Agra News Desk, tajnews.in | Sunday, March 22, 2026, 07:55:20 PM IST

आगरा: ताजनगरी में विश्व जल दिवस के अवसर पर पानी की बूंद-बूंद को तरसते भविष्य की एक डरावनी तस्वीर पर गंभीर मंथन हुआ। ‘रिवर कनेक्ट कैंपेन’ के तत्वावधान में आयोजित एक विशाल संगोष्ठी में वक्ताओं ने मंच से बेहद सख्त संदेश दिया है। विशेषज्ञों ने एक सुर में स्पष्ट किया कि जल संकट अब भविष्य की कोई कोरी कल्पना नहीं रह गया है। दरअसल, यह हमारे वर्तमान का एक ऐसा खौफनाक सच बन चुका है जो तेजी से दरवाजे खटखटा रहा है। ऐसे में, यदि आज हमने तत्काल और ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। संगोष्ठी में इस बात पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया कि पानी जैसी बुनियादी जरूरत को आज बाजार की कमोडिटी बनाकर रख दिया गया है। जानकारों का मानना है कि पानी पर हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है, यह किसी भी सरकार या संस्था का एहसान नहीं हो सकता。

- जल संरक्षण का संदेश: रिवर कनेक्ट कैंपेन की संगोष्ठी में पानी को मौलिक अधिकार बनाने की पुरजोर वकालत की गई।
- बच्चों ने पेश की मिसाल: नृत्य ज्योति कथक केंद्र में बच्चों ने कैनवास पर चित्रकला के जरिए जल प्रदूषण के प्रति जागरूक किया।
- खौफनाक आंकड़े: देश में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी निवास करती है, जबकि पीने योग्य मीठा पानी केवल 4 प्रतिशत है।
- शहरी कुप्रबंधन पर प्रहार: वक्ताओं ने कहा कि 40 प्रतिशत पानी लीकेज में बह रहा है और शहर टैंकर माफिया की गिरफ्त में हैं।
कैनवास पर उतरी पानी की अहमियत, बच्चों ने दिया बड़ा संदेश
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, विश्व जल दिवस के इस अहम मौके पर ‘नृत्य ज्योति कथक केंद्र’ ने अपनी नई शाखा ताज नगरी फेस 2 में एक बेहद रचनात्मक पहल की। इस अवसर पर छोटे-छोटे बच्चों को जल प्रदूषण और जल संरक्षण के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए एक चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की गई। बच्चों ने अपने रंगों और तूलिका के माध्यम से सूखी नदियों, प्यासे परिंदों और पानी बचाते इंसानों की जो तस्वीरें उकेरीं, उन्होंने वहां मौजूद हर शख्स को सोचने पर मजबूर कर दिया। इस उत्कृष्ट प्रदर्शनी और प्रतियोगिता में रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने पर्यावरणविद् ब्रज खंडेलवाल ने मुख्य निर्णायक की अहम जिम्मेदारी निभाई। उनके साथ डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य भी इस रचनात्मक मूल्यांकन का हिस्सा रहे। वहीं, कार्यक्रम की शुरुआत में विशाल झा ने उपस्थित सभी अतिथियों और पर्यावरण प्रेमियों का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए उनका आभार प्रकट किया।

यह कैसी विकास यात्रा? शुद्ध पेयजल से महरूम है आम आदमी
कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार और संयोजक ब्रज खंडेलवाल ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में सिस्टम की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने स्थिति की गंभीरता को बयां करते हुए तीखा तंज कसा कि आखिर हमारी यह कैसी विकास यात्रा है? आज हम स्मार्ट सिटी और चांद-तारों की बात कर रहे हैं, लेकिन जमीन पर आम आदमी को पीने के लिए दो घूंट शुद्ध पानी तक मयस्सर नहीं है। उन्होंने मंच से साफ शब्दों में मांग उठाई कि सुरक्षित पेयजल को केवल एक सुविधा न मानकर, इसे संविधान के तहत मौलिक मानव अधिकार के रूप में मान्यता दी जाए। इसके अलावा, इसे एक सख्त कानून के दायरे में लाना भी बेहद जरूरी है, ताकि सरकारों और नौकरशाहों की सीधी जवाबदेही तय की जा सके।

उन्होंने इस बात पर भी गहरा रोष जताया कि आज पानी को पूरी तरह से बाजार की एक बिकाऊ वस्तु बना दिया गया है। यह अंधी व्यावसायिकता हमारे समाज में असमानता की एक गहरी खाई खोद रही है। आज स्थिति यह है कि जो आर्थिक रूप से सक्षम है, वह बोतलबंद साफ पानी खरीदकर पी रहा है। वहीं दूसरी ओर, गरीब और लाचार आदमी दूषित और जानलेवा पानी पीने को अभिशप्त है। यह केवल प्यास का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर इंसान की गरिमा और उसके जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ एक गंभीर सामाजिक मुद्दा है।
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कुप्रबंधन की मार: आबादी 18 प्रतिशत, मीठा पानी सिर्फ 4 प्रतिशत
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रख्यात पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने ऐसे आंकड़े पेश किए, जिन्होंने सभी को हिला कर रख दिया। उन्होंने लगातार रसातल में जा रहे भूजल स्तर और नदियों के बढ़ते प्रदूषण पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि भारत के पास पूरी दुनिया की 18 प्रतिशत विशाल आबादी का बोझ है। हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए हमारे पास वैश्विक जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत ही मीठा पानी उपलब्ध है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश का यह जल संकट केवल प्रकृति की नाराजगी या संसाधनों की कमी का नतीजा नहीं है। बल्कि, यह हमारी सरकारों के घोर कुप्रबंधन, प्रशासनिक लापरवाही और अदूरदर्शिता का प्रत्यक्ष परिणाम है। उन्होंने जल संरक्षण के लिए एक स्पष्ट वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने और सतत जल प्रबंधन (Sustainable Water Management) की नीतियों को धरातल पर उतारने की वकालत की。

इस विचार-विमर्श में शहर के कई अन्य गणमान्य नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए। इनमें चतुर्भुज तिवारी, डॉ. ज्योति खंडेलवाल, राहुल नंदवंशी और दीपक राजपूत ने भी अपने विचार रखे। साथ ही, गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय, पंडित जुगल किशोर और पद्मिनी अय्यर ने भी जल संरक्षण की प्राचीन भारतीय पद्धतियों पर प्रकाश डाला। सभी वक्ताओं का एक ही मत था कि जल संकट की सबसे भारी कीमत समाज के सबसे कमजोर तबके को चुकानी पड़ती है। गरीब परिवार, महिलाएं, छोटे बच्चे और हाशिए पर खड़े लोग इसके सबसे पहले शिकार बनते हैं。
लीकेज और माफिया का गठजोड़: सूखती व्यवस्था के लिए अल्टीमेटम
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, वक्ताओं ने इस कटु सत्य को भी सामने रखा कि आज भी ग्रामीण भारत में हजारों महिलाएं तपती धूप में मीलों पैदल चलकर पानी ढोने को विवश हैं। इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य, उनकी दिनचर्या और उनके बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है। दूसरी तरफ, दूषित पानी के सेवन से डायरिया, हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियां ग्रामीण और मलिन बस्तियों में हर साल हजारों जिंदगियां निगल रही हैं। संगोष्ठी में शहरी जल प्रबंधन के खोखलेपन पर भी तीखा प्रहार किया गया। यह बताया गया कि नगर निगमों की खस्ताहाल पाइपलाइनों में होने वाले लीकेज के कारण लगभग 40 प्रतिशत शुद्ध पानी सड़कों पर बहकर बर्बाद हो जाता है। इस प्रशासनिक विफलता का सीधा फायदा शहरों में सक्रिय टैंकर माफिया उठा रहे हैं, जिनकी पकड़ सिस्टम पर लगातार मजबूत हो रही है。

जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश और लगातार बढ़ रही बेतहाशा गर्मी ने इस पूरी स्थिति को और भी विकराल रूप दे दिया है। हालांकि, वक्ताओं ने ‘जल जीवन मिशन’ जैसी महत्वाकांक्षी सरकारी योजनाओं की सराहना जरूर की। लेकिन, उन्होंने यह भी चेताया कि केवल गांवों में पाइप और नल बिछा देना ही काफी नहीं है। जब तक उन नलों में नियमित और स्वच्छ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ऐसे मिशन महज कागजी शेर ही साबित होंगे। जल संकट से निपटने के लिए तकनीक आधारित आधुनिक समाधान जैसे स्मार्ट मीटरिंग, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और भूजल के अवैध दोहन पर सख्त नियंत्रण की आवश्यकता पर जोर दिया गया。
अंत में, रिवर कनेक्ट कैंपेन ने सरकार और प्रशासन को सीधा अल्टीमेटम देते हुए अपील की कि जल प्रबंधन को अब ‘अधिकार आधारित’ नजरिए से देखा जाए। नदियों, कुओं और तालाबों का संरक्षण हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। चेतावनी दी गई कि यदि समय रहते हमारी नींद नहीं टूटी और कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले कल में सिर्फ हमारे नल ही नहीं सूखेंगे, बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता और व्यवस्था ही प्यास से तड़पकर सूख जाएगी。
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Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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