ख़ऊओं का शहर आगरा! बृज मंडल की मिठास की अनंत परंपरा: बृज खंडेलवाल का विशेष आलेख

Article Desk, tajnews.in | Sunday, May 03, 2026, 05:24:17 PM IST

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Brij Khandelwal Senior Journalist
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने आगरा, मथुरा और हाथरस की समृद्ध खान-पान संस्कृति और पारंपरिक मिठाइयों की विरासत पर एक बेहद मीठा और विचारोत्तेजक आलेख लिखा है। पेठा, पेड़ा, रबड़ी और 231 साल पुरानी ‘भगत हलवाई’ जैसी संस्थाओं के बहाने यह आलेख सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक धरोहर को भी समेटता है जो आज के पैकेटबंद दौर में भी अपनी शुद्धता और महक से लोगों को अपनी ओर खींच रही है।
HIGHLIGHTS
  1. आगरा, मथुरा और हाथरस का बृज मंडल अपनी सदियों पुरानी पारंपरिक मिठाइयों, शुद्ध घी और खोए की महक के लिए विश्व विख्यात है।
  2. 1795 में स्थापित आगरा की ‘भगत हलवाई’ 231 वर्षों से अधिक समय से इस मीठी सांस्कृतिक विरासत और शुद्धता को सहेजे हुए है।
  3. आगरा का पेठा, हाथरस की सोन पपड़ी-घेवर और मथुरा का पेड़ा बृज की सादगी और मुगलई समृद्धि के बेजोड़ संगम को दर्शाते हैं।
  4. ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय: पैकेटबंद फूड के इस दौर में फूड टूरिज़्म (Food Tourism) के जरिये इस अनूठी ग्रामीण और पारंपरिक अर्थव्यवस्था को बचाने की सख्त ज़रूरत है।

ख़ऊओं का शहर आगरा!
बृज मंडल की मिठास की अनंत परंपरा
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बृज खंडेलवाल द्वारा
3 मई 2026
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बृज मंडल: आगरा, मथुरा और हाथरस का यह पवित्र त्रिकोण कृष्ण प्रेम की मीठी धुन पर थिरकता है। यमुना की लहरों और ब्रज की धूल में दूध, घी और खोए की महक आज भी घुली हुई है।

यहां की मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत का संगम हैं। मंदिरों में “लाल कू मीठी खीर भौत भावे” कहकर भोग चढ़ाया जाता है, जहां मठरी, लड्डू, ठौर, पेड़ा और रबड़ी, मोहन थाल जैसे प्रसाद कृष्ण भक्ति को और मिठास देते हैं। वृन्दावन में ठंडी दही लस्सी के बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है, तो मथुरा में खुरचन और मेवा-युक्त खौलते दूध का कुल्लड़ चटकाए बिना मनोकामना पूरी नहीं होती।

बृज क्षेत्र की मिठाइयां सांस्कृतिक धरोहर हैं। इनमें मुगल काल की समृद्धि और ब्रज की सादगी का अनोखा मेल दिखता है। आगरा का विश्व प्रसिद्ध पेठा तो गरीब- अमीर सभी का पसंदीदा है, लेकिन घेवर, कलाकंद, बर्फी, गुलाब जामुन, खुरमी, बालूशाही, पेड़ा, रबड़ी, सोन पपड़ी और दूध की मलाई जैसी रचनाएं ब्रज की आत्मा को छूती हैं। घी और खोया इन मिठाइयों की जान हैं, जबकि बंगाल चेना पर और दक्षिण भारत नारियल पर निर्भर रहता है। यहां गोंद जैसे पौष्टिक तत्व और मुगल शाही रबड़ी की गाढ़ापन ब्रज की खास पहचान है。

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भारत में मिठाइयों का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है, लेकिन आगरा की भगत हलवाई इसे जीवंत उदाहरण बनाती है। 1795 में लेख राज भगत द्वारा यमुना किनारे बेलंगंज में स्थापित यह दुकान भारत की सबसे पुरानी मिठाई की दुकानों में से एक मानी जाती है। लगभग 231 वर्ष पुरानी इस संस्था ने पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक रेसिपी और बनाने के तरीके संभालकर रखे हैं। शुरू में बेड़इं, जलेबी, लड्डू और साधारण मिठाइयों से सफर शुरू करने वाली यह संस्थान आज सैकड़ों आइटम्स, मिठाई, चाट, बेकरी और कन्फेक्शनरी, तक पहुंच चुकी है। NDTV समेत कई मीडिया संस्थानों ने इसे भारत की सबसे पुरानी मिठाई दुकान के रूप में मान्यता दी है। मक्खन का समोसा, पिस्ते की बर्फी, खास हैं。

बेलनगंज में भगत हलवाई के सामने एक जमाने में राजनीतिक सभाएं होती थीं और बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता यहां नाश्ता करते थे। आज इसके 7-8 आउटलेट्स हैं, लेकिन स्वाद वही पुराना, शुद्ध घी-खोया वाला बना हुआ है।
कई दुकानों पर आज भी दोपहर को कढ़ाई में पका गाढ़ा दूध पीना आगरा की अनोखी शान है。

