नीदरलैंड की ऐतिहासिक नहरों, साइकिलों के बेजोड़ अनुशासन और डच जीवनशैली के बीच भारतीय जायके के खूबसूरत अनुभवों पर वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का विशेष यात्रा संस्मरण
आर्टिकल डेस्क | 🌐 tajnews.in | 26 सितंबर 2026 | 18:00 बजे


बृज खंडेलवाल
आप अगर ऐसे शहर में जाएँ जहाँ साइकिलें, कार या अन्य वाहन यात्रियों से ज्यादा ताकतवर हों, तो क्या होगा?
आप एम्स्टर्डम पहुँच जाएँगे।
यहाँ साइकिलों में नेताओं जैसा आत्मविश्वास, एक्सप्रेस ट्रेन जैसी रफ्तार और राजाओं जैसा रास्ते पर अधिकार है। पर्यटक नहर देख सकता है, पुल की तस्वीर खींच सकता है और वान गॉग को याद कर सकता है। लेकिन गलती से साइकिल की पटरी पर पैर रख दिया, तो अगले ही पल वह डच आपात बैठक का विषय बन सकता है। चेतावनी आमतौर पर बस इतनी होती है। “रिंग-रिंग!” आवाज़ बड़ी शरीफ लगती है। मतलब बिल्कुल शरीफ नहीं होता। मतलब है, “भाई साहब, हटिए। इस साइकिल को राजनयिक छूट मिली हुई है।”
- साइकिल सवार ही बॉस: नीदरलैंड के एम्स्टर्डम में लाल डामर वाले ट्रैक, घंटी की शरीफ चेतावनी और दो पहियों का राज।
- पानी से इश्क और इंजीनियरिंग: समुद्र तल से नीचे बसे शहर में नहरों का जाल, खूबसूरत मेहराबदार पुल और पानी में तैरता इतिहास।
- देसी बिरयानी का सुकून: यूरोपीय नहरों की सैर के बीच पंजाबी खानसामे के हाथ की बिरयानी, समोसे और रायते का अनमोल स्वाद।
- ओवरटूरिज्म और पर्यावरण की बहस: पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ के नियमन और डच किसानों के प्रदूषण संकट पर जमीनी अवलोकन।
फिर भी एम्स्टर्डम का एक शांत जादू है। यह धीरे-धीरे आपको अपना दीवाना बना लेता है। आसमान भी यहाँ बड़ा असमंजस में रहता है। एक पल बादल ऐसे घिरते हैं जैसे कोई माँ अपने बच्चे को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित हो। अगले ही पल धूप निकलती है और नहरों, पुलों तथा ऊँचे, पतले मकानों पर सुनहरी रोशनी बिखेर देती है। मौसम किसी उलझे हुए नेता की तरह बार-बार अपना रुख बदलता है। लेकिन नतीजा हमेशा खूबसूरत आता है।
दिन में हमने एक प्यारा-सा डच गाँव भी देखा। वहाँ लकड़ी के जूते, जिन्हें क्लॉम्पेन कहा जाता है, बड़े गर्व से सजाए गए थे। पारंपरिक तरीके से पनीर बनते देखा और उस पुराने हॉलैंड की झलक मिली, जहाँ जिंदगी शायद आज से कुछ ज्यादा आराम से चलती थी। लेकिन एम्स्टर्डम सिर्फ लकड़ी के जूतों का शहर नहीं है। यह साइकिलों का शहर है।
साइकिल मार्ग, अनुशासन और विकास का आईना
साइकिलें हर जगह हैं। पुलों पर, नहरों के किनारे, दुकानों के बाहर और एक-दूसरे से इतनी सटाकर खड़ी कि लगता है रातों-रात इनकी आबादी बढ़ती है। साइकिल सवार चुपचाप निकलते हैं। न हॉर्न, न बहस, न गाली। बस घंटी। रिंग-रिंग! और फिर आप रास्ते से गायब। यहाँ साइकिल सवार कोई परेशानी नहीं है। साइकिल सवार ही बॉस है।
