आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | गुरुवार, 10 सितंबर 2026, 08:30:00 AM IST

नेता फेल हुए, अब न्यायपालिका का ही सहारा
समाज को आईना दिखाने लगे जज
राजनीति की जड़ता ने न्यायपालिका को सामाजिक और पर्यावरणीय चौकीदार बना दिया है | बृज खंडेलवाल द्वारा | 10 सितंबर 2026
प्रमुख अंश (Highlights):
- सामाजिक यथार्थ पर न्यायिक टिप्पणियां: पितृसत्ता, घरेलू हिंसा, दहेज और लिव-इन संबंधों पर अदालतों के कड़े रुख ने राजनीति और कानून की जड़ता के बीच समाज को आईना दिखाया।
- पर्यावरण की चौकीदार बनी अदालतें: यमुना में प्रदूषण, चंबल में अवैध रेत खनन और अरावली के संकट पर सुओ मोटू संज्ञान; कार्यपालिका की विफलता से न्यायपालिका के पाले में आते नदी और जंगल।
- न्यायिक सक्रियता बनाम प्रशासनिक दायित्व: क्या अदालतें हमेशा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या नगर निगमों का काम करेंगी? संस्थागत शून्यता को भरने की सीमाएं और न्यायिक भाषा में संयम का सवाल।
- लोकतांत्रिक संतुलन की बहाली: विधायिका कानून बनाए, कार्यपालिका जवाबदेही से लागू करे; अच्छा लोकतंत्र वह है जहां चुनी हुई संस्थाएं समय पर जागें और अदालती डंडे की नौबत न आए।

बृज खंडेलवाल
अदालतों में आजकल सिर्फ कानून की बातें नहीं होतीं। वहां समाज भी आये दिन कटघरे में खड़ा होता है।
शादी, परिवार, पितृसत्ता, युवा, लिव-इन रिश्ते और महिलाओं की गरिमा पर टिप्पणियां हो रही हैं।
और अब नदियां भी अदालत पहुंच गई हैं।
यमुना से लेकर चंबल और अरावली तक, न्यायपालिका पर्यावरण की प्रहरी बनती दिखाई दे रही है।
ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकारी तंत्र और उसकी इकाइयां सो रही हैं। राजनीति को इन दिनों एक अजीब बीमारी लग गई है: अनुकूलन पक्षाघात।
समाज बदल रहा है। तकनीक बदल रही है। रिश्ते बदल रहे हैं। पर कानून और राजनीति अक्सर वहीं टिके हैं।
युवा अलग ढंग से सोच रहे हैं। महिलाएं अपने अधिकार मांग रही हैं। लिव-इन रिश्ते अब असामान्य नहीं रहे। डिजिटल दुनिया ने निजता की परिभाषा बदल दी है।
हाल के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने घरेलू हिंसा, दहेज, वैवाहिक अत्याचार और सामाजिक दबाव पर कड़ी टिप्पणियां की हैं।
एक मामले में सवाल उठा कि पढ़े-लिखे लोग बहू और उसके परिवार को क्यों अपमानित करते हैं।
दूसरे मामले में यह चिंता सामने आई कि सामाजिक बदनामी के डर से माता-पिता अपनी बेटियों को बार-बार हिंसक वैवाहिक घरों में वापस भेज देते हैं।
एक अन्य फैसले में पितृसत्ता को समाज की गहरी बीमारी के रूप में देखा गया।
लिव-इन संबंधों पर भी अदालत ने बदलते सामाजिक यथार्थ को स्वीकार किया।
यह सब स्वागत योग्य है। आखिर जज भी इसी समाज का हिस्सा हैं।
वे रोज उन परिवारों को देखते हैं, जिनकी पीड़ा अखबारों की सुर्खियां नहीं बनती।
वे देखते हैं कि कानून की किताब के बाहर जिंदगी कितनी बेरहम हो सकती है।
लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है। जज फैसला सुनाएं या समाज को प्रवचन दें? ‘कॉकरोच’ विवाद ने खतरे की घंटी बजाई थी। युवा कार्यकर्ताओं को लेकर ‘कॉकरोच’ और ‘पैरासाइट’ जैसे शब्दों पर विवाद हुआ।
बाद में संदर्भ और स्पष्टीकरण सामने आए। लेकिन सवाल फिर भी खड़ा है।
न्यायाधीश की एक टिप्पणी आम नागरिक की टिप्पणी नहीं होती। उसके पीछे संस्था की पूरी ताकत खड़ी होती है। जज के मुंह से निकला एक वाक्य अगले दिन राष्ट्रीय बहस बन सकता है। इसलिए न्यायिक भाषा में भी संयम जरूरी है। कानून की ताकत को शब्दों की तल्खी की जरूरत नहीं होती।
नदियां, पहाड़ और पर्यावरण की चौकीदार बनी अदालतें
न्यायपालिका का पर्यावरण को लेकर बढ़ता हस्तक्षेप इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। नदियां गंदी हैं। जंगल कट रहे हैं। झीलें गायब हो रही हैं। भूजल नीचे जा रहा है। शहर दम घोंट रहे हैं। सरकारी विभाग फाइलें चला रहे हैं। और अदालतें सवाल पूछ रही हैं।
यमुना प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की सुओ मोटू पहल इसका बड़ा उदाहरण है। मामला केवल एक नदी का नहीं रहा। सवाल साफ पानी और स्वस्थ जीवन के संवैधानिक अधिकार तक पहुंच गया।
चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन हो या राजस्थान की जोजरी-बांडी-लूणी नदी प्रणाली की दुर्दशा, अदालत ने प्रशासन से जवाब मांगा।
अरावली की पहाड़ियों का सवाल भी केवल पहाड़ों की ऊंचाई का मामला नहीं है। वह भूजल, जंगल, जैव-विविधता और भविष्य की पीढ़ियों का सवाल है।
यानी अदालत अब पूछ रही है:
“सरकार जी, आप कर क्या रहे हैं?”
