Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 11 Mar 2026, 03:00 am IST
Taj News Satire Desk
राजनैतिक व्यंग्य-समागम
राजेंद्र शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक
वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक राजेंद्र शर्मा ने अपने इस मारक राजनैतिक व्यंग्य में भारत की वर्तमान विदेश नीति पर गहरा तंज कसा है। उन्होंने बताया है कि कैसे ईरान पर हो रहे अमरीकी हमलों के बीच ‘विश्व गुरु’ ने चुप्पी साध रखी है और ईरान को भी हमारी तरह ‘विश्व बॉस’ के सामने घुटने टेकने की व्यंग्यात्मक सलाह दी है। पढ़िए यह बेबाक आलेख:
मुख्य बिंदु
- ईरान पर अमरीका-इस्राइल के खौफनाक हमले और ‘विश्व गुरु’ भारत की रहस्यमयी और डरी हुई चुप्पी पर करारा प्रहार।
- मीनाब में बच्चियों के स्कूल पर बमबारी और भारतीय सीमा के पास ईरानी जहाज डूबने की घटना पर तीखा कटाक्ष।
- गांधी-नेहरू के समय वाले ‘पुराने भारत’ की नैतिकता बनाम आज के मुनाफाखोर ‘नये भारत’ की कूटनीति की तुलना।
- ईरान को व्यंग्यात्मक सलाह: ‘विश्व बॉस’ (अमरीका) के आगे आत्मसमर्पण कर दो, ताकि ‘विश्व गुरु’ की पोल न खुले!
हमें तो आज-कल ईरान वालों के लिए बहुत ज्यादा ‘सॉरी’ फील हो रहा है। सच कहें तो मन में बड़ा बुरा-सा लग रहा है। लेकिन आप मेरी बात का गलत मतलब बिल्कुल मत निकालिएगा। नहीं-नहीं, हम किसी को जाकर सीधे सॉरी नहीं बोल रहे हैं। हम दुनिया में किसी को भी सॉरी बोलने नहीं जाते हैं। किसी को भी नहीं। फिर ईरान वाले तो आते ही किस गिनती में हैं। पहले के पुराने समय में कभी किसी से गलती पर सॉरी बोला होगा, तो बोला होगा। पर आज के इस महान युग में तो सॉरी बोलने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। अब तो सत्ता की कुल रीति ही सदा चली आ रही है: न इस्तीफा देब, न माफी मांगी जाई! जब बड़े-बड़े राष्ट्रीय मुद्दों पर कोई माफी नहीं आई, तो विदेशी मामलों में माफी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
आप खुद ही इतिहास के पन्ने पलट कर देख लीजिए। जब साल 2002 के गुजरात के भयानक नरसंहार पर कोई माफी नहीं मांगी गई। जब अचानक रातों-रात लागू की गई नोटबंदी से लोगों की जान गई, लेकिन कोई माफी नहीं मांगी गई। जब कोरोना के उस डरावने टाइम में दवा, आक्सीजन और अस्पताल में बैड के अभाव में लोगों ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया, तब भी मरने वालों के घरवालों से कोई माफी नहीं मांगी गई। अचानक लगे लॉकडाउन में लाखों मजदूर सैकड़ों किलोमीटर पैदल घिसट-घिसट कर अपने गांव पहुंचे थे। उन गिरते-पड़ते और भूखे-प्यासे मजदूरों से किसी ने माफी नहीं मांगी। जब इलैक्टोरल बांड जैसे गैर-कानूनी हथियार के जरिए हजारों करोड़ रुपये की अवैध वसूली पकड़ी गई, तब भी कोई माफी नहीं मांगी गई। और तो और, पूरे सवा साल तक दिल्ली के बार्डरों पर कड़ाके की ठंड और गर्मी में डटे रहे किसानों से भी बिना अगर-मगर लगाए माफी नहीं मांगी गई। तो फिर ऐसे महान सत्ताधीशों के आम प्रजा जन आखिर किसी दूसरे देश से कैसे माफी मांगेंगे?
और यह माफी भी किससे मांगनी है? ईरान से! और वह भी सिर्फ इसलिए मांगनी है कि उस पर जब इलाके से बाहर वाले देशों (अमरीका और इस्राइल) ने अचानक जानलेवा हमला किया, तो हमारे मुंह से विरोध के दो छोटे शब्द तक नहीं निकले। जब उसके सबसे बड़े नेता की बाकायदा निशाना साधकर क्रूर हत्या कर दी गयी, तो हमारे नेता से एक औपचारिक शोक तक नहीं जताया गया। अब किसी गलत काम का विरोध करना, पड़ोसी देश के नेता की मौत पर शोक जताना और मुश्किल वक्त में पड़ोसी का साथ देना हमारी संस्कृति रही है। अगर किसी वजह से ऐसा न कर पाएं तो कम से कम माफी मांगना जरूरी होता है। लेकिन ये सब तो बेकार के नैतिक तकाजे हैं। इन पुराने नैतिक तकाजों से तो गांधी-नेहरू के टाइम वाला पुराना भारत चला करता था। आज के इस तेज रफ्तार और डिजिटल भारत में इन पुरानी बातों की कोई जगह बिल्कुल नहीं है。
दरअसल यह एक बिल्कुल नया भारत है। यह नया भारत अब नैतिकता वगैरह के फालतू चक्करों में बिल्कुल नहीं फंसता है। यह देश अब बस बड़े सेठों और कॉरपोरेट घरानों का मोटा मुनाफा देखता है। तभी तो आज बाकी दुनिया में चाहे कुछ भी होता रहे, नया भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के रास्ते पर तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। वह नैतिकता के चक्कर में हिचकने वाले सभी पुराने देशों को बहुत पीछे छोड़ता जा रहा है। सत्ताधीशों का मानना है कि अगर हम नैतिकता के चक्करों में ही पड़े रहते, तब तो हमें भी पीछे छोडक़र कोई और देश बहुत आगे निकल गया होता। यशस्वी नेतृत्व में देश 2047 तक विकसित देश बनने के रास्ते पर बढ़ रहा है। इसलिए बढ़ते हुए भारत के द्वारा किसी विदेशी युद्ध का विरोध करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है। हमें सिर्फ अपने बिजनेस से मतलब है।
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हम तो बस इतनी सी बात कह रहे हैं कि हमें भी यह सब देखकर थोड़ा बुरा सा लग रहा है। हमें भी यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि हमले के पहले ही दिन अमेरिका के खतरनाक बमों ने मीनाब में छोटी बच्चियों के एक स्कूल को सीधे निशाने पर ले लिया। उन्होंने एक साथ 165 छोटी-छोटी मासूम बच्चियों को पल भर में मौत की नींद सुला दिया। आखिर उन छोटी और बेकसूर बच्चियों ने दुनिया के किसी चौधरी का क्या बिगाड़ा था? हमें भी यह सुनकर बहुत बुरा लग रहा है कि भारत में ही एक संयुक्त नौसैनिक आयोजन से लौटते हुए ईरान के एक युद्धपोत पर हमला कर दिया गया। वह जहाज उस समय एक प्रकार से बिल्कुल निहत्था था। वह हमारे पास के ही समंदर में था। यह वही समंदर है जहां हम हमेशा दुनिया को समुद्री सुरक्षा मुहैया कराने की अपनी ठेकेदारी के बड़े-बड़े हौसले जताते आए थे। उसी समंदर में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने उस जहाज को बेरहमी से डुबो दिया। इसके बाद उन्होंने करीब एक सौ चालीस ईरानी नौसैनिकों को उसी गहरे समंदर में मरने के लिए ही छोड़ दिया。
वह तो भला हो पड़ोसी श्रीलंका की नौसेना का, जिसने तुरंत वहां पहुंचकर बत्तीस-चौतीस नौसैनिकों को किसी तरह बचा लिया। वर्ना अपने बाकी साथियों के साथ ही उनकी भी वहां पक्की जल-समाधि हो जाती। मरने वाले वे सभी नौसैनिक तो भारत में ही एक बड़े समारोही आयोजन में हिस्सा लेकर शांति से अपने घर लौट रहे थे। उनके लिए तो हमें जरूर बुरा लगता है। हम तो यही कहेंगे कि इस भयानक लड़ाई में ईरान में भी और ईरान पर हमला करने वालों तथा उनकी मदद करने वाले देशों में भी, जितने लोग भी बेमौत मरे हैं, उनके लिए हमें बहुत बुरा लगता है। जितने भी बेगुनाह लोग घायल हुए हैं और जितना भी आर्थिक नुकसान हुआ है और आगे भी होगा, उसके लिए हमें बुरा लगता है। हमारे यशस्वी नेता जी कोई गलत थोड़े ही कहते हैं। उनका मशहूर डायलॉग है कि हम बुद्ध के देश से हैं, न कि युद्ध के देश से! इसलिए हम युद्ध नहीं करेंगे, बस चुपचाप बैठकर दूसरों का युद्ध देखेंगे और अमेरिका से कोई सवाल नहीं पूछेंगे。
