Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 23 Mar 2026, 07:15 PM IST

Taj News Opinion Desk

मुख्य बिंदु
- 1967 में डॉ. लोहिया का ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नारा ही था असल में ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का पहला खाका।
- नेहरू के केंद्रीकृत विकास मॉडल से मोहभंग के बाद लोहिया ने ‘नया समाजवाद’ और ‘चौखंबा राज्य’ गढ़ा।
- गांधीवाद का आक्रामक रूप: लोहिया ने आदर्शवाद को छोड़कर जाति और असमानता पर सीधा प्रहार किया।
- विवादित राजनीतिक विरासत: कैसे उनके कई राजनीतिक शिष्यों ने ही लोहिया के मूल समाजवाद को धुंधला कर दिया।
आखिर कांग्रेस-मुक्त भारत का यह मशहूर नारा किसका है? आज यह नारा देश के सभी राजनीतिक गलियारों में बहुत ज़ोर से गूंजता है। पर सच यह है कि इसकी पहली आहट बहुत साल पहले ही सुनाई दे दी थी। वह आहट एक बहुत ही बाग़ी दिमाग में उठी थी। वह एक बेहद बेचैन आत्मा में गूंजी थी। दरअसल, वह आहट महान डॉ. राम मनोहर लोहिया के भीतर उठी थी। 23 मार्च का यह दिन उनकी जयंती का दिन है। यह सिर्फ उनकी मूर्ति पर फूल चढ़ाने का कोई साधारण दिन बिल्कुल नहीं है। बल्कि, यह देश की कुछ थोड़ी असहज सच्चाइयों से सीधे टकराने का दिन भी है। डॉ. लोहिया की कद काठी बेशक बहुत छोटी थी। लेकिन, देश की राजनीति पर उनका असर बहुत ही विराट और स्थायी था। बात साल 1934 की है। तब उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई थी। उनके साथ जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेंद्र देव भी थे।
उस समय कांग्रेस के भीतर ही समाजवाद का एक नया बीज बोया गया था। डॉ. लोहिया कांग्रेस के विदेश विभाग के अहम सचिव बने थे। फिर इसके बाद 1942 का साल आया। देश में ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू हुआ। डॉ. लोहिया ने उस समय लंबा भूमिगत जीवन बिताया। वे भूमिगत रहकर आज़ाद ‘कांग्रेस रेडियो’ की बुलंद आवाज़ बने थे। इसलिए, अंग्रेजी हुकूमत की उन्हें दबाने की हर कोशिश पूरी तरह नाकाम हो गई थी। फिर अंततः देश में आज़ादी आई। पर डॉ. लोहिया इस आज़ादी से बिल्कुल संतुष्ट नहीं हुए। क्योंकि, उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू का विकास मॉडल बहुत अधूरा लगा था। नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था और केंद्रीकृत योजना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आई थी। दरअसल, उन्हें यह सिर्फ “ऊपर से विकास” का एक दिखावटी मॉडल दिखा था। यह मॉडल आम जनता से बहुत दूर था। लेकिन, यह सत्ता के बहुत करीब था। इसलिए, डॉ. लोहिया ने अपनी राजनीतिक राह पूरी तरह बदल ली।
साल 1955 में उन्होंने अपनी नई ‘सोशलिस्ट पार्टी’ बनाई। फिर कुछ समय बाद ‘संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी’ का गठन हुआ। उन्होंने अपना खुद का एक स्वतंत्र मंच बनाया। उन्होंने अपनी एक बिल्कुल नई लड़ाई शुरू की। जब वे जीतकर देश की संसद में पहुंचे, तो उन्होंने सरकारी आंकड़ों को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। संसद में उनका मशहूर भाषण “तीन आने रोज” आज भी याद किया जाता है। उन्होंने देश की गरीबी की रेखा का बिल्कुल नंगा और कड़वा सच पूरे देश के सामने रख दिया था। जब वे संसद से निकलकर सड़क पर उतरे, तो उनके जन-मुद्दे और भी ज्यादा तेज हो गए। वे देश में फैली जाति व्यवस्था के सख्त खिलाफ थे। वे शासन में अंग्रेज़ी भाषा के कड़े प्रभुत्व के खिलाफ भी थे। इसके अलावा, वे गरीब किसान के भारी शोषण के खिलाफ हमेशा मजबूती से खड़े रहे। फिर देश की राजनीति में 1967 का एक बड़ा और ऐतिहासिक साल आया।
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उस साल लोहिया ने सिर्फ एक नया नारा नहीं दिया था। बल्कि, उन्होंने एक पूरी और नई राजनीतिक रणनीति दी थी। वह नारा था “गैर-कांग्रेसवाद”। अगर हम उसे आज की आधुनिक भाषा में कहें। तो वास्तव में, यही “कांग्रेस-मुक्त भारत” का सबसे पहला ब्लूप्रिंट था। डॉ. लोहिया ने उस समय बिखरे हुए पूरे विपक्ष को एक साथ जोड़ा था। उन्होंने कांग्रेस की उन मजबूत दीवारों में पहली बार एक बड़ी दरार डाली थी। नतीजतन, देश के कई राज्यों में कांग्रेस की सत्ता हमेशा के लिए बदल गई। भारत में आज की जो मशहूर गठबंधन राजनीति है, उसने अपना जन्म यहीं से लिया था। लेकिन, यहीं पर एक बहुत ही असहज राजनीतिक सवाल भी खड़ा होता है। आज पूरे देश में जो “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा इतनी जोर से गूंजता है। तो क्या आज उसके सबसे पहले शिल्पकार को कोई याद भी करता है? क्या आज की सत्ता को अपने उन पुराने वैचारिक पूर्वजों के प्रति अपना आभार नहीं जताना चाहिए?
पर यह राजनीतिक कहानी किसी एक सीधी रेखा में कभी नहीं चलती है। डॉ. लोहिया दिमाग से जितने तेज थे, वे स्वभाव से उतने ही असहज भी थे। उनकी आलोचना बहुत कटु होती थी। वे हमेशा बिना किसी फिल्टर वाली सीधी भाषा बोलते थे। नतीजा यह हुआ कि उनके अपने ही समाजवादी खेमे में कई गहरी दरारें पड़ गईं। इसलिए, उनके कई पुराने राजनीतिक दोस्त ही उनके सबसे बड़े विरोधी बनते चले गए। उनका समाजवादी आंदोलन तो बहुत बड़ा हो गया, लेकिन उनका अपना संगठन बहुत छोटा रह गया। अब हम जरा उनके उस विलक्षण दिमाग की ओर चलते हैं। उन्होंने जर्मनी के मशहूर बर्लिन विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी। उन्होंने भारत पर लगने वाले ‘नमक कर’ पर अपनी पीएचडी की थी। उन्होंने वहां महान मार्क्स को बहुत गहराई से पढ़ा था। पर उन्होंने उसे आंख मूंदकर बिल्कुल नहीं अपनाया था।
उन्होंने मार्क्स के वर्ग-संघर्ष की उस भारी कठोरता को पूरी तरह ठुकरा दिया था। उन्होंने रूस के उस मशहूर सोवियत मॉडल पर भी कई तीखे सवाल उठाए थे। इसलिए, उन्होंने अपना एक बिल्कुल अलग विचार गढ़ा: “नया समाजवाद”। यह न तो कोई पूंजीवाद था। और न ही यह कोई साम्यवाद था। बल्कि, यह इन दोनों विचारधाराओं से “समान दूरी” पर था। उनका यह नया समाजवाद सिर्फ पुरानी किताबों का ज्ञान नहीं था। बल्कि, यह देश की आम ज़रूरतों का समाजवाद था। उनका मानना था कि देश में उत्पादन सिर्फ जनता की ज़रूरत के हिसाब से ही होना चाहिए। उनके इस दर्शन के केंद्र में सिर्फ मनुष्य था। उसमें कोई बेजान मशीन बिल्कुल नहीं थी। और फिर इसके बाद उन्होंने अपनी मशहूर “सप्त क्रांति” का विचार दिया। यह एक साथ देश के कई मोर्चों पर एक बड़ी वैचारिक लड़ाई थी।
यह लड़ाई आर्थिक असमानता के सख्त खिलाफ थी। यह समाज की सदियों पुरानी जाति-प्रथा के खिलाफ थी। यह औरत-मर्द के बीच के लिंग भेद के खिलाफ थी। यह दुनिया के रंगभेद के खिलाफ थी। इसके अलावा, यह विदेशी वर्चस्व के भी पूरी तरह खिलाफ थी। वास्तव में, यह सिर्फ एक राजनीतिक विचार नहीं था। बल्कि, यह एक बहुत बड़ा बहु-आयामी संघर्ष था। इसके साथ ही, उन्होंने “चौखंबा राज्य” की बहुत बड़ी परिकल्पना दी थी। इसमें गांव, जिला, प्रांत और केंद्र का सीधा प्रशासन शामिल था। यह देश में सत्ता के पूर्ण विकेंद्रीकरण का मॉडल था। यह दिल्ली की वह मजबूत पकड़ ढीली करने का एक बड़ा सपना था। यह पूरी तरह से प्रधानमंत्री नेहरू की उस केंद्रीकृत सोच के ठीक उलट था। पर इस कहानी का असली ट्विस्ट तो यहां पर है। डॉ. लोहिया महात्मा गांधी के सच्चे उत्तराधिकारी थे। पर वे गांधीवाद के कोई ‘कॉपी-पेस्ट’ नेता बिल्कुल नहीं थे।
बल्कि, वे तो गांधीवाद का एक पूरी तरह अपग्रेडेड संस्करण थे। उन्होंने गांधीजी से अहिंसा का विचार लिया। उन्होंने गांधीजी से सत्याग्रह का मंत्र लिया। उन्होंने गांधीजी से ग्राम स्वराज का महान सपना लिया। पर उन्होंने उस शांतिपूर्ण विचार में अपने उग्र समाजवाद का बहुत भारी बारूद भर दिया। महात्मा गांधी हमेशा सिर्फ नैतिक सुधार की बातें करते थे। लेकिन, डॉ. लोहिया ने साफ कहा कि इस पूरे समाज की संरचना ही बदलो। उन्होंने देश को “रोटी और बेटी” का एक नया नारा दिया। इसका मतलब था कि समाज में सब लोग एक साथ बैठकर खाना खाएं। इसके अलावा, समाज में बिना किसी भेद के एक साथ शादी हो। वास्तव में, यह देश की जाति-प्रथा पर एक बहुत सीधा और करारा प्रहार था। यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा बिल्कुल नहीं था। बल्कि, यह समाज में एक बड़े विस्फोट का पक्का फार्मूला था। उन्होंने शांतिपूर्ण गांधीवाद को पूरी तरह से रीब्रांड किया था।
उन्होंने इस नए आंदोलन को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया था। इसमें न तो कोई कोरा और शुद्ध आदर्शवाद था। और न ही इसमें कोई विदेशी मार्क्सवादी विचारधारा थी। बल्कि, यह एक पूरी तरह देसी मिश्रण था। जो इस देश की मिट्टी और ज़मीन से मजबूती से जुड़ा था। और यह देश की व्यवस्था को पूरी तरह झकझोरने वाला भी था। लेकिन, भारत की हर राजनीतिक विरासत की तरह ही यह भी समय के साथ धुंधली हो गई। यह काफी विवादित भी हो गई। और यह सब लोहिया के उन अनेकों स्वार्थी शिष्यों और उनके उत्तराधिकारियों की गंदी करतूतों की वजह से हुआ। राज नारायण, मधु लिमए, जॉर्ज फर्नांडिस और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता उसी विरासत के थे। लालू यादव, नीतीश कुमार, बीपी मंडल और मुलायम सिंह यादव भी उसी विरासत से निकले। वास्तव में, यह लिस्ट बहुत बड़ी है!! हालांकि, समय के साथ लोहिया की कुछ नीतियों पर भी कई कड़े सवाल उठे।
उनके विकेंद्रीकरण के मॉडल में देश के कहीं विखंडन का डर था। उनके कट्टर अंग्रेज़ी विरोध से देश का एक बड़ा मध्यम वर्ग काफी दूर हो गया। उनकी समाजवाद की टूटती हुई पार्टियों ने उनका राजनीतिक असर बहुत कमजोर कर दिया। उनके तीखे व्यक्तिगत हमलों ने उनकी उस बड़ी सोच पर एक भारी परदा डाल दिया। फिर भी, देश को उनकी एक तस्वीर हमेशा याद रखनी चाहिए। वह साल 1967 का समय था। लोहिया ने भारी गरीबी में अपना पूरा जीवन बिताया। और उन्होंने बहुत सादगी में ही अपनी मौत को गले लगाया। उनके मन में न तो सत्ता का कोई लोभ था। और न ही उनके मन में संपत्ति का कोई भारी मोह था। आज जब देश में भारी असमानता फिर से अपना सिर उठा रही है। जब नवउदारवाद का भारी शोर है। जब विकास की इस झूठी चमक के पीछे एक बहुत बड़ा असंतुलन छिपा है। तब ऐसे समय में डॉ. लोहिया हमें फिर से बहुत याद आते हैं।
उनका वह “नया समाजवाद” असल में एक तरह का सशस्त्र गांधीवाद था। जहां स्वराज का मतलब सिर्फ राजनीतिक आज़ादी नहीं था। बल्कि, उसका मतलब समाज में पूरी बराबरी भी था। डॉ. लोहिया कोई भगवान या संत बिल्कुल नहीं थे। पर वे इस देश की राजनीति में एक बहुत बड़ी चिंगारी जरूर थे। वे एक बहुत ही उग्र और विद्रोही गांधीवादी थे। जिसने देश की सर्वोच्च सत्ता को सीधे ललकारा था। उन्होंने हमारे समाज को उसका असली आईना दिखाया था। और आज भी संसद में उनकी वह मशहूर आवाज़ गूंजती है। उन्होंने कहा था, “जब देश की सड़क खामोश हो जाती है, तो संसद हमेशा आवारा हो जाती है।” देश की जाति-प्रथा पर उनका वह प्रहार आज भी उतना ही सटीक है। उन्होंने कहा था, “जाति हमेशा इंसान के अवसर को बहुत सीमित करती है… और फिर वह अवसर इंसान की क्षमता को मार देता है।” और भारत की स्त्री पर उनकी कल्पना भी बहुत अलग थी। उनकी कल्पना में एक आदर्श स्त्री सीता नहीं, बल्कि द्रौपदी थी। जो सिर्फ आज्ञाकारिता नहीं, बल्कि पूरी बुद्धि और साहस का भी प्रतीक थी। यही डॉ. लोहिया थे: वे असुविधाजनक थे, वे असहज थे, लेकिन वे इस देश के लिए बहुत जरूरी थे। यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा है? क्या हम आज लोहिया को सिर्फ दिखावे के लिए याद कर रहे हैं, या सच में हम उन्हें समझ भी रहे हैं?

Pawan Singh
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