Agra Desk, tajnews.in | Sunday, April 26, 2026, 09:15:30 PM IST

आगरा: ताजनगरी आगरा हमेशा से ही उर्दू अदब, गंगा-जमुनी तहजीब और साहित्य का एक महान केंद्र रही है। मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब और नज़ीर अकबराबादी जैसे अज़ीम शायरों की इस धरती पर शनिवार की शाम एक बार फिर शायरी और सुखन की एक बेहतरीन महफिल सजी। ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, आगरा कैंट स्थित होटल ग्रैंड में चित्रांशी संस्था द्वारा 41वें ‘चित्रांशी कुल हिंद मुशायरे’ और 17वें ‘फ़िराक इंटरनेशनल अवार्ड’ समारोह का बेहद भव्य आयोजन किया गया। यह मुशायरा उर्दू साहित्य के महान हस्ताक्षर पद्म भूषण प्रोफेसर रघुपति सहाय फ़िराक गोरखपुरी की पावन याद में आयोजित किया गया था। इस गरिमामय समारोह में देश के जाने-माने शायरों ने शिरकत की और अपने बेहतरीन कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर मुल्क के मशहूर शायर मंसूर उस्मानी को प्रतिष्ठित ‘चित्रांशी फ़िराक इंटरनेशनल अवार्ड-2026’ से नवाजा गया। इसके साथ ही, शहर के वरिष्ठ साहित्यकार और जाने-माने पर्यटन उद्यमी अरुण डंग को ‘चौथे केसी श्रीवास्तव अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। समारोह के उद्घाटन से लेकर देर रात इसके समापन तक, शेरो-शायरी का एक ऐसा शानदार सिलसिला चला जिसने आगरा के साहित्य प्रेमियों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। आइए, इस पूरी अदबी महफिल, शायरों के कलाम और अतिथियों के प्रेरक उद्बोधनों का विस्तार से आनंद लेते हैं।

सम्मान समारोह: साहित्य और संस्कृति के साधकों का वंदन
होटल ग्रैंड के विशाल सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत शमां रोशन (दीप प्रज्वलन) के साथ हुई। चित्रांशी संस्था के पदाधिकारियों ने मुख्य अतिथियों और सभी आमंत्रित शायरों का फूल-मालाओं से जोरदार स्वागत किया। इस भव्य समारोह के मुख्य अतिथि फिरोजाबाद के अपर जिला जज (एडीजे) मुमताज़ अली रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में जीएसटी/पीएफ कमिश्नर इंद्रनील और सेंट जॉन्स डिग्री कॉलेज आगरा के उर्दू विभाग के अध्यक्ष सैयद सिब्ते हसन नक़वी ने मंच की शोभा बढ़ाई। चित्रांशी संस्था के अध्यक्ष तरुण पाठक ने इस पूरे कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जबकि मंच का बेहद कुशल संचालन संस्था के महासचिव अमीर अहमद एडवोकेट ने किया।

कार्यक्रम के पहले चरण में सम्मान समारोह आयोजित किया गया। मशहूर गज़ल गायक सुधीर नारायण ने 2026 के फ़िराक इंटरनेशनल अवार्ड से सम्मानित होने वाले शायर मंसूर उस्मानी का विस्तृत परिचय पढ़ा। इसके बाद भारतदीप माथुर ने उनके सम्मान पत्र का वाचन किया। चतुर्थ ‘केसी श्रीवास्तव अवार्ड’ से सम्मानित किए गए साहित्यकार अरुण डंग का साहित्यिक परिचय अमीर अहमद ने पढ़ा। उनके सम्मान पत्र को डॉ. महेश धाकड़ ने सभी के सामने प्रस्तुत किया। अतिथियों ने दोनों ही हस्तियों को शॉल ओढ़ाकर और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। यह क्षण आगरा के साहित्यिक परिवेश के लिए बेहद गौरवशाली था। साहित्य और संस्कृति को जीवित रखने वाले इन दिग्गजों का सम्मान पूरे शहर का सम्मान माना जा रहा है।
अतिथियों के विचार: इंसान अपने कर्मों से बड़ा होता है