हमें असल में ईरान वालों के लिए बुरा इसलिए और भी ज्यादा लग रहा है कि वे बड़ी आसानी से खुद भी इस युद्ध की आफत से बच सकते थे। वे अपनी थोड़ी सी समझदारी से बाकी दुनिया को भी इस भारी मुसीबत से बचा सकते थे। और जब हम यहाँ बाकी दुनिया कहते हैं, तो शब्दश: सारी दुनिया को मुसीबत से बचाने की बात स्पष्ट करते हैं। क्या आपने देखा नहीं कि कैसे सिर्फ तेल के चक्कर में सारी दुनिया की इकोनॉमी की वॉट लगी पड़ी है? और वह भी सिर्फ एक हफ्ते की छोटी सी लड़ाई में यह हाल हो गया है। अगर हम अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप साहब की मानें, तो उनकी हमले की तैयारी महीने भर से भी ज्यादा की है। यानी अब सारी दुनिया की इकोनॉमी का तो पूरी तरह कबाड़ा ही होने वाला है, यह आप पक्का समझिए। पर ईरान वाले इस पूरी तबाही से बड़ी आसानी से खुद भी बच सकते थे और बाकी दुनिया को भी हमेशा के लिए बचा सकते थे। जाहिर है कि इस बाकी दुनिया में वो बेचारे खाड़ी देश भी आते ही हैं, जो अमेरिका और ईरान की इस बेगानी लड़ाई में सिर्फ इसलिए फालतू में पिस रहे हैं कि अमेरिका को ईरान को निशाना बनाने के लिए उनके ठिकानों का इस्तेमाल करना है。
अमेरिका को तरह-तरह की सहूलियतों का सहारा लेने के लिए उन खाड़ी देशों की जमीन का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। उस बेचारे अमेरिका को खाड़ी की पंचैती करने के लिए, अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ, हजारों किलोमीटर दूर से उड़कर जो आना पड़ता है। ऐसे में ईरान वाले पूरी दुनिया को इस मुसीबत से कैसे बचा सकते थे? इसका जवाब बहुत ही सिंपल है। उन्हें बस हमारे ‘विश्व गुरु’ का दिखाया हुआ सुनहरा रास्ता अपनाना था। ईरान को इस मामले में ज्यादा अपना दिमाग लगाने की कोई जरूरत ही नहीं थी। बस भारत आज-कल जो-जो करता आ रहा है, ईरान को भी ठीक वही-वही करना था। वे अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता सब कुछ आसानी से भूल जाते। जो कुछ भी ट्रम्प साहब कहते, उसे वे बस सिर झुकाकर ‘यस सर’ कहकर मान लेते। यह कोई इतना मुश्किल काम तो नहीं था。
अगर ट्रम्प साहब कहते कि हमारा चहेता पट्ठा नेतन्याहू जो भी कहे, पहले वह सब मानकर दिखाओ, तो ईरान वाले नेतन्याहू जो कहता वह तुरंत मानकर दिखा देते। अगर ट्रंप और नेतन्याहू कहते कि ईरान में पुरानी राजशाही को वापस ले आओ, तो वे राजशाही वापस ले आते। अगर ट्रंप साहब कहते कि अपने देश का सारा तेल, हमारी बड़ी और मुनाफाखोर तेल कंपनियों के हवाले कर दो, तो वे तुरंत कर देते। ट्रंप और नेतन्याहू कोई पागल तो बिल्कुल हैं नहीं कि वे फिर भी ईरान पर बेवजह हमला करते। अगर ईरान झुक जाता, तो उसे भी खाड़ी देशों के अमेरिकी अड्डों पर अपनी मिसाइलों से जवाबी हमला नहीं करना पड़ता। पर नहीं, ईरान वालों को तो सिर्फ अपने ही मन की करनी थी। उनके सामने ‘विश्व गुरु’ के आत्मसमर्पण का जीता-जागता बेहतरीन उदाहरण सामने था। पर नहीं, उन्हें तो हर हाल में ‘विश्व बॉस’ की इच्छा अनसुनी ही करनी थी। सो अब वे इसका अंजाम भुगत रहे हैं और अपने साथ-साथ बाकी सारी दुनिया को भी इस आग में भुगतवा रहे हैं。
इस भीषण लड़ाई में उस ‘विश्व बॉस’ का कुछ बिगड़े या न बिगड़े, कम से कम सारी दुनिया में विश्व बॉस के साथ-साथ आज ‘विश्व गुरु’ की भी भारी थू-थू तो हो ही रही है। पूरी दुनिया देख रही है कि कैसे एक तरफ एक छोटा सा देश अपनी संप्रभुता के लिए लड़ रहा है, और दूसरी तरफ एक बड़ा देश सिर्फ तमाशा देख रहा है। इसलिए ऐ ईरानियो, इतने सारे वार सहकर अब तो कम से कम संभल जाओ। तुम कम से कम अपनी स्वतंत्रता, स्वाभिमान और संप्रभुता वगैरह की गुजरे जमाने की बातें पब्लिक को बार-बार याद मत दिलाओ। तुम ऐसी बातें करके खामखां हमारे ‘विश्व गुरु’ का नाम बदनाम ना करो। क्योंकि तुम्हारी यह बहादुरी हमें हमारी अपनी कायरता और कूटनीतिक गुलामी का सीधा अहसास कराती है। इसलिए तुम भी हमारी तरह चुपचाप झुक जाओ, ताकि इस दुनिया में हमारा यह खोखला भ्रम हमेशा बना रहे!
Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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