Taj News Opinion Desk, Taj News | Monday, March 23, 2026, 10:33:00 PM IST

Taj News Opinion Desk

डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा
मुख्य बिंदु
- भगत सिंह का नास्तिक होना किसी अहंकार का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरी बौद्धिक प्रक्रिया का तार्किक निष्कर्ष था।
- उन्होंने स्पष्ट किया था कि नैतिकता और अच्छे आचरण के लिए ईश्वर या धर्म में विश्वास करना बिल्कुल जरूरी नहीं है।
- “मैं विश्वास की कमी से नहीं, बल्कि तर्क की शक्ति के कारण नास्तिक हूँ” – यह कथन आज भी अत्यधिक प्रासंगिक है।
- शिक्षा और समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देकर ही एक विकसित और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है।
दरअसल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी योद्धा बिल्कुल नहीं थे। बल्कि, वे एक बहुत गहन चिंतक और तार्किक विचारक भी थे। इसके अलावा, वे एक महान बौद्धिक विद्रोही के रूप में भी सामने आते हैं। इसलिए, उनका प्रसिद्ध निबंध “मैं नास्तिक क्यों हूँ” हमारी वैचारिक परंपरा में बहुत अहम है। क्योंकि, उन्होंने इसमें सिर्फ ईश्वर के अस्तित्व पर सीधा प्रश्न नहीं उठाया था। बल्कि, उन्होंने आस्था, अंधविश्वास और मानव स्वतंत्रता के बीच का गंभीर विश्लेषण भी किया था। नतीजतन, यह निबंध सिर्फ कोई व्यक्तिगत या आत्मकथात्मक वक्तव्य बिल्कुल नहीं है। हालांकि, यह एक बहुत व्यापक वैचारिक प्रतिरोध का एक मजबूत ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसलिए, यह निबंध उस समय के धार्मिक और आध्यात्मिक विमर्श को सीधी चुनौती देता है।
दरअसल, आज के समकालीन संदर्भ में इस निबंध का पुनर्पाठ करना बहुत जरूरी है। क्योंकि, यह हमें आज के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को समझने में मदद करता है। इसके अलावा, यह आज नास्तिकता, तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रासंगिकता भी बताता है। वास्तव में, भगत सिंह के नास्तिक होने का असली प्रश्न बहुत गहरा था। क्योंकि, यह बात सिर्फ ईश्वर के अस्तित्व को नकारने तक बिल्कुल सीमित नहीं थी। बल्कि, यह बात उनके संपूर्ण वैचारिक विकास से बहुत मजबूती से जुड़ी हुई थी। इसके अलावा, यह तत्कालीन सामाजिक यथार्थ के प्रति उनकी गहरी समझ को भी दिखाती है। इसलिए, उन्होंने अपने इस ऐतिहासिक लेख में एक बात बहुत स्पष्ट रूप से लिखी थी। उन्होंने बताया कि उनका नास्तिक होना किसी अहंकार या दंभ का परिणाम बिल्कुल नहीं था।
बल्कि, यह उनकी एक बहुत दीर्घकालीन बौद्धिक प्रक्रिया का सीधा और तार्किक निष्कर्ष था। वे हमेशा मानते थे कि हर मनुष्य को अपने जीवन की पूरी जिम्मेदारी उठानी चाहिए। मनुष्य को अपने कर्म और उनके परिणामों का जिम्मा भी खुद ही लेना चाहिए। उसे किसी भी अदृश्य शक्ति पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं रहना चाहिए। नतीजतन, उनका यह दृष्टिकोण मूलतः आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक चेतना पर पूरी तरह आधारित है। इसलिए, यह विचार आज के आधुनिक समाज के लिए भी उतना ही ज्यादा प्रासंगिक है। आज समकालीन समाज में विज्ञान और तकनीक का बहुत अभूतपूर्व विकास हुआ है। लेकिन, दूसरी ओर हमारी धार्मिक आस्थाओं और अंधविश्वासों का प्रभाव बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। इसलिए, हम कई बार समाज में एक बहुत ही अजीब विरोधाभास देखते हैं।
