हीडलबर्ग से ब्लैक फॉरेस्ट: जहां जंगल फुसफुसाता है और कोयल वक्त बताती है: बृज खंडेलवाल

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हीडलबर्ग के महलों से जर्मनी के घने श्वार्ज़वाल्ड तक का सफर, ट्राइबर्ग की कुकू क्लॉक का जादू और देसी जायके के बीच वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का विशेष संस्मरण

आर्टिकल डेस्क | 🌐 tajnews.in | 26 सितंबर 2026 | 16:00 बजे

आर्टिकल डेस्क
Brij Khandelwal

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरणविद् व अंतरराष्ट्रीय यात्रा-वृतांत लेखक
धरोहर, पर्यावरण, नागरिक समाज और वैश्विक यात्रा संस्मरणों पर निरंतर प्रखर व सजीव लेखन।

शहर अचानक गायब हो गया।

एक पल पहले तक हमारी बस हीडलबर्ग की पुरानी गलियों, नेकर नदी, पहाड़ी पर खड़े लाल बलुआ पत्थर के खंडहरनुमा महल और ओल्ड ब्रिज की खूबसूरत मेहराबों को पीछे छोड़ रही थी। अगले ही पल लगा, जैसे बस जर्मनी के किसी बिल्कुल दूसरे हिस्से में दाखिल हो गई हो।

इमारतें गायब। पेड़ बढ़ते गए। दोनों ओर पहाड़ उठ खड़े हुए। घनी हरी शाखाओं के बीच से धूप छनकर आ रही थी, जैसे उसे भी जंगल में दाखिल होने की इजाज़त लेनी पड़ रही हो। यह सफर कम और किसी परी-कथा की शुरुआत ज्यादा लग रहा था।

HIGHLIGHTS
  • ब्लैक फॉरेस्ट का हरा संसार: हीडलबर्ग के शहरी आकर्षण को छोड़ जर्मनी के घने जंगलों, शांत पहाड़ों और ताजी हवा के आगोश में पहुंची यात्रा।
  • कुकू क्लॉक की परंपरा: ट्राइबर्ग के कारीगरों की 18वीं सदी की प्रसिद्ध कोयल वाली घड़ियां और वक्त की पाबंदी का जर्मन अंदाज।
  • जंगल में हिंदुस्तानी स्वाद: निलेश देसाई के रेस्तरां में कढ़ी-खिचड़ी, दही वड़े और असली ब्लैक फॉरेस्ट केक का लजीज संगम।
  • प्रकृति का बड़ा पैगाम: भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच पेड़ की तरह ठहरना और खामोशी की जुबान को समझने का गहरा सबक।

नाम जरूर थोड़ा डरावना है: ब्लैक फॉरेस्ट! नाम सुनते ही आंखों के सामने घना अंधेरा जंगल, रहस्यमय रास्ते, चुड़ैलें, परियां और पेड़ के पीछे छिपा कोई भेड़िया घूमने लगता है। रोमनों ने इसकी घनी और छायादार हरियाली देखकर इसे Silva Nigra, यानी काला जंगल कहा था। जर्मन इसे श्वार्ज़वाल्ड कहते हैं।

लेकिन यहां पहुंचकर पहला ताज्जुब यही हुआ: ब्लैक फॉरेस्ट काला कम और हरा ज्यादा है।

हमारी टीचर और गाइड लेडी मार्था ने बताया कि दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी का यह विशाल पहाड़ी इलाका देवदार, स्प्रूस और बीच के घने पेड़ों, लहरदार पहाड़ियों, झरनों, झीलों, पुराने गांवों और ढलानदार छतों वाले लकड़ी के मकानों के लिए मशहूर है।

कुछ ही देर पहले हम हीडलबर्ग में थे: विश्वविद्यालयों, किताबों, रोमांस और पुराने यूरोपीय आकर्षण का शहर। अब मंज़र पूरी तरह बदल चुका था। गगनचुंबी इमारतों की जगह पहाड़ थे। ट्रैफिक के शोर की जगह पेड़ों की सरसराहट थी। शेयर बाजार गायब था। ऑक्सीजन बाजार तेज़ी से फल-फूल रहा था!

