बहुजन से जातियों के कुनबे तक : कांशीराम का सपना क्यों बिखर गया?

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बसपा के शून्य तक सिमटने, अस्मिता की राजनीति की सीमाओं और ‘बहुजन’ से बिखरकर अलग-अलग जातीय कुनबों में बंटने की ऐतिहासिक पड़ताल करता वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह का विशेष आलेख

आर्टिकल डेस्क
Sheetal P Singh

शीतल पी. सिंह

वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
भारतीय राजनीति, सामाजिक आंदोलनों, अस्मिता की राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर निष्पक्ष व गंभीर विश्लेषण।

राजस्थान के ताजा स्थानीय निकाय चुनावों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 19 सीटें मिली हैं। पिछली बार 24 थीं। इस बार काफ़ी नई सीटें बढ़ भी गई थीं। पांच सीटें कम होना अपने आप में कोई बड़ी राष्ट्रीय राजनीतिक घटना नहीं है, और राजस्थान कभी बसपा का मुख्य गढ़ भी नहीं रहा है। लेकिन इन 19 सीटों को उत्तर प्रदेश में बसपा के पिछले दो दशकों के सफर के साथ रखकर देखिए, तो यह छोटी संख्या एक बहुत बड़ी राजनीतिक कहानी सुनाने लगती है।

2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 में से 206 सीटें और 30.43 प्रतिशत वोट, 2012 में 80 सीटें और करीब 26 प्रतिशत वोट, 2017 में 19 सीटें और 2022 में केवल एक सीट और 12.88 प्रतिशत वोट। लोकसभा में 2009 की 20 सीटों से 2014 में शून्य ; 2019 में समाजवादी पार्टी से गठबंधन करके फिर 10 सीटें और 2024 में दोबारा शून्य। 2024 में वोट भी घटकर केवल 9.39 प्रतिशत रह गया। अब तो स्थिति और भी चिंताजनक हो चुकी है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का अगस्त 2026 में निधन हो गया। वे बलिया की रसड़ा सीट से तीन बार विधायक रहे थे। अब 403 सदस्यीय विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक नहीं बचा है। राज्यसभा में पार्टी के पास केवल एक सांसद रामजी गौतम बचे हैं, जिनका कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। उसके बाद संसद के किसी भी सदन में बसपा का कोई प्रतिनिधि नहीं होगा। यह 1989 के बाद पहली बार होगा जब बसपा संसद से पूरी तरह बाहर हो जाएगी।

HIGHLIGHTS
  • चुनावी पतन का ऐतिहासिक आंकड़ा: 2007 में पूर्ण बहुमत से लेकर 2026 में यूपी विधानसभा और संसद के दोनों सदनों में शून्य तक पहुंचने का सफर।
  • ‘बहुजन’ की बड़ी राजनीतिक छत: कांशीराम द्वारा जातियों को मिटाए बिना सत्ता की भागीदारी के लिए तैयार किए गए राजनीतिक बीजगणित की पड़ताल।
  • जातीय क्षत्रपों का उभार: सोनेलाल पटेल, ओमप्रकाश राजभर, संजय निषाद और स्वामी प्रसाद मौर्य के अलग मंचों से बहुजन गठबंधन का विघटन।
  • भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग: छोटी जातीय अस्मिताओं को सत्ता की हिस्सेदारी देकर वृहद हिंदुत्व की छतरी तले समाहित करने की रणनीति।

आखिर ऐसा क्या हुआ? क्या मायावती की रणनीति असफल हुई? क्या संगठन कमजोर हुआ? क्या भाजपा ने दलित वोट में सेंध लगा दी? क्या नेतृत्व की दूसरी पंक्ति खत्म कर दी गई? ये सभी कारण महत्वपूर्ण हैं। लेकिन शायद इनके नीचे एक और बड़ी कहानी छिपी हुई है — बसपा का उत्थान और पतन भारत में अस्मिता की राजनीति की ताकत और उसकी सीमाओं की कहानी भी है.

बहुजन : एक बड़ी छत

कांशीराम की सबसे बड़ी उपलब्धि बसपा बनाना या मायावती को मुख्यमंत्री बनाना भर नहीं थी। उनका असली राजनीतिक चमत्कार था — दर्जनों अलग-अलग जातीय पहचानों को मिटाए बिना उनके ऊपर एक बड़ी राजनीतिक पहचान खड़ी कर देना, जिसका नाम हुआ — बहुजन। बामसेफ, फिर डीएस-4 और अंततः 1984 में बसपा तक कांशीराम का संदेश मोटे तौर पर एक ही था — जिनकी आबादी इतनी बड़ी है, सत्ता में उनकी हिस्सेदारी इतनी छोटी क्यों है?

दलित, अति पिछड़े, गैर-यादव ओबीसी और दूसरे वंचित समुदाय यदि अपनी-अपनी जातियों में बंटे रहेंगे, तो किसी दूसरे राजनीतिक गठबंधन का वोट बैंक बने रहेंगे। लेकिन संख्या जोड़कर एक राजनीतिक समुदाय बन जाएं, तो सत्ता की चाबी उनके हाथ में आ सकती है। कांशीराम ने बिखरे हुए सामाजिक अंकगणित को राजनीतिक बीजगणित में बदल दिया। लेकिन इस प्रयोग की कमजोरी भी उसके भीतर ही मौजूद थी।

‘बहुजन’ स्वयं कोई जाति नहीं थी। राजभर, राजभर था। निषाद, निषाद ; कुर्मी, कुर्मी ; मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, प्रजापति, पासी, वाल्मीकि — सभी का अपना इतिहास, अपनी सामाजिक स्थिति, अपने नायक और अपनी आकांक्षाएं थीं। कांशीराम ने इन पहचानों को खत्म नहीं किया था। उन्होंने इनके ऊपर एक बड़ी राजनीतिक छत डाल दी थी। जब तक वह छत मजबूत रही, कारवां बढ़ता गया। फिर छत कमजोर हुई और नीचे रहने वाले समूह अपने-अपने कमरे बनाने लगे।

चार कहानियां, जो बहुजन के बिखराव की कहानी हैं

इस प्रक्रिया को समझने के लिए चार राजनीतिक यात्राएं देखना पर्याप्त है- सोनेलाल पटेल, ओमप्रकाश राजभर, संजय निषाद और स्वामी प्रसाद मौर्य।

सोनेलाल पटेल कांशीराम के निकट सहयोगी और बसपा के संस्थापक सदस्यों में थे। बाद में मतभेद हुए और 1995 में उन्होंने अपना दल बनाया। जिस कुर्मी-पटेल सामाजिक हिस्से को कांशीराम ‘बहुजन’ की बड़ी पहचान में जोड़ना चाहते थे, उसके लिए अब एक अलग राजनीतिक मंच उपलब्ध था। सोनेलाल की मृत्यु के बाद पार्टी और परिवार में संघर्ष हुआ। अंततः राजनीतिक विरासत भी दो हिस्सों में बंट गई — एक तरफ अनुप्रिया पटेल के प्रभाव वाला अपना दल (सोनेलाल) और दूसरी तरफ कृष्णा पटेल-पल्लवी पटेल वाला अपना दल (कमेरावादी)।

अनुप्रिया भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की सहयोगी बनीं और फिर केंद्र में मंत्री। दूसरी तरफ पल्लवी पटेल ने 2022 में समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न पर सिराथू से चुनाव लड़कर भाजपा के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को हराया। यानी पहले ‘बहुजन’ से कुर्मी पहचान अलग हुई, फिर उसी पहचान की पार्टी दो हिस्सों में बंटी और एक ही राजनीतिक परिवार की दो धाराएं विरोधी गठबंधनों तक पहुंच गईं।

