सारी सड़कें रोम जाती हैं, मगर दिल भारत के लिए तड़पता है: बृज खंडेलवाल

खबर शेयर कीजिए

रोम के प्राचीन इतिहास, कोलोसियम के किस्से और ग्लोबल फैमिली के साथ देसी यादों की भावुक विदाई पर वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का विशेष संस्मरण

आर्टिकल डेस्क | 🌐 tajnews.in | 26 सितंबर 2026 | 14:55 बजे

आर्टिकल डेस्क
Brij Khandelwal

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरणविद् व अंतरराष्ट्रीय यात्रा-वृतांत लेखक
धरोहर, पर्यावरण, नागरिक समाज और वैश्विक यात्रा संस्मरणों पर निरंतर प्रखर व सजीव लेखन।

रोम को सिर्फ इतिहास पढ़ना नहीं आता। वह इतिहास को पहनता है, पुरानी दीवारों, खंडहरों, फव्वारों, सड़कों और इमारतों पर ऐसे, जैसे कोई बुजुर्ग नवाब अपना थोड़ा घिसा मगर बेहद महँगा शेरवानी पहनकर बैठा हो।

कुछ दिन रोम की वास्तुकला और पुरानी इमारतों के बीच घूमने के बाद एक बात साफ हो जाती है, रोम एक दिन में तो नहीं बन सकता था। इसे बनाने में सदियाँ लगीं। युद्ध हुए, फतहें हुईं, बादशाह आए और गए, साजिशें हुईं, हत्याएँ हुईं, वीरगाथाएँ लिखी गईं और न जाने कितने इतालवी लोगों ने बहस करते-करते शायद Forum की दीवारें भी हिला दी होंगी।

कहावत है, सारी सड़कें रोम जाती हैं। इस कहावत ने मुझे ताज नगरी के एक भुला दिए गए किस्से की याद दिला दी। कहते हैं, कभी दूर किसी धूल भरे गाँव में लोला नाम का एक खुशमिजाज, मगर थोड़ा कम-अक्ल आदमी रहता था। सपने बड़े थे, जेब छोटी थी और मुँह दोनों से बड़ा।

HIGHLIGHTS
  • रोम का इतिहास और आकर्षण: सदियों पुरानी वास्तुकला, कोलोसियम, फोरम और सस्ते पास्ता की तलाश में घूमे लोला की चुटीली कहानी।
  • चलता-फिरता मोहल्ला बनी बस: ग्लोबल फैमिली समूह में गीत, किस्से, आपसी अपनापन और यूरोपीय सड़कों पर देसी रंगत।
  • इंसानियत का अनूठा रिश्ता: कोलोसियम में पद्मिनी जी के पैर में मोच पर पूनम जी की मरहम वाली मदद और परस्पर देखभाल।
  • यात्रा का भावुक समापन: साम्राज्य और स्मारक मिट जाते हैं, पर आपसी दोस्ती, मुश्किल में थामे गए हाथ और साझी यादें सदा जिंदा रहती हैं।

एक सुबह उसने ऐलान कर दिया, “मैं दुनिया घूमने निकल रहा हूँ! जिसके पास ज़बान है, वह रोम जा सकता है। और मेरी ज़बान तो रुकने का नाम ही नहीं लेती!” गाँव वाले हँस पड़े। बूढ़े नत्थू ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, रोम भी कदम-कदम चलकर ही पहुँचा जाता है। अपनी बकबक के सहारे उड़ने की कोशिश मत करना।”

लोला चल पड़ा। ऊँची सड़क ली, नीची सड़क ली, कीचड़ वाली सड़क ली और आखिर में बकरियों की पगडंडी भी पकड़ ली। कोई पूछता, “कहाँ जा रहे हो?” लोला छाती फुलाकर कहता, “रोम! आखिर सारी सड़कें रोम जाती हैं!” हफ्ते बीत गए। जूते घिस गए। पेट ने धरना दे दिया। जेब ऐसी हल्की हुई जैसे चुनाव के बाद नेता का वादा। लेकिन लोला चलता रहा। “रोम एक दिन में नहीं बना था,” वह खुद को समझाता। “तो पहुँचना भी एक दिन में जरूरी नहीं।”

आखिर एक दिन रोम सामने था। धूप में चमकता हुआ शाश्वत शहर। लोला सीधे एक रेस्तराँ में घुसा और सबसे बड़ी प्लेट पास्ता मँगाई। वेटर ने उसके कीचड़ से सने जूते और खुशी-खुशी गाते चेहरे को देखकर शक की निगाह डाली। लोला ने आँख मारी, “जब रोम में हो तो रोम वालों जैसा ही करो!” एक प्लेट और मँगाई। फिर तीसरी।

यहीं लोला को रोम का सबसे बड़ा राज समझ आया। रोम ने कभी दुनिया पर राज किया था, लेकिन अब वह पर्यटकों की जेब पर राज करता है। रेस्तराँ हो, दुकान हो, गाइड हो या कोई मुस्कुराता हुआ अजनबी, सबकी जुबान पर एक ही प्राचीन रोमन शब्द था, यूरो! लोला की जेब घंटे-दर-घंटे हल्की होती गई। उसने आह भरकर कहा, “पहले रोम ने दुनिया जीती। अब रोम मुझे जीत रहा है!”