और शायद यही सवाल जनता वर्षों से पूछ रही है।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप जरूरी हो सकता है। कभी-कभी वह जीवनदायी भी होता है। लेकिन क्या अदालतें हमेशा के लिए प्रशासन चलाएंगी? क्या जज प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का काम करेंगे? क्या अदालतें तय करेंगी कि कौन-सी नदी कैसे साफ होगी? क्या हर सरकारी नाकामी का इलाज सुओ मोटू ही होगा?
अदालत सरकार नहीं है। उसे सरकार का काम करने की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए।
व्यवस्था की खाली जगह और संस्थागत संतुलन
असली बीमारी कहीं और है। समस्या उस राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में ज्यादा है, जो समय के साथ बदलने को तैयार नहीं। संसद समय पर कानून नहीं बदलेगी तो अदालत को बोलना पड़ेगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड काम नहीं करेगा तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।
नगर निगम नालियां और नदियां बचाने में नाकाम रहेगा तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
सरकार महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करेगी तो न्यायपालिका से उम्मीद की जाएगी।
जब व्यवस्था खाली जगह छोड़ती है, कोई न कोई उसे भरता है।
आज वह जगह न्यायपालिका भर रही है।
लेकिन यह स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकती।
लोकतंत्र में संस्थाओं की अपनी सीमा
लोकतंत्र में सबका अपना काम है।
संसद का काम है कानून बनाना।
सरकार का काम है उन्हें लागू करना।
प्रशासन का काम है व्यवस्था चलाना।
नियामक संस्थाओं का काम है नियम लागू करवाना।
नगर निकायों का काम है शहर और जलस्रोत बचाना।
और अदालत का काम है संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना।
अगर हर संस्था दूसरे का काम करने लगे तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ेगा।
जज समाज का विवेक जरूर बन सकते हैं। लेकिन उन्हें समाज का प्रबंधक बनने की जरूरत नहीं। वे आईना दिखा सकते हैं। आईने को खुद चेहरा बनने की जरूरत नहीं।
न्यायपालिका को चुप कराने की जरूरत नहीं है। हाल के न्यायिक हस्तक्षेपों से घबराने की जरूरत नहीं है। बल्कि उन्हें गंभीरता से समझने की जरूरत है।
अदालतें हमें हमारी कमियां दिखा रही हैं।
सवाल यह नहीं कि जज बोल क्यों रहे हैं।
सवाल यह है कि बाकी लोग चुप क्यों हैं?
राजनीति को जगाना ही असली समाधान
न्यायपालिका को चुप कराना समाधान नहीं है।
राजनीति को जगाना समाधान है।
संसद को समाज की बदलती जरूरतों को समझना होगा।
सरकारों को अदालत के आदेश का इंतजार करना बंद करना होगा।
प्रशासन को हर संकट में न्यायिक डंडे की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
और राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि चुनाव केवल सत्ता पाने का रास्ता नहीं है।
वह समाज के बदलते सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी भी है।
भारत को कानूनों की कमी नहीं है।
कमी है संस्थागत कल्पनाशीलता की।
कमी है समय पर निर्णय लेने की।
कमी है जवाबदेही की।
कमी है बदलती दुनिया को स्वीकार करने की।
इसलिए आज की अदालतें एक बड़ा संदेश दे रही हैं। जब समाज बदलता है और राजनीति नहीं बदलती, न्यायपालिका आगे आती है।
जब संस्थाएं अपना काम नहीं करतीं, न्यायपालिका दरवाजा खटखटाती है।
यह उसकी ताकत भी है। और हमारे लोकतंत्र की कमजोरी का प्रमाण भी।
अच्छा लोकतंत्र वह नहीं है जिसमें जज बार-बार समाज को बचाने निकलें।
अच्छा लोकतंत्र वह है जिसमें चुनी हुई संस्थाएं अपना काम समय पर करें।
ताकि अदालत को हर बार कहना न पड़े:
“सरकार जी, अब तो जागिए!”
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Thakur Pawan Singh
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