खून के छींटें ब्लैकबोर्ड पर! : संपृक्ता बोस (अनुवाद : संजय पराते)

खबर शेयर कीजिए

आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | मंगलवार, 8 सितंबर 2026, 10:15:00 AM IST

Taj News Logo
Taj News
Article Desk

खून के छींटें ब्लैकबोर्ड पर!

(रिपोर्ट : संपृक्ता बोस | अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)

प्रमुख अंश (Highlights):

  • स्कूल की बदहाली पर सवाल की कीमत मौत: बांकुरा के करिशुंडा प्राइमरी स्कूल की जर्जर हालत पर सवाल उठाने वाले युवा कार्यकर्ता अब्दुल हफ़ीज़ पर हमला, बचाने आए बुजुर्ग पिता शेख मोहम्मद माफ़िक की पीट-पीटकर हत्या।
  • मुआवजे से इनकार, स्कूल की मांग: स्वतंत्रता दिवस पर दम तोड़ने वाले भूमिहीन मजदूर के परिवार ने सरकारी नकद सहायता ठुकराई; पिता की स्मृति में आधुनिक सरकारी स्कूल बनाने की रखी शर्त।
  • प्रशासन को 10 दिन का अल्टीमेटम: वामपंथी, छात्र और नागरिक संगठनों के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने गांव का दौरा किया; हत्यारोपियों और लापरवाह पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई न होने पर एसडीओ कार्यालय घेराव की चेतावनी।
  • लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला: प्राथमिक शिक्षा और संस्थागत पारदर्शिता की मांग करने वाले नागरिकों को हिंसा और ‘राष्ट्र-विरोधी’ के ठप्पे से दबाने के खिलाफ राज्यव्यापी जनाक्रोश।
Sanjay Parate

रिपोर्ट : संपृक्ता बोस | अनुवाद : संजय पराते

संपृक्ता बोस (स्वतंत्र पत्रकार) | संजय पराते (उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा | संपर्क: 94242-31650)
सार्वजनिक शिक्षा, लोकतांत्रिक अधिकारों, राजनीतिक हिंसा और जन-आंदोलनों पर गंभीर व जमीनी रिपोर्टिंग।

बांकुरा ज़िले के इंदस ब्लॉक में स्थित करिशुंडा गाँव में हाल ही में हुई हिंसक झड़प ने पूरे पश्चिम बंगाल में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बिगड़ती हालत को सबके सामने ला दिया है। 24 साल के शिक्षा कार्यकर्ता अब्दुल हफ़ीज़ पर बेरहमी से हुए हमले और उसके बाद उनके पिता शेख़ मोहम्मद माफ़िक — जो भूमिहीन खेत मज़दूर थे — की मौत ने लोगों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। एक स्थानीय प्राइमरी स्कूल के खस्ताहाल ढांचे के बारे में एक आम नागरिक की पूछताछ से शुरू हुआ यह मामला अब एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया है। इसने लोकतांत्रिक असहमति को हिंसा से दबाने के ख़िलाफ़ छात्र, युवा, महिला और वामपंथी संगठनों को एकजुट कर दिया है।

सवाल पूछने की कीमत

अब्दुल हाफ़िज़ हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन में हिस्सा लेने के बाद अपने गाँव लौटे थे। उस आंदोलन से प्रेरित होकर, हाफ़िज़ ने करिशुंडा के सरकारी प्राइमरी स्कूल में खराब बुनियादी ढाँचे, संसाधनों की भारी कमी और पढ़ाई-लिखाई के घटिया हालात पर ध्यान दिया।

13 अगस्त को, हाफ़िज़ ने स्कूल का दौरा किया और इसकी स्थिति का निरीक्षण किया और प्रधानाध्यापक के साथ मुद्दों पर चर्चा की। खुले संवाद के बजाय, उससे मुठभेड़ की गई, उसे घेर लिया गया और उस पर शारीरिक हमला किया गया। हाफिज के मुताबिक, उसे पीटा गया और जबरन अपने घर की ओर खींच लिया गया। जब उनके पिता शेख मोहम्मद माफ़िक उन्हें बचाने के लिए निहत्थे आगे बढ़े, तो हमलावरों ने बुजुर्ग व्यक्ति पर लोहे की छड़ों और भारी लाठियों से हमला कर दिया। पिता-पुत्र दोनों को गंभीर चोटें आईं।

