हिन्दुओं की किस्में – बकौल आरएसएस मुखिया

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Tuesday, 21 July, 2026, 04:02:06 AM IST.

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Ram Puniyani
राम पुनियानी
वरिष्ठ चिंतक व लेखक
देश के प्रतिष्ठित लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और आईआईटी बॉम्बे के पूर्व प्रोफेसर राम पुनियानी ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म’ के अध्यक्ष हैं। वे सांप्रदायिक सौहार्द, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर अपने बेबाक, तथ्यपरक तथा प्रखर वैचारिक लेखों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं।

हिन्दुओं की किस्में – बकौल आरएसएस मुखिया

— राम पुनियानी (रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ‘हिन्दू राष्ट्र’ की अपनी विशिष्ट अवधारणा को सिद्ध करने के लिए अक्सर विभिन्न प्रकार की वैचारिक कलाबाजियां दिखाते रहते हैं। वे सार्वजनिक मंचों से कई बार यह दोहरा चुके हैं कि भारत की भौगोलिक सीमाओं के भीतर रहने वाले सभी नागरिक मूलतः हिन्दू हैं और हम सभी के पूर्वज एक ही थे। परंतु, इस कूटनीतिक दावे के साथ सबसे बड़ी ऐतिहासिक समस्या यह है कि संघ के पुराने प्रमुख विचारक हमेशा से यह स्थापित करने का प्रयास करते रहे हैं कि इस्लाम और ईसाईयत भारत के लिए पूरी तरह से विदेशी धर्म हैं।

हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा के जनक वी.डी. सावरकर ने हिन्दू शब्द को परिभाषित करते हुए स्पष्ट रूप से कहा था कि हिन्दू केवल वही व्यक्ति है जो सिन्धु नदी से लेकर समुद्र तक फैली भारत भूमि को अपनी पवित्र भूमि और अपनी पितृभूमि मानता है। वहीं, संघ के द्वितीय सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर का आधिकारिक रूप से मानना था कि भारत में हिन्दू राष्ट्र के निर्माण हेतु हमें जर्मनी के नाजी मॉडल का अनुसरण करना चाहिए, जहां बहुत बड़ी संख्या में यहूदियों को भयानक यातनाएं दी गईं और फिर उन्हें गैस चैम्बरों में भेजकर जर्मन राष्ट्र का गठन किया गया। हाल के समय में इसी पुराने विचार के कुछ अधिक चिकने-चुपड़े और कूटनीतिक संस्करण भागवत द्वारा जनमानस के सामने रखे जा रहे हैं।

आरएसएस की ओर से लगातार यह दावा भी किया जाता रहा है कि हिन्दू वास्तव में कोई विशिष्ट धर्म नहीं, बल्कि एक समन्वित जीवनशैली है। हालांकि, यह कथन समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से पूरी तरह गलत सिद्ध होता है, क्योंकि समाजशास्त्र के अनुसार आराध्य देव, स्थापित कर्मकांड, पवित्र धर्मग्रंथ, और विशिष्ट पुरोहित वर्ग ही किसी भी संगठित धर्म के मुख्य तत्व माने जाते हैं। हाल ही में संघ प्रमुख ने हिन्दुओं का एक अनोखा वर्गीकरण पेश किया, जिसका मुख्य कूटनीतिक उद्देश्य देश के अल्पसंख्यकों (मुसलमानों और ईसाईयों) में व्याप्त हाशियेपन के सामाजिक एहसास को कम करना दिखाई देता है। हिन्दू धर्म की बहुत ही अजीब परिभाषा गढ़ते हुए उन्होंने कहा कि, “अगर आप भारतीय हैं, तो यह प्रकृति (हिन्दू) आप में स्वतः अंतर्निहित है।”

भागवत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि देश के मुसलमान और ईसाई भी इस हिन्दू राष्ट्र के अविभाज्य अंग हैं। इसके उपरांत उन्होंने भारत के सम्पूर्ण हिन्दुओं को चार मुख्य समूहों में वर्गीकृत किया। उनके अनुसार, पहले समूह में वे लोग शामिल हैं जो अपनी हिन्दू पहचान को सार्वजनिक रूप से गर्व के साथ घोषित करते हैं। दूसरे समूह में वे लोग आते हैं जो स्वयं को हिन्दू तो मानते हैं, परंतु इसमें उन्हें किसी विशेष विशिष्टता का एहसास नहीं होता। संघ प्रमुख के अनुसार, तीसरा समूह उन लोगों का है जो केवल बंद कमरों में या निजी चर्चाओं के दौरान ही अपनी हिन्दू पहचान का उल्लेख करते हैं। वहीं, चौथे समूह में वे लोग शामिल किए गए हैं जो या तो अपनी मूल हिन्दू पहचान को पूरी तरह भूल चुके हैं, अथवा जिन्हें सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के चलते इसे विस्मृत करा दिया गया है।

