Article Desk, 🌐 tajnews.in | Friday, 7 August, 2026, 07:15:00 PM IST.


10 अगस्त : बोलने और सड़क पर उतरने का दिन
इतिहास में ऐसे दूरगामी और ऐतिहासिक समय आते हैं, जब देश और उसकी महान जनता को, अपने वर्तमान और भविष्य दोनों को बचाने के लिए खुलकर बोलना और संघर्ष के मैदान में उतरना बेहद जरूरी हो जाता है। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में आज का समय ठीक ऐसा ही कालखंड है। दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर एकत्र हुए युवक-युवतियों ने न केवल संघर्ष का एक नया व्याकरण ही रचा है, बल्कि उन्होंने नागरिक प्रतिरोध की नयी भाषा और आपसी संवाद की नयी वर्तनी भी गढ़ी है। मोदी-अमित शाह की पुलिसिया बर्बरता के बावजूद युवाओं के इस शांतिपूर्ण विरोध और उसकी अद्भुत रचनात्मकता ने तानाशाही के दिनों-दिन फैलते मकड़जाल को महज पांच दिनों में जिस तरह से तार-तार किया है, वह भारतीय राजनीति के इतिहास का सुनहरा अध्याय तथा भविष्य के लिए उम्मीद जगाने वाला अत्यंत सराहनीय काम है। और यह ऐतिहासिक उभार सिर्फ दिल्ली भर तक सीमित नहीं है, देश के दो सौ से ज्यादा छोटे-बड़े शहरों ने भी अपनी युवा पीढ़ी का ऐसा ही अभूतपूर्व उबाल देखा है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता और जन-आक्रोश का यह ज्वार अब रुकने वाला नहीं है। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
मगर यह चौतरफा हमला सिर्फ युवाओं के रोजगार तक सीमित नहीं है। इस वक़्त देश की सत्ता पर काबिज, अडानी-अम्बानी जैसे चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों के इशारों पर काम करने वाली और अमरीकी साम्राज्यवाद की गीदड़ भभकियों से डरने वाली मोदी सरकार के हमलों के सीधे निशाने पर पूरा देश, भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान, लोकतंत्र और पवित्र संविधान है। वर्ष 2014 में इनके केंद्र की सत्ता में आने के बाद से देश और उसकी जनता का विराट बहुमत हिस्सा जिस तरह के मुश्किल से मुश्किलतर होते हालात से गुजर रहा है, उसकी कोई सीमा नहीं रह गई है। कुछ मुट्ठी भर बड़े घरानों और उनके चाकरों, कहारों तथा गोदी मीडिया के ढिंढोरचियों को छोड़कर देश की आबादी का ऐसा कोई भी वर्ग नहीं है, जिसके साथ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व और भाजपा की अगुआई वाली सरकार ने दगा न की हो, जिसे छला और ठगा न हो। मजदूर, किसान और समूचे मेहनतकश अवाम को तो जैसे इस सरकार ने पूरी तरह तबाह और बर्बाद करने की ही ठान ली है।
एक सामान्य मनुष्य के रूप में इज्जत के साथ जिन्दा रहने के लिए जरूरी बुनियादी भोजन, आवास, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाएं आम नागरिक की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं। इंसान का सम्मानजनक जीवन जीने के लिए जरूरी शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकार, क़ानून-विधान के नियम से चलने वाला शासन, यहाँ तक कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के स्वतंत्र नागरिक की पहचान माने जाने वाले मानवाधिकार तक आज मोदी सरकार के निशाने पर हैं। भारत जैसे महान लोकतांत्रिक देश के स्वाभिमानी लोगों को नागरिक से जबरन प्रजा में बदला जा रहा है। यह कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक हुक्मरान समूह इस देश और उसके नागरिकों का आज और आने वाला कल ही अन्धकार में नहीं डुबोना चाहते, बल्कि सैकड़ों वर्षों और कई युगों के अथक संघर्षों तथा उनमें दी गयी अनगिनत कुर्बानियों से हासिल की गई आज़ादी की रौशनी को भी बुझा देना चाहते हैं।
मजदूरों और किसानों से दुश्मनी का रवैया
मजदूरों और किसानों से तो जैसे मोदी सरकार ने खुली दुश्मनी ही ठान ली है। किसानों की आमदनी दो गुना करने का जोर-शोर से झूट दावा किया गया और उल्टे पूरी खेती-किसानी को पूंजीपतियों के हवाले करके बर्बाद कर दिया गया। मजदूरों को बेहतरी के बड़े-बड़े सपने दिखाए गए और उन्हें चार जन-विरोधी श्रम संहितों (Labor Codes) की बेड़ियों में जकड़ दिया गया। खेत मजदूरों सहित तमाम ग्रामीण श्रमिकों के पहले से ही बदहाल जीवन को और ज्यादा बेहाल कर दिया गया। हर साल दो करोड़ नए रोजगार देने का खोखला झांसा दिया गया और पहले से मौजूद करोड़ों नौकरियां ख़त्म करते हुए भविष्य में नए रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावनाओं को ही जड़ से समाप्त कर दिया गया।
भविष्य के जागरूक और तार्किक नागरिक तैयार करने वाले हमारे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को तो जैसे दमघोंटू यातनागृहों में तब्दील करने की एक सोची-समझी परियोजना ही शुरू कर दी गई है। यह सब करते हुए, इन्हीं के साथ महिलाओं सहित समाज के वंचित, शोषित और पीड़ित हिस्सों—दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को कुख्यात मनुस्मृति की यंत्रणाओं वाले प्राचीन युग में वापस पहुँचाने की कुटिल साजिशें तेज से तेजतर की जा रही हैं।
भ्रष्टाचार की लांघी गई सीमाएं और संस्थागत पतन
‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’ का लोकलुभावन झांसा देकर सत्ता में आया यह राजनीतिक कुनबा भ्रष्टाचार की अब तक की सारी सीमाएं लांघ चुका है। पवित्र नगरी अयोध्या के राम मंदिर निर्माण प्रक्रिया में हुई हजारों करोड़ की लूट और जमीनों का घोटाला इसकी प्रत्यक्ष बानगी है। रक्षा सौदों से लेकर सार्वजनिक संपत्तियों और जमीनों की बंदरबांट तक ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है, जहां भारी घपले और बेईमानियाँ न हुई हों। जो देश के इतिहास में आज तक नहीं हुआ, वह भी इस दौर में देखने को मिल रहा है – संवैधानिक न्यायपालिका को भी सत्ता का मातहत और संस्थागत भ्रष्टाचार का जरिया बनाने की तकलीफदेह मिसालें देश के सामने आई हैं।
कॉर्पोरेट पूँजी की गोदी में बैठे सांप्रदायिक हिंदुत्व ने अपनी शुरुआत धार्मिक, भाषाई और नस्लीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहरीली नफरत का माहौल बनाकर की थी। आज वह विषैली मुहिम एक जड़, कूपमंडूक, अपढ़ और मुट्ठीभर अति-अमीरों के कठोर नियंत्रण वाले तानाशाही सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे की स्थापना करने के खतरनाक मंसूबे तक पहुँच गयी है। हमारी हजारों वर्षों की साझी सांस्कृतिक विरासत दांव पर लगी है। जिस प्रपंच का हिन्दू धर्म या किसी भी मानवीय पंथ व परम्परा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है, वह उग्र हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता कॉर्पोरेट की गंदी और आपराधिक पूँजी के साथ हाथ मिलाकर न केवल आम जनता को भीषण त्रास दे रही है, बल्कि भारत की बहुलतावादी पहचान और उसकी मूल अवधारणा के लिए ही सीधा अस्तित्वगत खतरा पैदा कर रही है।
संघर्ष की नई राह और 10 अगस्त का राष्ट्रीय आह्वान
यह समय अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इन अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना उनसे सीधी टक्कर लेकर, उस लड़ाई में देश के मेहनतकश जनसमूहों और देशभक्त नागरिकों को जोड़ने के प्रयासों को तेज करके ही किया जा सकता है। मौजूदा विनाशकारी नीतियों को बदलने के साथ-साथ उन जन-हितैषी वैकल्पिक नीतियों को लागू कराने के लिए जनता को जगाने, एकजुट करने और सड़क के संघर्षों में उतारने का प्रयास निरंतर जारी है। सिर्फ युवा और महिलायें ही नहीं, देश के प्रमुख मजदूर और किसान संगठन ठीक यही काम कर रहे हैं। ऐतिहासिक किसान आन्दोलन ने एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार दिल्ली के हुक्कामों के घुटने टिकवाए हैं। एक के बाद एक हुई देशव्यापी मजदूरों की हड़तालों ने हुकूमत की चूलें हिलाई हैं। यह सबसे आशाजनक बात है कि अब ये सब – भारत के वास्तविक निर्माता और उसका भविष्य – सब मिलकर एक साझा मंच से लड़ने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं।
यदि हमें महात्मा गांधी, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर और शहीद-ए-आजम भगत सिंह के महान संग्रामों से हासिल हुए स्वतंत्र भारत को बचाना है, इसे उनके सपनों के गणराज्य के अनुरूप बनाना है, तो हमें उनके दिखाए गए संघर्ष के निडर रास्ते पर ही आगे चलना होगा। उन्होंने जिस बुलंद आवाज में औपनिवेशिक अंग्रेजों को ‘भारत छोड़ो’ का ऐतिहासिक नारा दिया था, आज उससे भी कहीं ज्यादा तेज और कड़क आवाज में ‘अडानी, अम्बानी के दलालों, अमरीका से डरने वालो, देश को बांटने वालो — भारत छोड़ो’ का नारा पूरे देश में बुलंद करना होगा।
देश के तमाम प्रमुख मजदूर और किसान संगठनों ने अपने संयुक्त आंदोलन के अगले और नए चरण का आधिकारिक एलान कर दिया है। इस निर्णायक चरण में स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महत्वपूर्ण दिन 9 अगस्त के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की वर्षगांठ को इस नए दौर के हालात में पूरे देश में मनाने का आह्वान किया गया है। चूंकि इस बार 9 अगस्त को रविवार का साप्ताहिक अवकाश है, इसलिए यह ऐतिहासिक देशव्यापी प्रतिरोध 10 अगस्त को आयोजित किया जाएगा। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साझे मंच के 28 और 29 जुलाई को नई दिल्ली में हुए दो सफल राष्ट्रीय सम्मेलनों ने जो शंखनाद किया है, वह 10 अगस्त को देश भर में लाखों मजदूरों, किसानों और युवाओं द्वारा अपनी गिरफ्तारियां देने (सामूहिक गिरफ्तारी आंदोलन) के रूप में दिखाई देगा। इस रोज कश्मीर से कन्याकुमारी और कटक से अटक तक पूरा देश एक स्वर में ‘अडानी-अम्बानी के दलालों, अमरीका से डरने वालो, देश को बांटने वालों — भारत छोड़ो’ के गगनभेदी नारों से गूँज उठेगा।
यह समय मन से हर हिचक छोड़ने, दूसरों के बाहर निकलने का इंतज़ार बंद करने, अपने-अपने घरों और दुकानों से सड़कों पर उतरने तथा देश में बर्बादी और नफरत लाने वाले बेईमानों व तानाशाहों से खुलकर मुकाबला करने का समय है।
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Pawan Singh
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