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हम देखते हैं कि वैज्ञानिक उपलब्धियों के बावजूद लोगों के व्यवहार में तर्कशीलता बिल्कुल नहीं होती है। ऐसे में भगत सिंह का यह नास्तिक चिंतन एक मजबूत वैचारिक उपकरण बन जाता है। क्योंकि, यह चिंतन हर व्यक्ति को निर्भीक होकर प्रश्न करने का भारी साहस देता है। इसके अलावा, यह लोगों को तर्क करने और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने की ताकत देता है। भगत सिंह ने कहा था कि वे विश्वास की कमी के कारण नास्तिक नहीं हैं। बल्कि, वे अपने तर्क की मजबूत शक्ति के कारण ही एक पक्के नास्तिक हैं। नतीजतन, उनका यह महान कथन आज के समय में बहुत विशेष महत्व रखता है। क्योंकि, आज विचारों की स्वतंत्रता और आलोचनात्मक चिंतन की आवश्यकता बहुत तेजी से बढ़ रही है। दरअसल, भगत सिंह के नास्तिक चिंतन का एक और बहुत महत्वपूर्ण पहलू मौजूद है। उन्होंने मानव की नैतिकता को किसी भी धर्म से पूरी तरह स्वतंत्र माना था।
उन्होंने तर्क दिया कि अच्छे नैतिक आचरण के लिए ईश्वर में विश्वास बिल्कुल आवश्यक नहीं है। उनके अनुसार, मनुष्य अपनी सामाजिक चेतना के आधार पर भी सही नैतिक निर्णय ले सकता है। इसके अलावा, वह अपने अनुभव और विवेक के आधार पर भी अच्छे काम कर सकता है। इसलिए, उनका यह विचार आज के समकालीन नैतिक दर्शन के साथ भी मेल खाता है। क्योंकि, आज हम नैतिकता को मानवाधिकार और न्याय के मजबूत सिद्धांतों से सीधे जोड़ते हैं। हम उसे केवल पुराने धार्मिक आदेशों से ही बंधा हुआ बिल्कुल नहीं मानते हैं। वर्तमान समय में लोग विभिन्न धार्मिक पहचानों के आधार पर आपस में बहुत लड़ रहे हैं। नतीजतन, समाज में भारी संघर्ष और भयानक विभाजन की स्थितियाँ लगातार उत्पन्न हो रही हैं। तब भगत सिंह का यह दृष्टिकोण हमें एक समावेशी नैतिकता की ओर साफ संकेत करता है।
हम यदि समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें, तो नास्तिकता केवल ईश्वर का निषेध बिल्कुल नहीं है। बल्कि, हम इसे एक बेहतरीन और वैकल्पिक सामाजिक दृष्टिकोण के रूप में भी समझ सकते हैं। दरअसल, भगत सिंह के लिए नास्तिकता एक प्रकार का बहुत बड़ा बौद्धिक साहस ही था। क्योंकि, इसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व और समाज के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टि तेजी से विकसित करता है। इसके अलावा, वह सत्ता की पुरानी संरचनाओं पर भी बहुत तीखे सवाल खड़े करता है। यह दृष्टिकोण उन्हें औपनिवेशिक सत्ता और भारी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित करता था। आज समकालीन संदर्भ में भी सत्ता के विभिन्न रूप व्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुत प्रभावित करते हैं। चाहे वह राजनीतिक सत्ता हो, या धार्मिक सत्ता हो, या फिर कोई आर्थिक सत्ता हो। इसलिए, तब यह नास्तिक दृष्टिकोण एक मजबूत प्रतिरोधी चेतना के रूप में सीधा कार्य कर सकता है।
