दिल्ली हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद सौरव दास-अशुतोष रांका ने वापस ली याचिका

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हिरासत बढ़ाने के आदेश को दी थी चुनौती; अदालत ने पहले SEM के समक्ष कार्यवाही का परिणाम देखने और फिर कानूनी विकल्प अपनाने की सलाह दी

राष्ट्रीय डेस्क | 🌐 tajnews.in | बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 | दोपहर 2:56 बजे

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राष्ट्रीय डेस्क

नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट में बुधवार, 21 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और अशुतोष रांका ने हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने वाली अपनी याचिका वापस ले ली। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिकाकर्ताओं को पहले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) के समक्ष चल रही कार्यवाही का परिणाम देखने और शिकायत बरकरार रहने पर कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्प अपनाने की सलाह दी।

सुनवाई में अदालत ने सवाल उठाया कि जब कानून में अन्य उपाय उपलब्ध हैं, तो सीधे हाई कोर्ट में रिट याचिका क्यों दायर की गई। पीठ ने वैकल्पिक कानूनी प्रक्रिया अपनाने की जरूरत पर जोर दिया। इसके बाद दोनों नेताओं की ओर से पेश वकील अभिक चिमिनी ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

हाइलाइट्स
  • याचिका वापस: सौरव दास और अशुतोष रांका ने हाई कोर्ट से अपनी याचिका वापस ली।
  • SEM की कार्यवाही: अदालत ने पहले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष होने वाली सुनवाई का परिणाम देखने को कहा।
  • वैकल्पिक उपाय: शिकायत बरकरार रहने पर कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्प अपनाए जा सकते हैं।
  • कोई अंतिम फैसला नहीं: हाई कोर्ट ने हिरासत बढ़ाने के आदेश की वैधता पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय नहीं दिया।

हिरासत बढ़ाने के आदेश को दी थी चुनौती

सौरव दास और अशुतोष रांका ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत उनकी न्यायिक हिरासत 21 अक्टूबर तक दो दिन के लिए बढ़ाई गई थी। याचिका में हिरासत जारी रखने के आधार, आदेश की वैधता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए गए थे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि हिरासत बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार स्पष्ट नहीं किए गए और जमानतदारों को स्वीकार नहीं किए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित आदेश कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है और उनके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। ये याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए आरोप और दलीलें थीं, अदालत के अंतिम निष्कर्ष नहीं।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने रिट याचिका के जरिए राहत मांगने और कानून में उपलब्ध वैकल्पिक उपायों के बीच अंतर पर भी ध्यान दिलाया। अदालत की टिप्पणी का आशय था कि जब किसी आदेश के खिलाफ अन्य कानूनी रास्ता उपलब्ध हो, तो सीधे रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने के औचित्य पर विचार जरूरी है।

पहले SEM के सामने कार्यवाही का परिणाम देखने की सलाह

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिकाकर्ताओं के वकील से कहा कि वे पहले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष होने वाली कार्यवाही का परिणाम देखें। यदि उसके बाद भी उनकी शिकायत बनी रहती है, तो वे कानून के तहत उपलब्ध उपायों पर विचार कर सकते हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष दोनों नेताओं के जमानतदारों से संबंधित मुद्दे पर भी कार्यवाही होनी थी। इसी संदर्भ में हाई कोर्ट ने तत्काल रिट याचिका पर निर्णय देने के बजाय पहले उस प्रक्रिया का परिणाम देखने की सलाह दी।

याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है। इसलिए इस कार्यवाही को हिरासत बढ़ाने के आदेश की न्यायिक पुष्टि या उस विवाद का अंतिम निपटारा नहीं माना जा सकता।

संगठन और प्रदर्शन के संदर्भ में भी सवाल

सुनवाई के दौरान पीठ ने CJP के संगठन, उसके उद्देश्य और प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि को लेकर भी सवाल किए। अदालत की टिप्पणियां सार्वजनिक शांति और व्यवस्था से जुड़े संदर्भ में थीं। हालांकि, सुनवाई के दौरान पूछे गए सवालों को संगठन या दोनों नेताओं के बारे में किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिए गए थे दोनों नेता

प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, सौरव दास और अशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के बाद 13 अक्टूबर को हिरासत में लिया गया था। इसके बाद 14 अक्टूबर को उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। 19 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ा दी थी। इसी आदेश को दोनों नेताओं ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

इस मामले में पुलिस की ओर से शांति भंग होने की आशंका और पहले दिए गए बॉन्ड के कथित उल्लंघन का हवाला दिया गया था। वहीं, याचिकाकर्ताओं ने हिरासत बढ़ाने के आधारों और जमानतदारों को लेकर सवाल उठाए। दोनों पक्षों की दलीलों और आरोपों को अदालत के अंतिम निष्कर्ष से अलग समझना जरूरी है।

अब आगे क्या होगा?

हाई कोर्ट में याचिका वापस लिए जाने के बाद आगे की स्थिति विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई कार्यवाही और उसके परिणाम पर निर्भर करेगी। यदि दोनों नेताओं की शिकायत बनी रहती है, तो वे कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपना सकते हैं।

फिलहाल, हाई कोर्ट ने न तो हिरासत बढ़ाने का आदेश रद्द किया है और न ही उसकी वैधता पर अंतिम फैसला सुनाया है। अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी। इसलिए इस घटनाक्रम को हिरासत संबंधी विवाद का अंतिम निपटारा मानना सही नहीं होगा।

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Pawan Singh, Chief Editor, Taj News

Pawan Singh

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