Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 03 Mar 2026, 12:45 pm IST
Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस विश्लेषणात्मक लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया तमिलनाडु यात्रा, द्रविड़ राजनीति के मिथक और दक्षिण भारत में हिंदुत्व व विकास की राजनीति के बढ़ते प्रभाव का गहन आकलन किया है। प्रस्तुत है उनकी यह विशेष रिपोर्ट:
1 मार्च 2026 की तपती दोपहर में मदुरै की ज़मीन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सियासी बिजली की तरह उतरे। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उन्होंने एनडीए में नई जान फूंक दी। विकास, भक्ति और तीखे बयान: तीनों का ज़बरदस्त संगम दिखा। मकसद साफ था: डीएमके के लंबे क़ब्ज़े को चुनौती देना। दिन की शुरुआत ₹4,400 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास से हुई। नए रेलवे स्टेशन, बेहतर सड़क संपर्क, और कई विकास योजनाएं। संदेश सीधा था: “विकसित तमिलनाडु, विकसित भारत।” मोदी का पुराना फॉर्मूला: विकास ही जवाब है। इसके बाद वे तिरुपरंकुंड्रम मुरुगन मंदिर पहुंचे। यह सिर्फ़ पूजा नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक संवाद भी था। तमिल समाज की गहरी आस्था को सम्मान देने का संदेश।
एनडीए की विशाल रैली में मोदी ने डीएमके पर जमकर निशाना साधा। “भ्रष्टाचार, घोटाले, माफिया जैसी सियासत,” उन्होंने कहा। दावा किया कि जनता बदलाव चाहती है: साफ, असरदार हुकूमत। एआईएडीएमके के नेता ई.के. पलानीस्वामी ने भी बड़ी जीत की भविष्यवाणी की। माहौल जोशीला था। एनडीए अब बाहरी खिलाड़ी नहीं लग रहा था। राजनीतिक गलियारों में सवाल गूंज रहा है: क्या तमिलनाडु का तथाकथित “हिंदुत्व-विरोधी किला” दरक रहा है? सालों से द्रविड़ अलग पहचान की कहानी सुनाई जाती रही। कहा गया कि तमिलनाडु “उत्तर भारतीय प्रभाव” से अलग एक खास दुनिया है। लेकिन चुनावी शोर हटाएं तो तस्वीर कुछ और दिखती है। तमिलनाडु भारत से अलग कोई सभ्यता नहीं। यह उसी इमारत का एक शानदार कक्ष है: पुराना, समृद्ध, मगर उसी घर का हिस्सा।
पेरियार ई.वी. रामासामी ने ब्राह्मण वर्चस्व को चुनौती दी, यह ऐतिहासिक था। लेकिन क्या जाति खत्म हो गई? नहीं। ऑनर किलिंग आज भी होती है। मंदिर प्रवेश पर विवाद होते हैं। शादी के विज्ञापनों में उप-जाति की तलाश जारी है। 370 से अधिक पंजीकृत जातियां हैं। राजनीति जाति समीकरण पर चलती है; थेवर, वन्नियार, दलित, मुदलियार, हर समूह एक वोट बैंक। 2019-20 के सर्वे में 98% भारतीयों ने अपनी पहचान जाति से जोड़ी। तमिलनाडु भी अलग नहीं। उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह यहां भी सामाजिक ढांचा गहराई से जड़ा हुआ है। तमिल भाषा प्राचीन और गौरवशाली है। लेकिन पूरी तरह अलग-थलग? नहीं। संगम साहित्य में संस्कृत के शब्द मिलते हैं। मंदिरों में संस्कृत मंत्र और तमिल भजन साथ-साथ गूंजते हैं। मीनाक्षी अम्मन, बृहदीश्वर और रंगनाथस्वामी मंदिर भारतीय परंपरा का ही हिस्सा हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार 87% तमिल हिंदू हैं। पोंगल के साथ दिवाली, नवरात्रि, कार्तिगई भी मनाते हैं। क्षेत्रीय रंग अलग हो सकता है, मगर धड़कन भारतीय है। मछली और मटन यहां आम हैं। पर अय्यर, अयंगर ब्राह्मण और कुछ समुदाय सात्विक भोजन भी अपनाते हैं। संयुक्त परिवार, तयशुदा विवाह, बड़ों का सम्मान: सब कुछ भारतीय समाज जैसा ही। तमिलनाडु की साक्षरता 80% से ऊपर है। चेन्नई आईटी और ऑटोमोबाइल हब है। लेकिन मंदिरों में भीड़ उमड़ती है। ज्योतिष चलता है। नेता भी आशीर्वाद लेते हैं। यह विरोधाभास नहीं; भारतीय यथार्थ है। 2जी जैसे घोटाले भी हुए, तो मिड-डे मील जैसी योजनाएं भी सफल रहीं। मुफ्त योजनाएं, सब्सिडी, और विकास, सब साथ चलता है। यह तस्वीर देश के बाकी राज्यों से बहुत अलग नहीं।
चोल, पांड्य और पल्लव शासकों ने पूरे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया तक प्रभाव फैलाया। आज तमिलनाडु के सांसद संसद में हैं, जज सुप्रीम कोर्ट में, सैनिक देशभर में। अलगाव की शुरुआती आवाजें अब इतिहास बन चुकी हैं। तमिल गर्व ज़िंदा है। साहित्य, सिनेमा, व्यापार, सब दमदार। मगर यह अलगाव नहीं, विविधता है। जैसे महाराष्ट्र का मराठा स्वाभिमान या बंगाल की साहित्यिक शान, वैसे ही तमिल अस्मिता। तमिलनाडु कोई फुटनोट नहीं। भारत की कहानी का मजबूत अध्याय है। मोदी की यात्रा ने संकेत दिया है कि द्रविड़ राजनीति का नाटक शायद अंतिम अंक में है। चुनावी जज़्बात अपनी जगह, मगर साझा तक़दीर की सच्चाई और भी मजबूत है。
Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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