सम्मान प्राप्त करने के बाद मुरादाबाद के दिग्गज शायर मंसूर उस्मानी ने चित्रांशी संस्था और आगरा के अवाम का हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने उर्दू भाषा की अहमियत पर जोर देते हुए कहा, “जहां-जहां उर्दू बोली जाती है, वहां-वहां हिंदुस्तान बोलता है।” उनका यह वाक्य श्रोताओं के दिलों में सीधे उतर गया। वहीं, दूसरे सम्मानित व्यक्तित्व अरुण डंग ने अपने संबोधन में देश की साझी विरासत यानी गंगा-जमुनी तहजीब को हमेशा जिंदा रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आगरा पर्यटन के साथ-साथ अपनी साहित्यिक मिठास के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है। अध्यक्षीय संबोधन देते हुए तरुण पाठक ने कहा कि उर्दू से मोहब्बत करने वाले लोगों के कारण ही हम लगातार कामयाबी की राह पर आगे बढ़ रहे हैं और हमें इसे कायम रखना है।
समारोह के मुख्य अतिथि एडीजे मुमताज़ अली ने चित्रांशी संस्था के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि आज के भौतिकवादी युग में इस तरह के कार्यक्रम हमारी सभ्यता और संस्कृति को जिंदा रखने का एक बहुत बड़ा प्रयास हैं। उन्होंने एक बेहद गहरी बात कहते हुए कहा, “कोई भी इंसान अपनी धन-दौलत से बड़ा नहीं होता, बल्कि वह अपने कर्मों से बड़ा होता है। इंसान को उसके बेहतरीन कर्मों के लिए ही सदा याद किया जाता है।” विशिष्ट अतिथि इंद्रनील और सैयद सिब्ते हसन नक़वी ने भी उर्दू अदब के गिरते स्तर को बचाने और युवा पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने पर अपने अमूल्य विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शायरी केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज को आईना दिखाने का भी काम करती है।
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शायरों ने बांधा समां: राजनीति, समाज और जज्बातों की बात
सम्मान समारोह के बाद असली मुशायरे का आगाज हुआ। महफिल में जैसे ही शायरी का दौर शुरू हुआ, पूरा सभागार ‘वाह-वाह’ और ‘मुकर्रर’ की आवाजों से गूंज उठा। साहित्य प्रेमियों ने शायरों की रचनाओं का करतल ध्वनियों (तालियों) से भरपूर इस्तकबाल किया। मुशायरे में मंसूर उस्मानी (मुरादाबाद), फ़ख़्री मेरठी (मेरठ), डॉ. मुजीब शहज़र (अलीगढ़), निकहत अमरोहवी (अमरोहा), सलीम अमरोहवी, नौफ़िल आर्या (आगरा) और कुमार ललित (आगरा) जैसे स्थापित कवियों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाएं प्रस्तुत कीं। इन सभी ने समाज की विसंगतियों और मानवीय रिश्तों की गहराई को अपनी कलम के जरिए बयां किया。
शायर मंसूर उस्मानी ने आज के राजनीतिक और सामाजिक हालात पर एक बेहद तीखा तंज कसते हुए जो शेर पढ़ा, उसने महफिल को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने पढ़ा:
“तंग आकर गलतबयानी से
हम अलग हो गये कहानी से
कितनी सदियों का क़त्ल होता है
ऐक लम्हे की बदगुमानी से
आदमी आदमी का दुश्मन है
अब सियासत की मेहरबानी से।”
उनका यह शेर सियासत द्वारा फैलाए जा रहे जहर और इंसानी रिश्तों में आ रही दूरियों का एक जीता-जागता अक्स था। हर कोई उनके इस गहरे शेर पर दाद देने से खुद को नहीं रोक सका।
वहीं, मेरठ से आए मशहूर शायर फ़ख़्री मेरठी ने मजदूर वर्ग की पीड़ा और महंगाई के दर्द को अपनी शायरी में पिरोते हुए सुनाया:
“हमारे पास बुज़ुर्गो की जाएदाद नहीं
ख़ुदा का शुक्र है, घर में कोई फ़साद नहीं
तमन्ना फायदे की थी, मगर घाटा ख़रीदा है
लहू को बेचकर, मज़दूर ने आटा ख़रीदा है।”
