Sanjay Parate article on LPG price hike, inflation and Indian geopolitics

नागरिक परिक्रमा: गैस सिलेंडरों की कीमतों में आग, 7 लाख करोड़ की लूट का हिसाब कौन देगा?

आर्टिकल

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 09 Mar 2026, 03:30 pm IST

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Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Sanjay Parate Writer

संजय पराते

राजनीतिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार

राजनीतिक विश्लेषक संजय पराते ने अपनी इस विशेष ‘नागरिक परिक्रमा’ टिप्पणी में घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की बढ़ती कीमतों पर सरकार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने महंगाई के बहाने अमेरिका और इजरायल की अंध-भक्ति पर भी गंभीर कूटनीतिक सवाल खड़े किए हैं। पढ़िए उनका यह बेबाक आलेख:

मुख्य बिंदु

  • गैस सिलेंडरों की कीमतों में भारी उछाल, 12 सालों में जनता से 7 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त वसूली का दावा।
  • 2014 के 410 रुपये वाले सिलेंडर की कीमत आज 1100 के पार; पुराने चुनावी वादों की याद दिलाता लेख।
  • महंगाई का ठीकरा पश्चिम एशिया संकट (ईरान-अमेरिका-इजरायल) पर फोड़ने वाली सरकारी नीतियों की आलोचना।
  • भारत की संप्रभुता को ताक पर रखकर अमेरिकी नीतियों के सामने आत्मसमर्पण करने का तीखा आरोप।

भारत की आम जनता एक बार फिर भारी महंगाई का भयानक शिकार हुई है। मोदी सरकार ने घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में बहुत भारी वृद्धि कर दी है। सरकार ने आम आदमी की जेब पर सीधा डाका डाला है। अब 924 रूपये वाला गैर सब्सिडी घरेलू गैस सिलेंडर बहुत महंगा हो गया है। उपभोक्ता को अब इसके लिए 984 रूपये चुकाने होंगे। इसके अलावा व्यावसायिक सिलेंडर की कीमतों में भी भयंकर उछाल आया है। व्यापारी वर्ग को अब 1923.50 रूपये की जगह 2085.50 रूपये देने होंगे। उज्ज्वला योजना के तहत मिलने वाला गैस सिलेंडर भी इस मार से अछूता नहीं रहा है। गरीब परिवारों को उज्ज्वला सिलेंडर 553 रूपये की जगह अब 613 रूपये में मिलेगा। इससे पहले भी सरकार ने जनता को कई तगड़े झटके दिए हैं। सरकार ने अप्रैल 2025 में घरेलू गैस सिलेंडर की दर में 50 रूपये की भारी बढ़ोतरी की थी। इसी महीने 1 मार्च को व्यावसायिक गैस सिलेंडर की दर में 28 रूपये की वृद्धि हुई थी। इस प्रकार हम स्पष्ट देखते हैं कि मोदी राज में गैस की कीमत दुगुने से भी ज्यादा हो चुकी है।

सरकार के इस तानाशाही कदम ने हर घर का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। सत्ता में आने से पहले वर्तमान सत्ताधारी दल ने महंगाई पर बहुत हंगामा किया था। भाजपा नेताओं ने ‘बहुत हुई महंगाई की मार’ का ज़ोरदार नारा लगाते हुए सड़कों पर उग्र प्रदर्शन किए थे। स्वर्गीय सुषमा स्वराज का गैस सिलेंडर सिर पर लिए हुए सड़क पर नाचने वाला फोटो आज भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। इसके अलावा स्मृति ईरानी भी गैस की कीमतों पर खूब शोर मचाती थीं। साल 2014 में देश की राजधानी दिल्ली में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत लगभग 410 रूपये थी। आज वही घरेलू गैस सिलेंडर लगभग 1103 रूपये का हो गया है। यह वृद्धि सीधे तौर पर 169 प्रतिशत बैठती है। यह डरावना आंकड़ा आम जनता की कमर तोड़ने के लिए काफी है। देश में हर साल लगभग 180 करोड़ गैस सिलेंडरों की भारी खपत होती है। इसका सीधा अर्थ है कि मोदी राज ने पिछले 12 सालों में आम जनता से जमकर पैसा वसूला है। सरकार ने केवल गैस सिलेंडरों से ही लगभग 7 लाख करोड़ रूपये अतिरिक्त निचोड़ लिए हैं।

इस प्रकार अंधाधुंध तरीके से गैस की कीमत बढ़ाने वाली इस सरकार को जनता कभी माफ नहीं कर सकती है। सरकार ने अपने सारे पुराने चुनावी वादे पूरी तरह भुला दिए हैं। गैस की कीमतों में हुई इस बढ़ोतरी का सारा बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। ये दोनों तरह की मूल्य वृद्धि मध्यम वर्ग और कामकाजी लोगों पर बहुत बुरा असर डालेंगी। आम इंसान पहले से ही बढ़ती महंगाई और घटती वास्तविक आय के बीच बुरी तरह पिस रहा है। सरकार के इस असंवेदनशील फैसले ने उनके कंधों पर और अधिक आर्थिक बोझ डाल दिया है। वास्तव में गैस की कीमतों में इस अनावश्यक वृद्धि से आसानी से बचा जा सकता था। यदि मोदी सरकार सिलेंडरों पर करों से प्राप्त होने वाले अपने राजस्व का एक छोटा सा हिस्सा छोड़ने के लिए तैयार हो जाती। लेकिन सरकार ने ऐसा बिल्कुल नहीं किया। ऐसा न करना इस सरकार की घोर जनविरोधी प्रवृत्ति को ही खुलेआम उजागर करता है। सरकार को सिर्फ अपना खजाना भरने की चिंता है।

मोदी सरकार ने इस मूल्य वृद्धि के लिए पश्चिम एशियाई संघर्ष का बेतुका हवाला दिया है। सरकार का यह तर्क पूरी तरह से बचकाना और हास्यास्पद लगता है। सरकार दरअसल अपनी खुद की भयंकर कमजोरियों को छिपाने का लगातार प्रयास कर रही है। कल तक यह सरकार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर स्वयं अपनी पीठ थपथपा रही थी। सरकार के मंत्री कहते थे कि ईरान पर अमेरिकी-इजरायल हमले का भारत पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। वे दावा करते थे कि मोदी सरकार इन वैश्विक हमलों के प्रभावों से निपटने में पूरी तरह सक्षम है। यहां तक कि सरकार ने रूस से तेल खरीदने के मामले में भी अपनी कूटनीतिक जीत का खूब ढिंढोरा पीटा था। गोदी मीडिया लगातार बताता था कि भारत ने अमेरिकी सरकार को पूरी तरह झुका दिया है। यह सब सिर्फ एक झूठा प्रचार था। असलियत यह है कि रूस ने अब भारत को एक कड़ा झटका दिया है। रूस ने साफ घोषणा कर दी है कि अब वह भारत को कच्चे तेल की कीमतों में कोई भी रियायत बिल्कुल नहीं देगा। रूस अब भारत से विश्व बाजार के अनुसार बढ़ी-चढ़ी कीमतें वसूलेगा।

पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष में भारत सरकार का रुख बहुत ही निराशाजनक है। भारत ने प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका और इजरायल का अंधा समर्थन किया है। यह समर्थन अब हमें सीधे तौर पर भारी नुकसान पहुंचा रहा है। वास्तव में यह सरकार की एक बहुत बड़ी कूटनीतिक विफलता है। ट्रम्प प्रशासन की खतरनाक युद्ध-उन्माद नीतियों के आगे मोदी सरकार ने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया है। सरकार हमारे देश और उसके आम लोगों के हितों की लगातार अनदेखी कर रही है। वह सिर्फ अमेरिकी वैश्विक हितों की सेवा करने के लिए पूरी तरह तैयार बैठी है। मोदी सरकार का यह आत्मघाती रुख हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर देगा। वास्तव में यह पश्चिमी युद्ध भारतीय जनता के लिए बहुत बड़ी तबाही ला रहा है। यह युद्ध ऐसी भयंकर महंगाई ला रहा है जिसकी कोई आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता है। हमने वैश्विक स्तर पर अपनी रणनीतिक संप्रभुता पूरी तरह खो दी है। जिस देश के पास अपनी स्वतंत्र संप्रभुता नहीं होती, उसकी राजनैतिक आजादी का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि मोदी सरकार ने पूरे देश की जनता को एक तरह से अमेरिका का गुलाम बना दिया है। कूटनीतिक गुलामी की ये जंजीरें आज इतनी ज्यादा मोटी हो चुकी हैं कि हम अपना स्वतंत्र फैसला नहीं ले सकते। अपने ही देश के लिए अपनी जरूरत का तेल खरीदने के लिए अब हमें अमेरिका से अनुमति लेने की जरूरत पड़ती है। यह भारत जैसे संप्रभु राष्ट्र के लिए बहुत ही शर्मनाक स्थिति है। भारत हमेशा से गुटनिरपेक्ष नीति का एक बहुत मजबूत पैरोकार रहा है। लेकिन आज हमारी विदेश नीति पूरी तरह से वाशिंगटन के इशारों पर नाच रही है। सरकार को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का असर सीधे आम आदमी की रसोई पर पड़ता है। जब तेल महंगा होता है, तो ढुलाई अपने आप महंगी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप फल, सब्जियां और रोज़मर्रा का हर सामान बहुत ज्यादा महंगा हो जाता है।

गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए अब दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी भारी पड़ रहा है। उज्ज्वला योजना का चुनाव में खूब प्रचार किया गया था। लेकिन आज गरीब महिलाएं फिर से लकड़ी और पारंपरिक चूल्हे पर खाना पकाने को मजबूर हैं। क्योंकि वे 613 रुपये का गैस सिलेंडर भराने का भारी खर्च बिल्कुल नहीं उठा सकती हैं। सरकार को अपनी इस घोर जनविरोधी नीति पर तुरंत पुनर्विचार करना चाहिए। सरकार को पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस पर लगने वाले भारी-भरकम टैक्स को तुरंत कम करना चाहिए। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बहुत कम होती हैं, तब भी सरकार जनता को कोई राहत नहीं देती है। लेकिन जैसे ही कोई वैश्विक संकट आता है, सरकार तुरंत सारा बोझ जनता पर डाल देती है। यह देश की जनता के साथ सरासर अन्याय है।

सात लाख करोड़ रुपये की इस भारी-भरकम लूट का हिसाब जनता अब चुनाव में जरूर मांगेगी। विपक्ष को भी इस गंभीर मुद्दे पर सरकार को संसद से लेकर सड़क तक घेरना चाहिए। नागरिक परिक्रमा कॉलम का यह स्पष्ट मानना है कि सरकार की जवाबदेही हर हाल में तय होनी चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता हमेशा सर्वोपरि होती है। कोई भी चुनी हुई सरकार जनता को इस तरह से खुलेआम नहीं लूट सकती है। सरकार को अर्थव्यवस्था की असल सच्चाई को तुरंत स्वीकार करना चाहिए। उसे झूठे दावों और बेतुके विदेशी तर्कों से बाहर निकलना चाहिए। अगर सरकार ने इस बेलगाम महंगाई को तुरंत नियंत्रित नहीं किया, तो देश में एक बहुत बड़ा सामाजिक असंतोष फैल जाएगा। जनता का धैर्य अब पूरी तरह टूट चुका है। भारत का भविष्य अब एक बहुत ही गंभीर चौराहे पर खड़ा है। हमें एक ऐसी जिम्मेदार सरकार चाहिए जो अमेरिका की नहीं, बल्कि अपने देश की आम जनता की परवाह करे।

आज बाज़ार में हर चीज़ के दाम लगातार आसमान छू रहे हैं। ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ने से आम उपभोग की वस्तुएं रोज महंगी हो रही हैं। दाल, चावल, आटा और खाद्य तेल जैसी बुनियादी चीजें भी आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर हो गई हैं। गरीब आदमी के लिए अब जीवित रहना भी एक बड़ा संघर्ष बन गया है। सरकार अपनी आर्थिक विफलताओं को छिपाने के लिए रोज़ नए-नए जुमले गढ़ती है। लेकिन ये सियासी जुमले किसी के भूखे पेट की आग को बिल्कुल नहीं बुझा सकते हैं। जब आम आदमी का घर का बजट बिगड़ता है, तो पूरे परिवार की शांति भंग हो जाती है। लोगों को बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च में कटौती करनी पड़ती है। यह हमारे देश के भविष्य के लिए बहुत ही घातक संकेत है। सरकार बड़ी-बड़ी कंपनियों का लाखों करोड़ रुपये का भारी कर्ज आसानी से माफ कर देती है। कॉरपोरेट घरानों को बहुत भारी टैक्स छूट दी जाती है। लेकिन जब बात आम आदमी की रसोई की आती है, तो सरकार अंतरराष्ट्रीय बाज़ार का झूठा रोना रोने लगती है।

यह सरकारी दोहरा मापदंड अब देश की जनता अच्छी तरह समझ चुकी है। सात लाख करोड़ रुपये कोई छोटी रकम बिल्कुल नहीं होती है। इस भारी भरकम राशि से देश में कई नए अस्पताल और बेहतरीन स्कूल आसानी से बन सकते थे। इस पैसे से करोड़ों बेरोजगार युवाओं को रोज़गार दिया जा सकता था। लेकिन यह सारा पैसा सिर्फ सरकारी खजाने को भरने और कॉरपोरेट दोस्तों को फायदा पहुंचाने में खर्च हो गया। राजनीतिक टिप्पणीकार संजय पराते ने बिल्कुल सही सवाल उठाया है। इस सात लाख करोड़ रुपये का हिसाब कौन देगा? यह पैसा देश की उस गरीब जनता का है जो खून-पसीना एक करके अपना गुज़ारा करती है। सरकार को इस भारी लूट का जवाब हर हाल में देना ही होगा।

आज के समय में रसोई गैस कोई विलासिता की वस्तु नहीं है। यह हर परिवार की सबसे बुनियादी और पहली जरूरत है। सरकार ने इसे भी एक भारी मुनाफे का साधन बना लिया है। यह एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के बिल्कुल खिलाफ है। भारतीय संविधान हर नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने का मौलिक अधिकार देता है। लेकिन यह भयंकर महंगाई नागरिकों से उनका यह मौलिक अधिकार खुलेआम छीन रही है। हमें इस आर्थिक अन्याय के खिलाफ अपनी मजबूत आवाज बुलंद करनी होगी। हमें सरकार की इन जनविरोधी नीतियों का पुरजोर तरीके से विरोध करना होगा। तभी जाकर आम आदमी को इस असहनीय महंगाई से थोड़ी राहत मिल सकेगी। भारत का मध्यम वर्ग आज सबसे ज्यादा परेशान और हताश है। वह न तो सरकार से कोई मुफ्त योजना की उम्मीद करता है और न ही वह सड़कों पर उतरकर हिंसक प्रदर्शन करता है। वह चुपचाप अपना टैक्स भरता है। लेकिन बदले में सरकार उसे सिर्फ बढ़ती हुई महंगाई का एक और नया तोहफा देती है। गैस सिलेंडर की कीमत में यह ताज़ा वृद्धि इस मध्यम वर्ग की पीठ पर एक और ज़ोरदार प्रहार है। सरकार को यह भारी अहंकार हो गया है कि वह कुछ भी करेगी और जनता उसे चुपचाप सह लेगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी किसी सरकार ने आम आदमी की रोटी और रसोई पर सीधा हमला किया है, तो उस सत्ता का पतन बहुत जल्द हुआ है। इसलिए सत्ताधीशों को समय रहते इस जमीनी हकीकत को पहचान लेना चाहिए। उन्हें अपने कॉरपोरेट मित्रों की तिजोरी भरने के बजाय आम जनता की रसोई की फिक्र करनी चाहिए।

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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