भारत में मरम्मत संस्कृति की मौत और ई-वेस्ट का पहाड़: क्या हम खुद को जहर दे रहे हैं?

आर्टिकल Desk | tajnews.in | Thursday, April 02, 2026, 01:17:12 PM IST

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विशेष पर्यावरण और वैचारिक आलेख
Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्
वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद मारक आलेख में भारत में खत्म होती ‘मरम्मत संस्कृति’ (Repair Culture) पर गहरा प्रहार किया है। दरअसल, उन्होंने बताया है कि कैसे हम हर छोटी खराबी पर इलेक्ट्रॉनिक सामान फेंककर ‘ई-वेस्ट’ (E-Waste) का एक जहरीला पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने सरकार के नए ‘राइट टू रिपेयर’ (Right to Repair) कानून और बढ़ते प्रदूषण पर बहुत सटीक विश्लेषण किया है। इसलिए, पढ़िए यह विचारोत्तेजक आलेख:

मुख्य बिंदु

  • वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत ने 14.14 लाख मीट्रिक टन ई-वेस्ट (E-Waste) भारी मात्रा में उत्पन्न किया है।
  • दरअसल, भारी धातु और जहरीले रसायनों वाला यह इलेक्ट्रॉनिक कचरा हमारी मिट्टी, पानी और हवा को लगातार जहर दे रहा है।
  • अब भारत के महानगरों में ‘जुगाड़’ और पुरानी ‘मरम्मत संस्कृति’ बहुत तेज़ी से खत्म हो रही है।
  • इसलिए, सरकार को ‘राइट टू रिपेयर’ कानून और ई-वेस्ट प्रबंधन नियमों को बहुत सख्ती से लागू करना होगा।

क्या हमने सच में मरम्मत संस्कृति, “ठीक करो” को भुला दिया है? या “फेंको और नया लाओ” को ही आधुनिक जीवन का मंत्र मान लिया है?

भारत के घरों में इलेक्ट्रॉनिक सामान की बाढ़ आ गई है, स्मार्टफोन, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी, वॉशिंग मशीन, फ्रिज और एसी। लेकिन साथ ही एक खतरनाक चीज भी तेजी से बढ़ रही है, ई-वेस्ट, (इलेक्ट्रॉनिक कचरा)। यह जहरीला कचरा है, जिसमें सीसा, पारा, कैडमियम जैसे भारी धातु और जहरीले रसायन होते हैं, जो मिट्टी, पानी और हवा को जहर देते हैं。

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत ने 14.14 लाख मीट्रिक टन (लगभग 1.41 मिलियन टन) ई-वेस्ट उत्पन्न किया है। इसमें से मात्र 9.79 लाख मीट्रिक टन का ही औपचारिक रिसाइक्लिंग हुआ है। यानी बड़ा हिस्सा अनियंत्रित तरीके से अनौपचारिक क्षेत्र में जा रहा है या खुले में फेंका जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में ई-वेस्ट की मात्रा लगातार बढ़ रही है—2023-24 में 12.54 लाख टन, 2024-25 में 13.97 लाख टन, और अब 14.14 लाख टन। यह संख्या चिंताजनक है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर भी ई-वेस्ट 2022 में 62 मिलियन टन पहुंच चुका था और 2030 तक 82 मिलियन टन होने का अनुमान है। भारत दुनिया के सबसे बड़े ई-वेस्ट उत्पादकों में शुमार है。

एक हालिया अध्ययन और रिपोर्ट्स इस दुखद बदलाव को उजागर करती हैं। भारत की पुरानी मरम्मत संस्कृति तेजी से खत्म हो रही है। पहले हम जुगाड़ और रिपेयर से चीजों को सालों चलाते थे, लेकिन अब “रिप्लेसमेंट कल्चर” हावी है। दिल्ली और हैदराबाद जैसे महानगरों में हर वर्ग के लोग पुराने सामान को ठीक करने की बजाय नया खरीद रहे हैं। नागपुर में अमीर वर्ग अपग्रेड करता है, जबकि मध्यम वर्ग अभी भी मरम्मत पर निर्भर है। कोलकाता में पुरानी रिपेयर संस्कृति कुछ हद तक बची हुई है, और रांची जैसे छोटे शहरों में सादगी, बचत और टिकाऊपन की सोच अभी मजबूत है। लेकिन कुल मिलाकर, शहरों में रिपेयर की जगह नया खरीदना प्रमुख ट्रेंड बन गया है。

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इसके पीछे कई कड़वे कारण हैं। मरम्मत अब महंगी पड़ती है। असली स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल है, क्योंकि कंपनियां उन्हें सीमित रखती हैं या महंगे बेचती हैं। कुशल तकनीशियन कम हो गए हैं, और उनके पास आधुनिक डायग्नोस्टिक टूल्स की कमी है। अनधिकृत रिपेयर सेंटरों पर भरोसा नहीं रहा; वारंटी नहीं, गुणवत्ता का डर, और कीमत अक्सर नए प्रोडक्ट के बराबर। नतीजा? ग्राहक मजबूरन नया खरीद लेता है。

यह सिर्फ व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक बदलाव है। पर्यावरण की चिंता अभी भी उपभोक्ताओं के फैसलों में बहुत कम भूमिका निभाती है। अमीर के लिए सुविधा और स्टेटस महत्वपूर्ण है, गरीब के लिए मजबूरी मरम्मत करवाती है। लेकिन इस चक्र से ई-वेस्ट का ढेर लगता जा रहा है। यह संसाधनों की बर्बादी है, कीमती धातुएं, दुर्लभ अर्थ मिनरल्स बर्बाद हो रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, और अर्थव्यवस्था क्षणिक उपभोग पर टिकी है, जो टिकाऊ नहीं。

फिर भी उम्मीद है। सरकार और विशेषज्ञ एक स्पष्ट रोडमैप सुझा रहे हैं। राइट टू रिपेयर, को मजबूत कानून बनाना जरूरी है। 2025 में सरकार ने मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए रिपेयरेबिलिटी इंडेक्स को मंजूरी दी है, और राइट टू रिपेयर पोर्टल शुरू किया गया है। कंपनियों को मजबूर किया जाए कि वे रिपेयर मैनुअल, असली स्पेयर पार्ट्स और डायग्नोस्टिक टूल्स उपलब्ध कराएं। मरम्मत सेक्टर के लिए सर्टिफिकेशन, मानक और ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएं। स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई चेन मजबूत हो। तकनीशियनों को स्किल्ड बनाया जाए。

सरकार की भूमिका सबसे अहम है। ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) रूल्स 2022 लागू हैं, लेकिन इन्हें सख्ती से लागू करना होगा। अगर मरम्मत को नीति का हिस्सा नहीं बनाया गया, तो ई-वेस्ट का संकट और गहराएगा。

आखिरी सवाल आपके लिए है: क्या हम हर खराब चीज को कचरे में बदलते रहेंगे? या उसे ठीक करके नया जीवन देंगे?

भारत कभी जुगाड़ और मरम्मत की दुनिया में मशहूर था, सस्ता, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल। वक्त है उस संस्कृति को फिर से जिंदा करने का। वरना ई-वेस्ट के पहाड़ हमारे विकास की कड़वी सच्चाई बन जाएंगे

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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