पूंजीवाद का कुरूप चेहरा: लोकतांत्रिक समाजवाद की वापसी की पुकार, बृज खंडेलवाल का प्रखर आलेख

खबर शेयर कीजिए

Article Desk, tajnews.in | Tuesday, May 05, 2026, 09:37:49 PM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने आधुनिक पूंजीवाद, असमानता की बढ़ती खाई और ‘गिग इकॉनमी’ के दौर में लोकतांत्रिक समाजवाद की प्रासंगिकता पर एक विचारोत्तेजक आलेख लिखा है। कार्ल मार्क्स से लेकर डॉ. राम मनोहर लोहिया और नॉर्डिक देशों के कल्याणकारी मॉडल का संदर्भ देते हुए यह आलेख इंसान को माल (Commodity) समझने वाली क्रूर आर्थिक नीतियों पर करारा प्रहार करता है।
HIGHLIGHTS
  1. उदारीकरण और वैश्वीकरण के तीन दशकों बाद भारत में अमीर-गरीब की खाई और गहरी हुई है, जहाँ कॉर्पोरेट मुनाफा आसमान छू रहा है।
  2. डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और व्यापार युद्ध ने पूंजीवाद के उस कुरूप चेहरे को बेनकाब किया है, जो कमजोर देशों को ‘hell hole’ कहता है।
  3. कार्ल मार्क्स से लेकर डॉ. राम मनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव तक, विचारकों ने आर्थिक समानता के बिना लोकतंत्र को दिखावा माना है।
  4. भारत में मनरेगा जैसी योजनाएं नाकाफी हैं; नॉर्डिक देशों की तर्ज पर एक मजबूत लोकतांत्रिक समाजवाद ही आज के आर्थिक संकट का वास्तविक समाधान है।

पूंजीवाद का कुरूप चेहरा:
लोकतांत्रिक समाजवाद की वापसी की पुकार
_______
बृज खंडेलवाल

_________

लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए?

तीन दशकों से भारत में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का निज़ाम चला। कहा गया कि विकास होगा, दौलत बढ़ेगी, सबका भला होगा। हुआ क्या? अमीर और अमीर हो गए। ग़रीब वहीं खड़े रह गए, कई जगह और पीछे चले गए। शहर चमक उठे, लेकिन गाँव सूने हो गए। अमीरी-गरीबी का फासला अब खाई बन चुका है。

दुनिया के मंच पर यह पूंजीवाद अब और भी बेनक़ाब हो चुका है। डोनाल्ड ट्रंप इस सिस्टम का सबसे बदसूरत चेहरा बनकर उभरे। उनकी सियासत में तहज़ीब कम, घमंड ज़्यादा दिखाई दिया है। व्यापार युद्ध, ऊँचे टैरिफ, कमज़ोर देशों को “hell hole” कहना; यह सब सिर्फ लफ्ज़ नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जहाँ ताक़त ही सच बन जाती है。

यह पूंजीवाद का वही चेहरा है, जो इंसान को इंसान नहीं, माल (commodity) समझता है। कामगार एक नंबर बन जाता है। मज़दूर एक लागत बन जाता है। और इंसानियत? वह कहीं गुम हो जाती है。

कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले चेतावनी दी थी: यह सिस्टम इंसान के रिश्तों को सिर्फ पैसे के लेन-देन में बदल देगा। आज गिग इकॉनमी, ठेके पर काम, और प्रवासी मज़दूरों की हालत देखिए। सब कुछ वही कहानी कह रहे हैं。

यह भी पढ़ें

रोजा लक्जेमबर्ग ने कहा था, या तो समाजवाद आएगा, या बर्बरता। आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, यह बात और भी सच्ची लगती है। नफ़रत की राजनीति, धर्म और नस्ल के नाम पर बँटवारा; यह सब उसी बर्बरता की आहट है。

भारत में समाजवाद की सोच कोई पराई चीज़ नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया ने साफ कहा था: बराबरी के बिना भाईचारा एक झूठ है। जब तक आर्थिक समानता नहीं होगी, तब तक समाज में सच्ची मोहब्बत नहीं पनपेगी。

आचार्य नरेंद्र देव ने लोकतंत्र और समाजवाद को एक-दूसरे का पूरक माना। उनका मानना था कि पूंजीवाद के तहत लोकतंत्र सिर्फ दिखावा है, असल ताक़त कुछ लोगों के हाथ में सिमट जाती है。

आज भारत में यह सच्चाई साफ दिखती है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, लेकिन उनके साये में झुग्गियाँ भी हैं। कॉर्पोरेट मुनाफा आसमान छू रहा है, लेकिन किसान कर्ज़ में डूबकर जान दे रहा है। नौजवान पढ़-लिखकर भी बेरोज़गार है। यह कैसी तरक़्क़ी है?

दुनिया में भी हालात कुछ अलग नहीं। ट्रंप की नीतियों ने दिखा दिया कि पूंजीवाद अब सिर्फ बाज़ार नहीं, बल्कि ताक़त का खेल बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कमज़ोर हो रही हैं। नियमों की जगह मनमानी चल रही है。

ऐसे में लोकतांत्रिक समाजवाद एक उम्मीद बनकर उभरता है। यह कोई ख़याली पुलाव नहीं है। यह एक संतुलित रास्ता है, जहाँ लोकतंत्र भी हो, और आर्थिक न्याय भी。

समाजवाद का मतलब सिर्फ सरकार का नियंत्रण नहीं। इसका मतलब है; हर इंसान को इज़्ज़त से जीने का हक़ मिले। अच्छी शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवा, और रोजगार के मौके सबको मिलें。

नॉर्डिक देशों का मॉडल सामने है। वहाँ बाज़ार भी है, लेकिन मज़बूत यूनियन भी हैं। अमीर टैक्स देते हैं, और ग़रीबों को सहारा मिलता है। यही संतुलन समाज को स्थिर बनाता है。

भारत में भी कुछ कोशिशें हुई हैं। मनरेगा, मिड-डे मील जैसी योजनाओं ने राहत दी है। लेकिन ये आधे-अधूरे कदम हैं। ज़रूरत है एक बड़े बदलाव की: नीतियों में, सोच में, और सियासत में。

आज सबसे ज़रूरी है इंसान को केंद्र में रखना। मुनाफा नहीं, इंसानियत अहम हो। विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी नहीं, बल्कि लोगों की खुशहाली हो。

मई दिवस भले फीका पड़ गया हो, लेकिन उसका पैग़ाम आज भी ज़िंदा है। यह हमें याद दिलाता है कि हक़ माँगने से नहीं, लड़ने से मिलते हैं。

पूंजीवाद ने हमें बहुत कुछ दिया, लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया। अब वक़्त है सोचने का; क्या हम उसी रास्ते पर चलते रहेंगे, या कोई नया रास्ता चुनेंगे?

लोकतांत्रिक समाजवाद कोई पुरानी किताब का सपना नहीं। यह आज की ज़रूरत है। यह वह रास्ता है, जहाँ इंसान, इंसान बना रहता है, न कि सिर्फ एक ग्राहक या मजदूर。

और शायद यही सबसे बड़ी लड़ाई है: इंसान को इंसान बनाए रखने की。

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: उदारीकरण का भ्रम और लोकतांत्रिक समाजवाद का यथार्थ

बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख उस कड़वे यथार्थ को हमारे सामने रखता है जिसे मुख्यधारा का विमर्श अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है। 1991 में जब भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के दरवाजे खोले थे, तब देश को एक सुनहरा सपना बेचा गया था कि ‘ट्रिकल-डाउन इफ़ेक्ट’ (Trickle-down effect) यानी ऊपर से रिसकर दौलत नीचे तक पहुंचेगी। लेकिन तीन दशकों का यथार्थ यह है कि दौलत रिसकर नीचे नहीं आई, बल्कि नीचे के संसाधनों का दोहन कर चंद हाथों में सिमट गई। शहरों में खड़ी गगनचुंबी इमारतें विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि उस पूंजीवादी व्यवस्था के स्मारक हैं जिसने गांवों को खोखला कर दिया है और किसान को कर्ज के दुष्चक्र में धकेल दिया है।

गिग इकॉनमी और आधुनिक दास-प्रथा:
कार्ल मार्क्स की जिस चेतावनी का आलेख में जिक्र है, वह आज ‘गिग इकॉनमी’ (Gig Economy) के रूप में पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। ओला, उबर, जोमैटो या स्विगी जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने युवाओं को ‘पार्टनर’ (Partner) शब्द का झुनझुना थमाकर उनके सारे श्रम अधिकार छीन लिए हैं। आज का युवा 12-14 घंटे काम करता है, लेकिन उसके पास न कोई स्वास्थ्य बीमा है, न कोई भविष्य निधि (PF), और न ही रोजगार की सुरक्षा। यह आधुनिक दास-प्रथा का वह स्वरूप है जहाँ इंसान को इंसान नहीं, महज़ एक एल्गोरिदम (Algorithm) का पुर्जा मान लिया गया है। पूंजीवाद ने मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक रिश्तों को बाज़ार के माल (Commodity) में तब्दील कर दिया है।

ट्रंप की नीतियां और लेट-स्टेज कैपिटलिज्म (Late-stage capitalism):
वैश्विक परिदृश्य में डोनाल्ड ट्रंप का उभार कोई आकस्मिक घटना नहीं है; यह लेट-स्टेज कैपिटलिज्म का अनिवार्य परिणाम है। जब पूंजीवाद गहरा आर्थिक संकट पैदा करता है, तो जनता के गुस्से को भटकाने के लिए नस्लवाद, धर्मान्धता और अंध-राष्ट्रवाद का सहारा लिया जाता है। कमज़ोर देशों को ‘hell hole’ कहना उसी साम्राज्यवादी और नव-उदारवादी अहंकार का प्रकटीकरण है, जहाँ मानवीय गरिमा की कोई कीमत नहीं है। ट्रंप की नीतियां इस बात का प्रमाण हैं कि जब मुनाफा सर्वोपरि हो जाता है, तो मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग सब बेमानी हो जाते हैं।

नॉर्डिक मॉडल: एक व्यावहारिक विकल्प:
भारत के संदर्भ में डॉ. राम मनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव के विचारों की प्रासंगिकता आज पहले से कहीं अधिक है। लोहिया जी का स्पष्ट मानना था कि आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक लोकतंत्र एक पाखंड है। आज हम चुनाव तो लड़ते हैं, लेकिन नीतियां वे कॉरपोरेट घराने तय करते हैं जो राजनीतिक दलों को भारी चंदा देते हैं। ऐसे में नॉर्डिक देशों (स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे) का ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ एक आशा की किरण है। यह मॉडल साबित करता है कि पूंजी का सृजन और उसका समान वितरण दोनों एक साथ संभव हैं। वहाँ मुक्त बाज़ार भी है, लेकिन राज्य यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा हर नागरिक का मौलिक अधिकार हो।

भारत को आज ‘फ्रीबीज़’ (Freebies) की नहीं, बल्कि एक ठोस अधिकार-आधारित कल्याणकारी व्यवस्था (Welfare State) की आवश्यकता है। मनरेगा (MGNREGA) जैसी योजनाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जीवन रक्षक साबित हुई हैं, लेकिन इन्हें भी लगातार बजट कटौती का सामना करना पड़ रहा है। विकास का पैमाना स्टॉक मार्केट का इंडेक्स (Sensex) या चंद अरबपतियों की सूची नहीं हो सकता। असली विकास वह है जब देश का सबसे गरीब व्यक्ति खुद को सुरक्षित महसूस करे। मई दिवस का लाल रंग भले ही आज फीका नज़र आता हो, लेकिन शोषण के खिलाफ संघर्ष की जो चिंगारी है, वह कभी बुझ नहीं सकती। जब तक समाज में एक भी इंसान भूखा और बेरोज़गार है, तब तक लोकतांत्रिक समाजवाद की पुकार और भी मुखर होकर गूंजती रहेगी। बृज खंडेलवाल जी का यह लेख इसी वैचारिक क्रांति का एक महत्वपूर्ण आह्वान है।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment