आर्टिकल Desk, Taj News | Tuesday, April 14, 2026, 01:15:00 PM IST


(मूल आलेख: संजय रॉय)
शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी की उच्च दर
(आलेख :संजय रॉय, अनुवाद : संजय पराते)
शिक्षित लोगों की आबादी में भारी बढ़ोतरी के बावजूद, महत्वाकांक्षी भारत में हाल के दिनों में कृषि क्षेत्र में रोजगार की संख्या बढ़ती हुई दिख रही है — जो कि एक विडंबना ही है! जिसे अक्सर ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (जनसांख्यिकीय लाभांश) कहा जाता है — यानी कुल आबादी में काम करने लायक उम्र के लोगों का ज़्यादा अनुपात होना — वह 2030 तक खत्म हो जाएगा ; उसके बाद युवाओं का यह हिस्सा अपने चरम पर पहुँचने के बाद घटने लगेगा। अपने चरम पर, काम करने लायक उम्र की आबादी का हिस्सा, आश्रित आबादी के हिस्से से दोगुने से भी ज़्यादा होगा। दुर्भाग्य से, ऐसा लगता है कि कुछ ही सालों की इस छोटी-सी अवधि में इस लाभांश का लाभ उठा पाना अकल्पनीय है, क्योंकि ‘स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया’ पर हाल ही में आई एक रिपोर्ट बताती है कि स्नातक युवाओं में बेरोज़गारी की दर 40 प्रतिशत तक पहुँच गई है। एक और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि युवा लड़के-लड़कियाँ अपने परिवारों की मदद करने के लिए पढ़ाई बीच में ही छोड़ रहे हैं। भारत में 15 से 29 साल की उम्र के 36.7 करोड़ लोग रहते हैं, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा है, और यह काम करने लायक उम्र की कुल आबादी का एक-तिहाई हिस्सा है। इन 36.7 करोड़ लोगों में से कुछ ने खुद को श्रम बाज़ार से अलग कर लिया है, क्योंकि वे अभी भी पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि 26.3 करोड़ युवा भारत की संभावित युवा कार्यबल का हिस्सा हैं। यह संख्या किसी भी यूरोपीय देश की आबादी से कहीं ज़्यादा है, और ब्राज़ील या पाकिस्तान जैसे देशों की कुल आबादी से भी ज़्यादा है। 20 से 29 साल के आयु वर्ग के युवा लोगों में से 6.3 करोड़ लोगों ने स्नातक या उससे ऊपर की पढ़ाई पूरी की है, और उनमें से 1.10 करोड़ स्नातक युवा बेरोज़गार हैं। यह संख्या स्वीडन या पुर्तगाल की कुल आबादी से भी ज़्यादा है। शिक्षित लोगों में बेरोज़गारी का यह विशाल सागर दो महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर करता है : पहला, स्नातक कार्यबल की मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ता हुआ अंतर ; और दूसरा, इससे जुड़ा हुआ तथ्य यह है कि भारत में उत्पादन प्रक्रिया अभी भी कम पढ़े-लिखे और सस्ते श्रम पर ही निर्भर है। दिलचस्प बात यह है कि इस कार्यबल का गैर-कृषि क्षेत्रों की गतिविधियों से कृषि क्षेत्र की ओर वापस लौटना, और कृषि क्षेत्र में महिलाओं के रोज़गार का हिस्सा बढ़ना — ये दोनों बातें ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ते कदम के दावों की विडंबना को ही दर्शाती हैं。
कृषि की ओर उल्टा प्रवाह
आर्थिक विकास की अवधारणा में एक संरचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया शामिल होती है, जिसमें लोग कम उत्पादकता वाले कामों से ज़्यादा उत्पादकता वाले कामों की ओर जाते हैं। चूंकि कृषि की उत्पादकता में ज़मीन और मज़दूरी दोनों की उत्पादकता का मिला-जुला असर होती है, और चूंकि ज़मीन की उत्पादकता अपनी प्राकृतिक सीमाओं के करीब पहुँच चुकी होती है, इसलिए आम तौर पर यह माना जाता है कि लोगों का कृषि संबंधी गतिविधियों से हटकर औद्योगिक और सेवा-संबंधी गतिविधियों की ओर जाना प्रगति का संकेत है। लेकिन इस प्रक्रिया के साथ-साथ, सिर्फ़ अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बदलाव होने के बजाय, ज़्यादा उत्पादकता वाली गतिविधियों की ओर लगातार आगे बढ़ना भी ज़रूरी है। पिछले चार दशकों में, भारत में आबादी का कृषि संबंधी गतिविधियों से हटकर गैर-कृषि गतिविधियों की ओर, खासकर सेवा और निर्माण-संबंधी गतिविधियों की ओर, बड़े पैमाने पर बदलाव देखने को मिला है। लेकिन 2017 के बाद से, कृषि-संबंधी गतिविधियों के हिस्से में बढ़ोतरी हुई है。
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कोविड के बाद के दौर (2021-22 से 2023-24) में, भारत की रोज़गारशुदा आबादी 49 करोड़ से बढ़कर 57.2 करोड़ हो गई है। इसका मतलब है कि 8.2 करोड़ नए रोजगार पैदा हुए हैं, जिनमें से 4 करोड़ रोजगार कृषि क्षेत्र में ही पैदा हुए हैं। इन नए रोजगारों में से 3.8 करोड़ रोजगार महिलाओं को ही मिले हैं। यह बात दिलचस्प है कि कृषि क्षेत्र में काम करने वाले पुरुषों का हिस्सा 1983 से लगातार कम होता जा रहा है, जबकि महिलाओं का हिस्सा 2017 से बढ़ा है। हाल के वर्षों में, कृषि से जुड़ी गतिविधियों में युवा और बुज़ुर्ग, दोनों ही तरह की महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। कई अध्ययनों में कृषि कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी (फेमिनिज़ेशन) पर टिप्पणी की गई है। इसकी मुख्य वजह ‘बिना वेतन वाले पारिवारिक श्रम’ में हुई बढ़ोतरी को माना जाता है, जो इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है।
दाखिलों में गिरावट
पिछले चार दशकों का एक अहम रुझान यह है कि भारत में युवाओं के शैक्षणिक दाखिलों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है, जबकि रोज़गार में गिरावट आई है। 1983-2023 के दौरान, 15-19 साल के पुरुषों में दाखिला 49 प्रतिशत से बढ़कर 73 प्रतिशत हो गया है और महिलाओं में यह 38 प्रतिशत से बढ़कर 68 प्रतिशत हो गया है। बहरहाल, पिछले वर्षों में उच्च शिक्षा में दाखिलों में आई तेज़ी में अब गिरावट देखने को मिल रही है। शिक्षा में युवा पुरुषों की हिस्सेदारी 2017 में 38 प्रतिशत से घटकर 2024 में 34 प्रतिशत रह गई है, और जवाब देने वाले 72 प्रतिशत लोगों ने पढ़ाई छोड़ने का कारण घर-परिवार को आर्थिक सहारा देने की ज़रूरत बताया है।
लेकिन समस्या इससे भी गहरी है। यह मुख्य रूप से यह दिखाता है कि हमारा उत्पादन ढांचा अभी तक बढ़ती हुई शिक्षित श्रम शक्ति को खपाने के लिए तैयार नहीं है, जिसका मतलब है कि कम-कुशल और सस्ते श्रम पर निर्भरता बनी हुई है। नौकरी मिलने की बहुत कम उम्मीद होने के कारण युवा हतोत्साहित हैं, और यही भारत के जनसांख्यिकीय बदलाव की निराशाजनक तस्वीर है。
(लेखक अर्थशास्त्री हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

Pawan Singh
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