Badal Saroj political satire article on RSS USA relations, USCIRF report and Donald Trump diplomacy

संघ और अमरीका: जिन पे तकिया था, वही पत्ते हवा देने लगे! ट्रंप के सामने ‘विश्वगुरु’ का कूटनीतिक सरेंडर?

आर्टिकल

Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 23 Mar 2026, 09:55 PM IST

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Taj News Satire Desk

राजनैतिक व्यंग्य-समागम
Badal Saroj Writer
बादल सरोज
संपादक, ‘लोकजतन’
संयुक्त सचिव, अखिल भारतीय किसान सभा
वरिष्ठ वामपंथी नेता और लेखक बादल सरोज ने अपने इस बेहद मारक व्यंग्य में अमेरिका और आरएसएस (RSS) के कूटनीतिक रिश्तों की पोल खोली है। उन्होंने बताया है कि कैसे ट्रम्प के सामने बार-बार ‘सरेंडर’ करने के बावजूद, अमेरिका ने संघ पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश करके सबसे बड़ा झटका दिया है। पढ़िए यह खास आलेख:

मुख्य बिंदु

  • अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने धार्मिक स्वतंत्रता के हनन पर आरएसएस पर प्रतिबंध और संपत्ति ज़ब्त करने की सिफारिश की है।
  • ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ और ‘हाउडी मोदी’ जैसे नारों के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को लगातार कूटनीतिक झटके दिए हैं।
  • आरएसएस ने अमेरिका में अपनी छवि सुधारने के लिए विदेशी लॉबिंग फर्मों पर करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन नतीजा सिफर रहा।
  • रूस से तेल खरीदने की ‘इजाज़त’ और कश्मीर पर ट्रंप के दावों पर ‘विश्वगुरु’ की शर्मनाक चुप्पी पर कड़े सवाल।

दरअसल, न तो इन्होने महान शेक्सपीयर को पढने का कोई झंझट पाला है। न ही इन्हें रानी क्लियोपेट्रा के बारे में ही कुछ खास मालूम है। वरना ताजे अमरीकी कारनामे पर ये लोग जुलियस सीजर के अंदाज़ में हैरत ज़रूर जताते। वे आहत भाव से इतना तो कहते ही कि ‘हे ब्रूटस, तुम भी’! क्योंकि, हाल के दौर में इन्होंने न जाने क्या-क्या कड़वे घूंट सहे हैं। इन्होंने गगनचुम्बी चाटुकारिता की कई पातालगामी मिसालें कायम की हैं। लेकिन, इतने भारी सरेंडर के बाद भी कमबख्त अमरीका ने सीधे इनके मर्म पर ही चोट की है। ट्रंप की रहनुमाई वाली संघीय सरकार ने एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाया है। दरअसल, अमरीका के धार्मिक स्वतन्त्रता पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग ने एक नई रिपोर्ट जारी की है। इस आयोग का नाम ‘यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम’ (USCIRF) है। इस आयोग ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी ‘आरएसएस’ (RSS) पर बहुत गंभीर आरोप लगाए हैं。

आयोग संघ को लोगों की धार्मिक स्वतन्त्रता के भारी हनन का जिम्मेदार मानता है। इसके अलावा, वह संघ को कई हिंसक कार्यवाहियों का भी मुख्य जिम्मेदार मानता है। इसलिए, आयोग ने संघ पर कड़ा प्रतिबन्ध लगाने की सीधी सिफारिश की है। आयोग ने संघ से जुड़े सभी व्यक्तियों के अमरीका प्रवेश पर भी रोक लगाने की मांग की है। इसके साथ ही, उसने अमेरिका में मौजूद उनकी संपत्तियों को पूरी तरह जब्त करने सहित कुल 6 कड़े सुझाव दिए हैं। इसी मार्च के महीने में जारी इस रिपोर्ट में अमरीकी आयोग ने कई घटनाओं का उल्लेख किया है। नतीजतन, उसने भारत को ‘चिंताजनक देशों’ की सूची में शामिल कर दिया है। इसके अलावा, आयोग ने संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार से एक बहुत बड़ी मांग की है। उसने कहा है कि सरकार भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों और व्यापार के रिश्तों को तय करते समय इन बातों को मुख्य आधार बनाए。

