Article Desk, Taj News | Sunday, July 05, 2026, 11:15:32 PM IST


आरएसएस-भाजपा और अमेरिका की दासता की ओर बढ़ता भारत
— राम पुनियानी (अनुवाद : अमरीश हरदेनिया)
स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित थी और वह शीत युद्ध के दोनों प्रमुख पात्रों – अमेरिका और सोवियत संघ – में से किसी के सामने नहीं झुकता था। इसके विपरीत, हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान शुरू से ही अमेरिका के इशारों पर नाचता रहा। वहां लोकतंत्र का गला घोंटकर मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति का बोलबाला स्थापित होने में अमेरिकी राजदूत, मुल्लाओं और सेना की भूमिका सबके सामने साफ थी। परिणामस्वरूप, आज भी इस्लाम के नाम पर वहां कट्टरपंथियों का बोलबाला है और वहां की शासन व्यवस्था में सेना बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वहां एक के बाद एक सेना के जनरल सत्ता पर काबिज रहे या राजनैतिक मामलों में उनका जबरदस्त विधिक हस्तक्षेप रहा। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर को भोज का आमंत्रण दिए जाने से पाकिस्तान के वर्तमान राजनीतिक व प्रशासनिक हालात क्या हैं, यह बहुत अच्छे से समझा जा सकता है। वैसे पाकिस्तान की विदेश नीति के अन्य पक्ष भी हैं, लेकिन उसका वाशिंगटन की ओर एकतरफा झुकाव एकदम स्पष्ट रहा है।
राजनैतिक हलकों में अक्सर यह मजाक में कहा जाता था कि पाकिस्तान पर तीन ‘ए‘ का राज है – अल्लाह, अमेरिकी राजदूत और आर्मी। यह कथन संभवतः कुछ लोगों को अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, लेकिन यह पूरी तरह साफ है कि जब किसी भी समाज में धर्म के नाम पर की जाने वाली संकीर्ण राजनीति का बोलबाला हो जाता है, तब अंततः वैसे ही विनाशकारी हालात बन जाते हैं, जैसे हमारे पड़ोसी मुल्क में ऐतिहासिक रूप से दिखाई देते हैं। इसके विपरीत, आज़ाद भारत हमेशा किसी भी वैश्विक महाशक्ति के सामने न झुकने की संप्रभु राह पर चला। विभिन्न राष्ट्रों के आपसी सहयोग से बहुआयामी विकास करते हुए उसने तकनीकी, औद्योगिक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व आत्मनिर्भर तरक्की हासिल की। देश के इस स्वावलंबी दृष्टिकोण का सबसे बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण हमारे वे पांच प्रारंभिक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) हैं, जिनमें से प्रत्येक को दुनिया के अलग-अलग बड़े विकसित देशों के तकनीकी सहयोग से विधिक रूप से स्थापित किया गया था, लेकिन उनकी संप्रभुता भारत के पास ही रही।
उल्लेखनीय है कि भारत कभी भी महाशक्तियों के कूटनीतिक दबाव के सामने नहीं झुकता था, जिसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण बांग्लादेश की स्थापना के पहले की ऐतिहासिक घटनाएं हैं। वर्ष 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारत को सीधी धमकी देते हुए कहा था कि वह पूर्वी पाकिस्तान के घटनाक्रम में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न करे। उस समय पाकिस्तान की क्रूर सेना वहां के मासूम नागरिकों पर भीषण कहर ढा रही थी, जिसके वीभत्स नतीजे में बहुत बड़ी संख्या में बेसहारा शरणार्थी लगातार सीमा पार कर भारत आ रहे थे। इस संकट के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अदम्य निर्भीकता का परिचय दिया। उन्होंने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की अनुचित सलाह को सिरे से खारिज कर दिया, बल्कि सोवियत संघ के साथ एक ऐतिहासिक ‘मैत्री संधि‘ पर विधिक हस्ताक्षर भी किए। बंगाल की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े की प्रत्यक्ष मौजूदगी के बावजूद भारतीय सेना ने वहां मानवीय हस्तक्षेप किया और मुक्ति वाहिनी की मदद करके पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान के क्रूर चंगुल से पूरी तरह मुक्त कराया।
गौरतलब है कि पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान पर जबरन उनकी राष्ट्रभाषा उर्दू को लादने का तानाशाही प्रयास किया जा रहा था, जिसके खिलाफ बांग्लाभाषी पूर्वी पाकिस्तान की स्वाभिमानी जनता ने ऐतिहासिक बगावत कर दी थी। भारत ने तत्कालीन अमेरिकी धमकियों की परवाह न करते हुए पूर्वी पाकिस्तान की शोषित जनता को मुक्ति दिलवाई और वैश्विक मानचित्र पर बांग्लादेश का उदय हुआ। लेकिन वर्ष 2014 के बाद से भारत की पारंपरिक विदेश नीति में धीरे-धीरे एक चिंताजनक बदलाव आता गया और हमारी संप्रभुता पर अमेरिकी साम्राज्य का प्रभुत्व स्पष्ट रूप से कायम होता गया। वर्तमान दौर में इजराइल के साथ भारत अत्यंत प्रगाढ़ कूटनीतिक संबंध स्थापित कर रहा है, जिसके कारण देश की वर्तमान सत्ता पर काबिज दल की आर्थिक व राजनीतिक नीतियों के अनुरूप ईरान और फिलीस्तीन से हमारे दशकों पुराने परंपरागत वफादार रिश्तों को कूटनीतिक रूप से कुर्बान कर दिया गया है।
इस सिलसिले में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच तीखा टकराव हुआ था। जहां एक तरफ भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह आधिकारिक दावा किया कि यह युद्ध विराम दोनों देशों के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ताओं और पाकिस्तान के विशेष अनुरोध की वजह से विधिक रूप से हुआ, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार वैश्विक मंचों पर यह शेखी बघारी कि उनके प्रशासन ने भारत को आर्थिक मामलों में भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाने की सीधी धमकी देकर दोनों देशों के बीच जबरन युद्ध विराम करवाया था। भारत सरकार द्वारा इस पर चुप्पी साध लेना हमारी विदेश नीति की कमज़ोरी को ही दर्शाता है। अब तक भारत के आंतरिक राजनैतिक विमर्श में पाकिस्तान को हमेशा देश का ‘दुश्मन नंबर 1’ बताकर चुनावी ध्रुवीकरण किया जाता रहा है। हालांकि, दोनों देशों के आम नागरिकों के बीच ‘इंडो-पाक फोरम’ और ‘अमन की आशा’ जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक पहलों के जरिए संपर्क-संबंध स्थापित करने के मानवीय प्रयास भी लगातार होते रहे हैं।
याद किया जाना चाहिए कि ‘अमन की आशा’ अभियान की ऐतिहासिक शुरूआत भारत के प्रमुख समाचार पत्र ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ एवं पाकिस्तान के अग्रणी मीडिया संस्थान ‘जंग’ ने मिलकर की थी। हालांकि, यह भी सच है कि दोनों देशों की सरकारें हमेशा एक-दूसरे पर तीखे आरोप-प्रत्यारोप लगाती रही हैं। कश्मीर का विधिक मुद्दा हमेशा से दोनों देशों के बीच एक विवाद रहा है। घाटी के मासूम कश्मीरियों को एक ओर पाकिस्तान की तरफ से आने वाले उग्रवादियों और बर्बर आतंकियों का सामना करना पड़ा, तो दूसरी ओर नागरिक इलाकों में भारी सैन्य मौजूदगी ने उनके सामान्य जीवन को अत्यंत कठिन बना दिया। बहरहाल, अब अचानक ऐसा प्रतीत होता है कि आरएसएस-भाजपा का पाकिस्तान के प्रति अपना पुराना पारंपरिक कड़ा रुख बदल रहा है। आरएसएस के दूसरे सबसे बड़े शीर्ष नेता और सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले ने हाल ही में एक बयान जारी कर कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत के दरवाजे हमेशा खुले रहने चाहिए।
