महिला आरक्षण की आड़ में ‘लोकतंत्र के एनकाउंटर’ का खेल! मोदी सरकार के दांव-पेंच पर राजेंद्र शर्मा का प्रखर आलेख

आर्टिकल Desk, Taj News | Friday, April 24, 2026, 05:30:00 PM IST

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Rajendra Sharma Writer
राजेंद्र शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
एवं संपादक, ‘लोक लहर’
‘लोक लहर’ के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने अपने इस बेहद शोधपरक और मारक राजनीतिक आलेख में मोदी सरकार के ‘महिला आरक्षण’ के दावों और ‘परिसीमन’ (Delimitation) की छिपी हुई साज़िश की पूरी बखिया उधेड़ दी है। दरअसल, उन्होंने बताया है कि कैसे 2023 में पास हुए बिल को तीन साल तक ‘डीप फ्रीजर’ में रखकर चुनाव के वक्त बाहर निकाला गया। इसके अलावा, उन्होंने 2011 की जनगणना के आधार पर दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें कम करने और उत्तर भारत में सत्ताधारी दल को अनुचित लाभ पहुंचाने के ‘एनकाउंटर’ पर कड़ा प्रहार किया है। इसलिए, बिना किसी देरी के पढ़िए यह शानदार राजनीतिक विश्लेषण:
HIGHLIGHTS
  1. संसद के तीन दिन के विशेष सत्र में 2023 के ‘महिला आरक्षण कानून’ को लागू करने की अधिसूचना जारी करना महज़ एक तकनीकी मजबूरी और दिखावा था।
  2. दरअसल, मोदी सरकार की मंशा महिला आरक्षण को ‘जनगणना और परिसीमन’ की शर्तों में फंसाकर पुरुष सांसदों की संख्या को बिना कम किए सीटों का आकार बढ़ाना था।
  3. इसके अलावा, सरकार महिला आरक्षण की आड़ में 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर ‘परिसीमन’ लागू कर संघ-भाजपा को राजनीतिक रूप से अनुचित लाभ पहुंचाना चाहती थी।
  4. हकीकत में, इस चालबाजी से जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम करने वाले दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता, लेकिन विपक्ष की एकजुटता ने इस साज़िश को नाकाम कर दिया।

संपादकीय संदर्भ: महिला आरक्षण का ‘मायाजाल’ और परिसीमन का राजनीतिक अखाड़ा

भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ मुद्दे ऐसे रहे हैं जो हर चुनाव में ‘ब्रह्मास्त्र’ की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं, और चुनाव खत्म होते ही किसी ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। ‘महिला आरक्षण’ (Women’s Reservation) एक ऐसा ही संवेदनशील और बहुचर्चित मुद्दा है। आज़ादी के इतने दशकों बाद भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व ऊंट के मुंह में जीरे के समान रहा है। जब 2023 में संसद के दोनों सदनों ने भारी बहुमत से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन) पारित किया, तो ऐसा लगा मानो दशकों पुराना इंतज़ार खत्म हो गया हो। लेकिन राजनीति में जो सामने दिखता है, असल कहानी हमेशा उसके पीछे छिपी होती है। यह बिल पास तो हो गया, लेकिन इसके लागू होने को ‘जनगणना’ (Census) और ‘परिसीमन’ (Delimitation) जैसी जटिल और लंबी प्रक्रियाओं से जोड़ दिया गया। इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि 2024 के आम चुनावों में देश की आधी आबादी को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया।

असली खेल यहीं से शुरू होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने की यह शर्त कोई ‘तकनीकी आवश्यकता’ नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ‘राजनीतिक चाल’ थी। इस चाल का मुख्य केंद्र ‘परिसीमन’ है। परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा की सीटों की सीमाओं और संख्या का पुनर्निर्धारण करना। भारत में 2001 की जनगणना के बाद यह तय किया गया था कि 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक परिसीमन पर रोक (Freeze) रहेगी। यह रोक इसलिए लगाई गई थी ताकि परिवार नियोजन (Family Planning) और जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर शानदार काम करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल) को ‘दंडित’ न किया जा सके। यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई गईं, तो उत्तर भारत (विशेषकर यूपी और बिहार) में लोकसभा की सीटें भारी मात्रा में बढ़ जाएंगी, जिससे केंद्र की सत्ता का संतुलन पूरी तरह से उत्तर भारत की ओर झुक जाएगा।