शहर में अलग साइकिल मार्ग हैं जहां कारें लगभग मेहमान होती हैं। मोटर चालक रास्ता देते हैं। पैदल चलने वाले सावधान रहते हैं। साइकिल सवार पूरे आत्मविश्वास से चलते हैं, जैसे उन्हें शहर भी मालूम है और अपने अधिकार भी।
एम्स्टर्डम भारतीयों को एक मजेदार आईना दिखाता है। नीदरलैंड दुनिया के सबसे विकसित देशों में है, फिर भी यहाँ लोग खुशी-खुशी साइकिल चलाते हैं। भारत ने विकास के नाम पर साइकिल को पीछे छोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साइकिल से स्कूटर। स्कूटर से मोटरसाइकिल। मोटरसाइकिल से एसयूवी। और जिस रफ्तार से हम चल रहे हैं, शायद एक दिन बेडरूम से ड्राइंग रूम तक जाने के लिए भी एसयूवी चाहिए होगी। एम्स्टर्डम धीरे से पूछता है: क्या विकास के लिए चार पहिए जरूरी हैं? शायद तरक्की यह समझने का नाम भी है कि कब दो पहिए काफी हैं।
यहाँ साइकिल चलाना शौक नहीं है। यह यातायात है, व्यवस्था है और पहचान भी है। शहर ने वर्षों लगाकर साइकिल मार्ग सुधारे हैं। लाल डामर, चौड़े रास्ते और शांत चौराहे इसका हिस्सा हैं। यहाँ साइकिल मेहमान नहीं है। मेजबान है।
नहरों का जलमार्ग और डच इंजीनियरिंग का चमत्कार
एम्स्टर्डम की दूसरी बड़ी प्रेम कहानी पानी के साथ है। डच लोगों ने ऐसी जगह शहर बनाया जहाँ पानी कभी भी कह सकता था, “भाइयों, अब आप यहाँ से निकलो।” लेकिन उन्होंने पानी से हार मानने से इनकार कर दिया। नीदरलैंड का बड़ा हिस्सा समुद्र तल के बराबर या उससे नीचे है। डच लोगों ने नहरें बनाईं, बाँध खड़े किए, पंप लगाए और इंजीनियरिंग को अपना हथियार बनाया। जिस पानी को खतरा समझा जा सकता था, वही शहर की जीवनधारा बन गया।
कभी इन्हीं जलमार्गों से मसाले, लकड़ी और दौलत ढोई जाती थी। उसी संपन्नता ने नहरों के किनारे खूबसूरत मकान, संग्रहालय और भव्य इमारतें खड़ी कीं। आज इन्हीं नहरों में एक और चीज खूब बहती है। पर्यटक। और काफी संख्या में।
हमारी नहर यात्रा ने एम्स्टर्डम को उसके सबसे रोमांटिक रूप में दिखाया। पानी चमक रहा था। सूरज बादलों के साथ आँख-मिचौली खेल रहा था। एक के बाद एक सुंदर पुल आते गए। पुराने मकान पानी में अपना प्रतिबिंब देखकर ऐसे झुक रहे थे, जैसे पूछ रहे हों, “भाई, आज भी अच्छे लग रहे हैं न?” जवाब था। बिल्कुल।
नहर किनारे बिरयानी और भारतीय पर्यटकों का स्थायी संविधान
और तभी आई बिरयानी। उस क्षण एम्स्टर्डम अचानक अपना-सा लगने लगा। हमारी टूर लीडर मार्था समय की ऐसी रखवाली करती हैं जैसे स्कूल की प्रधानाचार्या सुबह की प्रार्थना सभा में बच्चों की। उनका प्यार भरा लेकिन स्पष्ट आदेश, “चलो, चलो!”, हमारे कानों में लगातार गूंजता रहता है। और हमारे पंजाबी खानसामे ने भारतीय पर्यटकों की मनोदशा को खूब समझ रखा है। पहले उन्हें यूरोप दिखाओ। लेकिन उससे पहले उन्हें खाना खिलाओ।