परंतु, यहाँ एक बड़ा प्रश्न यह खड़ा होता है कि भागवत के अनुसार वास्तविक स्वाभिमानी हिन्दू आखिर कौन हैं? क्या वे लोग हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद के ढांचे को ढहाया? क्या वे हैं जो धार्मिक स्थलों के सामने उपद्रव करते हुए आक्रामक नारे लगाते हैं? या फिर वे जो कांवड़ियों के भेष में सड़कों पर कानून-व्यवस्था को चुनौती देते हैं? यद्यपि संघ प्रमुख ने इस विषय पर स्थिति स्पष्ट नहीं की, परंतु इसके राजनीतिक निहितार्थों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इसके समानांतर, बाबासाहेब आंबेडकर का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है; वे एक पारंपरिक हिन्दू परिवार में जन्मे थे, परंतु उन्होंने सामाजिक असमानता के विरोध में ‘मनुस्मृति’ को जलाया और ऐतिहासिक घोषणा की कि यद्यपि वे हिन्दू के रूप में पैदा हुए हैं, परंतु वे हिन्दू के रूप में कदापि नहीं मरेंगे। संघ प्रमुख आंबेडकर जैसे विचारकों को अपने इस चार-स्तरीय वर्गीकरण के किस वर्ग में रखना पसंद करेंगे?

इसके अतिरिक्त, संघ भारतीय संविधान को किस रूप में परिभाषित करेगा—क्या एक ‘अच्छे’ हिन्दू द्वारा निर्मित विधिक संहिता के रूप में, अथवा किसी अन्य रूप में? यह सर्वविदित है कि इसी संगठन ने अतीत में भारतीय संविधान का तीव्र विरोध यह तर्क देकर किया था कि यह पूर्णतः पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है और इसमें भारतीयता का कोई समावेश नहीं है। वर्तमान में संघ के समक्ष सबसे बड़ी वैचारिक दुविधा यह है कि मुसलमानों, ईसाईयों, दलितों और आदिवासियों को अपने सामाजिक दायरे से जोड़ने के लिए उसे इन वर्गों के प्रति सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करने की विधिक कलाबाजी दिखानी पड़ रही है। वैसे भी, हिन्दू धर्म को किसी एक संकीर्ण परिभाषा में बांधना अत्यंत कठिन कार्य है, जिसकी कई ऐतिहासिक वजहें हैं। पहली वजह यह है कि हिन्दू धर्म कोई पैगम्बर-आधारित (Prophetic) धर्म नहीं है और न ही इसकी स्थापना किसी एक व्यक्ति द्वारा की गई है।

दूसरी मुख्य वजह यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में युगों से विकसित हुई अनेक विविध धार्मिक धाराएं समय के साथ इसमें समाहित होती गईं। तीसरी वजह यह है कि हिन्दू धर्म के कर्मकांडों और मान्यताओं में इतनी व्यापक विविधता है कि उन्हें किसी एक रंग या सांचे में नहीं ढाला जा सकता। इसमें यह भी उल्लेखनीय है कि अलग-अलग कालखंडों में विकसित हुए विचार और लोक-परंपराएं आज भी एक साथ इस धर्म का अभिन्न अंग हैं। जहाँ एक ओर सत्यनारायण व्रत और संतोषी माता की पूजा होती है, वहीं दूसरी ओर सगुण और निर्गुण ईश्वर की दार्शनिक अवधारणाएं भी समानांतर रूप से विद्यमान हैं। परंतु, हिन्दू धर्म से जुड़ा एक सबसे मूलभूत और गंभीर मुद्दा वर्ण व्यवस्था का गहरा प्रभाव रहा है, जिसने सामाजिक असमानता को धार्मिक मान्यता प्रदान की और वर्ण व्यवस्था को धर्मग्रंथों व परंपराओं के केंद्र में स्थापित कर दिया।

इतिहास के पन्नों को खंगालें तो विभिन्न चरणों में भारत आए आर्य मूलतः पशुपालक और बहुदेववादी थे। शुरुआती वैदिक काल में रचे गए वेद उस समय के मूल्यों की झलक प्रस्तुत करने के साथ-साथ अनेक देवी-देवताओं की उपस्थिति और बहुदेववाद के अस्तित्व को दर्शाते हैं। उस दौर में ‘मनु के नियम’ समाज के मुख्य मार्गदर्शक सिद्धांत बने। वैदिक काल के उपरांत ब्राह्मणवाद का दौर आया, जिसमें समाज का कुलीन वर्ग आम जनता से पूरी तरह कट गया और जाति प्रथा के माध्यम से विशिष्ट वर्ग के प्रभुत्व को बनाए रखने का एक अत्यंत कुशल सामाजिक तंत्र विकसित किया गया।

कालांतर में, जब जातिप्रथा और कर्मकांडों को भगवान बुद्ध के बौद्ध धर्म द्वारा तीव्र चुनौती मिली, तब सर्वोपरि बने रहने के लिए ब्राह्मणवाद को एक ऐसे नए स्वरूप में ढलने पर मजबूर होना पड़ा जिसे आज वृहद हिन्दू धर्म कहा जाता है। इस दौर में आम जनमानस को बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने से रोकने के लिए सामाजिक व धार्मिक परंपराओं से बड़े वर्ग को जोड़ा गया और नए सार्वजनिक उत्सव व कर्मकांड स्थापित किए गए। यहाँ यह तथ्य अत्यंत दिलचस्प है कि 8वीं शताब्दी तक प्राचीन ग्रंथों में ‘हिन्दू’ शब्द का कोई उल्लेख नहीं मिलता। यह शब्द मुख्य रूप से मध्य पूर्व और पश्चिम एशियाई अरबों-मुसलमानों के आगमन के साथ अस्तित्व में आया, जो सिन्धु नदी के पार रहने वाले निवासियों को ‘हिन्दू’ कहकर संबोधित करते थे। इस प्रकार, हिन्दू शब्द मूलतः एक भौगोलिक क्षेत्र का सूचक था, जिसके आधार पर इस क्षेत्र में विकसित हुई समस्त धाराओं को बाद में हिन्दू कहा जाने लगा।

इतिहास गवाह है कि कठोर जाति प्रथा के शिकार शोषित वर्गों ने उत्पीड़न से बचने के लिए समय-समय पर धर्मपरिवर्तन के मार्ग अपनाए, जिनमें बौद्ध धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म और बाद के कालखंड में सिख धर्म प्रमुख रहे। हिन्दू धर्म के भीतर भी दो मुख्य वैचारिक धाराएं हमेशा समानांतर चलती रहीं—ब्राह्मणवाद और श्रमणवाद। श्रमण परंपरा ने ब्राह्मणों के आधिपत्य का मुखर विरोध किया और जाति व्यवस्था को सिरे से खारिज किया। यद्यपि राजनीतिक संरक्षण के कारण ब्राह्मणवाद का वर्चस्व अधिक रहा, परंतु तंत्र, भक्ति, शैव और सिद्ध परंपरा जैसी अन्य लोक-धाराएं भी अपनी पहचान बनाए रहीं। श्रमणों ने कभी भी वैदिक कर्मकांडों को स्वीकार नहीं किया; जहाँ ब्राह्मणवाद ने जाति के आधार पर विभाजन किया, वहीं श्रमणवाद ने समानता का संदेश दिया।

ब्राह्मणवादी धारा का स्थायित्व इसलिए बना रहा क्योंकि इसे तत्कालीन शासकों का सीधा संरक्षण प्राप्त था। मगध और मौर्य साम्राज्यों के दौर से ही बौद्ध व जैन धर्मों के प्रभाव को कम करने का प्रयास शुरू हुआ और धीरे-धीरे निचली जातियों की लोक-परंपराओं को दरकिनार कर ब्राह्मणवाद को ही एकमात्र प्रामाणिक हिन्दू धर्म माना जाने लगा। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान, जब अंग्रेजों ने भारतीय समाज को प्रशासनिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया, तब उन्होंने ब्राह्मणवादी ग्रंथों और नियमों को ही सभी गैर-मुस्लिम व गैर-ईसाई आबादी पर समान रूप से लागू कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, हिन्दू धर्म की विशाल आंतरिक विविधता ओझल हो गई और केवल ब्राह्मणवादी कर्मकांडों को ही हिन्दू धर्म की मुख्य पहचान मान लिया गया। अंततः, भागवत को हिन्दुओं का वर्गीकरण करते समय इस ऐतिहासिक जातिगत यथार्थ को भी ध्यान में रखना चाहिए था, क्योंकि इतनी व्यापक विविधता वाले समाज को केवल चार संकीर्ण वर्गों में विभाजित कर देना व्यावहारिक और ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वथा अधूरा है।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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