कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक के नेतृत्व में CSJMU ने बदली कार्यसंस्कृति, तकनीक, शोध और नैक A++ से वैश्विक पहचान तक का सफर
Agra Desk, 🌐 tajnews.in | Friday, 14 August, 2026, 4:24:00 PM IST.

tajnews.in | एक समय था, जब देश में शिक्षा की उत्कृष्टता के लिए पटना विश्वविद्यालय, कलकत्ता और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम लिये जाते थे, अकादमिक प्रतिष्ठा और बौद्धिक प्रभाव के लिए यही पूरे देश में प्रसिद्ध थे। लेकिन समय के साथ प्रशासनिक जड़ता, परीक्षा व्यवस्था की कठिनाइयों, संसाधनों की कमी, शोध की धीमी गति और बदलती शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढाल न पाने जैसी चुनौतियों से जूझने लगे। और आज, इनका नाम कोई नहीं गिनाता। पिछले दिनों एक खबर आई कि कानपुर के छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) ने अपनी वैश्विक रैंकिंग में जबरदस्त सुधार किया है और विदेशी छात्रों की संख्या कई गुना बढ़ गई है।
तो एक बार फिर इस विश्वविद्यालय पर नजर पड़ गई। कभी सामान्यतः ‘कानपुर विश्वविद्यालय’ के नाम से पहचाना जाने वाला यह विश्वविद्यालय भी लंबे समय तक अपनी विशाल संबद्धता, परीक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण जड़ता और उतार के दौर से रूबरू था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस विश्वविद्यालय ने जिस तरह अपनी कार्यसंस्कृति, तकनीकी व्यवस्था, शैक्षणिक दृष्टिकोण और शोध संस्कृति में परिवर्तन किया है, उसने इसे देश के प्रमुख राज्य विश्वविद्यालयों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया। इस परिवर्तन की कहानी के केंद्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक हैं। उन्होंने 12 अप्रैल 2021 को कुलपति के रूप में कार्यभार संभाला। उनके पास उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, विश्वविद्यालय प्रशासन, शोध, ऑनलाइन शिक्षा और तकनीक आधारित शैक्षणिक व्यवस्था का व्यापक अनुभव रहा है। प्रो. पाठक की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वे केवल किसी एक विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था संभालने वाले शिक्षाविद के रूप में कानपुर नहीं आए थे। उन्होंने अलग-अलग विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में शिक्षक, प्रोफेसर, अधिष्ठाता और कुलपति जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभाए थे। इसलिए उनके पास केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं था, बल्कि विभिन्न प्रकार के विश्वविद्यालयों की वास्तविक चुनौतियों और उनके समाधान का व्यावहारिक अनुभव भी था।

यही अनुभव कानपुर विश्वविद्यालय के कायाकल्प में सबसे महत्वपूर्ण आधार बना। प्रो. पाठक ने विश्वविद्यालय को केवल एक विशाल संबद्ध विश्वविद्यालय के रूप में देखने के बजाय उसे आधुनिक, तकनीक-सक्षम, शोधोन्मुख और विद्यार्थी-केंद्रित विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया। परिवर्तन का केंद्र केवल नई इमारतें या नए पाठ्यक्रम नहीं रहे, बल्कि विश्वविद्यालय की पूरी कार्यप्रणाली को बदलने का प्रयास था। आज छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय की पहचान नैक के ए-प्लस-प्लस (NAAC A++) ग्रेड और यूजीसी (UGC) की श्रेणी-एक विश्वविद्यालय के रूप में होती है। यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नैक का ए-प्लस-प्लस केवल किसी एक विभाग या किसी एक उपलब्धि के आधार पर नहीं मिलता। इसमें शिक्षण, शोध, अधोसंरचना, प्रशासन, विद्यार्थी सुविधाओं, नवाचार, संस्थागत मूल्यों और अनेक शैक्षणिक एवं प्रशासनिक मानकों का समग्र मूल्यांकन होता है। यह उपलब्धि केवल किसी एक परीक्षा या मूल्यांकन की सफलता नहीं, बल्कि पिछले वर्षों में हुए व्यापक संस्थागत परिवर्तन का परिणाम है।