मेन्यू शानदार था। बिरयानी। दही। समोसा। ब्राउनी। अब और क्या चाहिए? समोसे ने कुरकुरापन दिया। बिरयानी ने भावनात्मक सहारा दिया। दही ने शांति स्थापित की। और ब्राउनी ने साबित कर दिया कि भारत और यूरोप के संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं।
यूरोप की कई दिनों की यात्रा के बाद भोजन भी पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। एफिल टावर अच्छा है। बिग बेन ऐतिहासिक है। नहरें रोमांटिक हैं। लेकिन दोपहर दो बजे किसी भारतीय पर्यटक से पूछिए कि सबसे जरूरी चीज क्या है। जवाब आने की पूरी संभावना है: “खाना कहाँ मिलेगा?” हमारे समूह का अपना संविधान बन चुका है। कहाँ जाना है? कब निकलना है? कितनी दूर है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल— खाना कब मिलेगा? इन सवालों ने जितनी मानवता को जोड़ा है, उतनी कई अंतरराष्ट्रीय बैठकों ने भी नहीं जोड़ी होगी।
धीरे-धीरे पर्यटकों का समूह एक अस्थायी परिवार बन जाता है। कोई तस्वीरें देख रहा है, कोई दुकान खोज रहा है, कोई अगले पड़ाव की चिंता कर रहा है और कोई घड़ी। मार्था हँसते-हँसाते सबको व्यवस्थित रखती हैं।
पर्यटकों का दबाव, पर्यावरण संकट और बादलों का रोमांस
उधर एम्स्टर्डम अपनी सफलता की एक दूसरी समस्या से जूझ रहा है। शहर पूरी दुनिया को बुलाता है। लेकिन जब पूरी दुनिया एक साथ आ जाए, तो स्वर्ग को भी भीड़ नियंत्रण की जरूरत पड़ती है। महँगे मकान, अल्पकालीन किराये के मकान, पर्यटकों की भीड़ और सार्वजनिक जगहों पर दबाव ने शहर को नियम कड़े करने के लिए मजबूर किया है। हम पर्यटक भी गजब की प्रजाति हैं। भीड़ की शिकायत करते हैं। फिर उसी भीड़ में शामिल हो जाते हैं। फिर भीड़ की तस्वीर खींचते हैं। और लिखते हैं: “एम्स्टर्डम कितना शांत शहर है!”
डच किसानों का नाइट्रोजन प्रदूषण को लेकर विरोध एक दूसरी कठिन बहस है। प्रदूषण कम करने के नियमों ने खेती, किसानों की रोजी-रोटी और पर्यावरण के बीच टकराव पैदा किया है। हाल के विरोध और व्यवधान बताते हैं कि व्यावहारिक समाधान के लिए मशहूर डच समाज में भी हर समस्या का आसान जवाब नहीं होता। शायद यही एम्स्टर्डम का असली सबक है। कोई शहर संपूर्ण नहीं होता। वह भी नहीं, जहाँ नहरें हों, साइकिलें हों और मकान ऐसे दिखें जैसे किसी रोमांटिक वास्तुकार ने दो बोतल दारू पीकर बनाए हों।
हमारी नहर यात्रा खत्म हुई तो बादल फिर लौट आए। सूरज उनके पीछे छिप गया। नहरें कुछ गहरी और शांत दिखने लगीं। मकान चुप हो गए। पानी में उनके प्रतिबिंब और नरम हो गए। फिर भी एम्स्टर्डम खूबसूरत था। पेरिस ने भव्यता दी। लंदन ने इतिहास की परतें दिखाईं। एम्स्टर्डम ने साइकिल, नहरें और समझदारी से चलने की सीख दी। और शुक्र है, बिरयानी ने हमें आगे बढ़ते रहने की ताकत दी। शायद कुछ शहरों को खूबसूरत दिखने के लिए धूप चाहिए। एम्स्टर्डम को नहीं। उसे तो बादलों को भी रोमांस करना सिखाना आता है।

Pawan Singh
Editor in chief, Taj News Network
pawansingh@tajnews.in
WhatsApp: 7579990777




