के कारण धीरे-धीरे छिन्न-भिन्न हो रहा है।

हर साल बिना किसी पश्चाताप के हज़ारों पेड़ हमारी नज़रों के सामने से ग़ायब हो रहे हैं। कहीं चार लेन की सड़क को छह लेन बनाने की होड़ है, तो कहीं नए-नए एक्सप्रेसवे के लिए कंक्रीट बिछाई जा रही है। कहीं अनियंत्रित कॉलोनियाँ उग रही हैं, तो कहीं कंक्रीट के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स खड़े किए जा रहे हैं। हमारे ऐतिहासिक शहर बेतरतीब फैल रहे हैं, और हमारी प्राकृतिक हरियाली लगातार सिकुड़ती जा रही है। कंक्रीट का यह निर्जीव जंगल तेज़ी से पैर पसार रहा है, जबकि हमारे वास्तविक प्राकृतिक जंगल पीछे हटकर विलुप्त हो रहे हैं।

ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के उद्देश्य से वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित 10,400 वर्ग किमी के इस टीटीज़ेड क्षेत्र के बावजूद आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हरित पट्टियाँ लगातार घट रही हैं। वर्ष 2017 में इस क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले छः ज़िलों का कुल रिकॉर्डेड वन क्षेत्र 664 वर्ग किमी दर्ज किया गया था, जो कि वर्ष 2019 के आधिकारिक सर्वेक्षण तक घटकर मात्र 657.71 वर्ग किमी ही रह गया। अकेले ताजनगरी आगरा की सीमाओं के भीतर 9.38 वर्ग किमी का विशाल वन क्षेत्र पूरी तरह नष्ट हो चुका है। अंधाधुंध शहरीकरण, बिना रोक-टोक निर्माण, बड़े पेड़ों की कटाई, अवैध अतिक्रमण, बढ़ता वायु-जल प्रदूषण और गहराता भूजल संकट इसके मुख्य प्रशासनिक कारण हैं। यद्यपि कागजों पर लाखों नए पौधे रोपने का दावा किया जाता है, परंतु प्रशासनिक भ्रष्टाचार और देखभाल के अभाव में उनके जीवित रहने की दर (Survival Rate) निराशाजनक रूप से बेहद कम रहती है। केवल खानापूरी के लिए पौधारोपण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बने बनाए पुराने वृक्षों का संरक्षण ही असली प्राथमिकता होनी चाहिए।

सरकारी तंत्र हमेशा यह घिसा-पिटा तर्क देता है कि काटे जाने वाले एक परिपक्व वृक्ष के बदले दस नए पौधे लगाए जाएँगे। कागज़ की सरकारी फाइलों में यह नीतिगत तर्क भले ही बहुत सुहावना और न्यायसंगत लगता हो, मगर हमारी प्रकृति किसी सरकारी फाइल या बजट के पन्नों से नहीं चलती। एक विशाल और बरगद या पीपल जैसा पुराना पेड़ बनने में कई-कई दशक लग जाते हैं। वह अपने जीवनकाल में हर दिन भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है, राहगीरों को विशाल छाया देता है, ज़हरीली हवा को शुद्ध करता है, हज़ारों पक्षियों व जीवों को प्राकृतिक आश्रय देता है और पूरे शहर के बढ़ते तापमान को कई डिग्री कम रखता है। गमले या नर्सरी से लाकर लगाया गया एक छोटा सा पौधा वर्षों तक किसी भी हालत में उस विशाल वृक्ष की बराबरी नहीं कर सकता। ऊपर से लगाए गए अनेक पौधे बिना पानी और बाड़ की देखभाल के कुछ ही हफ़्तों में सूखकर दम तोड़ देते हैं।

ताजनगरी आगरा और ब्रज क्षेत्र पहले ही ख़राब वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) और ज़हरीली हवा से गंभीर रूप से जूझ रहे हैं। निर्माण कार्यों की उड़ती धूल, वाहनों का अत्यधिक धुआँ और अनियंत्रित कंक्रीट गतिविधियां यहाँ की आवोहवा को लगातार बदतर बना रही हैं। ऐसे नाजुक दौर में 10,700 से अधिक परिपक्व पेड़ों की कटाई शहर की इस प्राकृतिक ढाल को पूरी तरह से मटियामेट कर देगी। इसके सीधे नतीजे के तौर पर गर्मी का प्रकोप और बढ़ेगा, जलस्तर और नीचे जाएगा और ताजनगरी की हवा में सांस लेना और दूभर हो जाएगा।

यमुना नदी के संवेदनशील बाढ़ क्षेत्र (Floodplains) भी इस कंक्रीटकरण की तबाही से अछूते नहीं रहेंगे। पुराने पेड़ों की जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं, मानसूनी जल को ज़मीन के भीतर उतारकर भूजल को प्राकृतिक रूप से रिचार्ज करती हैं और समृद्ध जैव विविधता को सहारा देती हैं। उनके इस तरह समूल विनाश से हमारा समूचा पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बुरी तरह चरमरा जाएगा। इस भयानक त्रासदी पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए विख्यात पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, “हम किसी भी स्तर पर विकास के विरोधी नहीं हैं। लेकिन हर बुनियादी परियोजना का डिज़ाइन तैयार करते समय सबसे पहले यह बारीक अध्ययन होना चाहिए कि इसमें से कितने सौ साल पुराने पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है। हज़ारों पेड़ों पर आरी चलाना अंतिम और अपरिहार्य विकल्प होना चाहिए, पहला और आसान रास्ता नहीं।”

वहीं वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ. मुकुल पांड्या प्रशासनिक नीतियों पर सीधा प्रहार करते हुए कहते हैं, “आगरा और ब्रजमंडल की प्राकृतिक हरियाली जिस ख़तरनाक रफ़्तार से ख़त्म की जा रही है, उस रफ़्तार से नए पेड़ वापस कभी नहीं लौट सकते। पेड़ केवल सड़कों का सौंदर्य बढ़ाने वाले शो-पीस नहीं हैं, बल्कि वे इस घुटते हुए शहर के असली फेफड़े हैं।” इसके साथ ही, वृंदावन के समर्पित ग्रीन एक्टिविस्ट जगन नाथ पोद्दार अपनी गहरी व्यथा व्यक्त करते हुए कहते हैं, “हमारी सरकारें और नेता चमचमाती कंक्रीट की सड़कों, ओवरब्रिज और मॉल का तो फीता काटकर उद्घाटन करते हैं, लेकिन कभी किसी नए घनघोर जंगल का उद्घाटन नहीं करते। हमारी प्रशासनिक व्यवस्था में पेड़ों को जीवनदाता मानने के बजाय अब विकास की राह में एक रुकावट और बाधा समझा जाने लगा है। यही हमारी सबसे बड़ी वैचारिक त्रासदी है।”

असल सवाल विकास बनाम पर्यावरण की किसी बेतुकी बहस का नहीं है, बल्कि एक दूरदर्शी और समझदारी भरे सतत विकास (Sustainable Development) का है। यदि नीयत साफ़ हो, तो सड़कों और रेलवे लाइनों के संरेखण (Alignment) को थोड़ा बदला जा सकता है। घने हरित क्षेत्रों के ऊपर से एलिवेटेड कॉरिडोर बनाए जा सकते हैं। आधुनिक तकनीकों के सहारे बड़े पेड़ों का वैज्ञानिक प्रत्यारोपण (Tree Translocation) किया जा सकता है। साथ ही, कागज़ों पर लगाए जाने वाले पौधों की किसी निष्पक्ष स्वतंत्र संस्था से कठोर निगरानी होनी चाहिए और उनकी वास्तविक जीवित रहने की दर सार्वजनिक डोमेन में साझा की जानी चाहिए।

टीटीज़ेड का गठन देश के सर्वोच्च न्यायालय की एक दूरदर्शी और पवित्र सोच का परिणाम था। उसे केवल कागज़ी नियमों का ढोल बनाकर या बेजान संस्था बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना देखिए कि दुनिया में प्रेम की सबसे ख़ूबसूरत निशानी माना जाने वाला संगमरमरी ताजमहल आज अपने ही प्राकृतिक रखवालों और हरे-भरे जंगलों को एक-एक कर खो रहा है। एक सौ साल पुराने बरगद, नीम या पीपल के पेड़ को कुल्हाड़ी से काटना बेहद आसान है, लेकिन उसे पुनः उस रूप में वापस लाने में इंसान की कई पीढ़ियाँ बीत जाती हैं।

ताजमहल को सिर्फ़ दूर से चमकने वाले संगमरमर के बेजान पत्थरों की नहीं, बल्कि साफ़ और शुद्ध हवा, कल-कल बहती जीवंत यमुना और अपने चारों ओर फैले घने जीवित जंगलों की सख़्त ज़रूरत है। प्रकृति, नदियों और पेड़ों की बलि देकर हासिल किया गया तथाकथित विकास असल में कोई विकास नहीं है, बल्कि वह हमारी आने वाली मासूम पीढ़ियों के सांसों पर थोपा गया एक कभी न चुकाया जाने वाला ख़तरनाक कर्ज है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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