जब केंद्र सरकार ने पुरानी संसद छोड़कर नई संसद (New Parliament Building) का निर्माण करवाया, तो उसमें लोकसभा की क्षमता 850 से अधिक सीटों की रखी गई। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि सरकार का अगला बड़ा कदम परिसीमन के ज़रिए सीटों की संख्या बढ़ाना है। 2026 के हालिया विशेष सत्र में जब सरकार ने महिला आरक्षण को हथियार बनाकर 2011 की ‘पुरानी जनगणना’ के आधार पर परिसीमन लागू करने की कोशिश की, तो विपक्ष ने इस दांव को समझ लिया और कड़ा विरोध किया। विपक्ष की मांग स्पष्ट थी: यदि सरकार की नीयत साफ़ है, तो वह परिसीमन की शर्त को हटाकर वर्तमान 543 सीटों में से ही 33 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित क्यों नहीं कर देती? लेकिन ऐसा करने का मतलब था वर्तमान पुरुष सांसदों के टिकट कटना, जो कि पितृसत्तात्मक राजनीतिक ढांचे को कतई मंज़ूर नहीं था।

इसके अतिरिक्त, चुनाव आयोग (Election Commission) द्वारा हाल ही में ‘सघन विशेष पुनरीक्षण’ (SIR) के नाम पर देश भर में, विशेषकर पश्चिम बंगाल में, लाखों मतदाताओं के नाम काटे जाने से भी सिस्टम की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। जब मतदाता सूचियों में ही इतनी भारी धांधली के आरोप लग रहे हों, तो सरकार द्वारा नियुक्त ‘परिसीमन आयोग’ से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? ‘लोक लहर’ के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा जी ने अपने इस बेहद प्रखर और विश्लेषणात्मक आलेख में मोदी सरकार की इन्ही कूटनीतिक और राजनीतिक चालबाज़ियों की बखिया उधेड़ दी है। उनका यह आलेख न केवल सत्ता के ‘नारी वंदन’ वाले मुखौटे को उतारता है, बल्कि संघीय ढांचे (Federal Structure) के लिए परिसीमन के खतरे को भी बेबाकी से उजागर करता है। पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा जी का यह 100% मूल और प्रामाणिक आलेख:

महिला आरक्षण की आड़ में लोकतंत्र के एन्काउंटर का खेल
(आलेख : राजेन्द्र शर्मा)

महिला आरक्षण का रास्ता साफ करने के नाम पर बुलायी गयी संसद की तीन दिन की विशेष बैठक में, जब संसद में सरकार की ओर से पेश, संविधान संशोधन समेत तीन विधेयकों पर चर्चा शुरू हो रही थी, तभी सरकार की ओर से इसकी अधिसूचना जारी की गयी कि, 2023 के सितंबर में 106वें संविधान संशोधन के जरिए, महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का जो कानून संसद ने लगभग एक राय से पास किया था, वह इसी 16 अप्रैल 2026 से लागू हो गया है! कानून की बारीकियों की ज्यादा जानकारी न रखने वाले आम पाठकों को बेशक इस खबर ने कुछ उलझन में डाला होगा। महिलाओं के लिए जिस एक-तिहाई आरक्षण के नाम पर संविधान संशोधन लाया जा रहा था, उसी आरक्षण का लागू होना इसी दिन से शुरू होने का ऐलान किया जा रहा था! बेशक, इस उलझन के पीछे का तकनीकी/ कानूनी पेंच सामने आने में ज्यादा समय नहीं लगा — महिला आरक्षण कानून को अधिसूचित करना इसलिए जरूरी था कि सरकार इस कानून में संशोधन का प्रस्ताव लायी थी और अधिसूचित हुए बिना ही इस कानून में संशोधन का प्रस्ताव करना, एक विसंगति होती。

बहरहाल, मोदी सरकार की इस तकनीकी मजबूरी ने, लोकसभा तथा विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण के मामले में, मोदीशाही के पाखंड की पोल पूरी तरह से खोलकर रख दी। तीन साल पहले, 2023 में संसद में लगभग सर्वसम्मति से (लोकसभा में सिर्फ दो एमआईएम सदस्यों के अपवाद को छोड़कर) स्वीकृत इस संविधान संशोधन के बाद, मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर क्या किया था? वह इसे पूरी तरह से भूलकर तीन साल सोयी रही थी, जब तक कि उसकी ‘चाणक्य बुद्घि’ में महिला आरक्षण की आड़ में और बड़ा एडवांटेज लेने का आइडिया नहीं आ गया!

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इस सिलसिले में यह याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि 2023 में जब महिला आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन स्वीकार किया गया था, तभी मोदीशाही ने यह सुनिश्चित कर दिया था कि अगले ही साल होने वाले आम चुनावों की तो बात दूर, 2029 के तथा और इसके अगले आम चुनावों तक भी इसको लागू नहीं किया जा सके। वास्तव में, मोदीशाही में नंबर-दो, अमित शाह ने खुद सार्वजनिक रूप से इस आशय के दावे किए थे कि इसमें करीब चार साल लगेंगे। और यह किया गया था, महिला आरक्षण के लागू होने के साथ, नयी जनगणना और 2026 के बाद की जनगणना के बाद, होने वाले परिसीमन या डिलिमिटेशन की शर्त जोड़ने के जरिए。
तभी वामपंथ समेत लगभग समूचे विपक्ष ने आग्रह किया था कि जनगणना और परिसीमन की शर्तों को हटाकर, लोकसभा के 557 सदस्यों के वर्तमान रूप से ही एक-तिहाई आरक्षण की व्यवस्था शुरू की जाए, जिसे अगले आम चुनाव से ही लागू किया जा सकता था। दूसरी ओर, जबकि 2021 की जनगणना की 2023 तक शुरूआत तक नहीं की गयी थी और वास्तव में अमित शाह आम चुनाव के बाद ही जनगणना शुरू होने की घोषणाएं कर रहे थे, उक्त दोनों शर्तें पूरी होकर आरक्षण लागू होने में, 2034 के आम चुनाव चुनाव तक का समय लग सकता था। लेकिन, विपक्ष के इन सुझावों को, जो वास्तव में महिला आरक्षण के लिए तीन दशक से ज्यादा से लगातार संघर्ष कर रहे देश के जनतांत्रिक महिला आंदोलन के भी सुझाव थे, मोदीशाही ने सीधे-सीधे खारिज कर दिया था। इसकी सीधी सी वजह यही थी कि मोदीशाही की संघ-बुद्घि को यह मंजूर नहीं था कि पुरुष सांसदों की वर्तमान संख्या में किसी तरह की कमी कर के, महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएं। इसके बजाय, पुरुष सांसदों की संख्या सुरक्षित रखते हुए, कुल सीटों की संख्या बढ़ाने के बाद ही, उसमें से महिलाओं को तिहाई हिस्सा देना वे स्वीकार कर सकते थे। यह दूसरी बात है कि इतना भी, संघ-भाजपा के मूल वैचारिक रुझान को देखते हुए, बहुत थोड़ा नहीं है। इसीलिए, संघ-भाजपा हलकों में भीतर-भीतर, महिला आरक्षण के खिलाफ विरोध की आग सुलगती रही है। यह भी वजह है कि प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में भाजपा का ही, निर्वाचित निकायों के लिए महिला उम्मीदवार खड़े करने और जिताने में सबसे खराब रिकार्ड रहा है。

फिर भी कोई यह पूछ सकता है कि मान लिया कि 2023 में जो कानून बनाया गया था, उसमें यह कमी थी कि उसके तहत आरक्षण लागू होने के लिए महिलाओं को एक दशक तक इंतजार करना पड़ सकता था। इस कमी को दूर करने के लिए और महिला आरक्षण की मांग को निकट भविष्य से ही व्यवहार्य बनाने के लिए, अगर मोदी सरकार संबंधित नारी वंदन अधिनियम में संशोधन करना चाहती थी, तीन साल इस मुद्दे पर बैठे रहने के बाद ही सही, अब इस कमी को दूर करना चाहती थी, तो क्या विपक्ष को इसमें मददगार नहीं होना चाहिए था, जो महिला आरक्षण का समर्थक होने का दम भरता है। बेशक, विपक्ष को मददगार होना चाहिए था और इसमें अपने अहंकार को आड़े नहीं आने देना चाहिए था। लेकिन, शर्त यह थी कि मोदीशाही 2023 के कानून में समझ-बूझ कर जोड़ी गयी इस कमी को दूर करने का प्रयास कर रही होती। पुन: जैसा कि अधिकांश विपक्षी नेताओं ने बार-बार सुझाया, 2023 के कानून से जनगणना और परिसीमन की शर्तों को हटाने के लिए आवश्यक संशोधन करने के जरिए, एक-तिहाई आरक्षण का रास्ता अगले चुनाव से ही खोला जा सकता है। लेकिन, मोदीशाही को इस तरह का सुधार मंजूर नहीं हुआ। यहां तक कि लोकसभा में मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित संविधान संशोधन के गिर जाने और उसके बाद सरकार के तीनों विधेयकों का अपना पैकेज वापस ले लेने के बाद भी, राज्य सभा में द्रमुक की एक सांसद ने उक्त सुधार के लिए एक निजी संकल्प रखा था, लेकिन उसे खारिज ही कर दिया गया। दरअसल, महिला आरक्षण पर अमल का रास्ता बनाने की आड़ में, सरकार कुछ और ही दांव खेल रही थी। इस दांव का नाम है, परिसीमन या डिलिमिटेशन。

सभी जानते हैं कि हमारे देश में परिसीमन की प्रक्रिया पर एक प्रकार से राजनीतिक सर्वसम्मति से दो दशक से ज्यादा से रोक लगी हुई थी। 2001 की जनगणना को आधार बनाकर हुए परिसीमन के बाद, देश में परिसीमन पर 2026 के बाद की जनगणना तक के लिए रोक लगा दी गयी थी। अन्य कारणों के अलावा, इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि आबादी नियंत्रण समेत विकास के लक्ष्यों के मामले में, देश के विभिन्न हिस्सों में भारी अंतर था और उत्तर तथा दक्षिण के बीच खासतौर पर ज्यादा गहरी खाई थी। इन हालात में, एक संघीय व्यवस्था में संघ के विभिन्न घटकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संतुलन बनाए रखने के लिए, यह जरूरी माना गया कि सिर्फ जनसंख्या के आधार पर अनुपात का निर्धारण, जनसंख्या समेत विभिन्न मोर्चों पर अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित करना बन जाएगा, जो राष्ट्रीय एकता के लिए समस्यापूर्ण हो सकता है। इसलिए, मोटे तौर पर इतने अरसे तक इस अनुपात को यथावत रखा जाए, जब तक कि मोटे अनुमान के अनुसार देश भर में आबादी के स्थिर होने की अपेक्षा की जा सकती थी। उसके बाद राज्यों के आनुपातिक वजन में जो थोड़े-बहुत बदलाव करने जरूरी हों, किए जा सकते हैं。

लेकिन, मोदीशाही के मन में कुछ और ही था। यह संयोग ही नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने कोविड के प्रकोप के बीच जब अपनी नयी संसद बनवायी, उसमें मूल योजना में ही लोकसभा में 770 के करीब सीटों की कल्पना थी, जिसे अंत तक बढ़ाकर 850 ही कर दिया गया। और यह सिर्फ निर्वाचित सदन की संख्या में बढ़ोतरी का सवाल नहीं था, हालांकि इस तरह की बढ़ोतरी की जनतंत्र के व्यवहार के लिए उपादेयता भी, बहस से परे नहीं है। यह इससे बढ़कर, संघीय निकायों में राज्यों के वजन के अनुपात में ऐसे उल्लेखनीय बदलाव का प्रयास था, जो संघीय ढांचे का संतुलन ही बदलने वाला था। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि यह संतुलन, वर्तमान सत्ताधारी संघ-भाजपा जोड़ी के अधिक राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्रों के पक्ष में बदलने जा रहा था。

चूंकि 2026 के बाद की जनगणना के बाद, राज्यों के अनुपातिक वजन के पहलू से डिलिमिटेशन पर लगी रोक हटने वाली थी, महिला आरक्षण के प्रश्न से स्वतंत्र रूप से भी इस प्रश्न पर काफी बहस थी और दक्षिण भारत के राज्यों तथा छोटे राज्यों की चिंताएं खुलकर सामने आ रही थीं। इन चिंताओं से निपटने की कोशिश में मोदीशाही की ओर से विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों को यह कहकर आश्वस्त करने की कोशिश भी की गयी थी कि सभी राज्यों के प्रतिनिधित्व में समानुपात में बढ़ोतरी होगी। अब संसद की विशेष बैठक में इसी आश्वासन को यह कहकर दोहराया गया था कि महिला आरक्षण के साथ सभी राज्यों की सीटों में 50 फीसद बढ़ोतरी कर दी जाएगी। लेकिन, जैसा कि कई टिप्पणीकारों ने ध्यान दिलाया है, समानुपातिक बढ़ोतरी भी, राज्यों के बीच संख्यात्मक असंतुलन को बढ़ाने का ही काम करेगी और उत्तरी भारत के राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में 50 फीसद बढ़ोतरी के बाद, संघ-भाजपा जोड़ी अगले दसियों साल के लिए केंद्र में सत्ता पर अपनी दावेदारी पक्की कर सकती है।

यह संयोग ही नहीं है कि संसद में विशेष बहस के दौरान मोदी और शाह की जोड़ी के बार-बार इसका आश्वासन देने के बावजूद कि सभी राज्यों की सीटें 50 फीसद बढ़ायी जाएंगी, संबंधित संविधान संशोधन विधेयक में इसका कोई उल्लेख तक नहीं था। क्यों? क्योंकि एक बार जब 2011 की जनगणना के आधार पर, जिसे 2026-27 की जनगणना की जगह आधार बनाने का प्रस्ताव था, परिसीमन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिसके लिए महिला आरक्षण विधेयक की आड़ में दरवाजा खोला जा रहा था, उसके बाद यह अनुपात राज्यों की जनसंख्या से जुड़ना तय है और तब इन आश्वासनों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। 2026-27 की जनगणना को इस मामले में बॉयपास किए जाने मकसद, इस जनगणना में शामिल होने वाली जाति गणना के संभावित नतीजों को धता बताना था。

लेकिन, बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। मोदीशाही के चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों के सघन विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर जिस तरह देश भर में करोड़ों वैध मतदाताओं का मताधिकार छीना है और प. बंगाल में तो सरासर मनमानी, धांधली और अल्पसंख्यक तथा महिलाविरोधी पूर्वाग्रह के साथ लाखों लोगों का मताधिकार छीना है और जिस तरह सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक सभी संस्थाएं इस खुले अन्याय को रोकने में नाकाम रही हैं, उसके अनुभव के बाद क्या सीधे वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रमुख भूमिका वाले, डिलिमेटेशन आयोग से सत्ताधारी पार्टी का हुकुम बजाने के सिवा किसी न्याय की अपेक्षा की जा सकती है? असम और जम्मू-कश्मीर में डिलिमिटेशन की पक्षपाती राजनीति देश देख चुका है। महिला आरक्षण के नाम पर लोकतंत्र के इसी एन्काउंटर से एकजुट विपक्ष ने देश को बचाया है।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)

Pawan Singh

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Chief Editor, Taj News
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