हैरानी की बात है कि आयोग ने भारत को हथियारों की आपूर्ति रोकने तक की भी सख्त बात कही है। इस रिपोर्ट में आरएसएस के साथ-साथ भारत की खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ (RAW) का भी नाम साफ दर्ज़ है। दरअसल, इसके पीछे कनाडा में लगे हत्या के आरोप ही मुख्य कारण हो सकते हैं। हालांकि, ऐसा कोई पहली बार बिल्कुल नहीं हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से इस तरह के नकारात्मक उल्लेख लगातार होते रहे हैं। इसी तरह की एक पुरानी रिपोर्ट के आधार पर मौजूद प्रधानमंत्री को भी बहुत पहले निशाना बनाया गया था। जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, तब अमेरिका ने उनको एक ‘अवांछित व्यक्ति’ घोषित कर दिया था। उस समय अमेरिका ने उनके अमरीका प्रवेश पर कड़ा प्रतिबन्ध भी लगाया था। इसलिए, इस तरह की गंभीर रिपोर्ट्स को हम ऐसे ही अनदेखा बिल्कुल नहीं कर सकते हैं। क्योंकि, बाद में पश्चिमी देश इन्ही रिपोर्ट्स को एक बड़े बहाने के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसके ढेर सारे पुराने उदाहरण आज मौजूद हैं。

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वैसे अमरीका न तो पूरी दुनिया का कोई दरोगा है, और न ही वह कोई सरपंच है। जो वह दुनिया के बाकी सभी देशों को अपनी मर्ज़ी से सर्टिफिकेट बांटता फिरे। मगर संघ और भाजपा के मामले में हम ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते हैं। क्योंकि भारत में यह अकेला ही एक ऐसा कुनबा है, जो अमेरिका की बहुत परवाह करता है। शायद पूरी दुनिया में भी यह कुनबा बिल्कुल अकेला ही है। जो अपने ही पड़ोसी देशों के बारे में अमरीकी आयोगों के एलानों को सच मानता है। वह अमेरिकी एजेंसियों के इन बयानों को सीधे ईश्वरीय वचन मानकर बहुत फुदकता रहता है। इसलिए भी क्योंकि हाल के दौर में तो इन्होने अपने आपको अमरीका के साथ बहुत बुरी तरह नत्थी कर लिया है। वे इस कदर अमेरिका के करीब गए हैं कि कई बार तो खुद अमरीकी नेता भी संशय में पड़ जाते हैं। अमेरिकी सोचते हैं कि ये भारतीय नेता अपने देश के प्रति ज्यादा वफादार हैं, या फिर अमेरिका के प्रति?

साढ़े तेरह हजार किलोमीटर दूर धरती के दूसरे कोने पर बैठे संघी और भाजपाई अमेरिका के कितने करीब हैं? यह सब साल 2014 में उनके सत्ता में आने के बाद साफ़-साफ़ नज़र आया है। उन्होंने कभी भरे गले से पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपना जिगरी दोस्त बताया था। उन्होंने ओबामा से अपने ‘तू-तड़ाक’ वाले घनिष्ठ संबंधों का बखान खुद गा-गाकर पूरी दुनिया को सुनाया था। फिर ट्रंप के साथ तो उनकी रही-सही दूरियां भी इस कदर नज़दीकियां बन गयीं कि सब हैरान रह गए। इधर भारत में ‘हाउडी ट्रंप’ का भारी तमाशा हुआ, जिसे हिंदी में कहें तो ‘कैसा है रे ट्रम्पवा’। तो उधर अमेरिका में ‘हाउडी मोदी’ के भारी तमाशे होने लगे। उनका यह राजनीतिक लगाव इतना ज़्यादा उन्मुक्त हुआ कि उसने सारी कूटनीतिक भद्रता की भद्रा उतार दी। भारत के प्रधानमंत्री ने सीधे ‘अब की बार ट्रम्प सरकार’ का नारा बना दिया। और वह नारा लेकर वे अगले के विदेशी चुनाव प्रचार तक जा पहुंचे。

हालांकि अगले को उनके इस विदेशी नारे से कोई भी ख़ास फ़ायदा बिल्कुल नहीं हुआ। उस राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की लुटिया पूरी तरह डूब ही गयी थी। फिर चार साल जो बाइडन को रिझाते और मनाते हुए आसानी से गुजरे। मगर ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद तो जैसे भारत के सारे कूटनीतिक तटबंध ही टूट गए। उसके बाद जो-जो हुआ है और जैसा-जैसा हुआ है, वह बहुत शर्मनाक है। उससे भारत जैसे महान देश की जितनी भारी भद्द पिटी है, उसकी इतिहास में कोई दूसरी मिसाल बिल्कुल नहीं है। ओबामा को सिर्फ ‘बराक-बराक’ उवाचने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप को तुरंत ‘माय डिअर फ्रेंड डोनाल्ड’ कह दिया। उन्होंने ट्रंप को दुनिया की सबसे ऊंची आसंदी पर विराज दिया। और उसका जो सिला उनके उस अमेरिकी ‘दोस्त’ ने दिया, उसे देखकर हम सबको एक मशहूर मिसरा याद आ गया। वह मिसरा है: ‘हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमाँ क्यों हो’。

हमारे प्रधानमंत्री के इस ‘माय डिअर फ्रेंड’ ने उन्हें पहला और करारा झटका तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में न बुलाकर ही दे दिया था। उसके बाद बड़ी मान-मनुहार और भारी जुगाड़ करने के बाद वे उनसे मुलाक़ात के लिए पहुंचे। तो वहां प्रेस कांफ्रेंस में ट्रंप ने लाइव कैमरों के सामने ही उन्हें ज़ोर से हड़का दिया। ट्रंप ने उन्हें तत्काल अपनी नीतियाँ बदलने का कड़ा हुकुम सुना दिया। मगर मज़ाल है कि हमारे प्रधानमंत्री के मुंह से इस घोर बेइज्ज़ती पर कोई बोल तक फूटा हो! वे उस अपमानजनक मुलाक़ात को करके वापस भारत लौट आए। इसके बाद भी उन्होंने अमेरिका के खिलाफ किसी भी तरह की अप्रसन्नता या अपनी असहमति बिल्कुल नहीं जताई। दरअसल, मोदी वहां सिर्फ संघ के एक प्रचारक या भाजपा के नेता की निजी हैसियत से बिल्कुल नहीं गए थे। वे अमरीका के राष्ट्रपति के सामने 140 करोड़ भारतीयों के प्रधानमंत्री के नाते बैठे थे。

जबकि ऐसे ही खराब बर्ताव पर अमरीकी रहमोकरम पर जिंदा यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलिंसकी तक ने ट्रंप को खरी-खरी सुना दी थी। मगर जैसा कि खुद ट्रंप ने बार-बार पूरी दुनिया से कहा है, मोदी सिर्फ उन्हें खुश करने के नए-नए ज़रिये ढूंढ रहे थे। तो फिर वे अपने उस ‘माय डिअर फ्रेंड’ को भला नाराज़ कैसे करते? इसके बाद तो दुनिया के इस सबसे घिनौने राष्ट्रपति ने जैसे भारत को अपना ‘पंचिंग बैग’ ही बना लिया। ट्रंप ने भारत पर अपमानों की एक अंतहीन झड़ी ही लगा दी और वह दुखद सिलसिला आज भी जारी है। कश्मीर के पुलवामा (पहलगाम) हमले के बाद ट्रंप ने बजाय भारत का साथ देने के, उसे धमकी ही दी थी। उसने दोनों देशों के बीच युद्ध रुकवाने के अपने झूठे दावे को तो जैसे अपना तकिया कलाम ही बना लिया है। ट्रंप अब तक कोई एक सौ बार मीडिया में कह चुका है कि उसने फोन करके मोदी को धमकाया और युद्ध रुक गया。