बस की खिड़की से बाहर देखते हुए लगा कि यहां प्रकृति को कभी जल्दी नहीं रही। पेड़ धीरे-धीरे बड़े हुए। पहाड़ सदियों से खड़े हैं। नदियां अपनी मर्ज़ी से रास्ता बनाती रही हैं। जल्दी सिर्फ हमें है। शहर में मोबाइल फोन बजता है। यहां चिड़ियां जवाब देती हैं। शहर में हॉर्न चीखते हैं। यहां हवा पेड़ों के कान में कुछ फुसफुसाती है।

ब्लैक फॉरेस्ट ने मुझे दक्षिण भारत की नीलगिरि पहाड़ियों की याद दिला दी। दोनों जगह आधुनिक जिंदगी की वह दुर्लभ नेमत मिलती है, जिसे हमने लगभग भुला दिया है; आंखों के लिए सुकून और दिमाग के लिए खामोशी।

ब्लैक फॉरेस्ट के बड़े हिस्से को प्रकृति को अपनी रफ्तार से चलने देने की सोच के साथ संभाला जाता है। 2014 में बने ब्लैक फॉरेस्ट नेशनल पार्क का मूल विचार भी यही है कि प्रकृति को प्रकृति रहने दिया जाए। मानो जंगल इंसानों से कह रहा हो: “भाई साहब, हमें अकेला छोड़ दीजिए। यह सिस्टम हम आपसे बहुत पहले से चला रहे हैं!” और शायद जंगल सही भी कहता है। हम इंसान हर चीज को मैनेज करना चाहते हैं: जंगल, नदियां, ट्रैफिक, बाजार, पड़ोसी और कभी-कभी दूसरों की जिंदगी भी। जंगल को देखिए। वह बस बढ़ता है।

ट्राइबर्ग और कोयल वाली घड़ियों का अनुशासन

ब्लैक फॉरेस्ट सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं है। यह झरनों, झीलों, पुराने गांवों, लकड़ी के घरों और सबसे बढ़कर कुकू क्लॉक, यानी कोयल वाली घड़ियों की धरती है। इन घड़ियों की परंपरा यहां काफी पुरानी है। 18वीं सदी में लंबे और बर्फीले जर्मन सर्दियों के दौरान किसानों और कारीगरों ने इन्हें बनाना शुरू किया। ट्राइबर्ग और उसके आसपास के इलाके आज भी इन घड़ियों के लिए मशहूर हैं।

हर घंटे छोटी-सी चिड़िया बाहर निकलती है और पूरे अनुशासन के साथ घोषणा करती है: “कू-कू!”

पद्मिनी अय्यर ने तुरंत टिप्पणी की: “भारत में ऐसी घड़ी घर में लगा दी जाए तो तीसरे दिन परिवार पूछेगा, इसको बंद करने का बटन कहां है?” लेकिन यहां कोयल संस्कृति है। हमारी घड़ियां कभी-कभी देर से चलती हैं। यहां तो कोयल भी वक्त की पाबंद है। जर्मन अनुशासन ने आखिरकार पक्षियों को भी पकड़ लिया! यहां घड़ी सिर्फ समय नहीं बताती। वह कहानी सुनाती है और साथ में एक अच्छा-खासा स्मृति-चिह्न भी बेच देती है।

फिर आया ट्राइबर्ग। झरने का गिरता पानी, हरी पहाड़ियां और घुमावदार रास्ते ऐसा मंज़र बनाते हैं कि कैमरा खुद जेब से बाहर निकलना चाहता है। पहले झरना देखिए। फिर फोटो खींचिए। फिर फोटो में खुद को देखिए। और उसके बाद वह ऐतिहासिक वाक्य आता है: “एक फोटो और!”

हमारी इस यूरोपीय यात्रा में “एक फोटो और” शायद दूसरे नंबर का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ वाक्य है। पहले नंबर पर है: “अगला टॉयलेट कितनी दूर है?” उसके बाद खाने में क्या मिलेगा?

लेकिन कई दिनों की लगातार सैर के बाद हमारे घुटनों ने भी अपनी राय देना शुरू कर दिया था। उन्होंने साफ संदेश दिया: “यात्रा आपकी है, घुटने हमारे हैं!” सो हम वरिष्ठ यात्रियों ने प्रकृति के साथ एक व्यावहारिक समझौता कर लिया। जितना आराम से देख सकते हैं, उतना ही काफी है। हर झरने पर विजय प्राप्त करना जरूरी नहीं। हर पहाड़ी पर चढ़ना जरूरी नहीं। कभी-कभी दूर खड़े होकर प्रकृति की खूबसूरती का लुत्फ लेना भी काफी होता है। उम्र एक बड़ी बात सिखाती है: हर जगह पहुंचना जरूरी नहीं। जहां पहुंच जाएं, वहां खुश रहना जरूरी है।

जंगल में कढ़ी-खिचड़ी और असली ब्लैक फॉरेस्ट केक

और फिर आया दिन का सबसे अहम अध्याय: लंच! ब्लैक फॉरेस्ट के बीच निलेश देसाई ने अपने रेस्तरां में हमारा स्वागत किया। और फिर ऐसा खाना सामने आया कि जर्मनी में अचानक घर की खुशबू महसूस होने लगी।

दही वड़ा। आलू टिक्की। कढ़ी। खिचड़ी। और साथ में असली ब्लैक फॉरेस्ट केक: चेरी और क्रीम से बना वह मशहूर केक, जिसकी जड़ें इसी इलाके से जुड़ी हैं। हमने ब्लैक फॉरेस्ट के नाम पर दुनिया भर में बहुत केक खाए हैं। लेकिन असली ब्लैक फॉरेस्ट के बीच बैठकर ब्लैक फॉरेस्ट केक खाना एक बेहद लज़ीज़ इत्तेफाक था।

जंगल जर्मन था। खाना हिंदुस्तानी था। और हमारे पेट को इस सांस्कृतिक मेल-मिलाप से कोई शिकायत नहीं थी। धन्यवाद, लेडी मार्था! कहते हैं, प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है। हमारे मामले में कढ़ी और खिचड़ी ने तो दिल तक जाने के लिए एक्सप्रेसवे पकड़ लिया। विदेश यात्रा में शाकाहारी पर्यटक के लिए खाना भी अपने आप में एक पर्यटन स्थल बन जाता है। आप महल देखने निकलते हैं। संग्रहालय देखते हैं। झरने खोजते हैं। लेकिन आखिर में पेट ही यात्रा का कार्यक्रम तय करने लगता है।

श्वार्ज़वाल्ड में राधे-राधे की गूंज और खामोशी की दौलत

सुबह बस में गीता जी के भजन और “राधे-राधे” की गूंज अभी भी कानों में थी। एक तरफ ब्रज की राधा थीं। दूसरी तरफ जर्मनी का श्वार्ज़वाल्ड। भाषा अलग। मौसम अलग। संस्कृति अलग। लेकिन संगीत और प्रकृति में एक खूबसूरत समानता है: उन्हें पासपोर्ट नहीं चाहिए।

अमेरिका से आईं गीता जी जिनकी जड़ें बिहार के भागलपुर में हैं, के भजनों ने हमारी सुबह को आध्यात्मिक रंग दिया था। अब वही बस जंगलों के बीच आगे बढ़ रही थी और प्रकृति जैसे अपनी खामोश इबादत में लगी थी। कहीं नदी बह रही थी। कहीं कोयल घंटे का ऐलान कर रही थी। और हमारे भारतीय पर्यटक दल के भीतर एक बेहद व्यावहारिक सवाल अब भी जिंदा था: “अगला टॉयलेट कितनी दूर है?”

यही तो यूरोप है; आध्यात्मिकता, खूबसूरती और सैनिटेशन: तीनों एक साथ!

इस यूरोपीय सफर में एक बात बार-बार सामने आई है। शहर हमें तेज़ चलना सिखाते हैं। प्रकृति हमें ठहरना सिखाती है। और ब्लैक फॉरेस्ट में ऐसा लगा कि सिर्फ हवा को जल्दी थी। शायद यही इस जंगल का सबसे बड़ा पैगाम है। हर चीज को जल्दबाज़ी में करना जरूरी नहीं। कभी-कभी जिंदगी को पेड़ की तरह खड़ा रहने देना चाहिए।

यहां पेड़ भाषण नहीं देते। पहाड़ अपनी उपलब्धियों की सूची नहीं छापते। नदी सोशल मीडिया पर सेल्फी नहीं डालती। वे बस मौजूद हैं। और आज की शोर-भरी दुनिया में शायद यही सबसे बड़ी दौलत है। खामोशी भी एक ज़ुबान है।

कुछ ही दिन पहले हम एम्स्टर्डम की नहरों के किनारे थे। फिर ब्रसेल्स आया। एक ही दिन में हमारी बस की खिड़की से तीन देश गुजर गए। हीडलबर्ग ने यूरोप का बौद्धिक और रोमानी चेहरा दिखाया। अब ब्लैक फॉरेस्ट यूरोप का एक और चेहरा सामने ला रहा था: उसकी बेपनाह कुदरती खूबसूरती।

नक्शा लगातार बदल रहा था। फोटो लगातार बढ़ रही थीं। सूटकेस में जगह लगातार घट रही थी। लेकिन यादों का खजाना लगातार भर रहा था। अब सवाल यह नहीं था: “यूरोप में और क्या देखना बाकी है?” सवाल यह था: “इतनी सारी यादें घर कैसे ले जाएंगे?”

सूटकेस में कपड़ों के लिए जगह भले कम पड़ जाए। लेकिन दिमाग और दिल में यादों के लिए जगह हमेशा रहती है। सफर जारी है। और हमारी कहानी भी।

Pawan Singh

Pawan Singh

Editor in chief, Taj News Network

pawansingh@tajnews.in

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