वर्तमान भारतीय समाज में धर्म और राजनीति का गहरा अंतर्संबंध भी एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई बार चालाक नेता धार्मिक आस्थाओं का उपयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए जमकर करते हैं। नतीजतन, इससे समाज में भारी ध्रुवीकरण और वैचारिक संकीर्णता को बहुत ज्यादा बढ़ावा मिलता है। ऐसे खतरनाक परिदृश्य में भगत सिंह का यह नास्तिक चिंतन एक तार्किक आधार प्रदान करता है। यह विचार हर व्यक्ति को किसी भी प्रकार की विचारधारात्मक कट्टरता से बहुत दूर रखता है। उन्होंने कहा था कि क्रांति की तलवार सिर्फ विचारों की सान पर ही तेज होती है। दरअसल, उनका यह विचार हमें एक बहुत ही गहरा और महत्वपूर्ण संकेत देता है। क्योंकि, समाज में किसी भी वास्तविक परिवर्तन के लिए वैचारिक स्पष्टता बहुत ज्यादा आवश्यक है। इसके अलावा, व्यक्ति के भीतर एक पक्की बौद्धिक ईमानदारी होना भी अत्यंत जरूरी है। शिक्षा के महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी भगत सिंह का यह नास्तिक दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक है।
आज हमारी शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छी नौकरी या रोजगार प्राप्त करना बिल्कुल नहीं है। बल्कि, इसका उद्देश्य एक बहुत ही जागरूक और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करना भी है। इसलिए, आज तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को शिक्षा का एक अभिन्न अंग बनाना बहुत आवश्यक है। भगत सिंह का क्रांतिकारी जीवन और उनके महान विचार छात्रों के लिए एक बड़ी प्रेरणा हैं। क्योंकि, वे छात्रों को निर्भीक होकर प्रश्न करने और सत्य की खोज करने के लिए प्रेरित करते हैं। दरअसल, यह आधुनिक दृष्टिकोण हमारे भारतीय संविधान के उस महत्वपूर्ण प्रावधान के बिल्कुल अनुरूप ही है। जिसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुधार की सच्ची भावना को हर नागरिक का मुख्य कर्तव्य बताया गया है। हालांकि, हमें यहाँ एक और बहुत महत्वपूर्ण बात पर भी अपना पूरा ध्यान देना चाहिए। नास्तिकता का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक परंपराओं का पूर्णतः निषेध कर दे।
भगत सिंह स्वयं भारतीय समाज और हमारी संस्कृति के बहुत ही गहरे जानकार थे। उन्होंने अपने विचारों में कहीं भी हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रति कोई अनादर नहीं दिखाया था। बल्कि, उनका कड़ा विरोध केवल उन बुरे तत्वों से था जो न्याय के बिल्कुल विरुद्ध थे। वे मानवता और तर्क के दुश्मनों के खिलाफ हमेशा बहुत मजबूती से खड़े रहते थे। इसलिए, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी यह नास्तिकता का प्रश्न हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कई लोग कठिन परिस्थितियों में ईश्वर में विश्वास के माध्यम से सांत्वना और आशा प्राप्त करते हैं। भगत सिंह इंसान की इस मानवीय प्रवृत्ति को बहुत अच्छी तरह समझते थे। परंतु, वे इसे मनुष्य की एक प्रकार की मानसिक निर्भरता ही मानते थे। उनका मानना था कि यह निर्भरता व्यक्ति को असल वास्तविकता से बहुत दूर ले जा सकती है। उन्होंने कहा था कि जीवन की हर कठिनाई का सामना सिर्फ साहस और विवेक के साथ करना चाहिए।
मनुष्य को किसी भी अलौकिक आशा पर निर्भर रहकर अपना जीवन बिल्कुल नहीं बिताना चाहिए। आज के समय में, जब मानसिक स्वास्थ्य एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। तब यह प्रश्न हमारे सामने और भी ज्यादा जटिल हो जाता है। क्या नास्तिक दृष्टिकोण व्यक्ति को अधिक सशक्त बनाता है या उसे भावनात्मक रूप से कमजोर करता है? इस अहम संदर्भ में हमें एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना बहुत आवश्यक है। जो व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं और उसकी बौद्धिक स्वतंत्रता दोनों का पूरा सम्मान करे। वैश्वीकरण और आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के इस नए युग में सब बदल गया है। आज दुनिया में विचारों का आदान-प्रदान अत्यंत तीव्र हो गया है। विभिन्न विचारधाराएँ, अनेक संस्कृतियाँ और मान्यताएँ आज एक-दूसरे के सीधे संपर्क में आ रही हैं। ऐसे में नास्तिकता, आस्तिकता और अज्ञेयवाद जैसे दृष्टिकोणों के बीच एक खुले संवाद की आवश्यकता बहुत बढ़ गई है।
भगत सिंह का नास्तिक चिंतन इस संवाद के लिए एक बहुत मजबूत आधार प्रदान करता है। क्योंकि, यह चिंतन किसी भी प्रकार की कट्टरता को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है। और यह सिर्फ तर्क तथा प्रमाण पर आधारित विचार को ही अपनी प्राथमिकता देता है। यह तार्किक दृष्टिकोण एक लोकतांत्रिक समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है। जहाँ विभिन्न विचारों का सम्मानजनक सह-अस्तित्व आसानी से संभव हो सके। समकालीन युवा वर्ग के संदर्भ में भी भगत सिंह का यह नास्तिक चिंतन विशेष महत्व रखता है। आज का युवा एक ओर अपनी परंपरा और संस्कृति से मजबूती से जुड़ा हुआ है। वहीं, दूसरी ओर वह आधुनिकता, विज्ञान और वैश्विक विचारों से भी बहुत गहराई से प्रभावित है। इस भारी द्वंद्व के बीच उसे एक ऐसी वैचारिक दिशा की सख्त आवश्यकता होती है। जो दिशा उसे स्वतंत्र रूप से सोचने और अपने निर्णय लेने की पूरी क्षमता प्रदान करे।
भगत सिंह का जीवन और उनका नास्तिक दृष्टिकोण इस दिशा में एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य कर सकता है। वे हमें यह सिखाते हैं कि किसी भी विचार को सिर्फ इसलिए स्वीकार न किया जाए क्योंकि वह परंपरागत है। बल्कि, उसे हमेशा अपने तर्क और अनुभव की कसौटी पर अच्छी तरह परखा जाए। अंततः, “मैं नास्तिक क्यों हूँ” को केवल एक धार्मिक विमर्श के रूप में बिल्कुल मत देखिए। बल्कि, यह एक बहुत ही व्यापक और महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज है। यह हर व्यक्ति की बौद्धिक स्वतंत्रता और उसकी नैतिक स्वायत्तता की बहुत जोरदार वकालत करता है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि पूरी तरह वैचारिक भी होती है। जब तक कोई व्यक्ति अपने विचारों में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होगा। तब तक वह किसी भी प्रकार के शोषण और अन्याय के विरुद्ध प्रभावी रूप से संघर्ष नहीं कर सकता है। समकालीन परिप्रेक्ष्य में समाज अनेक प्रकार के तनावों से गुजर रहा है।
तब भगत सिंह का यह चिंतन हमें एक संतुलित और तार्किक दृष्टिकोण प्रदान करता है। यह हमें यह समझने में सहायता करता है कि नास्तिकता केवल ईश्वर के निषेध का प्रश्न नहीं है। बल्कि, यह एक ऐसी सशक्त जीवन-दृष्टि है, जो तर्क, विवेक, मानवता और स्वतंत्रता पर पूरी तरह आधारित है। इस तार्किक दृष्टि को अपनाकर ही हम एक ऐसा समाज निर्मित कर सकते हैं। जहाँ हर व्यक्ति को अपने स्वतंत्र विचार व्यक्त करने की पूरी आज़ादी हो। जहाँ समाज में न्याय और समानता को ही सर्वोच्च मूल्य माना जाए। और जहाँ इंसान की आस्था और उसके तर्क के बीच एक सही संतुलन स्थापित किया जा सके। तभी जाकर सदभावना और सौहार्द के साथ एक अखण्ड, समृद्ध और विकसित राष्ट्र का निर्माण होगा। जय हिंद!

Pawan Singh
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