फिल्म समीक्षा: नफ़रतों के बीच मोहब्बत की महागाथा बयां करती है ‘मैं वापस आऊँगा’

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Entertainment Desk, 🌐 tajnews.in | Friday, 17 July, 2026, 12:45:10 PM IST.

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tajnews.in | नई दिल्ली: देश 15 अगस्त 1947 को जब आज़ाद हुआ, तो यह आज़ादी देश के विभाजन के साथ मिली थी। यह बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था, जिसमें लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को अपना गाँव और अपना शहर छोड़ना पड़ा था। अपनी ज़मीन से जबरन उखाड़े गए ये लोग क्या कभी चैन से रह सके? क्या वह अतीत बिना पीड़ा पहुंचाए आसानी से उनसे अलग हो गया? निर्देशक इम्तियाज़ अली की नई फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ उसी उम्मीद के सहारे ज़िंदा रहते एक वृद्ध की कहानी है, जिसने 78 साल पहले किसी को वचन दिया था कि ‘मैं वापस आऊँगा’। प्रख्यात आलोचक जवरीमल्ल पारख के अनुसार, यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि विभाजन की त्रासदी और विस्थापन के गहरे घावों को बयां करती एक महाकाव्यात्मक कृति है।

HIGHLIGHTS
  1. संवेदनशील सिनेमा: इम्तियाज़ अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ विभाजन के दर्द और स्मृतियों में अटकी सांसों की मार्मिक दास्तान है।
  2. मुख्य कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना और शर्बरी ने अभिनय से किरदारों में फूंकी जान।
  3. विभाजन का आघात: सरगोधा से उखड़े 95 वर्षीय बुजुर्ग की यादों के सहारे अतीत और वर्तमान के अंतर्संबंधों को दर्शाती फिल्म।
  4. वैश्विक संदेश: अंतिम दृश्यों में गाजा, फिलिस्तीन और सोमालिया की विस्थापन त्रासदी को जोड़कर फिल्म ने हासिल किया महाकाव्यात्मक विस्तार।
प्रख्यात आलोचक जवरीमल्ल पारख

फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ का एक मर्मस्पर्शी दृश्य

स्मृतियों के गलियारे में भटकती एक बुजुर्ग की आत्मा

विभाजन की यह कहानी 95 वर्षीय ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरुद्दीन शाह) की स्मृतियों के रूप में सामने आती है। वह मृत्यु शैय्या पर है और डिमेंसिया व अल्जाइमर का मरीज है। वर्तमान और अतीत दोनों उसके अंदर गड्डमड्ड हो गए हैं। उसके दोनों बेटे उसकी सेवा में लगे हैं, जिन्हें लगता है कि उनके पिता की कभी भी मृत्यु हो सकती है। लेकिन विभाजन से जुड़ी स्मृतियों में उसकी सांस अटकी हुई है। बीच-बीच में ईशर सिंह वर्तमान को भूल जाते हैं और 1947 के पहले के सरगोधा पहुँच जाते हैं, जो उनकी जन्मभूमि है। ईशर सिंह का पोता निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) जो लंदन में रहता है, अपने दादा को देखने के लिए घर लौट आता है। वह अपना ज्यादा समय दादा के साथ गुजारता है और उनके बड़बड़ाने के अर्थों को धीरे-धीरे समझने की कोशिश करता है, जिससे 1947 से पहले की कहानी के पन्ने एक-एक कर सामने आने लगते हैं।

अतीत की कहानी शुरू होती है सरगोधा के एक कॉलेज से, जहां ईशर सिंह उर्फ कीनु (वेदांग रैना) पढ़ रहा है। उसी कॉलेज में अफसाना उर्फ जिया (शर्बरी) भी पढ़ रही है और ये दोनों एक दूसरे से बेहद प्यार करते हैं। कीनु सिख है और जिया मुसलमान। इन दोनों के प्यार को दिखाने के लिए जिन प्रसंगों की रचना की गयी है, वे उनके लगातार गाढ़े होते प्रेम को तो व्यक्त करते ही हैं, लेकिन इनके अलावा भी कुछ ऐसे अर्थों को ध्वनित करते हैं, जिनका संबंध सिर्फ उन दोनों से नहीं, बल्कि तत्कालीन बड़े यथार्थ से होता है। कॉलेज प्रांगण में प्रगतिशील लेखक संघ के जलसे में जिया द्वारा प्रेमचंद की कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रत्न’ का उल्लेख करना इस प्रगतिशील सोच का परिचायक है।

विभाजन के दर्द और स्मृतियों को समेटे फिल्म का मुख्य विजुअल

अतीत और वर्तमान के द्वंद्व को दर्शाती फिल्म की मुख्य झलक

विस्थापन की विभीषिका और नफरत के बीच सुलगती मोहब्बत

कीनु और जिया अलग-अलग धर्म के होने के बावजूद एक-दूसरे से प्रेम इसीलिए कर सके, क्योंकि मजहब उनके बीच अवरोध नहीं था। फिल्म यह भी बताती है कि जब तक दंगे शुरू नहीं हुए थे, दोनों समुदाय घुल-मिलकर रहते थे। लेकिन बंटवारे की घोषणा के बाद फैली नफरत ने सबको तबाह कर दिया। कीनु के परिवार के सामने संकट खड़ा हुआ और दंगों की भेंट उनका पूरा परिवार चढ़ गया। विभाजन के समय हुए भयानक दंगों के कारण उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। ईशर सिंह अपनी बड़बड़ाहट में दंगा करने वालों को ‘मंगल ग्रह का एलियन’ और हिटलर का भाई-बंधु कहता है, जो साम्राज्यवाद और फासीवाद की पहचान कराता है।

विभाजन के छह साल बाद 1953 में कीनु एक बार फिर सरगोधा जाता है, जहां उसे मालूम पड़ता है कि उसके परिवार की सारी औरतें मारी जा चुकी हैं। वह विवाहिता अफसाना से मिलने का साहस नहीं जुटा पाता और वापस लौट आता है। 78 साल बाद, जब उनका पोता निर्वैर मोबाइल हाथ में लिए सरगोधा की गलियों में जिया के घर की तलाश करता है, तो स्मृतियों का वह नक्शा आज भी जीवित मिलता है। जिया तो दस साल पहले दुनिया छोड़ चुकी थी, लेकिन वह आखिरी क्षण तक कीनु का इंतजार करती रही, क्योंकि उसने वचन दिया था— ‘मैं वापस आऊँगा’।

वैश्विक त्रासदी से जुड़ता फिल्म का फलक

यह फिल्म विभाजन की विभीषिका को एक ऐसे आघात (ट्रॉमा) के रूप में पेश करती है, जिससे बाद की पीढ़ियों के लिए मुक्त होना आसान नहीं है। फिल्म के अंतिम पांच मिनट में जब प्रेम कहानी समाप्त होती है, तो एक गीत के साथ गज़ा, फिलिस्तीन, ईरान, सोमालिया और उन तमाम जगहों के दृश्य आने लगते हैं, जहां आज भी युद्ध, बमबारी और विस्थापन का तांडव चल रहा है। लोगों को शरणार्थी शिविरों में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। समीक्षक जवरीमल्ल पारख लिखते हैं कि अतीत और वर्तमान का यह समागम इस मानवीय त्रासदी को वैश्विक और महाकाव्यात्मक बना देता है, जो दर्शकों के दिलों में एक गहरी कसक छोड़ जाता है।

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Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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