ओमप्रकाश राजभर बसपा से जुड़े रहे, फिर अलग हुए और 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) बनाई। अब राजभर को ‘बहुजन’ के भीतर हिस्सेदारी मांगने के बजाय अपनी अलग पार्टी, अपना नेता और अपनी राजनीतिक सौदेबाजी की शक्ति मिल गई। सुभासपा कभी भाजपा के साथ गई, कभी उससे अलग हुई, समाजवादी पार्टी के साथ गई और फिर एनडीए में लौट आई। आज राजभर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं।

डॉ. संजय निषाद स्वयं बता चुके हैं कि उनकी राजनीतिक शिक्षा कांशीराम के बामसेफ में हुई। गोरखपुर और आसपास उनका काम बामसेफ की बैठकें आयोजित करना और नया कैडर तैयार करना था। जब बसपा बनी, तो कांशीराम ने उनसे पार्टी में आने के बजाय बामसेफ में काम जारी रखने को कहा। बाद में संजय निषाद ने अपने संगठन बनाए और अंततः निषाद समुदाय को केंद्र में रखकर निषाद पार्टी खड़ी की। यानी जिस व्यक्ति ने कभी कांशीराम के लिए बहुजन कैडर तैयार किया था, आगे चलकर वही निषाद पहचान की स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति का नेता बन गया। आज निषाद पार्टी भी भाजपा की सहयोगी है तथा संजय निषाद उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं।

स्वामी प्रसाद मौर्य करीब दो दशक बसपा में रहकर उसके सबसे बड़े गैर-यादव ओबीसी चेहरों में शामिल हुए। मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय महासचिव जैसी जिम्मेदारियां संभालीं। 2016 में वे बसपा छोड़कर भाजपा में चले गए। 2017 में भाजपा से विधायक बने और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री। 2022 से पहले भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में गए और बाद में वहां से भी अलग होकर अपनी राजनीतिक राह बनाई।

अब इन चारों तस्वीरों को एक साथ रखिए — कुर्मी-पटेल नेतृत्व अलग ; राजभर नेतृत्व अलग ; निषाद-मल्लाह नेतृत्व अलग ; मौर्य-कुशवाहा-शाक्य राजनीति का बड़ा चेहरा अलग ; और बसपा के पास लगातार बचता गया उसका सबसे प्रतिबद्ध सामाजिक आधार — जाटव। यह केवल नेताओं का दलबदल नहीं था। यह कांशीराम द्वारा बनाए गए बहुजन सामाजिक गठबंधन का विघटन था।

पहचान, प्रतिनिधित्व, पद और प्रतिष्ठा

इस प्रक्रिया पर हुए अध्ययनों में भी यही तस्वीर सामने आती है। उत्तर प्रदेश में अपना दल को कुर्मी आधार, सुभासपा को राजभर आधार, निषाद पार्टी को नदी और मछुआरा समुदायों तथा महान दल को मौर्य-शाक्य-कुशवाहा आधार वाली पार्टियों के रूप में देखा गया है। यानी बड़ी ओबीसी पहचान भी आगे छोटी जातीय राजनीतिक इकाइयों में टूटती गई। और यहीं अस्मिता की राजनीति की बुनियादी सीमा सामने आती है।

पहचान बहुत शक्तिशाली राजनीतिक औजार है, क्योंकि वह इतिहास, अपमान, सम्मान और प्रतिनिधित्व से जुड़ती है। लेकिन हर पहचान के भीतर एक और पहचान होती है। ओबीसी को जोड़िए, तो यादव और गैर-यादव निकलेंगे। गैर-यादव को जोड़िए, तो कुर्मी, मौर्य, राजभर, निषाद, कुशवाहा निकलेंगे। दलित को जोड़िए, तो जाटव और गैर-जाटव का सवाल आएगा। गैर-जाटव के भीतर जाइए, तो पासी, वाल्मीकि, कोरी और दूसरी पहचानें अपनी हिस्सेदारी पूछेंगी। इसलिए पहचान राजनीति को जन्म तो दे सकती है, लेकिन अपने आप स्थायी राजनीतिक एकता की गारंटी नहीं देती।