यही संघ परिवार दशकों से लगातार कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है और देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कश्मीर की वर्तमान स्थिति के लिए पूरी तरह दोषी ठहराता रहा है। इस पूरी राजनीतिक खींचतान के बीच कश्मीर में लंबे समय तक अफरातफरी की स्थिति जारी रही। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दोनों देशों के बीच के इस ऐतिहासिक विवाद को शांतिपूर्वक सुलझाने के प्रयास में लाहौर तक ऐतिहासिक बस यात्रा की थी। इसके बाद ही पाकिस्तान के तत्कालीन सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ भी आगरा शिखर वार्ता के लिए भारत पहुंचे थे। लेकिन इन तमाम प्रयासों के बावजूद जमीनी गतिरोध लगातार बना रहा। इस संपूर्ण पृष्ठभूमि के बीच होसबोले का यह ताजा वक्तव्य राजनीतिक विश्लेषकों के लिए हवा के एक ताजे झोंके की तरह है, जिसने संघ की दोहरी नीतियों को भी उजागर किया है।
आरएसएस के सर्वोच्च प्रमुख मोहन भागवत हमेशा पाकिस्तान और भारत के भावी रिश्तों को अपनी ‘अखंड भारत’ की वैचारिक संकल्पना से जोड़ते रहे हैं। लेकिन इसके विपरीत, वर्तमान भाजपा सरकार ने दक्षिण एशियाई देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने वाले ऐतिहासिक संगठन ‘सार्क’ (SAARC) को बढ़ावा देने की दिशा में पिछले एक दशक में कोई ठोस कूटनीतिक प्रयास नहीं किया। सार्क वास्तव में दक्षिण एशियाई देशों के बीच व्यापार, तकनीक और आपसी आर्थिक विकास की दिशा में एक अत्यंत शानदार और प्रगतिशील कदम था, जिसे मौजूदा सरकार ने पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया। होसबोले भले ही यह दावा करें कि बातचीत के द्वार खुले रखना संघ की हमेशा से स्थापित नीति रही है, लेकिन सच इसके बिल्कुल उलट है। संघ की ओर से ऐसी भाषा एकदम नई है।
गौरतलब है कि होसबोले ने यह वक्तव्य अपनी हालिया अमेरिका यात्रा से ठीक लौटकर जारी किया है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अनेक प्रेक्षकों को यह गहरा संदेह है कि उन्होंने यह नरम रुख पूरी तरह से वाशिंगटन के छिपे हुए कूटनीतिक दबाव में आकर अपनाया है। हालांकि, इस दावे की वास्तविक सच्चाई का पता लगाना आधिकारिक रूप से कठिन है, मगर इसमें कोई संदेह नहीं बचा है कि आर्थिक और भू-राजनीतिक मोर्चों पर वर्तमान भारत सरकार अमेरिका को अपना वास्तविक आका मान चुकी है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण तब देखने को मिला जब अमेरिका ने भारत से होने वाले आयात पर सीमा शुल्क (इंपोर्ट टैरिफ) को अचानक 3 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 50 प्रतिशत कर दिया और बाद में उसे थोड़ा संशोधित कर 18 प्रतिशत तक घटाया, लेकिन भारत सरकार ने अपनी संप्रभुता को ताक पर रखकर इसका कोई विधिक विरोध दर्ज नहीं किया।
इतना ही नहीं, भारत ने बिना किसी ना-नुकुर के अमेरिका के उस तानाशाही निर्देश का भी पूरी तरह पालन किया, जिसमें उसने रूस से कच्चे तेल की खरीद को तुरंत रोकने की मांग की थी। इस कूटनीतिक आत्मसमर्पण की दुबारा पुष्टि स्वयं आरएसएस-भाजपा के प्रमुख राष्ट्रीय नेता राम माधव के उस आधिकारिक वक्तव्य से हुई, जिससे विवाद बढ़ने पर वे बाद में चालाकी से पीछे हट गए। राम माधव ने वाशिंगटन स्थित दक्षिणपंथी थिंक टैंक ‘हडसन इंस्टीट्यूट’ में एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए खुलेआम स्वीकार किया था कि भारत टैरिफ बढ़ाने और रूस से तेल न खरीदने जैसे अमेरिका के सभी फैसलों और शर्तों के सामने पूरी तरह झुका है। इसके आगे उन्होंने बेहद कातर भाव से यह भी कहा था कि “भारत ने अमेरिका के साथ सहयोग करने के लिए आखिर क्या नहीं किया है।” जब इस बयान को लेकर देश के भीतर उनकी और सरकार की भारी तीखी आलोचना हुई, तो उन्होंने अपना यह वक्तव्य वापस ले लिया, मगर सरकार की पराधीनता की पोल वैश्विक स्तर पर खुल चुकी थी।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो आरएसएस हमेशा से अमेरिकी साम्राज्यवाद का पिछलग्गू रहा है। यहां तक कि साठ के दशक में जब वियतनाम पर अमेरिका ने बर्बर सैन्य हमला किया था, तब भी संघ ने खुलकर वाशिंगटन की उस क्रूर सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया था। संघ की राजनैतिक शाखा रहा पूर्ववर्ती ‘भारतीय जनसंघ’ देश में सहकारिता, विज्ञान और सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs) के उस मजबूत आर्थिक मॉडल के खिलाफ था, जिसकी मदद से आज़ाद भारत का मजबूत औद्योगिकीकरण हुआ था। पाकिस्तान भी अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए अमेरिकी मदद और डॉलर पर इतना ज्यादा आश्रित हो गया था कि उसने अपनी खुद की कोई स्वतंत्र औद्योगिक, शैक्षणिक और वैज्ञानिक शोध अधोसंरचना विकसित करने पर ध्यान ही नहीं दिया, जिसका खामियाजा वह आज दिवालिया होकर भुगत रहा है।
भारत की वर्तमान सरकार का पूरा ध्यान भी देश के वास्तविक विकास, रोजगार और विज्ञान से हटकर केवल संकीर्ण पहचान से जुड़े धार्मिक मुद्दों, गाय-बीफ के विमर्श और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर केंद्रित हो चुका है। वैज्ञानिक चेतना पर इस सरकार द्वारा लगातार किए जा रहे हमलों के तहत स्कूली पाठ्यक्रमों से चार्ल्स डार्विन के क्रमिक विकास के सिद्धांत को खारिज कर बाहर कर दिया गया है और रसायन विज्ञान के आधार स्तंभ माने जाने वाले मेंडलीफ की आवर्त सारणी (Periodic Table) को भी विज्ञान के पाठ्यक्रमों से बाहर कर दिया गया है। यह चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार वर्तमान में धीरेंद्र शास्त्री जैसे विवादित बाबाओं और चमत्कारी पाखंडियों की गिरफ्त में है, जिसके जरिए समाज में अंधश्रद्धा, तर्कहीनता और मध्ययुगीन कुंठाओं को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। आंतरिक रूप से वैज्ञानिक चेतना को नष्ट करने और बाहरी रूप से अमेरिका का पिछलग्गू बने रहने की यह वही आत्मघाती राह है, जिस पर दशकों पहले हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान चला था। इसी का यह अंतिम तार्किक परिणाम है कि वहां न तो कभी वास्तविक प्रजातंत्र अपनी जड़ें मजबूत कर सका और न ही उस देश का कोई वास्तविक और टिकाऊ विकास हो सका। संप्रभुता को खोकर अमेरिका की दासता की ओर बढ़ते भारत के लिए यह इतिहास एक गंभीर और डरावनी चेतावनी है।
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Pawan Singh
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