Brij Khandelwal article on love marriage registration and parental consent laws

प्यार किया तो पेरेंट्स से छिपाने वाली क्या बात है? गार्ड रेल्स, जंजीरें नहीं: क्यों ज़रूरी है विवाह में एहतियात की एक परत

ओपिनियन

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | 02 Mar 2026, 12:15 pm IST

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Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Brij Khandelwal Writer

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस लेख में प्रेम विवाह, लव जिहाद के आरोपों और विवाह पंजीकरण में माता-पिता की सूचना अनिवार्य करने वाले प्रस्तावित कानूनों पर एक संतुलित और बेबाक विमर्श प्रस्तुत किया है। पढ़िए उनका यह विचारोत्तेजक लेख:

रीना, 23 साल की। मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी-सादी लड़की। छोटे शहर से महानगर आई थी नौकरी की तलाश में। सोशल मीडिया पर एक युवक से दोस्ती हुई। नाम कुछ और बताया। धर्म कुछ और। परिवार के बारे में अधूरी बातें। बड़े सपने। मीठी बातें। “मैं तुमसे शादी करूँगा… बस घरवालों को मत बताना अभी।” रीना ने भरोसा किया। मोहब्बत में अक्सर तर्क पीछे छूट जाता है। कुछ ही दिनों में जल्दी-जल्दी अदालती शादी। परिवार को खबर तक नहीं। कागज़ी औपचारिकताएँ पूरी। फिर दबाव। “धर्म बदल लो… वरना रिश्ता नहीं चलेगा।” जिस्मानी और भावनात्मक ब्लैकमेल। निजी तस्वीरों की धमकी। दूसरे शहर भागे। जब तक रीना को सच्चाई समझ आई, बहुत देर हो चुकी थी। यह कहानी काल्पनिक हो सकती है, लेकिन आए दिन इस तरह की खबरें पढ़ने को मिल रही हैं, और ऐसे आरोपों वाले मामले देश के कई हिस्सों में दर्ज भी हुए हैं। बस यहीं से सवाल उठता है : क्या विवाह जैसी गंभीर संस्था में एक न्यूनतम सूचना-प्रणाली, एक पारिवारिक सूचना, एक “पॉज़”, एक कूलिंग समयावधि ज़रूरी नहीं है?

भारत कोई प्रयोगशाला समाज नहीं है। यह तहज़ीबों, रिश्तों और भावनाओं से बुना देश है। तेज़ बदलाव के दौर में भी परिवार यहाँ एक अहम इकाई है। इसी पृष्ठभूमि में गुजरात रजिस्ट्रेशन of Marriages Act, 2006 में प्रस्तावित संशोधन आजकल विवाद और चर्चा में है। फरवरी 2026 में गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने घोषणा की कि विवाह पंजीकरण के समय जोड़े को यह बताना होगा कि क्या माता-पिता को सूचना दी गई है। उनके संपर्क विवरण दिए जाएँगे। रजिस्ट्रार दस कार्य दिवस में सूचना देगा। 30–40 दिन की अवधि सत्यापन और आपत्ति के लिए होगी। विरोधी कहते हैं ये निजता पर हमला है। समर्थक कहते हैं ये पारदर्शिता और सुरक्षा का मंत्र है। बहस का केंद्र अंतरधार्मिक प्रेम नहीं है। न ही यह वयस्कों की आज़ादी छीनने का प्रस्ताव है। संविधान हर बालिग को अपनी पसंद से विवाह और धर्म चुनने का अधिकार देता है। मगर समस्या वहाँ खड़ी होती है जहाँ प्रेम की आड़ में फ़रेब होता है।

झूठी पहचान। जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप। कई बार नाबालिगों का शोषण। जिन राज्यों में विशेष कानून बने, वहाँ कुछ आँकड़े सामने आए हैं। Uttar Pradesh Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act 2020 के तहत 2021 से 2024 के बीच सैकड़ों मामले दर्ज हुए, अनेक गिरफ्तारियाँ हुईं। कुछ मामलों में अदालत में पीड़िताओं ने जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया। मध्य प्रदेश में Madhya Pradesh Freedom of Religion Act 2021 के अंतर्गत भी अनेक मामले दर्ज हुए, जिनमें नाबालिग लड़कियों के केस शामिल थे। सज़ा कम होना यह साबित नहीं करता कि समस्या नहीं है। कई बार गवाह दबाव में मुकर जाते हैं। सुरक्षा नहीं मिलती। मुकदमे लंबित रहते हैं। पहले ऐसे मामलों को सामान्य आपराधिक धाराओं में दर्ज किया जाता था। धर्म परिवर्तन का पहलू अलग से दर्ज ही नहीं होता था। अब कम से कम तस्वीर आंशिक रूप से साफ़ हो रही है।

सवाल यह है ; अगर कुछ रीना जैसी लड़कियाँ सचमुच धोखे का शिकार हो रही हैं, तो क्या राज्य चुप रहे? भारत में विवाह सिर्फ़ दो व्यक्तियों का कॉन्ट्रैक्ट नहीं है। यह परिवारों का मिलन है। बैंड बाजा बारात। सामाजिक संतुलन से जुड़ा रिश्ता है। जब धोखा होता है, तो असर व्यापक होता है। गुजरात का प्रस्ताव माता-पिता को वीटो पावर नहीं देता। यह सिर्फ सूचना देता है। एक दस्तावेज़ी रिकॉर्ड बनाता है। एक ठहराव देता है। आज के डिजिटल दौर में फर्जी प्रोफाइल बनाना आसान है। पहचान छिपाना आसान है। ऐसे में सावधानी को “जंजीर” कहना शायद अतिशयोक्ति है। साथ ही यह भी सच है कि किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। असली प्रेम करने वाले जोड़ों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। निगरानी और जवाबदेही ज़रूरी है। देश स्तर पर भी एक समान नीति पर विचार हो सकता है। गवाह सुरक्षा तंत्र मजबूत होना चाहिए। संगठित अपराध पर कड़ी सज़ा होनी चाहिए। लेकिन मूल प्रश्न वही है ; क्या राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं कि वह कमजोरों की हिफ़ाज़त करे? रीना की काल्पनिक कहानी हमें भावुक कर सकती है। पर असली मुद्दा भावुकता नहीं, एहतियात है। आज़ादी बेशक़ अज़ीज़ है। मगर सुरक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है। अगर विवाह पंजीकरण से पहले एक पारिवारिक सूचना किसी एक रीना को भी संभावित धोखे से बचा ले, तो क्या यह कदम पूरी तरह ग़लत कहा जा सकता है? भारत जैसे संवेदनशील, विविध और जटिल समाज में, संतुलन ही असली सुशासन है。

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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