गटर किसने खोलीं? फिल्म बनेगी: कॉकरोचों का इंतकाम
— बृज खंडेलवाल (28 जुलाई 2026)
देश की राजधानी दिल्ली में फिर वही पुराना और जाना-पहचाना मौसम लौट आया है। नहीं, यह कोई प्राकृतिक मानसूनी बरसात का मौसम नहीं है और न ही संसद के किसी औपचारिक सत्र का। यह दरअसल भारतीय राजनीति में कूटनीतिक और असंवैधानिक रूप से सियासी केंचुल बदलने का मौसम है। हमारे देश के कई राजनेता अपने बुनियादी उसूलों को किसी ज़हरीले साँप से भी ज़्यादा तेज़ी से बदल रहे हैं। राजनीतिक दलों के गठबंधन कागज़ों पर स्याही सूखने से पहले ही बिखर रहे हैं। हफ़्तों से जारी बड़े-बड़े धरने और आंदोलन पलक झपकते ही समेटे जा रहे हैं। कल तक जो इंक़लाबी हुंकार सड़कों पर गूँज रही थी, वह आज शाम होते-होते महज़ एक ढुलमुल प्रेस कॉन्फ़्रेंस बनकर रह जाती है, और आज का तीव्र जन-आक्रोश कल सुबह किसी मंत्री के प्रतीकात्मक इस्तीफे पर जाकर ख़त्म हो जाता है।
राजनीतिक ड्रामा की ताज़ा ब्लॉकबस्टर भी बिल्कुल सही वक़्त पर जनता के सामने आ गई है। एक बहुप्रचारित इस्तीफा, कुछ नाटकीय और सनसनीखेज ऐलान, सोशल मीडिया के मंचों पर शानदार डिजिटल तमाशा, और देखते ही देखते ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने अपनी ऐतिहासिक जीत का ढोल पीटते हुए ऐलान कर दिया। जंतर-मंतर से आनन-फानन में बड़े-बड़े बैनर समेटे गए, लाउडस्पीकर बंद किए गए और सारे प्रदर्शनकारी चुपचाप अपने-अपने घर लौट गए—मानो एक ही झटके में देश के इतिहास की दिशा ही बदल गई हो!
और हाँ… इस पूरे हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच में ‘गाजर’ भी आई। एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार! जब किसी नवगठित राजनीतिक दल के नेताजी इंस्टाग्राम पर सीधे लाइव आकर हाथ में गाजर लहराते हुए देश के युवाओं से बड़ी-बड़ी बातें करने लगें, तो समझ लीजिए कि भारतीय राजनीति अब उस अनोखे और हास्यास्पद मोड़ पर पहुँच चुकी है, जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने भी कभी नहीं की होगी। देश के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री उस गाजर में कोई गुप्त आर्थिक संदेश ढूँढ़ते रह गए। समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक उसके दार्शनिक मायने तलाशते रहे। हमारे सीधे-सादे किसान सोचने लगे कि क्या अब गाजर भी कोई नई राजनीतिक विचारधारा बन चुकी है। वहीं दूसरी ओर, डिजिटल मीडिया के मीम बनाने वालों ने तो उस गाजर को सीधे केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री ही घोषित कर दिया।
इसी बीच चर्चित किरदार डिचकॉक ने अपनी अगली नई फ़िल्म का ज़ोरदार ऐलान कर दिया है—”कॉकरोच फिर लौटेंगे!” दुनिया भर के वैज्ञानिक आज भी इस अनोखी कॉकरोच पार्टी की अद्भुत क्षमता पर हैरान हैं। कोई भयानक परमाणु बम किसी बड़े शहर को नक्शे से मिटा सकता है, भीषण बाढ़ बड़े-बड़े पुलों को बहा सकती है, और चुनावी नतीजे सरकारें गिरा सकते हैं। लेकिन राजनीतिक तिलचट्टे हर बार मुस्कुराते हुए गटर के ढक्कन उठाकर वापस आ जाते हैं! उनके एक हाथ में इस्तीफे की कड़क माँग होती है, तो दूसरे हाथ में भविष्य के सत्ताधारी गठबंधन का गुलदस्ता। इतनी ज़बरदस्त अनुकूलन क्षमता (Adaptability) तो शायद विकासवाद का सिद्धांत देने वाले महान वैज्ञानिक डार्विन ने भी नहीं सोची होगी।
हमारा सत्ता पक्ष उस निरंकुश स्कूल के हेडमास्टर जैसा व्यवहार करता है, जिसे मुग़ालता रहता है कि सुबह का सूरज भी उसकी विधिक इजाज़त लेकर ही आसमान में निकलता है। देश की हर छोटी-बड़ी उपलब्धि केवल उसके दूरदर्शी नेतृत्व का कमाल है, जबकि जनता की हर वाजिब आलोचना एक बहुत बड़ी विदेशी साज़िश। और जो नागरिक या पत्रकार ज़रा ज़्यादा सवाल पूछ ले, उसे विकास-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी या हालात और ख़राब हुए तो ‘गाजर-विरोधी’ भी विधिक रूप से घोषित किया जा सकता है।
फिर इसके बाद बारी आती है हमारे विपक्ष की। वे ज़मीन पर चलते नहीं, दौड़ते भी नहीं… बस, कॉकरोचों की तरह सर्र से फिसलकर मौक़ा देखकर निकल लेते हैं। सीजेपी की सबसे बड़ी ताक़त ही यही है—हर परिस्थिति में ज़िंदा रहना! इस हफ़्ते वे टीवी पर दहाड़ेंगे, अगले हफ़्ते बंद कमरों में नूरा-कुश्ती करेंगे, और उसके अगले हफ़्ते लोकतंत्र बचाने का पूरा श्रेय खुद अपने नाम दर्ज करा लेंगे। देश की नई पीढ़ी ने CJP का एक नया और सटीक अर्थ निकाल लिया है। अब इसका मतलब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नहीं, बल्कि ‘सर्टिफाइड जंपर्स पार्टी’ (Certified Jumpers Party) बन चुका है!
ऐसी अवसरवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह कमल, हाथ, झाड़ू, साइकिल या हाथी बिल्कुल नहीं होना चाहिए, बल्कि एक घूमता हुआ दरवाज़ा (Revolving Door) होना चाहिए। इस पार्टी का सदस्य बनने के नियम भी बेहद आसान और सुलभ हैं। किसी विचारधारा या नीति की कोई ज़रूरत नहीं है; सिद्धांत हों तो अच्छा, न हों तो और भी ज़्यादा अच्छा! बस आपके पास एक छोटा-सा बैग, तीन न्यूज़ चैनलों के माइक, भरपूर कृत्रिम नैतिक गुस्सा और एक ऐसी रीढ़ की हड्डी चाहिए जो बिना किसी दर्द के 360 डिग्री आराम से घूम सके। सुना है पार्टी की अपनी ट्रेनिंग अकादमी में कुछ बेहद ख़ास कोर्स भी चलाए जाते हैं—जैसे “अगली सूचना तक धरना कैसे दें”, “यू-टर्न लेने की उन्नत कूटनीतिक कला”, और सबसे लोकप्रिय विषय—”स्कोरबोर्ड पर चाहे कुछ भी लिखा हो, अपनी जीत का ज़ोरदार ऐलान कैसे करें!”
दीक्षांत समारोह में सभी पास होने वाले नेताओं की एक साथ ग्रुप फोटो भी खिंचती है। मुश्किल सिर्फ़ इतनी सी होती है कि अखबारों में फोटो छपने तक उनमें से आधे लोग किसी दूसरी पार्टी की सदस्यता ले चुके होते हैं। आजकल राजनीतिक प्रवक्ताओं की प्रेस कॉन्फ़्रेंस किसी सस्ते रियलिटी शो से कम नहीं लगती। पहला एपिसोड—’लोकतंत्र गंभीर ख़तरे में है’, दूसरा—’लोकतंत्र आखिरकार बच गया’, तीसरा—’सरकार हमारी ऐतिहासिक हुंकार के आगे झुक गई’, चौथा—’हमारा धरना समाप्त होता है’, और पाँचवाँ—’बहुत जल्द मिलेंगे, एक नए आंदोलन के साथ!’ ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स के बड़े-बड़े पटकथा लेखक भी अब शिकायत करने लगे हैं कि भारतीय राजनीति की यह रीयल स्क्रिप्ट उनकी काल्पनिक कहानियों से भी बहुत आगे निकल चुकी है।
हमारे राजनीतिक प्रवक्ता भाषा के सबसे बड़े बाजीगर और जादूगर बन चुके हैं। मैदान से पीछे हटने को वे ‘रणनीतिक जीत’ बताते हैं, साधारण इस्तीफे को ‘नैतिक भूकंप’ का नाम देते हैं, मजबूरी की चुप्पी को ‘गंभीर दूरदर्शिता’ घोषित करते हैं, और अंदरूनी उलझन को एक बहुत बड़ी ‘कूटनीतिक रणनीति’ करार देते हैं। उधर, इस सब तमाशे से हमारे असली जैविक कॉकरोचों ने भी अपनी भारी नाराज़गी जता दी है। ‘राष्ट्रीय कॉकरोच प्रतिष्ठा महासंघ’ ने बाकायदा एक लिखित बयान जारी करके कहा—”हम इंसानी नेताओं से अपनी तुलना किए जाने पर सख़्त एतराज़ दर्ज कराते हैं। हम तो सिर्फ़ इंसानों की रसोई में घुसते हैं, जबकि ये नेता तो टीवी स्टूडियो, वॉट्सऐप ग्रुप, संवैधानिक संस्थाओं और कभी-कभी एक-दूसरे की बनी-बनाई पार्टियों के भीतर ही सीधे घुस जाते हैं!”
शुक्र है कि आज का सोशल मीडिया देश की सबसे बड़ी और निष्पक्ष व्यंग्य पत्रिका बन चुका है। एक छोटा-सा सूटकेस घसीटते कॉकरोच का वायरल मीम चार घंटे की उबाऊ टीवी बहसों से कहीं ज़्यादा ज़मीनी हक़ीक़त बयां कर देता है। एक गाजर वाला इमोजी पूरे हफ़्ते की अवसरवादी राजनीति का कड़वा सच समझा देता है। हमारा लोकतंत्र कोई व्यावसायिक टैलेंट शो नहीं है, जहाँ हर विज्ञापन ब्रेक के बाद कलाकार एक नई आकर्षक पोशाक पहनकर मंच पर लौट आएं। भारत के इस लोकतंत्र को आज ऐसे हुक्मरानों की ज़रूरत है जो जनता के सवालों का पारदर्शी जवाब दें, ऐसे विपक्ष की ज़रूरत है जो अपने सिद्धांतों के पाँव पर मज़बूती से डटा रहे, ऐसे स्वतंत्र पत्रकारों की ज़रूरत है जो सीधे तीखे सवाल पूछ सकें, और ऐसे जागरूक नागरिकों की ज़रूरत है जो नेताओं के हर तालियों के इशारे पर बेवकूफ़ों की तरह ताली न बजाएँ।
वरना हर पाँच साल में होने वाला चुनाव केवल पूरे देश में कीटनाशक (Pesticide) छिड़कने का एक नया और खर्चीला सरकारी कार्यक्रम बनकर रह जाएगा। कीटनाशक का स्प्रे बड़े शोर-शराबे और विज्ञापनों के साथ छिड़का जाएगा… और हमारे ये राजनीतिक कॉकरोच हर बार मुस्कुराते हुए गटर से बाहर लौट आएँगे। तो आख़िर ये गटर की नालियाँ किसने खोलीं? लेकिन हर चुनाव, हर प्रायोजित धरना, हर सियासी इस्तीफा और हर नया पुनर्जन्म होने के साथ ही वही जानी-पहचानी गटर के ढक्कन की खड़खड़ाहट फिर से सुनाई देने लगती है। स्टूडियो की चमचमाती रोशनी मंद पड़ती है, न्यूज़ कैमरे बंद हो जाते हैं, और दिल्ली की गगनचुंबी इमारतों के नीचे कहीं दूर डिचकॉक मुस्कुराता है। मैनहोल का भारी ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठता है, और एक बेहद खुशमिज़ाज आवाज़ अंधेरे से फुसफुसाती है—”फ़िक्र मत कीजिए देशवासियों… इंटरवल अब पूरी तरह ख़त्म हो गया है!” विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।