भाजपा ने इसी कमजोरी को शायद सबसे सफलतापूर्वक पहचाना। उसने जाति की राजनीति खत्म नहीं की। उसने जातियों की राजनीति को अपने भीतर समाहित कर लिया। राजभर से नहीं कहा — राजभर होना छोड़ दो ; निषाद से नहीं कहा — निषाद होना छोड़ दो ; कुर्मी को अपनी पहचान छोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी। छोटी पार्टी भी रखिए, अपना नेता भी, अपना झंडा भी। चुनाव में सीट मांगिए और सरकार बने, तो मंत्री पद तथा सत्ता में हिस्सेदारी भी। लेकिन इन छोटी पहचान के ऊपर एक बड़ी राजनीतिक-सांस्कृतिक पहचान रख दी गई, वो है — हिंदू।

यहीं कांशीराम और भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग के बीच दिलचस्प मुकाबला दिखाई देता है। कांशीराम का सूत्र था — छोटी वंचित जातीय पहचान + सामाजिक न्याय + राजनीतिक हिस्सेदारी = बहुजन। भाजपा का उत्तर बना — छोटी जातीय पहचान + सत्ता में हिस्सेदारी + हिंदुत्व = व्यापक हिंदू राजनीतिक गठबंधन।

और भाजपा के पास एक अतिरिक्त शक्ति थी — सत्ता। सत्ता टिकट दे सकती है, मंत्री पद दे सकती है, बोर्ड-निगम और संगठन में स्थान दे सकती है, राजनीतिक प्रतिष्ठा और संरक्षण दे सकती है।

मायावती और ‘एकला चलो रे’ का संकट

राजनीतिक हलकों और बसपा के पुराने समर्थकों के एक हिस्से में लंबे समय से धारणा है कि मायावती भाजपा और केंद्रीय सत्ता से निर्णायक टकराव नहीं चाहतीं. इस धारणा को अक्सर उनके पुराने ताज कॉरिडोर और आय से अधिक संपत्ति संबंधी विवादों की स्मृति से जोड़ा जाता है। लेकिन इसे प्रमाणित तथ्य नहीं कहा जा सकता कि मायावती ‘जेल जाने के डर’ से भाजपा से नहीं लड़तीं। फिर भी उनकी राजनीति इस धारणा को तोड़ भी नहीं पाई है।

2019 में समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया — 10 लोकसभा सीटें मिलीं, गठबंधन तोड़ दिया। 2022 अकेले लड़ीं — एक विधानसभा सीट। 2024 में ‘इंडिया’ गठबंधन से बाहर रहकर अकेले लड़ीं — 9.39 प्रतिशत वोट और शून्य लोकसभा सीट। फिर भी ‘एकला चलो रे’ जारी है।

यहां कांशीराम और आज की बसपा के अकेलेपन का फर्क समझना जरूरी है। कांशीराम अकेले चलते थे और पीछे कारवां बढ़ता जाता था। आज बसपा अकेली चल रही है और कारवां छोटा होता जा रहा है।

ऊपर से उत्तराधिकार का संकट। कांशीराम ने अपना उत्तराधिकारी परिवार में नहीं खोजा था। मायावती उनकी बेटी, बहन या भतीजी नहीं थीं। उन्होंने आंदोलन के भीतर से एक कार्यकर्ता चुना और उसे नेतृत्व के लिए तैयार किया। आज मायावती के बाद बसपा का नेतृत्व कौन संभालेगा, इसकी चर्चा उनके भाई और भतीजों के इर्द-गिर्द चलती रहती है। जिस आंदोलन ने जन्म से निर्धारित सामाजिक हैसियत के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उसका राजनीतिक उत्तराधिकार यदि पारिवारिक जन्म-संबंधों में खोजा जाने लगे, तो विरोधाभास साफ है।