आगरा में तिकोनिया इलाके की दुकानें भी कम प्रसिद्ध नहीं। शहर के विभिन्न हिस्सों में हीरा लाल मिष्ठान, गोपाल दास पेठे वाले, देवी राम, दाऊजी, गोपिका और GMB जैसे ब्रांड्स लंबे समय से स्वाद की सेवा कर रहे हैं। गोपाल दास तो पेठा और दालमोठ के लिए मशहूर है। रबड़ी इतनी गाढ़ी होती है कि चम्मच उसमें खड़ा रह जाता है। धीमी आंच पर घंटों पकाई जाने वाली यह रबड़ी ब्रज की धैर्यपूर्ण परंपरा का प्रतीक है。

मथुरा में पेड़ा कृष्ण भक्ति का प्रतीक है। यहां का पारंपरिक पेड़ा खोए, शुद्ध घी और सूखे मेवों से बना नरम, हल्का पीला गोला मुंह में घुल जाता है। कान्हा स्वीट्स और बसंती मिठाई की रबड़ी दूध को उबाल-उबालकर बनाई जाती है, जिसमें पिस्ता की बारीक कतरनें स्वाद बढ़ाती हैं। मक्खन संदेश मक्खन की मलाई में फल-मेवे मिलाकर ब्रज का अनूठा स्वाद प्रस्तुत करता है। खुरचन भी यहां लोकप्रिय है, दूध की मलाई को रगड़कर बनाया गया चिपचिपा, इलायची-केसर युक्त आनंद。

हाथरस हींग कचौड़ी के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन मिठाइयों में भी पीछे नहीं। यहां का घेवर मेवों से भरा आता है। सोन पपड़ी पतली-कुरकुरी चादरों वाली, लंबे समय तक टिकने वाली मिठाई है। हाथरस के हलवाई पारंपरिक चूल्हों पर घी डालकर स्वाद को और गहराई देते हैं। खुरचन यहां भी चिपचिपी और सुगंधित बनती है。

बृज के छोटे कस्बे भी अपनी विशेषताएं रखते हैं। पिनाहट की खोए की गुजियां त्योहारों में खास होती हैं, खोया भरी कुरकुरी परतें, गुड़ या चीनी से मीठी। किरावली के पेड़े छोटे, घने खोए वाले और बेहद स्वादिष्ट होते हैं। ये छोटी जगहें ब्रज की गहरी सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाती हैं。

बृज मिठाइयों की सबसे बड़ी खूबी उनकी सादगी और पौष्टिकता है। शुद्ध घी, ताजा खोया और मेवों से बनी ये मिठाइयां न सिर्फ स्वाद देती हैं बल्कि ऊर्जा भी। आज के दौर में जब पैकेटबंद मिठाइयां बाजार में छाई हुई हैं, तब भी बृज मंडल के हलवाई पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं。

ताजमहल देखने आने वाले पर्यटक अब सिर्फ पत्थर की सुंदरता नहीं, बल्कि ब्रज की मीठी विरासत का भी रसास्वादन जरूर करें। आगरा, मथुरा और हाथरस की गलियों में घूमते हुए एक कौर पेड़ा, एक चम्मच रबड़ी या एक टुकड़ा सोन पपड़ी मुंह में रखें, तो महसूस होगा कि कृष्ण की लीला अभी भी यहां जीवंत है।
बृज मंडल की मिठास अनंत है, ठीक उसी तरह जैसे कान्हा का प्रेम। एक बार चख लो, तो बार-बार याद आएगी。

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: स्वाद, विरासत और फूड टूरिज़्म की असीम संभावनाएं

बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख केवल कुछ मिठाइयों का वर्णन नहीं है, बल्कि यह बृज मंडल की उस ‘गैस्ट्रोनोमिकल’ (Gastronomical) पहचान का जीवंत दस्तावेज़ है, जिसे सदियों से हमारे हलवाइयों, किसानों और कारीगरों ने अपने खून-पसीने से सहेजा है। आगरा को यूं ही “ख़ऊओं का शहर” नहीं कहा जाता। यह एक ऐसा शहर है जहां की सुबह बेड़ई-जलेबी की खनक के साथ शुरू होती है और रातें खौलते हुए दूध की सौंधी महक के साथ परवान चढ़ती हैं। आज जब हम इस आलेख की गहराई में उतरते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि हमारी पारंपरिक मिठाइयां केवल हमारी थाली का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह एक विशाल असंगठित अर्थव्यवस्था का मुख्य इंजन हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और डेरी किसानों की रीढ़:
मथुरा का पेड़ा हो, हाथरस की सोन पपड़ी या आगरा की गाढ़ी रबड़ी, इन सबके मूल में एक ही तत्व है—शुद्ध दूध और उससे बना खोया (मावा)। बृज मंडल की यह खान-पान संस्कृति सीधे तौर पर हमारे ग्रामीण भारत और डेरी किसानों से जुड़ी हुई है। जब एक शहर का प्रसिद्ध हलवाई अपनी कढ़ाई में दूध उबालता है, तो वह केवल मिठाई नहीं बना रहा होता, बल्कि वह आसपास के दर्जनों गांवों के दूध उत्पादकों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा होता है। यह एक ऐसा ईको-सिस्टम है जिसमें ग्वाले, भट्टी जलाने वाले मजदूर, चीनी मिलों के कामगार और मिठाई पैक करने वाले कारीगर शामिल हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों (FMCG) द्वारा बेची जा रही चॉकलेट और पैकेटबंद कुकीज़ के इस दौर में, हमारी ये पारंपरिक दुकानें इस पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ऑक्सीजन प्रदान कर रही हैं।

