जनरेशन ज़ेड के आंदोलन पर मनुवादी एजेंडे का हमला : विक्रम सिंह

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आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | बुधवार, 2 सितंबर 2026, 03:30:00 AM IST

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जनरेशन ज़ेड के आंदोलन पर मनुवादी एजेंडे का हमला

(आलेख : विक्रम सिंह)

प्रमुख अंश (Highlights):

  • जेन-ज़ी की समावेशी ताकत: शिक्षा, रोजगार और व्यवस्थागत जवाबदेही को लेकर उभरे छात्र आंदोलन के सामने सत्ता तंत्र की बेचैनी का यथार्थ।
  • आरक्षण विरोधी कृत्रिम नैरेटिव: युवाओं की साझी एकता को खंडित करने के लिए सोशल मीडिया पर प्रायोजित ‘आरक्षण हटाओ’ अभियानों के पीछे छिपे सामंती मंसूबे।
  • सामाजिक बराबरी बनाम गरीबी उन्मूलन: आरक्षण का मूल उद्देश्य आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक गैर-बराबरी व जातिगत भेदभाव को मिटाकर प्रतिनिधित्व देना।
  • जातिगत उत्पीड़न का कड़वा सच: मलिहाबाद विधायक जय देवी कौशल के मंदिर भेदभाव से लेकर न्यायपालिका तक में जातिगत पूर्वाग्रहों की ज्वलंत मिसालें।

यह सुखद है कि हमारे देश में एक बार फिर शिक्षा और रोजगार पर चर्चा हो रही है। न चाहते हुए भी तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया को शिक्षा के सवाल पर चर्चा करनी पड़ रही है। इसका श्रेय देश के छात्रों और नौजवानों के आंदोलन को जाता है, जिसने देश के पूर्व शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान जी को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। ‘जेन-ज़ी’ के इस आंदोलन के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। इसलिए इस लेख का मकसद इस आंदोलन का विवरण प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि यह चर्चा करना है कि इस आंदोलन से अर्जित युवाओं की एकता और उनकी संघर्षशील जनवादी चेतना को किस तरह सामंती तरीके से पीछे धकेलने की कोशिश की जा रही है।

व्यवस्थागत संकट के परिणामस्वरूप देश की शिक्षा व्यवस्था की बिगड़ती हालत से निराश, हताश और क्रोधित छात्रों तथा रोजगार के लिए लगातार फॉर्म भरते हुए, बेइंतहा बेरोजगारी से जूझ रहे नौजवानो के गुस्से से उपजा यह आंदोलन जायज तौर पर सरकार की तरफ से जवाबदेही की मांग कर रहा था और इसमें सफल भी हुआ।

लेकिन इसने पूरी शिक्षा व्यवस्था पर बहस की शुरुआत कर दी है। सरकार को इससे खतरा महसूस होने लगा है, क्योंकि यह कुछ बुनियादी सवालों को एक नई भाषा में उठा रहा है, जिनका कोई प्रभावी जवाब संघ परिवार के पास नहीं है। इतना ही नहीं, आंदोलन यहीं रुक नहीं गया। इसके बाद देश के कई स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर भी आंदोलन शुरू हो गए। आंदोलनों की जीत ने लोकतंत्र को मजबूत किया है।

भाजपा और आरएसएस ने इस घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लिया है। हालांकि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ और ‘जेन-ज़ी’ का यह आंदोलन पूंजीवादी व्यवस्था पर न तो सवाल खड़ा करता है और न ही उसे बदलने की मंशा जाहिर करता है, फिर भी यह आरएसएस के एजेंडे के लिए घातक है।

इस पूरे आंदोलन की एक खासियत इसका समावेशी चरित्र भी है। यह आंदोलन हर छात्र और नौजवान का आंदोलन है, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या भाषा से आता हो। देश में मौजूद आक्रामक मनुवादी सोच के खिलाफ लड़कियों ने न केवल इसमें बड़ी तादाद और पूरे जोश के साथ भागीदारी की, बल्कि नेतृत्व भी किया। इस पूरे आंदोलन में उन्हें उनके पहनावे और भाषा के बारे में नसीहत देने वाला कोई नहीं था। जैसे कि ज्यादातर जन आंदोलनों में देखने को मिलता है। दरअसल यह अपने आप में पितृसत्ता और मनुवादी व्यवस्था पर चोट थी।

युवा एकता तोड़ने की कोशिश

लेकिन शासक वर्ग और उसके तौर-तरीके बेहद शातिर होते हैं। एक बार फिर नौजवानों की एकता को तोड़ने के लिए उसी चिर-परिचित मनुवादी हथकंडे का इस्तेमाल किया जा रहा है। जो नौजवान समावेशी और समतामूलक शिक्षा के लिए लड़ रहे थे, उनको मनुवादी आरक्षण विरोधी आंदोलन में झोंकने की कोशिश की जा रही है।