परिवार का आरोप है कि हमलावर भारतीय जनता पार्टी से जुड़े थे, हालांकि बीजेपी ने इस आरोप से इंकार किया है। हाफ़िज़ ने बताया कि स्कूल प्रशासन को चुनौती देने की हिम्मत करने पर हमलावरों ने उन्हें “राष्ट्र-विरोधी” और “पाकिस्तानी” कहा। परिवार ने अस्पताल में भी भारी डराने-धमकाने का आरोप लगाया और कहा कि हमले के समय में स्थानीय पुलिस ने न तो दखल दिया और न ही कोई ठोस कार्रवाई की।

हमले के बाद माफ़िक की हालत तेज़ी से बिगड़ी। उसे बर्दवान मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया, जहाँ 15 अगस्त — यानी स्वतंत्रता दिवस — को चोटों के कारण उसकी मौत हो गई। यद्यपि अधिकारियों ने कई लोगों को गिरफ़्तार किया है, लेकिन पीड़ित का परिवार और उनसे जुड़े संगठन हमले में शामिल हर व्यक्ति की गिरफ़्तारी के साथ-साथ लापरवाही के आरोपी पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

“मेरे पिता के नाम पर एक स्कूल बनवाएं”

इस दुखद घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है, क्योंकि हाफ़िज़ ने कोई निजी या राजनीतिक फ़ायदा नहीं चाहा था। पिता की मौत के बाद, हाफ़िज़ ने सरकारी मुआवज़ा लेने से इंकार करने का नेक फ़ैसला किया है। इसके बजाय, उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार करिशुंडा में उनके पिता की याद में एक आधुनिक और अच्छी गुणवत्ता वाला सरकारी स्कूल बनाए — एक ऐसा स्कूल, जो सभी समुदायों के बच्चों के लिए खुला हो।

उनकी माँ, हसीना बीबी ने भी इस बात का समर्थन किया है और कहा है कि जब तक गाँव के दूसरे बच्चे बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं, तब तक वह अपने परिवार के लिए कोई आर्थिक मदद नहीं लेंगी। गहरे दुख के बावजूद, परिवार का मानना ​​है कि माफ़िक़ की कुर्बानी का सम्मान केवल एक स्थायी सार्वजनिक संस्थान ही कर सकता है।

छात्र और लोकतांत्रिक नेताओं ने एकजुटता दिखाई

हत्या के बाद, वामपंथी, छात्र और नागरिक अधिकार नेताओं के एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने परिवार के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए करिशुंडा का दौरा किया। इस प्रतिनिधिमंडल में एसएफआई के राज्य सचिव देबांजन डे, सीपीआई (एम) राज्य समिति के सदस्य शतरूप घोष और मयूख बिस्वास, सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) के प्रतिनिधि शामिल थे।

दौरे के दौरान, देबांजन डे ने इस हमले को डराने-धमकाने के उस बड़े पैटर्न का हिस्सा बताया, जिसका मकसद युवाओं को सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाने से रोकना था। डे ने बताया कि हाफ़िज़ दिल्ली में सरकारी स्कूलों के बचाव के लिए चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुए थे और अपने गाँव के प्राइमरी स्कूल को बचाने के लिए घर लौटे थे। उन्होंने हाफ़िज़ को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताने और उनके पिता की पीट-पीटकर हत्या करने वाले हमलावरों की निंदा की और चेतावनी दी कि इस तरह की राजनीतिक हिंसा से न्याय की लड़ाई या सरकारी संस्थानों को बचाने का संघर्ष नहीं रुकेगा।

शतरूप घोष ने इस हमले की निंदा की और आपराधिक हिंसा से निपटने के प्रशासन के तरीके और हमले से जुड़े राजनीतिक तत्वों की आलोचना की। घोष ने परिवार के घर की उपेक्षित हालत और गाँव तक जाने वाली जर्जर सड़कों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि सरकार को सिर्फ़ नाममात्र की नकद मदद देने के बजाय, ठोस और ढाँचागत मुआवज़ा देना चाहिए।

मयूख बिस्वास ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कामकाजी परिवारों के लिए एक ऐसी सुविधा बन गया है, जिसे पाना मुश्किल होता जा रहा है। उन्होंने ज़ोर दिया कि सरकारी शिक्षा के लिए लड़ाई सिर्फ़ बड़े शहरों के विरोध-प्रदर्शन वाले इलाकों तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे ग्रामीण इलाकों में भी सक्रिय रूप से संगठित किया जाना चाहिए, जहाँ प्रशासनिक उपेक्षा सबसे ज़्यादा है।

दस दिन की चेतावनी

सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने राज्य सरकार को दस दिन की सख्त समय-सीमा देते हुए न्याय और व्यवस्था में सुधार के लिए चार ऐसी मांगें रखीं, जिन पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता : अब्दुल हफीज़ और उनके परिवार को तुरंत और मज़बूत सुरक्षा देना ; हिंसक हमले में शामिल हर व्यक्ति की जल्द गिरफ्तारी और उन पर मुकदमा चलाना ; कार्रवाई न करने के आरोपी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सज़ा के साथ-साथ गहन जांच ; और आर्थिक मुआवज़े के बजाय हफीज़ के दिवंगत पिता, शेख मोहम्मद माफ़िक की याद में एक आधुनिक सरकारी स्कूल का निर्माण। रांका ने चेतावनी दी कि अगर अधिकारी दस दिन की समय-सीमा के भीतर इन मांगों को पूरा नहीं करते हैं, तो संगठन बांकुरा ज़िले में सब-डिविज़नल ऑफिसर (एसडीओ) के कार्यालय का घेराव करने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को लामबंद करके अपना संघर्ष तेज़ करेगा। इसके अलावा, संगठन ने पीड़ित परिवार की कानूनी और भौतिक ज़रूरतों में मदद के लिए स्वतंत्र रूप से राहत कोष जुटाने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि व्हिसलब्लोअर को डराने-धमकाने की कोशिशें उनके अभियान की गति को नहीं रोक पाएंगी, क्योंकि हफीज़ अब पूरे पश्चिम बंगाल में “स्कूल ठीक करो” अभियान का नेतृत्व करने के लिए आगे आ रहे हैं।

लोकतांत्रिक स्पेस की रक्षा

भारत में हाल की घटनाओं ने सांप्रदायिक बंटवारे के बीच धर्मनिरपेक्ष सद्भाव और लोकतांत्रिक आज़ादी की रक्षा करने की ज़रूरत को साफ़ तौर पर उजागर किया है। स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, सीपीआई(एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने आज़ादी की लड़ाई के समावेशी आदर्शों को याद किया। उन्होंने नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक संस्थानों की सतर्कता से रक्षा करने का आह्वान किया, ताकि उन ताक़तों का मुक़ाबला किया जा सके, जो बहुसंख्यकवादी राजनीति का इस्तेमाल करके जनता की शिकायतों को दबाने की कोशिश करती हैं।

यह घटना सरकारी स्कूलों की बिगड़ती हालत को भी दिखाती है। एसएफआई जैसे छात्र संगठन लंबे समय से सरकारी शिक्षा की अनदेखी के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। वे शिक्षकों की भारी कमी, जर्जर कक्षाओं और कल्याणकारी व्यवस्थाओं की खराबी का हवाला देते हैं, जो सरकारी शिक्षा को कमज़ोर करती हैं। इंदास में हुई बर्बरता एक खतरनाक मोड़ की ओर इशारा करती है — यह संस्थागत पारदर्शिता की मांग करने वाली ज़मीनी आवाज़ों को डराने-धमकाने की एक खुली कोशिश है।

सरकारी शिक्षा के सामने एक सवाल

इंदास की त्रासदी बांकुरा के एक गाँव की सीमाओं से कहीं आगे तक फैली हुई है। यह नागरिक समाज के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है : क्या आम नागरिक हिंसा और प्रशासनिक उदासीनता का सामना किए बिना ठीक से काम करने वाले सरकारी संस्थानों की मांग कर सकते हैं?

किसी भी लोकतंत्र में, गाँव के प्राइमरी स्कूल की हालत के बारे में सवाल पूछना नागरिक ज़िम्मेदारी है, कोई अपराध नहीं। अब्दुल हफ़ीज़ और उनके परिवार का चुप होने से इंकार करना — और साथ ही छात्रों, महिलाओं और लोकतांत्रिक संगठनों का एकजुट होकर आगे आना — यह साफ़ करता है कि सार्वजनिक शिक्षा और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

#KhoonKeChheenteBlackboardPar #BankuraSchoolViolence #IndasPrimarySchoolAttack #AbdulHafizActivism #SheikhMohammadMafikMartyrdom #SamprictaBoseReport #SanjayParateTranslation #WestBengalEducationCrisis #SaveGovernmentSchools #TajNewsOpinion #AgraNews #TajNewsViral #खून_के_छींटें_ब्लैकबोर्ड_पर #बांकुरा_हिंसा #सरकारी_शिक्षा_बचाओ #संजय_पराते_अनुवाद

यह भी पढ़ें

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Pradhan Sampadak, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment