Taj News Environment Desk, Taj News | Monday, March 23, 2026, 10:57:57 PM IST

Taj News Environment Desk

मुख्य बिंदु
- जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम अब पूरी तरह बेईमान हो चुका है; बेमौसम बारिश और जानलेवा लू इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
- घाघ और भड्डरी की लोक-कहावतों से लेकर AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) तक, मौसम पूर्वानुमान का ऐतिहासिक सफर।
- मौसम वैज्ञानिक अब सिर्फ सूचना नहीं देते, बल्कि वे आपदा से पहले लोगों की अनमोल जिंदगियां बचाते हैं।
- क्या हम मौसम की चेतावनियों को गंभीरता से लेते हैं? लापरवाही अक्सर हम पर बहुत भारी पड़ती है।
दरअसल, अब हमारा मौसम बिल्कुल भी भरोसे के क़ाबिल नहीं रहा है। क्योंकि, आसमान ने अब सचमुच अपनी ज़ुबान पूरी तरह बदल ली है। आज पूरी दुनिया ‘विश्व मौसम दिवस’ मना रही है। हालांकि, यह बात बहुत सीधी है, मगर इसका असर बहुत गहरा है। क्योंकि, मौसम अब वैसा बिल्कुल नहीं रहा है, जैसा हमने अपने बचपन में जाना था। पहले कभी हमारे यहां सिर्फ हल्की-फुल्की बारिश होती थी। लेकिन, अब वही बारिश एक बड़ी आफ़त बनकर हम पर टूट पड़ती है। पहले कभी गर्मी हमें बस थोड़ी सी तपिश देती थी। हालांकि, आज वही गर्मी एक जानलेवा लू बन जाती है। इसलिए, आप सिर्फ हाल के इन दिनों को ही ध्यान से देख लीजिए। अचानक बदले हुए इस मौसम ने किसानों की खड़ी फसलों को पूरी तरह चौपट कर दिया है।
इसके अलावा, पहाड़ों में भी बेमौसम और भारी बर्फबारी लगातार जारी है। अभी होली के तुरंत बाद तापमान ने अचानक एक बहुत बड़ी छलांग लगाई है। नतीजतन, इस भीषण गर्मी ने आम लोगों की सांसें पूरी तरह अटका दी हैं। इसलिए, मौसम अब सिर्फ़ अपना रूप बदलता नहीं है। बल्कि, वह अब हमें चौंकाता है और बहुत डराता है। इसके साथ ही, वह हमें कई बार भारी तबाही का खौफनाक मंजर भी दिखा देता है। पहले कभी हमारा रिश्ता मौसम से बिल्कुल सीधा होता था। क्योंकि, हमारे पुरखों ने आसमान को पढ़ना अच्छी तरह सीख लिया था। घाघ और भड्डरी जैसे महान लोक-ज्ञानी हमारे समाज में मौजूद थे। वे लोग बिना किसी आधुनिक मशीन के मौसम का पूरा हाल बता देते थे। वे सिर्फ़ प्रकृति के संकेतों से ही सटीक जानकारी दे देते थे।
इसलिए, उनकी पुरानी कहावतें आज भी हमारे गांवों में ज़ोर-ज़ोर से गूंजती हैं। “शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय… बिन बरसे ना जाए।” इसके अलावा, “दिन में गर्मी, रात में ओस… कहें घाघ, बरखा सौ कोस।” दरअसल, ये सिर्फ़ कुछ साधारण शब्द बिल्कुल नहीं थे। बल्कि, ये हमारे पूर्वजों का कई सदियों का पक्का अनुभव था। हवा का रुख, बादलों की चाल और पक्षियों का व्यवहार सब कुछ सही संकेत देता था। इसलिए, किसान इन्हीं इशारों पर भरोसा करके अपना बीज बोता था। वह अपने मवेशी खरीदता और बेचता था। इसके साथ ही, वह अपनी रोज़ी-रोटी का बड़ा फैसला भी करता था। लेकिन, फिर दुनिया में आधुनिक विज्ञान का एक नया दौर आया। सरकार ने एक नया मौसम विभाग तुरंत बनाया। इसके बाद, आधुनिक सैटेलाइट आसमान पर अपनी पैनी नज़र रखने लगे।
यह भी पढ़ें
उन्नत रडार ने बादलों की चाल को बहुत आसानी से पकड़ लिया। नतीजतन, सभी ज़मीनी स्टेशन अपना सटीक डेटा तेज़ी से जुटाने लगे। और फिर वैज्ञानिकों का नया पूर्वानुमान भी आसानी से आने लगा। वे बताने लगे कि कल बारिश होगी या फिर तेज़ धूप निकलेगी। दरअसल, इस एक छोटी सी जानकारी पर लाखों ज़िंदगियां पूरी तरह टिकी होती हैं! क्योंकि, किसान की फसल और पायलट की उड़ान इसी पर निर्भर करती है। इसके अलावा, मछुआरे की नाव और सरकार की तैयारी भी मौसम की भविष्यवाणी पर निर्भर करती है। इसलिए, एक सटीक पूर्वानुमान रोज़ाना कई कीमती जिंदगियां आसानी से बचा सकता है। हालांकि, अब मौसम की यह पूरी कहानी बिल्कुल बदल चुकी है। क्योंकि, जलवायु परिवर्तन ने मौसम की पूरी किताब ही उलट दी है।
अब हमारी बारिश का कोई भी पक्का ठिकाना नहीं है। इसके अलावा, हमारा सूखा अब बहुत लंबा खिंचता है। हमारे विनाशकारी तूफान अब पहले से काफी ज्यादा ताक़तवर हो गए हैं। इसलिए, आप सिर्फ अपने भारत में ही इस बदलाव को देख लीजिए। पहाड़ों में अचानक भारी बाढ़ आती है। मैदानों में झुलसाती हुई भयंकर गर्मी पड़ती है। और शहरों में जलभराव का भारी कहर टूटता है। नतीजतन, मौसम का पुराना डेटा अब हर बार सही काम नहीं आता है। मौसम अब कोई एक सीधी लकीर बिल्कुल नहीं रहा है। बल्कि, वह अब एक बहुत उलझी हुई पहेली बन गया है। इसलिए, ऐसे कठिन समय में मौसम वैज्ञानिकों की भारी जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है। उनका काम अब सिर्फ़ “कल का मौसम” बताना बिल्कुल नहीं रह गया है। बल्कि, अब वे आने वाले कई हफ्तों और महीनों का पक्का अनुमान लगाते हैं।
वे किसान को खेती के लिए बहुत जरूरी सलाह देते हैं। वे बताते हैं कि बीज कब बोना है और फसल कब काटना है। इसके अलावा, सरकार जल प्रबंधन की नई रणनीतियां भी बनाती है। आपदा प्रबंधन की टीमें भी इन चेतावनियों से पहले ही अलर्ट हो जाती हैं। यानी अब मौसम का पूर्वानुमान सिर्फ़ कोई साधारण सूचना नहीं है। बल्कि, वह अब हमारी सुरक्षा की तैयारी का एक मजबूत आधार बन चुका है। आधुनिक तकनीक ने इस मुश्किल काम को और भी तेज़ तथा सटीक बनाया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग ने मौसम पूर्वानुमान को बिल्कुल नई आंखें दी हैं। अब वैज्ञानिकों की चेतावनी सिर्फ़ इतनी नहीं होती है कि “भारी बारिश होगी”। बल्कि, वे यह भी बताते हैं कि “इस विशेष इलाके में बाढ़ का भारी खतरा है।”
इसके अलावा, हीटवेव (Heatwave) की भयानक स्थिति में भी खास सलाह जारी की जाती है। वे बुज़ुर्गों और मासूम बच्चों के लिए भी अपनी खास सलाह जारी करते हैं। दरअसल, यह सिर्फ़ विज्ञान नहीं है, बल्कि यह ज़िंदगियां बचाने का एक महान काम है। इन सबके पीछे हमारे महान मौसम वैज्ञानिक हमेशा मौजूद होते हैं। वे खामोशी से अपना काम लगातार करते रहते हैं। वे दिन-रात अपने जटिल आंकड़ों में पूरी तरह डूबे रहते हैं। हालांकि, उनकी यह कड़ी मेहनत हमें सीधे तौर पर दिखती नहीं है। लेकिन, उसका गहरा असर हम हर जगह आसानी से महसूस करते हैं। अब तो देश के छोटे-छोटे इलाकों के लिए भी बिल्कुल सटीक भविष्यवाणी संभव हो रही है। दिलचस्प बात यह है कि अब आम लोग भी इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा बन रहे हैं। वे अपने मोबाइल से भेजी गई स्थानीय जानकारी को सिस्टम का हिस्सा बनाते हैं।
इसलिए, मौसम की दुनिया अब काफी ज्यादा जुड़ी हुई और साझा हो गई है। लेकिन, हमारे सामने एक और बहुत बड़ी सच्चाई भी मौजूद है। दरअसल, मौसम कभी किसी मानव निर्मित सरहद को बिल्कुल नहीं मानता है। एक देश में उठा हुआ भारी तूफान दूसरे देश में भी तबाही ला सकता है। इसलिए, आज पूरी दुनिया में वैश्विक सहयोग बहुत ज्यादा जरूरी है। सभी देशों के बीच सटीक डेटा साझा करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। नई तकनीक बांटना और कमजोर देशों की मदद करना भी हमारी जिम्मेदारी बन चुका है। फिर भी, एक बहुत बड़ा सवाल हम सबसे भी सीधा जुड़ा है। क्या हम इन मौसम की चेतावनियों को कभी गंभीरता से लेते हैं? हम लोग क्रिकेट का लाइव स्कोर हर मिनट बहुत ध्यान से देखते हैं। लेकिन, हम मौसम की गंभीर चेतावनी को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
नतीजतन, हमारी यही भारी लापरवाही कई बार हम पर बहुत भारी पड़ती है। इसलिए, आज के इस ‘विश्व मौसम दिवस’ का पैग़ाम बिल्कुल साफ़ है। मौसम अब सिर्फ़ अखबार की कोई साधारण खबर नहीं रहा है। बल्कि, यह हमारी ज़िंदगी और हमारी मौत के बीच खिंची हुई एक नाज़ुक लकीर बन चुका है। इसलिए, इसे समझना, इसे सुनना और इस पर तुरंत अमल करना बहुत जरूरी है। अब यह हमारी कोई मजबूरी नहीं है, बल्कि यह हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। हमें अपने पर्यावरण को बचाने के लिए आज ही जागना होगा। क्योंकि, अगर आसमान ने अपनी ज़ुबान पूरी तरह बदल ली, तो हम धरती पर बिल्कुल ज़िंदा नहीं बचेंगे। जय हिंद!

Pawan Singh
7579990777