यह शेर सुनकर पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया और लोगों ने नम आंखों से दाद दी। सलीम अमरोहवी ने इंसानियत के खत्म होते रुतबे पर चोट करते हुए कहा:
“बड़ा रुतबा है यारो आदमी का,
मगर वो आदमी फिर आदमी हो
फ़क़त अपने ही अपने हों जहां पर
बहुत दुश्वार है जीना वहां पर।”
बेटियों का सम्मान और मोहब्बत के तराने
महफिल को आगे बढ़ाते हुए महिला शायरा निकहत अमरोहवी ने समाज में बेटियों के सम्मान और अहमियत पर एक बेहद मार्मिक शेर पेश किया। उन्होंने पढ़ा:
“जहाँ में जिसका भी ऊंचा मकान होता है
वो शख़्स अपने क़बीले की शान होता है
दिखाई देती है बेटी उसी के आंगन में
कि जिस बशर पे ख़ुदा मेहरबान होता है।”
इस शेर ने वहां मौजूद सभी महिलाओं और पिता तुल्य श्रोताओं का दिल जीत लिया। अलीगढ़ से पधारे डॉ. मुजीब शहज़र ने भी व्यवस्थाओं के खौफ और आम आदमी की बेबसी को अपने शेर में ढाला:
“प्यासे पंछी सोच रहे हैं बैठे रेत के टीले पर
आज यज़ीदी दौर नहीं फिर क्यूँ हैं पहरे टीलों पर।”
मुशायरे के अंतिम दौर में मोहब्बत और रिश्तों की कशमकश को बयां किया गया। आगरा के स्थानीय शायर नौफ़िल आर्या ने जज्बातों से भरा अपना कलाम पेश करते हुए कहा:
“लाख चाहेंगे ज़माने वाले
हम नहीं तुझ को भुलाने वाले
तेरी कश्ती भी तो जल जाएगी
आग दरिया में लगाने वाले।”
कार्यक्रम के अंत में आगरा के ही युवा कवि कुमार ललित ने शुद्ध हिंदी साहित्य का तड़का लगाते हुए एक बेहतरीन रचना प्रस्तुत की। उन्होंने पढ़ा:
“तुम्हारी साँस पल भर को हमें यदि मिल गई होती
हमारी देह चंदन सी सुवासित हो गई होती
अगर तुम बाँच लेते चाहतों की पांडुलिपियाँ तो
हमारे नेह की पुस्तक प्रकाशित हो गई होती।”
उनकी इस रचना पर युवा श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं।
आयोजकों और शहर के गणमान्य नागरिकों की रही मौजूदगी
इस भव्य और सफल कार्यक्रम के आयोजन में चित्रांशी संस्था के पदाधिकारियों की एक बहुत बड़ी और अहम भूमिका रही। अतिथियों का स्वागत एसीपी इमरान, संस्था के कोषाध्यक्ष अब्दुल कुद्दूस खां, जीडी शर्मा, हरीश सक्सैना चिमटी, इमरान शम्सी, कर्नल जीएम खान, महमूद उज्जमा, अभिनय प्रसाद, रूपेश कुलश्रेष्ठ, सलीम एटवी, वैभव असद, नाहर सिंह, शैलेश वार्ष्णेय, कपिल अग्रवाल, राजेश सहगल, राजीव गुप्ता, प्रोफेसर मौहम्मद हुसैन, बल्देव भटनागर और डॉ. सिराज कुरैशी आदि ने गर्मजोशी के साथ किया। इन सभी ने कार्यक्रम को सुचारू रूप से चलाने में अपना भरपूर योगदान दिया।
मुशायरे की इस यादगार रात में शहर के कई गणमान्य नागरिक और साहित्य प्रेमी भी दर्शक दीर्घा में मौजूद रहे। इनमें प्रमुख रूप से संस्था के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर ब्रजेश चंद्रा, बैकुंठी देवी कॉलेज की उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. नसरीन बेगम, होटल ग्रैंड के मालिक अनिल डंग, रमेश पंडित, पूनम भार्गव ज़ाकिर, डॉ. शादा जाफरी, अनिल शर्मा एडवोकेट और हेमेंद्र चतुर्वेदी एडवोकेट जैसे नामचीन चेहरे शामिल थे। देर रात तक चले इस 41वें चित्रांशी कुल हिंद मुशायरे ने यह साबित कर दिया कि आगरा के लोगों के दिलों में आज भी अदब और शायरी के लिए एक बहुत ही खास मुकाम बाकी है। यह महफिल ताजनगरी की साहित्यिक यादों में एक सुनहरा पन्ना बनकर दर्ज हो गई है।
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Thakur Pawan Singh
Editor in Chief, Taj News
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