कोर्ट पहुंचते-पहुंचते ‘सफेद हेरोइन’ का रंग हुआ काला: साक्ष्यों के विरोधाभास और पुलिसिया जांच की खामियों से 450 ग्राम ड्रग्स केस में आरोपी बरी

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Agra Desk, 🌐 tajnews.in | Thursday, 2 July 2026, 11:35:20 PM IST

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आगरा: आगरा की विशेष एनडीपीएस (NDPS) कोर्ट ने करीब पांच वर्ष पुराने 450 ग्राम हेरोइन बरामदगी के एक बेहद चर्चित मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बाइज्जत बरी कर दिया है। इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने अभियोजन पक्ष और पुलिस की तफ्तीश पर उस समय गंभीर सवाल खड़े हो गए, जब मालखाने से मंगाए गए सीलबंद पैकेट को न्यायाधीश के समक्ष खोला गया। पुलिस और सरकारी गवाहों ने जिस मादक पदार्थ को अपने बयानों में ‘सफेद रंग की हेरोइन’ बताया था, वह पैकेट खुलने पर पूरी तरह ‘काले रंग’ का पदार्थ पाया गया। रंग के इस बड़े और चौंकाने वाले विरोधाभास ने पुलिस की बरामदगी की पूरी कहानी और विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया।

HIGHLIGHTS
  1. बड़ा फैसला: विशेष एनडीपीएस अदालत ने 450 ग्राम हेरोइन तस्करी के पांच साल पुराने मुकदमे में साक्ष्यों की कमी के चलते आरोपी को किया दोषमुक्त।
  2. रंग का विरोधाभास: पुलिस रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों में मादक पदार्थ को सफेद बताया गया था, लेकिन कोर्ट रूम में पैकेट खोला तो पदार्थ निकला काला।
  3. जांच में घोर लापरवाही: बरामद नशीले पदार्थ के सैंपल को घटना के तुरंत बाद लैब भेजने के बजाय 12 दिनों तक थाने में दबाए बैठी रही पुलिस।
  4. संदेह का लाभ: अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष ‘चेन ऑफ कस्टडी’ और आरोपों को संदेह से परे साबित करने में रहा पूरी तरह नाकाम।

पूरा मामला आगरा के सदर थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, जहां स्थानीय पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर नाकेबंदी कर आरोपी को दबोचने और उसके कब्जे से कुल 450 ग्राम अवैध हेरोइन बरामद करने का दावा किया था। इस कथित बरामदगी के तत्काल बाद पुलिस प्रशासन द्वारा सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर आरोपी को एनडीपीएस एक्ट के तहत जेल भेज दिया गया था। हालांकि, जब यह मामला विशेष अदालत में ट्रायल पर आया, तो बचाव पक्ष के वकीलों ने पुलिस की जांच प्रक्रिया में बरती गई कई गंभीर विधिक खामियों और घोर लापरवाहियों को अदालत के सामने उजागर कर दिया।

अदालत की न्यायिक कार्यवाही के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य भी पटल पर आया कि पुलिस द्वारा कथित रूप से बरामद किए गए मादक पदार्थ के नमूनों (सैंपल्स) को फॉरेंसिक लैब की जांच के लिए घटना के तुरंत बाद नहीं भेजा गया था। पुलिस ने इस बेहद संवेदनशील कानूनी प्रक्रिया में शिथिलता बरतते हुए सैंपल को पूरे 12 दिनों के विलंब के बाद रासायनिक प्रयोगशाला प्रेषित किया। एनडीपीएस से जुड़े विशेष मामलों में बरामद ड्रग्स की सुरक्षित कस्टडी और समय पर उसकी वैज्ञानिक जांच (Chain of Custody) को कानूनन सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। इस बड़ी कानूनी चूक ने साक्ष्यों की विश्वसनीयता को पूरी तरह संदिग्ध बना दिया।

इसके अतिरिक्त, इस पूरे मामले को धाराशायी करने में सबसे बड़ी भूमिका मादक पदार्थ के रंग ने निभाई। अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए सरकारी गवाहों ने अपने बयानों में बार-बार कोर्ट को आश्वस्त किया था कि मौके से बरामद ड्रग्स बिल्कुल सफेद रंग का था। लेकिन जब अदालत ने वास्तविकता परखने के लिए मुख्य साक्ष्य यानी सीलबंद पैकेट को खुलवाया, तो उसमें से काले रंग का रासायनिक पदार्थ बाहर निकला। इस गंभीर विरोधाभास को लेकर विशेष एनडीपीएस कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए पुलिस की जब्तीकरण की समूची कानूनी प्रक्रिया पर कई तीखे प्रश्न उठाए।

विशेष एनडीपीएस कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में यह स्पष्ट रूप से माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध लगाए गए संगीन आरोपों को कानून की कसौटी पर और संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह से असफल सिद्ध हुआ है। साक्ष्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले विरोधाभास, लैब में सैंपल भेजने में हुई 12 दिनों की लंबी देरी और बरामद माल की मूल स्थिति को लेकर उत्पन्न हुए गहरे संदेह का सीधा विधिक लाभ आरोपी को दिया गया। इसी आधार पर न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए केस से पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया। यह न्यायिक फैसला स्पष्ट करता है कि गंभीर कानूनी मामलों में जांच एजेंसियों की जरा सी भी तकनीकी चूक अभियोजन के पूरे मामले को शून्य कर सकती है।

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Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

Thakur Pawan Singh

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