बाद में वह सेंट पीटर स्क्वायर पहुँच गया। वहाँ एक भव्य धार्मिक जुलूस चल रहा था। लोला ने पूछा, “पोप साहब आसपास हैं क्या?” एक गंभीर कार्डिनल ने उसे घूरकर देखा। लोला तुरंत संभल गया, “अच्छा-अच्छा, समझ गया। रोम में रहना है तो पोप से पंगा नहीं लेना चाहिए।” फिर बोला, “वैसे रोम का पोप बनना तो सबके बस की बात नहीं। मैं तो ऐसा आदमी बनूँगा जो सस्ता पास्ता बेचता हो।”

शाम तक लोला थककर चूर हो गया और लगभग खाली जेब लेकर कोलोसियम के पास जा बैठा। एक सड़क कलाकार वायलिन बजा रहा था और पर्यटक उसके सामने सेल्फी खींच रहे थे। लोला हँस पड़ा। “नीरो ने रोम में आग लगने के समय वायलिन बजाया था। आज यह भाई साहब पर्यटकों के क्रेडिट कार्ड जलते समय वायलिन बजा रहे हैं!” कलाकार मुस्कुराया। “शायद यही रोमन तरीका है।”

पास ही कुछ पर्यटक Trevi Fountain का रास्ता खोज रहे थे। एक नक्शे पर भरोसा कर रहा था, दूसरा GPS पर और तीसरा दावा कर रहा था कि उसे रोम की रहस्यमयी आत्मिक दिशा का ज्ञान है। लोला अचानक उठ खड़ा हुआ। “अरे भाई, झगड़ क्यों रहे हो? सारी सड़कें रोम आती हैं और हम पहले से रोम में हैं!” पास खड़ा एक Swiss Guard, जो न जाने किस रहस्यमय वेटिकन काम से वहाँ आया था, गंभीर आवाज में बोला: “Roma locuta est, causa finita est.” यानी, रोम बोल चुका। मामला खत्म। लोला ने काल्पनिक टोपी उतारी। “संदेश समझ लिया, हुजूर!” और इस तरह लोला ने रोम को जीत लिया, बिना किसी जंग के, बिना किसी सेना के और बिना कुछ जीते हुए भी सबका ध्यान जरूर जीत लिया।

हमारा भी अपना रोम था

हमारा Global Family समूह भी लोला से ज्यादा पीछे नहीं था। हमने भी इटली को अपने देसी अंदाज़ में फतह किया। रेस्तराँ जीते, होटल जीते, हाईवे जीते, हरी-भरी घाटियाँ देखीं और पहाड़ों की चोटियों तक पहुँचे। थकान को गीतों से हराया। भूख को खाने से। और लंबी बस यात्राओं को बातचीत से।

हमारी बस अब सिर्फ बस नहीं रही थी। वह चलता-फिरता मोहल्ला बन चुकी थी। किसी न किसी को गाना था। कोई गपशप कर रहा था। कोई खाने की तलाश में था। कोई बाथरूम पूछ रहा था। और कोई हर आधे घंटे बाद वही सनातन सवाल दाग रहा था: “और कितनी देर है?”

रोम की घुमावदार सड़कों पर बस की सवारी भी किसी रोमांच से कम नहीं थी। हर मोड़ के बाद इतिहास का एक नया पन्ना खुल जाता था। हमारी रोमन सिटी-टूर गाइड भी पूरी शान से अपना फर्ज निभा रही थीं। हाँ, कभी-कभी उनका विवरण हमारी समझ से किसी दूसरी सड़क पर निकल जाता था। लेकिन इसमें भी रोम की खूबसूरती थी। रोम में सड़कें ही नहीं, कमेंट्री भी भटकने की आज़ादी रखती है।

कोलोसियम का मोड़ और इंसानी हमदर्दी की मिसाल

लेकिन इस पूरे सफर का सबसे बड़ा आकर्षण फिर भी कोई स्मारक नहीं था। वह थी प‍द्मिनी। कोलोसियम में प‍द्मिनी अय्यर का पैर बुरी तरह मुड़ गया। अचानक रोमन साम्राज्य, ग्लैडिएटर, बादशाह और प्राचीन युद्ध सब पीछे छूट गए। उस वक्त हमारे लिए दुनिया का सबसे बड़ा था: दर्द का साम्राज्य।

प‍द्मिनी दर्द से परेशान बैठी थीं और मदद का इंतजार कर रही थीं। तभी पूनम जी एक छोटी मगर बेहद कीमती मरहम की ट्यूब लेकर सामने आईं। और यहीं कहानी में असली रोमन ट्विस्ट आया। एक दिन पहले तक प‍द्मिनी पूनम जी को गले और खाँसी के लिए आयुर्वेदिक गोलियाँ दे रही थीं। कल प‍द्मिनी थीं फार्मासिस्ट। आज पूनम जी बन गईं डॉक्टर। यात्रा में कर्म का हिसाब-किताब किसी अदालत में नहीं होता। वक्त आते ही हिसाब बराबर हो जाता है। न कोई अपॉइंटमेंट। न पर्ची। न फीस। बस इंसानियत।

फिर आया विदाई का वक्त

वेटिकन सिटी, विशाल बेसिलिका, नदी और रोम के बाकी नज़ारे देखने के बाद आखिर वह घड़ी भी आ गई, जिससे हर यात्री बचना चाहता है: सामान बाँधने की घड़ी। सूटकेस भी जैसे बंद होने से इंकार कर रहे थे। जूते किसी कोने में ठूँसे गए। स्मृति-चिह्न उन बैगों में घुसाए गए जो पहले ही अतिरिक्त सामान के खिलाफ बगावत कर चुके थे। और अचानक हँसी कुछ धीमी पड़ गई। क्योंकि हर सफर की एक मंज़िल होती है।

शेक्सपीयर ने विदाई को “मीठा दुख” कहा था। लगता है, वह भी कभी ग्रुप टूर पर गया होगा। कई दिनों तक हम देशों, पहाड़ों, नदियों, हवाई अड्डों, होटलों और सड़कों से गुजरते रहे। साथ खाया। साथ हँसे। साथ रास्ता भूले। फिर एक-दूसरे को ढूँढ़ निकाला। और कभी-कभी यह भी पता लगाया कि बस में कौन गायब है! पेरिस और रोम के बीच कहीं अजनबी साथी बन गए। पहाड़ों और खाने की मेज के बीच साथी दोस्त बन गए। और मजाक, गीतों, थके पैरों और साझा भोजन के बीच Global Family सिर्फ एक ट्रैवल कंपनी का नाम नहीं रहा। वह सचमुच एक छोटा-सा चलता-फिरता परिवार बन गया।

विदाई के समय Lady Martha भी अपने जज़्बात छिपा नहीं सकीं। हममें से कई लोग भी नहीं छिपा पाए। फोन नंबर फिर से सेव हुए। “संपर्क में रहना” कई बार दोहराया गया। कुछ वादे किए गए। कुछ मुस्कानें दी गईं। कुछ आँखें भीगीं। हम जानते थे कि कुछ ही दिनों में जिंदगी सबको वापस अपनी पुरानी पटरी पर खींच ले जाएगी। लेकिन कुछ बदल चुका था। हम इस यात्रा पर पर्यटक बनकर आए थे। अब लौट रहे थे तो अपने साथ एक साझा कहानी लेकर।

रोम ने हमें कोलोसियम दिया। वेनिस ने गोंडोला दिया। आल्प्स ने पहाड़ दिए। पेरिस ने एफिल टावर दिया। लेकिन इस सफर ने हमें वह चीज दी, जो दुनिया का कोई स्मारक नहीं दे सकता— लोगों की यादें। बसें रुक जाएँगी। पासपोर्ट वापस दराज में चले जाएँगे। सूटकेस किसी कोने में धूल खाएँगे। यात्रा की तस्वीरें हजारों WhatsApp तस्वीरों के बीच धीरे-धीरे दब जाएँगी। लेकिन हँसी बची रहेगी। गीत बचेंगे। वह छोटा-सा मरहम बचा रहेगा। वह एक-दूसरे का हाथ थामना बचा रहेगा। और शायद कई साल बाद कोई अचानक पूछेगा: “याद है वह Europe trip?” और देखते ही देखते सबके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी। यही तो सफर का अजब करिश्मा है। हम सोचते हैं कि हम जगहों को देखने जा रहे हैं। लेकिन आखिर में हम जगहों से ज्यादा लोगों को अपने साथ घर ले आते हैं।

अलविदा रोम

तो अलविदा रोम। तुम्हारी सदियों पुरानी ईंटों को सलाम। तुम्हारे भव्य गिरजाघरों को सलाम। तुम्हारी शोरभरी सड़कों को सलाम। तुम्हारे बेहिसाब ट्रैफिक को भी सलाम—हालाँकि उससे सलाम करने का मन कम और बचकर निकलने का मन ज्यादा करता है! अलविदा उस शहर को, जहाँ बादशाहों ने अमर होने के सपने देखे।

हमारी यात्रा ने मगर हमें एक और सादा सच सिखाया। साम्राज्य मिट जाते हैं। स्मारक बूढ़े हो जाते हैं। सड़कें बदल जाती हैं। लेकिन एक छोटी-सी मेहरबानी, एक साझा ठहाका और मुश्किल वक्त में बढ़ा हुआ दोस्त का हाथ, इनकी उम्र बहुत लंबी होती है। सड़कें हमें रोम तक ले आईं। लेकिन दोस्ती हमें घर तक ले जाएगी। शायद यही सबसे खूबसूरत सड़क है।

Arrivederci, Global Family! सफर यहाँ खत्म हो रहा है। कहानी नहीं। और न ही वे यादें, जो अब हमारे दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए अपना सामान जमा चुकी हैं।

Pawan Singh

Pawan Singh

Editor in chief, Taj News Network

pawansingh@tajnews.in

WhatsApp: 7579990777


खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment