वोट देना अब विशेषाधिकार, हर नागरिक को उपलब्ध नहीं: अपूर्वानंद का तीखा विश्लेषण

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Article Desk, tajnews.in | Saturday, May 09, 2026, 10:32:15 PM IST

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Apoorvanand Writer
अपूर्वानंद
प्रोफेसर,
दिल्ली विश्वविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने 2026 के विधानसभा चुनावों (विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम) में मतदाताओं के बड़े पैमाने पर बहिष्करण और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता पर एक बेहद गंभीर आलेख लिखा है। यह विश्लेषण मताधिकार के छीने जाने को भारतीय जनतंत्र के ‘मूल विचार’ की हत्या के रूप में प्रस्तुत करता है।
HIGHLIGHTS
  1. 2026 चुनावों का सबसे काला अध्याय: सार्वभौम वयस्क मताधिकार के विचार को गहरा दफ़न कर दिया गया है।
  2. बंगाल में 28 लाख वैध मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से काटना जनतंत्र के लिए एक ‘नैतिक पतन’ की स्थिति है।
  3. सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल; मताधिकार अब संवैधानिक अधिकार नहीं बल्कि सरकारी ‘प्रसाद’ बनता जा रहा है।
  4. असम में परिसीमन की चालाकी: अल्पसंख्यक वोटों को अप्रासंगिक बनाने के लिए चुनाव क्षेत्रों का साज़िशपूर्ण पुनर्निर्धारण।

वोट देना अब विशेषाधिकार, हर नागरिक को उपलब्ध नहीं (आलेख : अपूर्वानंद) 2026 में नई विधानसभाओं के लिए 5 राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों की सबसे बड़ी खबर यह है कि सार्वभौम वयस्क मताधिकार के विचार को गहरे कब्र में दफ़न कर दिया गया है। परकला प्रभाकर ने बहुत तकलीफ़ के साथ लिखा है कि बंगाल के 28 लाख वैध मतदाताओं से उनका मताधिकार छीन लेना अगर हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता नहीं है, तो हमें ख़ुद को जनतंत्र कहना बंद कर देना चाहिए।

प्रश्न यह नहीं है कि ये 28 लाख मतदाता अगर वोट डाल पाते, तो बंगाल का चुनाव परिणाम क्या होता? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत के लोगों को अब दो हिस्सों में बांट दिया जाएगा : एक, जिन्हें मताधिकार दिया जाएगा और दूसरा हिस्सा उनका, जिन्हें वक्त-वक्त पर मताधिकार से वंचित कर दिया जाएगा? क्या अब मताधिकार भारत के लोगों का अधिकार नहीं, बल्कि सरकारी चुनाव आयोग द्वारा तय की गई ‘तार्किक’ प्रक्रिया द्वारा दिया गया प्रसाद होगा?

बंगाल में चुनाव के पहले चुनाव आयोग ने भारतीय जनता पार्टी के लिए कोई 91 लाख असुविधाजनक मतदाताओं की छंटनी कर डाली थी। इनमें से 34 लाख मतदाता जब मतदाता सूची में शामिल होने की अपनी अर्ज़ी लेकर सर्वोच्च न्यायालय गए, तो न्यायालय ने उनसे कहा कि इस चुनाव में उनका वोट डालना कोई ज़रूरी नहीं है. यानी, भारत का प्रत्येक वयस्क अब मताधिकार का दावा नहीं कर सकता।

जो चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया से असहमत थे, उन राजनीतिक दलों ने भी इन 27 लाख मतदाताओं के बिना चुनाव में भाग लेना तय किया। इन चुनाव में हिस्सा लेकर उन्होंने इस विचार को वैधता प्रदान कर दी कि भारत में वयस्क मताधिकार अब एक विशेषाधिकार है, जो हर किसी को उपलब्ध नहीं होगा।

अपने जनतांत्रिक अधिकार से वंचित इन मतदाताओं ने देखा कि किसी राजनीतिक दल के लिए वे महत्त्वपूर्ण न थे। ऐसा करने के बाद यह विलाप करने का कोई अर्थ नहीं कि ममता बनर्जी भबानीपुर में 15 हज़ार वोटों से हारी हैं, जबकि वहां 47 हज़ार लोगों के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं। ममता बनर्जी अगर इन 47 हज़ार लोगों को चुनाव प्रक्रिया में शामिल किए बिना चुनाव न लड़ने का फ़ैसला करतीं, तो वह उनकी नैतिक जीत होती।

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यह कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच सिर्फ़ 13 लाख वोटों का फसला है, जबकि कोई 27 लाख लोगों को मतदान से वंचित किया गया। यानी अगर वे भी चुनाव में भाग ले पाते, तो क्या नतीजा यही होता? लेकिन अब यह सवाल प्रासंगिक नहीं, क्योंकि इन 27 लाख लोगों के बिना ममता बनर्जी और विपक्ष ने चुनाव लड़ना तय किया。

ये सब उन मतदाताओं के अधिकार के लिए खड़े नहीं हुए, जिनके साथ चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने नाइंसाफ़ी की थी। यह जनतंत्र में किसी के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अन्याय था, लेकिन ग़ैर-भाजपा राजनीतिक दलों के लिए यह इतना गंभीर न था कि वे यह कहते कि जब तक इन्हें चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं मिलता, वे भी चुनाव में भाग नहीं लेंगे。

अगर राजनीतिक दल यह चाहते हैं कि मतदाता उनके साथ खड़े हों, तो पहले उन्हें यह दिखलाना होगा कि वे उनके साथ खड़े हैं। दुर्भाग्य से, राजनीतिक दलों ने यह नहीं किया है。

उसी तरह असम में चुनाव क्षेत्रों का पुनर्निधारण इस प्रकार किया गया कि मुसलमान वोटों का महत्त्व कुल चुनाव परिणाम के लिए उनकी संख्या के मुक़ाबले बहुत कम हो जाए। यानी, जिन चुनाव क्षेत्रों के परिणाम को वे प्रभावित कर सकते थे, अब वे उनके मुक़ाबले बहुत कम चुनाव क्षेत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण रह गए हैं। इन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण इस तरह किया गया है कि भाजपा विरोधी मतदाताओं को कुछ ही चुनाव क्षेत्रों में सीमित कर दिया गया है, जबकि भाजपा और उसके सहयोगी दलों के मतदाताओं को चालाकी से व्यापक क्षेत्रों में फैला दिया गया है। इस तरह ऐसी हालत पैदा हो गई है कि अपने समर्थकों की सघनता वाले क्षेत्रों में 70-80% वोटों से जीतने पर भी ग़ैर भाजपा दलों की सीटों की संख्या हमेशा कम ही रहेगी。

इस तरह भारत के लोगों को दो तरह से दो हिस्सों में बांट दिया गया है। एक, मताधिकारयुक्त और दूसरा, मताधिकारविहीन। पहले की दूसरे से कोई सहानुभूति न होगी। लोग व्यक्तिगत तौर पर पहली सूची में किसी तरह घुस जाने की जुगत में लगे रहेंगे। लेकिन अगर यक़ीन हो जाए कि सिर्फ़ मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किया जाएगा, तो कोई व्यापक विरोध न होगा。

उसी तरह जहां मुसलमानों को पूरी तरह मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकेगा, वहां चुनाव क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण इस तरह किया जाएगा कि संपूर्ण राज्य के चुनाव परिणाम को वे प्रभावित नहीं कर पाएंगे। वे कुछ क्षेत्रों में सिमट कर रह जाएंगे। इस प्रकार सरकार बनाने के मामले में मुसलमान वोट अप्रासंगिक बना दिए जाएंगे。

2026 के विधानसभा चुनावों में बंगाल और असम में जो प्रयोग किया गया है, वह सावरकर और गोलवलकर के लक्ष्य की तरह निर्णायक कदम है : एक ऐसा भारत, जिसमें हिंदू हित मुसलमानों के हितों से ख़ुद को अलग कर लेंगे। मुसलमान शारीरिक तौर पर जीवित रहेंगे, लेकिन राजनीतिक तौर पर बेजान कर दिए जाएंगे。

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं।)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: जनतंत्र के प्रहरी या सत्ता के मोहरे?

प्रोफेसर अपूर्वानंद का यह आलेख भारतीय लोकतंत्र के उस नाज़ुक मोड़ की ओर इशारा करता है, जहाँ संविधान द्वारा प्रदत्त सबसे बुनियादी अधिकार—’वयस्क मताधिकार’ (Universal Adult Franchise)—गंभीर संकट में है। 1950 में जब भारत का संविधान लागू हुआ, तो हमने पश्चिमी देशों के विपरीत, एक ही झटके में हर नागरिक को वोट देने का अधिकार दिया था, चाहे वह अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित। लेकिन 2026 के ये चुनाव परिणाम बताते हैं कि अब यह अधिकार ‘अधिकार’ नहीं रह गया है, बल्कि इसे एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। जब राज्य तय करने लगे कि कौन वोट देगा और कौन नहीं, तो वह जनतंत्र नहीं, बल्कि एक ‘चुनावी तानाशाही’ (Electoral Autocracy) की ओर बढ़ता कदम है。

संस्थागत पतन और चयनात्मक न्याय:
आलेख में चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर जो सवाल उठाए गए हैं, वे बेहद विचलित करने वाले हैं। चुनाव आयोग की प्राथमिक ज़िम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र मतदाता छूटने न पाए। लेकिन बंगाल में 91 लाख मतदाताओं की ‘छंटनी’ और उनमें से 28-30 लाख वैध मतदाताओं का अंतिम सूची से बाहर रह जाना यह दर्शाता है कि संस्थाएं अब ‘निष्पक्ष’ रेफरी के बजाय सत्ता के ‘खिलाड़ी’ के रूप में व्यवहार कर रही हैं। सबसे दुखद पहलू न्यायपालिका का वह रुख है जिसने इस गंभीर संवैधानिक उल्लंघन को ‘ज़रूरी नहीं’ कहकर टाल दिया। जब न्याय के मंदिर से ही यह संदेश मिले कि आपका वोट डालना अनिवार्य नहीं है, तो वह आम नागरिक के संवैधानिक भरोसे की नींव हिला देता है。

विपक्ष की नैतिक विफलता:
लेखक ने विपक्षी दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस की भी कड़ी आलोचना की है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि उन मूल्यों की रक्षा का नाम है जिन पर वह टिका है। जब लाखों मतदाताओं को अन्यायपूर्ण तरीके से प्रक्रिया से बाहर किया गया, तो विपक्ष को उस प्रक्रिया का बहिष्कार करना चाहिए था। चुनाव लड़कर उन्होंने न केवल उन मतदाताओं को अकेला छोड़ दिया, बल्कि इस ‘भेदभावपूर्ण’ व्यवस्था को लोकतांत्रिक वैधता भी प्रदान कर दी। विपक्ष की यह ‘अवसरवादी’ राजनीति ही सत्ता को ऐसे प्रयोग करने की ताकत देती है। ममता बनर्जी की हार केवल 15 हज़ार वोटों की हार नहीं है, बल्कि उस ‘नैतिक साहस’ की हार है जो उन्हें एक सच्चे जनतंत्र का रक्षक बना सकता था。

राजनीतिक अप्रासंगिकता का ‘असम मॉडल’:
असम में चुनाव क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण (Gerrymandering) का जो ज़िक्र आलेख में है, वह ध्रुवीकरण की राजनीति का एक नया और घातक आयाम है। यह केवल वोट काटने का मामला नहीं है, बल्कि एक पूरे समुदाय की राजनीतिक आवाज़ को स्थायी रूप से दफन करने की साज़िश है। जब आप जानते हैं कि एक समुदाय का वोट आपको नहीं मिलेगा, तो आप भूगोल (Geography) को इस तरह बदलते हैं कि उनकी संख्या चाहे कितनी भी हो, उनके प्रतिनिधित्व की ताकत शून्य हो जाए। यह ‘राजनीतिक बेजान’ करने की प्रक्रिया सावरकर और गोलवलकर के उस सपने को साकार कर रही है जहाँ अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक (Second-class Citizen) बना दिया जाता है। यह भारत की ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब और ‘विविधता में एकता’ के विचार पर अंतिम प्रहार जैसा है。

निष्कर्षतः, प्रोफेसर अपूर्वानंद हमें आगाह कर रहे हैं कि सन्नाटा बहुत गहरा है। यदि आज हम दूसरों के मताधिकार छीने जाने पर खामोश रहे, तो कल यह ‘अदृश्य दीवार’ हम सबके इर्द-गिर्द खड़ी होगी। लोकतंत्र की रक्षा के लिए अब केवल राजनीतिक दलों पर भरोसा करना काफी नहीं है; इसके लिए नागरिकों को खुद अपनी संवैधानिक चेतना के साथ खड़ा होना होगा। वोट देना अब केवल एक विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हमारे वजूद की लड़ाई बन गया है。

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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