तरीका भी अपनाया गया तो ‘जेन-जी’ वाला ही। सीजेपी के तर्ज पर ही ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन (आरएचए)’ आंदोलन शुरू किया गया है। इस आंदोलन में भी युवाओं की भागीदारी है और इसकी प्रमुख मांग आरक्षण को समाप्त करना है। हालांकि यह आंदोलन दावा करता है कि यह सीजेपी के आंदोलन की निरंतरता है, लेकिन इसकी तासीर उससे बिल्कुल विपरीत है। इस आंदोलन ने सामान्य वर्ग के छात्रों के बीच आरक्षण के खिलाफ गुस्से को एक ऐसे इंस्टाग्राम पेज की शैली में संगठित करने की कोशिश की, जो कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) जैसा दिखता था।

इस अभियान के इंस्टाग्राम पेज के 56 लाख फॉलोअर्स है। 21 अगस्त को इसने दिल्ली के जंतर मंतर पर आरक्षण विरोधी आंदोलन आयोजित किया, जिसे सीजेपी के पहले आंदोलन की तर्ज पर इसे भी अनिश्चितकालीन आंदोलन में बदलने की कोशिश की गई। शुरुआत में काफी संख्या में लोग जुटे, लेकिन धीरे-धीरे इसका प्रभाव कम हो होता गया। दरअसल, इसमें शामिल संगठनों और इसकी लामबंदी के तौर-तरीकों पर एक नजर डालें, तो इसके मकसद को समझना काफी आसान हो जाता है।

आरक्षण-विरोध का नया चेहरा

जब सीजेपी का आंदोलन चल ही रहा था, उसी समय हर्ष दुबे नामक युवा ने ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन (आरएचए)’ का अकाउंट बनाया था। बकौल हर्ष दुबे, धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे यानि छात्रों एवं नौजवानों के आंदोलन की जीत के बाद, उन्होंने इस अकाउंट का नियंत्रण आरक्षण विरोधी और सामान्य वर्ग के नेताओं अनुराधा तिवारी, अजीत भारती और नेहा दास को सौंप दिया। इस आंदोलन में ज्यादातर लामबंदी करणी सेना, रणवीर सेना और काली सेना ने की। ये सभी तथाकथित संगठन अपने दलित और आदिवासी विरोधी चरित्र तथा इन दबे कुचले तबकों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए कुख्यात रहे है।

शुरुआत में इस आंदोलन ने पाँच मुख्य मांगे सामने रखी थी, जो मोटे तौर पर इस प्रकार थीं :

आय आधारित आरक्षण : केवल जाति के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक जरूरत के आधार पर सहायता सुनिश्चित की जाए।
एक परिवार, एक आरक्षण, एक बार : एक परिवार के केवल एक सदस्य को जीवन में एक बार, शिक्षा या नौकरी में, आरक्षण मिले。
सभी के लिए न्यूनतम मानक : सभी के लिए न्यूनतम योग्यता अंक निर्धारित हों। यदि सीटें खाली रह जाती हैं, तो उन्हें सामान्य वर्ग में स्थानांतरित किया जाए, लेकिन मेरिट से समझौता न किया जाए।
आरक्षण की राजनीति बंद हो : वोटों के लिए 50% की सीमा से आगे आरक्षण न बढ़ाया जाए। हर 10 वर्ष में इसकी समीक्षा की जाए।
आरक्षण समाप्ति का प्रावधान : शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय की जाए, ताकि भविष्य में आरक्षण की आवश्यकता समाप्त हो सके।

सार रूप में, इस आंदोलन का मकसद स्कूलों और सरकारी नौकरियों में जाति आधारित आरक्षण ख़त्म कर आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू लागू करना है।

समता के चोले में सामाजिक न्याय पर हमला

गौर तलब है कि सामाजिक न्याय के खिलाफ चलने वाले लगभग सभी आंदोलनों की एक खासियत है कि वे समता का चोला ओढ़कर सामने आते है और इसके लिए बी.आर. आंबेडकर का भी सहारा लेने से नहीं चूकते। इस आंदोलन में भी यही प्रयास दिखाई देता है। जाति आधारित आरक्षण को भेदभावपूर्ण व्यवस्था साबित करने की कोशिश की गई है और आर्थिक आरक्षण को न्याय के तौर पर पेश किया गया है।

मजेदार बात है यह कि ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के अकाउंट के बायो में बी.आर. आंबेडकर की प्रसिद्ध पंक्ति लिखी थी, “शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो” हालांकि बाद में इसे हटा दिया गया। ऐसा दिखावा किया गया था कि यही विचार उस अभियान को दिशा दे रहा था।

लेकिन यह सोचना भी मुश्किल है कि इस पंक्ति के असली मतलब को इससे ज़्यादा उलटे तरीके से कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है। आंबेडकर ने यह संदेश उन्हीं समुदायों को दिया था, जिनके सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर की दिशा में आरक्षण की व्यवस्था एक महत्वपूर्ण संवैधानिक उपाय है। उनका उद्देश्य था कि वे एकजुट होकर अपनी सामूहिक ताकत बनाएँ और उस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करें, जो पहले से ही उनके लिए असमान और अन्यायपूर्ण थी।

हालांकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह आंदोलन पूरी तरह कुछ सामान्य वर्ग के लोगों की मांगों तक सीमित हो चुका है। आंदोलन ने अपना नाम भी बदल दिया है और अब यह “आरक्षण सुधार आंदोलन” हो गया है। इस आंदोलन ने 25 अगस्त 2026, को एक बार फिर अपनी बदली हुई मांगों की एक सूची जारी की। इसमें सामान्य वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाने, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 2026 के जातिगत समानता से जुड़े नियमों को पूरी तरह वापस लेने और अजा/जजा (अत्याचार निवारण) अधिनियम की समीक्षा करने की मांग शामिल है। इस समीक्षा में गंभीर अपराध को छोड़कर अन्य मामलों में शुरुआती जांच, जमानत और झूठे मामलों से सुरक्षा जैसे प्रावधानों की मांग की गई है।

दिल्ली के जंतर-मंतर में 21 अगस्त को जब आरक्षण हटाओ आंदोलन शुरू हो रहा था, ठीक उसी समय मलिहाबाद से बीजेपी विधायक जय देवी कौशल अंग्रेजी के अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में शीतला मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य के लिए भूमि पूजन और शिलान्यास समारोह के दौरान अपने साथ हुए जातिगत भेदभाव की आपबीती बता रही थी। उनके शब्दों में “पुजारी ने मुझे ईंट को छूने या रोली लगाने तक की इजाज़त नहीं दी। यह जाति-भेदभाव के अलावा और कुछ नहीं था, क्योंकि मैं एक पासी दलित हूँ।” गौरतलब है कि जय देवी कौशल मलिहाबाद से वर्तमान विधायक हैं और भाजपा के दो बार सांसद तथा भूतपूर्व मंत्री कौशल किशोर की पत्नी हैं। यह विडंबना ही है कि जब एक चुनी हुई विधायक, वह भी भाजपा से चुनी हुई, को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, तो आरक्षण की आवश्यकता पर सवाल उठाने का औचित्य ही क्या है।

कोच्चि इंटरनेशनल फाउंडेशन और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज द्वारा आयोजित एक व्याख्यान में सेवानिवृत्त न्यायाधीश डॉ. एस. मुरलीधर ने “परिवर्तनकारी संवैधानिकता और न्यायपालिका की भूमिका” विषय पर बोलते हुए बताया कि इलाहाबाद के एक जज ने अपने चैम्बर को गंगाजल से इसलिए धुलवाया, क्योंकि पहले वहां बैठने वाला व्यक्ति दलित था। यही हमारे भारत की जिंदगी की कड़ी सच्चाई है। हमारा समाज ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जो समय-समय पर हमारे सामने आते रहते हैं।

इस आंदोलन की ऊपर बताई गई सभी मांगे खोखली है और एक असमानता पर आधारित समाज में कितनी अन्यायपूर्ण है, इस पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है। लेकिन यहां चर्चा का मकसद यह समझना और सामने लाना है कि नौजवानों को आरक्षण के खिलाफ खड़ा करने के पीछे की असली साजिश क्या है।

आरक्षण नहीं, बेरोजगारी है असली सवाल

यहां इस बात पर जोर देने की आवश्यकता है कि जो नौजवान इस आंदोलन में आएं हैं, वे गलत नहीं हैं। उनके प्रति सहानुभूति रखने और उनकी वास्तविक समस्याओं को समझने की जरूरत है, क्योंकि इनमे से ज्यादातर बेरोजगार है और इस व्यवस्था के शिकार हैं। इस सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा अपनाई गई नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का रास्ता न केवल बेरोजगारों की एक बड़ी फौज पैदा करता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को लगातार बने रहने वाले आर्थिक संकट की ओर भी धकेलता है। इसका असर औद्योगिक विकास पर तो पड़ा ही है, कृषि क्षेत्र भी लगातार संकट का सामना कर रहा है।

शुरुआत में हरित क्रांति से किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि आई। लेकिन वैश्वीकरण के बाद पिछले कुछ दशकों में खेती से पर्याप्त आमदनी न होने के कारण पारंपरिक रूप से प्रभावशाली और जमीन के मालिक जातियों को भी आर्थिक नुकसान हुआ। अब यही समुदाय आरक्षण की नीतियों में अपने लिए हिस्सेदारी सुनिश्चित कराने के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

इस समस्या को भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में हुए बड़े बदलावों और बेरोजगारी के संकट के संदर्भ में समझना चाहिए। इन परिस्थितियों के कारण यह धारणा मजबूत हुई है कि आरक्षण का मतलब सीधे नौकरी और रोजगार मिलना है। इस सोच में देश के व्यापक आर्थिक संकट और बेरोजगारी की वास्तविक समस्या को नजरअंदाज कर दिया जाता है। बेरोजगार परिवारों को ऐसा बताया जा रहा है कि उनकी बदहाली के लिए जिम्मेवार आरक्षण है, न कि पूंजीवादी व्यवस्था की विफलता। नौजवानों के सामने ऐसा छलावा पेश किया जा रहा है, मानो आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलने से सबकी गरीबी दूर हो जाएगी।

आरक्षण का सवाल: गरीबी नहीं, सामाजिक बराबरी

आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, जिसका मकसद व्यक्तियों या परिवारों की गरीबी हटाना है। इसके लिए कोई उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है कि आरक्षण से आर्थिक फायदा तो वंचित जातियों को मिल जाता है, परन्तु सामाजिक बराबरी के लिए एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। क्या हम जानते नहीं कि उच्च पदों पर काम कर रहे दलितों के प्रति उनके अधीनस्थों में अनेकों जातीय पूर्वाग्रह होते है? देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में आर्थिक तौर से अच्छे दलित छात्रों और अध्यापकों को भी जातीय भेदभाव शिकार होना पड़ता है।

ऐतिहासिक रूप से आरक्षण का मक़सद ऐतिहासिक भेदभाव से उत्पन्न होने वाले सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन और गैर-बराबरी को दूर करते हुए एक समानतामूलक समाज का निर्माण करना रहा है। हमारे देश में यह भेदभाव व्यक्तियों नहीं, बल्कि जाति रूपी सामाजिक समूहों के साथ हुआ है, इसलिए व्यक्ति की सामाजिक पहचान में उसकी जाति की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। इसी कारण गैर-बराबरी और सामाजिक शोषण को खत्म करने के उपायों में आरक्षण के लाभार्थियों की पहचान जाति के आधार पर की जाती है।

अगर हम किसी कानूनी प्रावधान के पीछे के दर्शन को नहीं समझतें हैं और केवल उसके तकनीकी पक्ष और प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण को ही तरजीह देते है, तो इससे शासक वर्ग के लिए कानून में हेरफेर करने और उसे अपने हित में इस्तेमाल करने की गुंजाइश पैदा होती है। इसका उदाहरण प्रभावशाली जातियों — जैसे मराठा या जाट — द्वारा अलग से आरक्षण की मांग तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर आरक्षण की मांगों में भी देखा जा सकता है।

मनुवादी राजनीति के खिलाफ युवा एकता

यह एक खतरनाक साजिश है, जिसमें देश में नौजवानों के उभरते आंदोलन को सत्ता पक्ष न केवल तोडना चाहता है, बल्कि उसे एक प्रतिगामी दिशा की ओर भी धकेलना चाहता है। इस पूरे आंदोलन को एक नए जन-आंदोलन के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है। आरक्षण विरोधी नौजवानों का यह कृत्रिम आंदोलन उसी पुरानी मनुवादी सोच और साजिश का वर्तमान परिस्थितियों में प्रयोग है जिसे देश की जनता ने कई बार ठुकराया है। हमारे देश में आरक्षण विरोधी आंदोलनों का एक खूनी इतिहास रहा है। इन आंदोलनों ने न केवल सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को समय-समय पर पीछे धकेला है, बल्कि समाज में गहरी नफरत और विभाजन की दरारें भी पैदा की हैं।

देश की युवा पीढ़ी, जनरेशन जेड को इस मनुवादी एजेंडे को न केवल पहचानना होगा, बल्कि अपनी मुद्दा आधारित एकता के जरिए इसे हराना भी होगा। किसी भी विकासशील समाज में नौजवानों को प्रगतिशील मूल्यों की पहचान बनना चाहिए, न कि प्रतिगामी मूल्यों का वाहक।

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Vikram Singh
विक्रम सिंह
संयुक्त सचिव
अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन
अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन (AIAWU) के संयुक्त सचिव और प्रखर वामपंथी चिंतक विक्रम सिंह (संपर्क: 94184 84418) देश के छात्र-युवा आंदोलनों, कृषि श्रमिकों के अधिकारों, सामाजिक न्याय, जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष और समकालीन राजनीतिक-आर्थिक नीतियों पर निरंतर वैचारिक व शोधपरक लेखन करते हैं।

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