कानपुर विश्वविद्यालय के इस परिवर्तन को समझने के लिए चार क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, भविष्य की शिक्षा, रोजगारपरक पाठ्यक्रम, शोध और परीक्षा व्यवस्था। इन चारों को प्रो. पाठक की कार्यशैली में अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए हिस्सों के रूप में देखा जा सकता है। आज का विश्वविद्यालय केवल पारंपरिक डिग्री देने वाला संस्थान नहीं रह सकता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, आंकड़ा विज्ञान, डिजिटल तकनीक और नई अर्थव्यवस्था के उभरते क्षेत्रों ने उच्च शिक्षा की दिशा बदल दी है। छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय ने इन बदलती आवश्यकताओं को समझते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई तकनीकों को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की पहल की है। विश्वविद्यालय के विभिन्न दस्तावेजों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अध्ययन, उच्च क्षमता वाली संगणना व्यवस्था तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग से संबंधित शोध सुविधाओं के विकास का उल्लेख मिलता है। यह पहल इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि तकनीकी शिक्षा को केवल कंप्यूटर से जुड़े विषयों तक सीमित रखने के बजाय विद्यार्थियों की व्यापक शैक्षणिक तैयारी का हिस्सा बनाया जा रहा है।
प्रो. पाठक की तकनीकी पृष्ठभूमि यहां विशेष रूप से उपयोगी दिखाई देती है। उन्होंने तकनीक को केवल एक विषय के रूप में नहीं देखा, बल्कि विश्वविद्यालय के प्रशासन, शिक्षा और शोध को अधिक प्रभावी बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसी सोच का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है रोजगारपरक शिक्षा। आज किसी विश्वविद्यालय की गुणवत्ता का वास्तविक परीक्षण केवल इस बात से नहीं होता कि वह कितने विद्यार्थियों को डिग्री देता है, बल्कि इस बात से भी होता है कि उसके विद्यार्थी शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार और जीवन की वास्तविक चुनौतियों के लिए कितने तैयार हैं।
छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय में व्यावसायिक एवं कौशल आधारित शिक्षा पर जोर रखा गया। विभिन्न विषयों के साथ रोजगारपरक प्रशिक्षण को जोड़ने, विद्यार्थियों को नई तकनीकों से परिचित कराने और उद्योग जगत की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा को विकसित करने का प्रयास किया गया। यह बदलाव केवल रोजगार के आंकड़ों का विषय नहीं है। इसके पीछे विश्वविद्यालय की उस बदलती सोच को देखा जा सकता है जिसमें शिक्षा को रोजगार, कौशल और आत्मनिर्भरता से जोड़ने का प्रयास किया गया है। इसी क्रम में परीक्षा व्यवस्था का परिवर्तन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बड़े संबद्ध विश्वविद्यालयों की सबसे जटिल चुनौतियों में परीक्षा और परिणाम व्यवस्था होती है। लाखों विद्यार्थियों, सैकड़ों महाविद्यालयों, हजारों उत्तर पुस्तिकाओं और विशाल प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच समय पर परीक्षा कराना और परिणाम घोषित करना किसी भी विश्वविद्यालय के लिए बड़ी चुनौती है। विश्वविद्यालय ने परीक्षा प्रक्रिया को तकनीक आधारित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए।
उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल मूल्यांकन, परीक्षा प्रक्रिया के स्वचालन और ऑनलाइन विद्यार्थी सेवाओं ने पूरी व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने में सहायता की। प्रशासन के डिजिटलीकरण ने विश्वविद्यालय की कार्यशैली को बदलने में भी बड़ी भूमिका निभाई। विश्वविद्यालय के परिवर्तन संबंधी प्रकाशित अध्ययन के अनुसार बड़ी संख्या में पुराने दस्तावेजों का डिजिटलीकरण किया गया तथा विभिन्न प्रशासनिक और विद्यार्थी सेवाओं के लिए अनेक डिजिटल प्रणालियाँ विकसित की गईं। किसी पुराने और विशाल विश्वविद्यालय के लिए यह परिवर्तन विशेष महत्व रखता है। ऐसे विश्वविद्यालयों की एक बड़ी चुनौती उनकी पुरानी कागजी प्रशासनिक विरासत होती है। कानपुर विश्वविद्यालय ने इस विरासत को केवल समस्या मानकर छोड़ने के बजाय उसे डिजिटल परिवर्तन का आधार बनाने का प्रयास किया।
आज विश्वविद्यालय की एक और बड़ी पहचान उसकी बढ़ती शोध संस्कृति है। किसी विश्वविद्यालय को वास्तव में अग्रणी बनाने वाली शक्ति केवल कक्षा में होने वाला शिक्षण नहीं है। मौलिक शोध, शोध के लिए आर्थिक सहायता, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, शोध केंद्र, अंतर-विषयक अध्ययन और प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ सहयोग किसी विश्वविद्यालय की दीर्घकालीन अकादमिक शक्ति का निर्माण करते हैं। विश्वविद्यालय के शोध संबंधी आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार पिछले एक वर्ष में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, जैव प्रौद्योगिकी विभाग, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद उत्तर प्रदेश तथा राष्ट्रीय अनुसंधान प्रतिष्ठान जैसी संस्थाओं से लगभग 3.5 करोड़ रुपये की प्रतिस्पर्धात्मक शोध सहायता प्राप्त हुई। आईआईटी कानपुर के सहयोग से शोध संबंधी महत्वपूर्ण परियोजना भी प्राप्त हुई।
कानपुर की सबसे बड़ी शैक्षणिक शक्तियों में से एक आईआईटी कानपुर की निकटता है। ये संस्थान तो लंबे समय से इसी शहर में है लेकिन उससे सहयोग बढ़ाने के प्रयास प्रो. पाठक ने किया। इस स्थानीय शैक्षणिक शक्ति का उपयोग सहयोग के रूप में करने की दिशा में हुआ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और शोध के क्षेत्र में आईआईटी कानपुर से सहयोग से बिना धन खर्च किए बड़ी कामयाबियों के रास्ते खोल लिये गए। विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थानों के बीच दूरी कम हुई है और विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए एक बड़े शैक्षणिक परिवेश से जुड़ने की संभावना बढ़ी। आज के इस दौर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) का जिक्र किए बिना बात अधूरी रह सकती है, और यहां इसका उल्लेख करना इसलिए भी आवश्यक है कि नीति के सर्वश्रेष्ठ आयामों को अपनाने का प्रयास हुआ है। बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास, व्यावसायिक शिक्षा, नए विषयों का समावेश और विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार अध्ययन के अवसर उपलब्ध कराने पर बखूबी काम हुआ है।
कानपुर विश्वविद्यालय में इन क्षेत्रों को बढ़ावा देना इस बात का संकेत है कि विश्वविद्यालय भविष्य की शिक्षा को केवल पारंपरिक विषयों के आधार पर नहीं देख रहा, बल्कि बदलती सामाजिक और आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को तैयार कर रहा है। असल में, असली कहानी उस मानसिकता के परिवर्तन की है जिसके माध्यम से विश्वविद्यालय ने अपने पुराने ढर्रे से बाहर निकलने की कोशिश की।
एक समय विश्वविद्यालय की विशालता स्वयं उसकी चुनौती थी, और आज विश्वविद्यालय प्रशासन के कुशल प्रबंधन की वजह से यह भी एक उपलब्धि है।
और, यही कारण हैं कि प्रो. विनय कुमार पाठक के नेतृत्व का मूल्यांकन केवल नई योजनाओं की संख्या से नहीं किया जाना चाहिए। उनके नेतृत्व का वास्तविक महत्व इस बात में है कि उन्होंने अपने तकनीकी ज्ञान और लंबे प्रशासनिक अनुभव को एक साथ जोड़कर विश्वविद्यालय की जटिल समस्याओं के लिए तकनीक आधारित समाधान विकसित करने की कोशिश की, और यह योजनाएं कागजों में नहीं, अस्तित्व पा गईं। कानपुर विश्वविद्यालय का यह सफर केवल एक विश्वविद्यालय के बदलने की कहानी नहीं है। यह इस बात का उदाहरण है कि विरासत के साथ आधुनिक सोच, तकनीक के साथ मानवीय दृष्टिकोण, शिक्षा के साथ रोजगार, और ज्ञान के साथ शोध को जोड़ दिया जाए तो एक पुराना विश्वविद्यालय भी नई ऊंचाई की ओर बढ़ सकता है।
यही छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय की वर्तमान यात्रा की सबसे उल्लेखनीय विशेषता है। इस आलेख का समापन इस बात के जिक्र के बिना अधूरा होगा कि कैसे प्रो. पाठक ने शिक्षा में फैले माफिया को खत्म किया और कैसे उनके खिलाफ साजिश हुईं। वो फिर भी अडिग हैं, अपने संकल्पों पर चल रहे हैं… शिक्षा ही समाज का आधार होती है, यह समझते हुए हमें उनका हौसला बढ़ाना चाहिए।
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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