असली संख्या शायद इससे कहीं अधिक ही होगी। इतना ही नहीं, अपनी इस झूठी ‘उपलब्धि’ की बिना पर भाई ने खुद को शांति का ‘नोबेल’ देने की मांग भी खुद ही कर डाली। लेकिन, मजाल है जो हस्तिनापुर (दिल्ली) में बैठे मोदी ने इसका खंडन किया हो? या उनके किसी अदने से अफसर ने मिमियाकर भी इस कोरे झूठ का कोई खंडन किया हो। फिर हमारे जले पर नमक छिड़कने के लिए इसी ‘माय डिअर फ्रेंड’ ने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को भी दावतें देना शुरू कर दीं। ट्रंप ने पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष को अपने एक प्रमुख राष्ट्रीय दिन के समारोह का मेहमाने खुसूसी बना दिया। उसने उसे एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का सर्वेसर्वा भी बना दिया। इस तरह अमेरिका ने एक बार फिर जान-बूझकर भारत को अंगूठा भी दिखाया, और मुंह भी चिढ़ाया। मगर इधर दिल्ली से सिर्फ ‘छोड़ेंगे सब मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे’ का वही पुराना दोस्ती राग बजता रहा。

उसके बाद अमेरिका की ‘टैरिफ ब्लैकमेलिंग’ की भारी मुसीबत आयी, और हमारी सरकार पूरी तरह ब्लैकमेल हुई। अमेरिका के साथ एक नया व्यापार समझौता हुआ। बाद में ट्रंप ने उसका एकतरफा एलान पहले ही कर दिया। जबकि हमारा पड़ोसी देश बांग्लादेश अमेरिका से कहीं बेहतर डील लेने में आसानी से कामयाब हुआ। रूस से सस्ता तेल न खरीदने सहित भारत ने और कितनी शर्तें किस तरह मानी हैं, यह अब पूरी दुनिया अच्छी तरह जानती है। एक समय जो भारत दुनिया के 118 गुटनिरपेक्ष (NAM) देशों का सबसे बड़ा और सर्वमान्य नेता था। उसे आज इतना ज्यादा अमरीका अनुमति आश्रित बना दिया गया है कि वह कुछ भी नहीं कर सकता है। वह आज अपने हजारों वर्ष पुराने दोस्त देश (ईरान) के सर्वोच्च नेता की निर्मम हत्या पर शोक भी जता नहीं पाया है। इतना ज्यादा अमेरिका के सामने झुकने के बाद भी भारत को सिर्फ एक “अच्छा अभिनेता” होने के तीखे कटाक्ष के सिवा और कुछ भी नहीं मिला。

यह भारत का मज़ाक उड़ाने वाली एक बहुत ही कड़वी टिप्पणी थी। यह सिर्फ ट्रंप की जुबान फिसल जाने का कोई साधारण मामला बिल्कुल नहीं था। क्योंकि, पहले ट्रंप की सहयोगी और वित्त सलाहकार स्कॉट बेसेंट ने यह बात कही। और उसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति भवन की प्रवक्ता और प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट द्वारा भी इस बात को दोहराया गया। यह साबित करता है कि यह एक सम्प्रभु देश को जानबूझकर निशाना बनाने की साज़िश है। यह भारत के योजनाबद्ध मानमर्दन के एक लंबे सिलसिले का ही हिस्सा है। ये कुछ ताज़ा उदाहरण यहाँ इसलिए गिनाये गए हैं, ताकि आप पूरी बात आसानी से समझ सकें। इधर से भारत झुकने में कोई कसर न छोड़ने के बाद भी बेइज़्ज़त हो रहा है। उधर से अमेरिका हमें हमारी हैसियत दिखाने में कोई कोर-कसर बिल्कुल नहीं छोड़ रहा है। जबकि उधर वाले अमेरिकी बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि ये बंदे तो जन्म-जन्म से विदेशियों की वफादारी निबाहते रहे हैं。

जब अमरीका दुनिया का चौधरी नहीं था, तब इनके लिए सिर्फ अंग्रेज ही सब कुछ थे। इन भाई लोगों के लिए वे गोरे भी इतने ही ज्यादा दिल फरेब थे। अंग्रेज तो चले गए, मगर इनकी गुलामी की आदत आज भी नहीं छूटी। इन्होंने ट्रंप की दोनों जीतों के लिए भारत में बड़े-बड़े यज्ञ किये, भारी हवन किये, पाठ किये और अनुष्ठान किये। ट्रंप तो ट्रंप, उसके राजनीतिक जुड़वां भाई बेंजामिन नेतन्याहू (इज़राइल) तक के लिए इन्होंने यही सब बार-बार किया है। इतना सब कुछ करने के बाद भी ‘हे ब्रूटस, तुम भी’ का यह डायलॉग दोहराया जाना इनके साथ बहुत बेइंसाफी है। वह भी तब, जब आका के देश में अपनी ‘अच्छे बच्चे’ की छवि बनाने के लिए आरएसएस (RSS) ने बहुत पैसे खर्च किए हैं। संघ ने उनसे मेल-मुलाकात बढ़ाने के लिए 3 लाख 30 हजार डॉलर खर्च किए हैं। यह आज की कीमत के हिसाब से कोई 3 करोड़ रूपये से ज्यादा का खर्च है。

संघ ने अमेरिकी लॉबिंग फर्म ‘स्क्वायर पैटन बोग्स’ (SPB) और एक अन्य लॉबिंग फर्म, ‘स्टेट स्ट्रीट स्ट्रैटेजीज’ (SSS) को पैसे दिए हैं। जो ‘वन+ स्ट्रैटेजीज’ के नाम से अमेरिका में अपना कारोबार करती है। संघ ने इन्हें तीन किश्तों में भारी फीस देकर अपने काम पर लगाया था। लेकिन आखिर में हासिल क्या हुआ? सिर्फ अमेरिका द्वारा भारत पर कड़े प्रतिबन्ध की सिफारिश और सम्पत्ति जब्त करने की कड़वी सलाह!! और जैसी कि इन दिनों भारत में चुप्प रहने की एक नई परम्परा ही बन गयी है, इस बार भी उसी का पूरा निर्वाह किया गया। धार्मिक स्वतन्त्रता पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग की इस सनसनीखेज़ रिपोर्ट पर (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक) न तो प्रधानमंत्री कुछ बोले हैं, और न ही किसी मंत्री ने अपना मुंह खोला है। और तो और, समालखा में अपनी सौंवी सालगिरह का भारी जश्न मना रहे आरएसएस (RSS) ने भी इस पर कुछ नहीं बोला है。

सिर्फ एक अदने से संघ अधिकारी भर ने इस पर अपना एक हल्का सा बयान दिया है। वह बयान भी इतना लिजलिजा है कि वह न तो लीपने का है और न ही पोतने का। “तू कौन, मैं खामखाँ” कहकर अमेरिका को उसकी असली सीमा में रहने की हिदायत देने के बजाय अधिकारी ने दूसरी बात कही है। संघ अधिकारी ने सिर्फ अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर होने वाले हमलों और भारतीय समुदाय के लोगों पर हिंसा का हवाला दिया है। भारत की प्रतिक्रिया का यह अजीब तरीका एक तरह से अमरीकी आयोग के कहे को पूरी तरह स्वीकार कर लेने जैसा ही है। यह ऐसा है कि “हम करते हैं तो क्या हुआ, आपके देश में भी तो ऐसा ही होता है।” इस अधिकारी के जवाब में सिर्फ मंदिरों भर का यह उल्लेख भी एक तरह से तोहमत का सीधा कबूलनामा ही है। दरअसल, असली दुविधा उन ‘भा भा भाओं’ (भारत से भागे भारतवासियों) यानी एनआरआई (NRI) की है。

जो एनआरआई मोदी की बड़ी सभाओं में ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के ज़ोरदार जैकारे लगा-लगाकर अपना गला बिठाए हुए थे। जो आज दुनिया भर में आरएसएस की कई नई शाखाएं खोले हुए हैं। और जो वहां से भर-भर झोली डॉलर, पाउंड, येन और मार्क इकट्ठा करके सीधा नागपुर भेजते रहते हैं। संघ की इस वैश्विक भुजा के सबसे बड़े संयोजक इसी अमरीका में रहने वाले सौमित्र गोखले हैं। लेकिन, ये श्रीमान भी अभी तक इस बड़ी बेइज़्ज़ती पर कुछ नहीं बोले हैं। इस अमेरिकी शाखा सहित दुनिया भर में और जितनी भी संघ की शाखाएं हैं। उनके संयोजकों सहित वे सब के सब असल में आरएसएस के प्रचारक ही हैं। हालांकि अमरीका में अपनी छवि बनाने और अमरीका के बड़े अधिकारियों तथा मंत्रियों आदि से भेंट मुलाक़ात करवाने के लिए तीन करोड़ रूपये दिए जाने के खुलासे के बाद संघ ने एक अजीब सी सफाई दी थी। आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर द्वारा यह सफाई दी गयी थी कि आरएसएस “केवल भारत में” ही काम करता है。

उनका यह भोला दावा रंगे हाथों पकड़े जाने पर मुकर जाने की संघ की पुरानी और स्थायी अदा के सिवा कुछ भी नहीं था। अम्बेकर की इस हास्यास्पद सफाई के कुल जमा छः सप्ताह बाद ही हैदराबाद में संघ की वैश्विक भुजा का एक बड़ा शिविर हुआ था। जिसे आरएसएस के बड़े प्रचारक ‘संघ का विश्व विभाग’ गर्व से बताते हैं। इस शिविर में दुनिया भर के 79 देशों के लगभग 1,600 लोग शामिल हुए थे। स्वयं सरसंघचालक मोहन भागवत इसमें खास तौर पर हिस्सा लेने पहुंचे थे। यह कोई नया संगठन या कोई नया उपक्रम बिल्कुल नहीं है। साल 2006 में संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ में छपी एक बड़ी खबर के अनुसार यह एक पुराना संगठन है। तब हर पांच साल में यह अंतरराष्ट्रीय शिविर हुआ करता था, लेकिन अब यह हर वर्ष होने लगा है। और उस वर्ष के शिविर के मुख्य अतिथि 2002 के नरसंहार से ख्याति पाए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे。

इससे पहले 1995 की एक प्रेस विज्ञप्ति ने बताया था कि ‘वैश्विक संघ’, ‘हिन्दू स्वयंसेवक संघ’, ‘सेवा इंटरनेशनल’, ‘विश्व हिन्दू परिषद्’, ‘हिन्दू स्टूडेंट्स कौंसिल’ और ‘फ्रेंड्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी इंटरनेशनल’ आदि-आदि संगठन आरएसएस के ही सीधे अनुषंगी संगठन हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि इनकी अंतरराष्ट्रीय सांगठनिक मौजूदगी है। जो बाकी जो हो सो हो, भारत के किसी भी असली काम की बिल्कुल नहीं है। दुनिया के अलग-अलग अमीर देशों में बैठे इतने सारे संघ संगठन क्या भारत के लिए कुछ भी करते हैं? या फिर वे कभी रोनाल्ड रीगन, तो कभी डोनाल्ड ट्रंप के लिए ही अपना विदेशी मंच सजाते रहते हैं? यह जानना बहुत ही दिलचस्प होगा कि हाल में ट्रंप द्वारा लगभग भारत विरोधी मुहिम छेड़े जाने के वक़्त संघ की इस अमरीकी शाखा ने आखिर क्या किया? क्या उसने इस पर कोई कड़ा बयान तक देने का भी साहस जुटाया या नहीं。

इन सब विवादित मुद्दों पर संघ के बोलने की उम्मीद करना तो बहुत दूर की बात है। अभी मार्च में जारी इस ताज़ा अमेरिकी रिपोर्ट और उसमें की गयी कड़े प्रतिबंध की सिफारिशों पर भी कुछ कहने की इनकी कोई हिम्मत नहीं हो पायी है। भारत और दुनिया के इतिहास ने बार-बार यही साबित किया है। कि इस रंग के हों या उस रंग के, दक्षिणपंथी और उन्मादपरस्त संगठनों के स्वभाव का एक अपरिवर्तनीय हिस्सा हमेशा होता है। वह हिस्सा है, साम्राज्यवाद की पालकी का आज्ञाकारी ‘कहार’ बनना। ये संगठन हमेशा यही चाहते हैं कि उनके साम्राज्यवादी आकाओं की नजर कभी टेढ़ी न हो। इसके लिए वे हमेशा हर संभव और शर्मनाक कोशिश करते हैं। इसलिए, आज यह पूरा देश अमेरिका के सामने इस कूटनीतिक सरेंडर का असली सच देख रहा है。

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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