231 वर्ष पुरानी विरासत: ‘भगत हलवाई’ का ऐतिहासिक महत्व:
आलेख में ‘भगत हलवाई’ का उल्लेख एक बेहद महत्वपूर्ण बिंदु है। 1795 में शुरू हुई यह दुकान इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आगरा के स्वाद में समय को मात देने की अद्भुत क्षमता है। 231 वर्षों का सफर तय करना, पीढ़ियों से चली आ रही रेसिपी को बचाकर रखना और आधुनिकता के बीच अपनी शुद्धता से कोई समझौता न करना—यह अपने आप में एक ‘केस स्टडी’ है। बेलनगंज की जिन गलियों में कभी बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता नाश्ता करते हुए देश की आज़ादी की रणनीतियां बनाते थे, आज वहां की खनकती हुई कढ़ाइयां आगरा के गौरवशाली इतिहास को बयान कर रही हैं। यह सिर्फ एक व्यापारिक सफलता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विजय है।

फूड टूरिज़्म (Food Tourism) का अनछुआ पहलू:
हर साल लाखों देशी-विदेशी पर्यटक ताजमहल, आगरा फोर्ट और फतेहपुर सीकरी का दीदार करने आते हैं। लेकिन पर्यटन उद्योग का एक बड़ा हिस्सा, जिसे हम ‘फूड टूरिज़्म’ (पाक पर्यटन) कहते हैं, आगरा और बृज मंडल में अभी भी अपनी पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो पाया है। इटली, फ्रांस या यहां तक कि थाईलैंड जैसे देश अपने पारंपरिक व्यंजनों को विश्व स्तर पर प्रमोट करके अरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। क्या आगरा का विश्व प्रसिद्ध पेठा, मथुरा का पेड़ा और हाथरस की कचौड़ी को हम ग्लोबल ब्रांड नहीं बना सकते? राज्य सरकार और पर्यटन विभाग को चाहिए कि वे ‘ताजमहल के साथ-साथ बृज के स्वाद’ को एक समग्र टूरिज़्म पैकेज के रूप में पेश करें। पर्यटकों के लिए ‘स्वीट ट्रेल’ (Sweet Trail) या ‘हेरिटेज फूड वॉक’ आयोजित की जानी चाहिए, जहां वे न केवल इन मिठाइयों का स्वाद ले सकें, बल्कि इन्हें बनते हुए देखकर इस प्राचीन कला को समझ भी सकें।

चुनौतियां और हमारा दायित्व:
हालांकि, यह मीठी विरासत आज कई चुनौतियों का सामना कर रही है। मिलावटी दूध और सिंथेटिक खोए का बढ़ता व्यापार इस शुद्धता पर सीधा प्रहार कर रहा है। इसके अलावा, नई पीढ़ी के बदलते स्वाद और पश्चिमी स्नैक्स का बढ़ता क्रेज भी पारंपरिक हलवाइयों के लिए संकट पैदा कर रहा है। ऐसे में यह हमारा सामाजिक दायित्व है कि हम अपने त्योहारों, शादियों और खुशी के हर मौके पर इन पारंपरिक मिठाइयों को ही प्राथमिकता दें। जब हम आगरा, मथुरा या हाथरस की गलियों से एक डिब्बा मिठाई खरीदते हैं, तो हम सिर्फ स्वाद नहीं खरीदते, बल्कि हम उस 200 साल पुरानी कला और उस गरीब कारीगर की मेहनत को सम्मान दे रहे होते हैं।

निष्कर्षतः, बृज मंडल की मिठाइयां केवल शर्करा और घी का मिश्रण नहीं हैं; वे ब्रज की मिट्टी की सौंधी खुशबू, कान्हा के प्रेम और मुगलकालीन नज़ाकत का एक अद्वितीय ‘फ्यूज़न’ हैं। यह विरासत तभी बचेगी जब हम अपनी इस ‘ख़ऊओं की पहचान’ पर गर्व करना सीखेंगे।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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