लेकिन फिर भी बसपा को समाप्त घोषित करना जल्दबाजी होगी। सामाजिक न्याय की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। जातीय असमानता खत्म नहीं हुई। आरक्षण, प्रतिनिधित्व, शिक्षा, रोजगार और संसाधनों में हिस्सेदारी के प्रश्न मौजूद हैं। यानी बहुजन राजनीति की सामाजिक जमीन अभी मौजूद है ; संकट उसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति का है। और शायद यहीं कांशीराम के प्रयोग का सबसे बड़ा सबक मिलता है।

बहुजनों के साथ आने और बंटने का सबक

पहचान राजनीति की शुरुआत हो सकती है, पूरी राजनीति नहीं। पहचान आपको बता सकती है कि आपके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ, वह सम्मान दिला सकती है, संगठन बना सकती है, आपको सत्ता तक भी पहुंचा सकती है, लेकिन सत्ता में स्थायी राजनीतिक गठबंधन बनाए रखने के लिए उसके आगे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसर, जमीन, सामाजिक सुरक्षा, नागरिक अधिकार और साझा भविष्य का कार्यक्रम चाहिए। वरना हर बड़ी पहचान के भीतर से छोटी पहचान अपना हिस्सा मांगते हुए बाहर निकलती रहेगी।

कांशीराम ने जातियों को खत्म नहीं किया था। उन्होंने उनके ऊपर ‘बहुजन’ की एक विशाल राजनीतिक छत खड़ी की थी। उनके जाने के बाद वह छत कमजोर हुई। सोनेलाल पटेल के साथ कुर्मी-पटेल राजनीति ने अपनी राह बनाई। ओमप्रकाश राजभर के साथ राजभर राजनीति ने। संजय निषाद के साथ निषाद राजनीति ने। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे बड़े ओबीसी चेहरे भी बसपा से निकल गए। और फिर भाजपा ने इन बिखरे हिस्सों में से अनेक को अपने विशाल राजनीतिक घर में जगह दे दी। इसलिए राजस्थान की 19 सीटें केवल राजस्थान की 19 सीटें नहीं हैं। वे एक लंबी यात्रा का नवीनतम पड़ाव हैं — बामसेफ से डीएस-4 ; डीएस-4 से बसपा ; बसपा से बहुजन ; बहुजन से सर्वजन ; और फिर सर्वजन से सिकुड़ते-सिकुड़ते मुख्यतः जाटव आधार तक।

शायद बसपा के उत्थान और पतन की पूरी कहानी दो वाक्यों में कही जा सकती है — कांशीराम ने बिखरी जातीय संख्याओं को जोड़कर राजनीतिक शक्ति बनाई थी। उनके बाद वह राजनीतिक शक्ति फिर छोटी-छोटी जातीय संख्याओं में बंट गई। और भाजपा की सफलता यह रही कि उसने उन बिखरी संख्याओं को मिटाया नहीं — उन्हें उनकी पहचान के साथ अपने बड़े राजनीतिक समीकरण में जोड़ लिया।

इसलिए सवाल अब केवल यह नहीं है कि मायावती या बसपा का भविष्य क्या होगा। असली सवाल है — क्या भारत के वंचित समुदाय अपनी अलग-अलग पहचान और सम्मान को सुरक्षित रखते हुए रोजगार, शिक्षा, आर्थिक न्याय, सामाजिक बराबरी और नागरिक अधिकारों के किसी बड़े साझा कार्यक्रम पर फिर एकत्र हो सकते हैं?

या वे अपनी-अपनी जातीय पार्टियां बनाकर उस बड़ी पार्टी के दरवाजे पर हिस्सेदारी की सौदेबाजी करते रहेंगे जिसके पास उस समय सत्ता और संसाधन बांटने की सबसे ज्यादा क्षमता होगी? पहचान सत्ता का दरवाजा खोल सकती है। लेकिन साझा भविष्य का कार्यक्रम न हो, तो वही पहचान उस सत्ता को टुकड़ों में भी बांट सकती है। शायद कांशीराम के महान राजनीतिक प्रयोग का सबसे महत्वपूर्ण सबक यही है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Pawan Singh

Pawan Singh

Editor in chief, Taj News Network

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