जब सड़कों पर इंसानों से ज़्यादा जानवरों का राज हो जाए
— बृज खंडेलवाल
सुबह की पहली किरण अजूबे ताजमहल पर पड़ने से पहले ही ताजनगरी आगरा के आम बाशिंदे अपने-अपने घरों से काम-काज के लिए निकलते हैं। लेकिन समकालीन दौर में अब उनकी पहली और मुख्य विधिक चिंता सड़कों का सुगम ट्रैफिक नहीं, बल्कि हर मोड़ पर हिंसक मुद्रा में खड़े या सरपट दौड़ते बेकाबू जानवर होते हैं। शहर के दयालबाग, कमला नगर, शाहगंज, ऐतिहासिक ताजगंज, सिकंदरा, बल्केश्वर और ट्रांस यमुना कॉलोनियों तक हर सुबह एक जैसा ही भयावह मंजर दिखाई देता है। कहीं खूंखार आवारा कुत्तों के विशाल झुंड राहगीरों और बाइक सवारों का आक्रामक पीछा करते हैं, तो कहीं आतंक का पर्याय बन चुके बंदर छतों, छज्जों और बालकनियों पर संकीर्ण निगाहें गड़ाए बैठे रहते हैं। वहीं दूसरी ओर, व्यस्त यमुना किनारा रोड पर भारी-भरकम भैंसों और आवारा गायों के बड़े-बड़े झुंड मुख्य सड़क को ही अपना स्थाई चारागाह समझ लेते हैं। जमीनी हकीकत देखकर ऐसा लगता है मानो इस ऐतिहासिक शहर की सड़कें अब विधिक रूप से इंसानों की नहीं, बल्कि लावारिस मवेशियों की जागीर बन चुकी हैं।
ताजमहल के कारण समूची दुनिया के कूटनीतिक फलक पर अपनी अद्वितीय पहचान रखने वाले इस अंतरराष्ट्रीय शहर के लिए यह विडंबना सिर्फ नागरिकों की एक असुविधा मात्र नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत गंभीर और अनियंत्रित ‘नागरिक संकट’ (Civic Crisis) बन चुका है। स्थानीय अस्पतालों, दोपहिया वाहन चालकों, मासूम स्कूली बच्चों और सुबह-सुबह ताजी हवा में टहलने वाले बुज़ुर्गों के लिए हर नई सुबह एक ख़तरनाक विधिक परीक्षा बन गई है। इस संबंध में सामने आने वाले सरकारी रिकॉर्ड के डराने वाले आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि आगरा की भौगोलिक सीमाओं के भीतर ९० हजार से अधिक आवारा कुत्ते और लगभग ६० हजार पालतू कुत्ते मौजूद हैं। स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, शहर में हर दिन करीब ३०० मासूम लोग आवारा कुत्तों के जानलेवा हमले और काटने (डॉग बाइट) का शिकार विधिक रूप से दर्ज हो रहे हैं। यह भयावह संख्या देश के कई बड़े महानगरों के औसत से भी कई गुना अधिक है।
सांख्यिकीय तुलना के लिए देखें तो देश की राजधानी दिल्ली जैसे विशाल और घनी आबादी वाले महानगर में छह महीने के लंबे दौरान जितने डॉग बाइट के विधिक मामले दर्ज हुए थे, आगरा में लगभग उतने ही खौफनाक मामले कुछ ही दिनों के भीतर धरातल पर सामने आ जाते हैं। यह साक्ष्य साफ़ बयां करता है कि ताज नगरी की यह आवारा पशु समस्या कितनी ज्यादा गंभीर हो चुकी है। आगरा के गांधी नगर क्षेत्र के एक वरिष्ठ चिकित्सा विशेषज्ञ बताते हैं कि उनके आपातकालीन वार्ड में आने वाले अधिकांश गंभीर पीड़ित १५ वर्ष से कम उम्र के अबोध बच्चे होते हैं। कई मासूम बच्चे घरों के बाहर गलियों में खेलते समय या अनजाने में इन कुत्तों को खाना खिलाते समय बुरी तरह घायल हो जाते हैं। शहर के केवल निजी क्लीनिकों में ही रोज़ाना सौ से अधिक एंटी-रेबीज के मरीज पहुंचते हैं, जबकि जिला अस्पताल (S.N. Medical College) और अन्य सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर इस अव्यवस्था के कारण अलग से भारी प्रशासनिक दबाव रहता है।
इस विकराल चुनौती के आगे हमारा स्थानीय नगर निगम भी पूरी तरह बेबस और लाचार नजर आता है। नगर निगम के आला अधिकारी दबी जुबान में यह विधिक विडंबना मानते हैं कि उनके पास मौजूद सीमित संसाधनों और बजट से इतनी भारी संख्या में आवारा कुत्तों की नसबंदी (Animal Birth Control – ABC) और उनका एंटी-रेबीज टीकाकरण (Vaccination) करना कतई आसान नहीं है। कागजों पर कूटनीतिक अभियान चल रहे हैं, लेकिन उनकी जमीनी रफ्तार समस्या के फैलाव के मुकाबले बहुत ज्यादा धीमी है। इसी कारण अब नगर निगम प्रशासन द्वारा पूरे शहर में बड़े स्तर पर कुत्तों की नसबंदी और वैक्सीनेशन का यह विधिक काम किसी बाहरी निजी विशेषज्ञ एजेंसी को आउटसोर्स करने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन आगरा की टैक्सपेयर जनता का यह सीधा और तीखा सवाल है कि जब पिछले वर्षों के दौरान इस मद में नगर निगम द्वारा करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा चुके हैं, तब भी धरातल पर हालात सुधरने की बजाय बदतर क्यों होते गए?
मुसीबत केवल इन आवारा कुत्तों के खौफ तक ही सीमित नहीं है। शहर के प्राचीन मंदिरों, व्यस्त बाजारों और अति-सुरक्षित ताजमहल के आसपास बंदरों का आतंक भी लगातार विधिक सीमाओं को लांघ रहा है। ये बंदर आए दिन मासूम बच्चों के हाथ से टिफिन और खाने-पीने का सामान छीन लेते हैं, बुज़ुर्गों के चश्मे और मोबाइल झपट ले जाते हैं। कई विदेशी पर्यटक भी इन बंदरों के हिंसक हमलों का शिकार बनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शहर की सािख को कूटनीतिक बट्टा लगा चुके हैं। उधर, यमुना किनारा रोड पर शाम के समय नदी से वापस लौटते भैंसों और लावारिस गायों के विशाल झुंड पूरी की पूरी मुख्य सड़क को विधिक रूप से घेर लेते हैं। वहां से गुजरने वाले दोपहिया और चारपहिया वाहन चालक जान हथेली पर रखकर किसी तरह रास्ता निकालते हैं और कई बार भीषण दुर्घटनाएं होते-होते बचती हैं।
स्थानीय यातायात के लिए रात का समय सबसे ज्यादा खतरनाक और जानलेवा साबित होता है। घने अंधेरे में काले रंग के ये मवेशी मुख्य डामर रोड पर वाहन चालकों को दिखाई नहीं देते, जिससे तेज रफ्तार बाइक सवार अक्सर इनसे सीधे टकरा जाते हैं। ऐसे दर्जनों विधिक हादसों में कई नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है तो कई गंभीर रूप से अपंग हो चुके हैं। इस अव्यवस्था ने आगरा की बुनियादी दिनचर्या को ही पूरी तरह बदलकर रख दिया है। जो सार्वजनिक पार्क कभी बुज़ुर्गों की खिलखिलाहट और बच्चों के खेल-कूद से गूंजते थे, वहां अब खौफ का सन्नाटा पसरा है। सुबह की सैर करने वाले प्रबुद्ध नागरिक बताते हैं कि कुत्तों के हिंसक झुंड अब पार्कों के गेट पर ही घात लगाकर बैठते हैं, जिसके कारण अधिकांश लोगों ने अपनी सुबह की सैर का समय विधिक रूप से घटा दिया है।
सजग माता-पिता अब अपने छोटे बच्चों को अकेले घरों से बाहर भेजने में बुरी तरह घबराते हैं। स्कूल जाते और लौटते समय भी बच्चों के साथ परिवार के किसी बड़े विधिक सदस्य का होना अब अनिवार्य सुरक्षा नियम समझा जाने लगा है। यद्यपि यह समस्या देश के कई अन्य शहरों में भी बढ़ रही है, लेकिन मई 2026 में देश के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद कड़ा विधिक रुख अपनाया था। सर्वोच्च अदालत ने अपने ऐतिहासिक आदेश में साफ कहा था कि देश के नागरिकों को बिना किसी भय के सार्वजनिक स्थानों और फुटपाथों पर निर्बाध चलने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार (Article 21) प्राप्त है। अदालत ने भीड़भाड़ वाले संवेदनशील इलाकों से आवारा कुत्तों को तत्काल हटाने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए स्थानीय नगर निकायों की विधिक जिम्मेदारी तय की थी।
रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़े पर्यावरण और सामाजिक कार्यकर्ताओं का विधिक तर्क है कि आगरा केवल स्थानीय बाशिंदों का शहर नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी मुद्रा देने वाले करोड़ों अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की मुख्य मंज़िल भी है। यदि शहर की सड़कों पर इस तरह असुरक्षा और दमन का माहौल बना रहेगा, तो ताजनगरी की वैश्विक छवि और हमारा पर्यटन व्यवसाय दोनों कूटनीतिक रूप से बुरी तरह प्रभावित होंगे। इस मानवीय संकट का स्थाई विधिक समाधान अब प्रशासन के आधे-अधूरे और दिखावटी उपायों से कतई नहीं निकलने वाला है। इसके लिए बड़े पैमाने पर पारदर्शी नसबंदी, आवारा मवेशियों के लिए विधिक कांजी हाउस व गंतव्य गौशालाओं का निर्माण, बंदरों का वैज्ञानिक व वन विभाग सम्मत प्रबंधन और सड़कों पर पशु छोड़ने वाले लापरवाह पशु मालिकों पर भारी विधिक जुर्माना व सख्त दंडात्मक कार्रवाई की तत्काल जरूरत है। जब तक ऐसा ठोस प्रशासनिक कदम नहीं उठाया जाता, तब तक ताज नगरी के बेबस लोग हर सुबह अपने घरों से निकलते समय पहले सड़क पर नजरें दौड़ाएंगे और फिर डर-डर कर अपने कदम आगे बढ़ाएंगे। किसी भी आधुनिक और सभ्य कहलाने वाले शहर के लिए इससे बड़ी प्रशासनिक बदकिस्मती और क्या हो सकती है? सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।