उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांस्कृतिक सहअस्तित्व

Political Desk, Taj News | Updated: Friday, 24 January 2026, 04:40 PM IST

भारत की सांस्कृतिक आत्मा और साझा सभ्यता की बहुरंगी परंपरा को रेखांकित करते हुए लेखक डॉ. प्रमोद कुमार अपने इस विचारोत्तेजक आलेख में उत्तर प्रदेश को गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत प्रतीक बताते हैं, जहाँ गंगा और यमुना के संगम की तरह ही विभिन्न आस्थाएँ, भाषाएँ, परंपराएँ और जीवन-शैलियाँ सदियों से सहअस्तित्व और सौहार्द के सूत्र में बंधी रही हैं, और जहाँ आध्यात्मिकता, साहित्य, कला व सामाजिक समन्वय मिलकर भारतीय सभ्यता की सबसे समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करते हैं।

“उत्तर प्रदेश: संस्कृति, सहअस्तित्व और सौहार्द (गंगा-जमुनी तहज़ीब) की भूमि”

डॉ प्रमोद कुमार

भारत की सांस्कृतिक चेतना में यदि किसी भूभाग ने अपनी बहुरंगी परंपराओं, आध्यात्मिक ऊँचाइयों और सामाजिक समन्वय की अद्भुत परंपरा से विशिष्ट स्थान अर्जित किया है, तो वह उत्तर प्रदेश है। गंगा और यमुना की पावन धाराओं से सिंचित यह धरती केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का प्राण-केंद्र है। यहाँ की मिट्टी में इतिहास की गहराई, आध्यात्मिकता की ऊष्मा, साहित्य की मधुरता और सहअस्तित्व की संस्कृति समाहित है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश को गंगा-जमुनी तहज़ीब की भूमि कहा जाता है—एक ऐसी जीवन-दृष्टि, जिसमें विविध आस्थाएँ, भाषाएँ, परंपराएँ और जीवन-शैलियाँ मिलकर एक साझा सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करती हैं।

डॉ प्रमोद कुमार

गंगा-जमुनी तहज़ीब केवल दो नदियों के संगम का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत रूपक है। गंगा जहाँ भारतीय परंपरा, धर्म, दर्शन और वैदिक संस्कृति की प्रतिनिधि मानी जाती है, वहीं यमुना सूफी परंपरा, इस्लामी कला-संस्कृति और मध्यकालीन सौंदर्यबोध की संवाहक रही है। इन दोनों धाराओं का मिलन जिस प्रकार प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर होता है, उसी प्रकार उत्तर प्रदेश की सामाजिक चेतना में हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई, बौद्ध-जैन सभी आस्थाओं का संगम दिखाई देता है। यह संगम किसी कृत्रिम समझौते का परिणाम नहीं, बल्कि सदियों से साथ रहने, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम है।

उत्तर प्रदेश का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवपूर्ण रहा है। वैदिक सभ्यता का विकास, राम और कृष्ण की कथाएँ, बुद्ध और महावीर का तप, कबीर और रैदास की निर्भीक वाणी, तुलसी और सूर की भक्ति, अकबर का सूझ-बूझ भरा शासन, और नवाबी संस्कृति की नजाकत—ये सभी परतें मिलकर इस प्रदेश की सांस्कृतिक संरचना को बहुआयामी बनाती हैं। अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे पवित्र नगर जहाँ आध्यात्मिक चेतना के केंद्र रहे हैं, वहीं लखनऊ, आगरा और फ़तेहपुर सीकरी कला, स्थापत्य और शिष्टाचार की अनूठी परंपरा के प्रतीक हैं। इस समन्वय ने उत्तर प्रदेश को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद की भूमि बनाया है।

भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भी उत्तर प्रदेश ने गंगा-जमुनी तहज़ीब को जीवंत रखा है। हिंदी और उर्दू का साझा विकास इसी धरती पर हुआ। अवधी, ब्रज, बुंदेली और भोजपुरी जैसी लोकभाषाओं ने लोकजीवन की संवेदनाओं को अभिव्यक्त किया, तो उर्दू शायरी ने प्रेम, विरह, करुणा और सौहार्द की मधुर अभिव्यक्ति दी। मीर, ग़ालिब और फ़िराक़ की परंपरा से लेकर प्रेमचंद, महादेवी वर्मा और रामधारी सिंह दिनकर तक साहित्य ने समाज को जोड़ने का कार्य किया। लखनऊ की तहज़ीब में अदब और तहजीब का जो स्वरूप दिखाई देता है, वह इस सांस्कृतिक सहअस्तित्व का सजीव उदाहरण है—जहाँ “आप” और “हुज़ूर” केवल संबोधन नहीं, बल्कि सम्मान और संवेदना के प्रतीक हैं।

धार्मिक विविधता के बावजूद सामाजिक सौहार्द की जो परंपरा उत्तर प्रदेश में विकसित हुई, वह अद्वितीय है। यहाँ रामलीला और मुहर्रम के जुलूस में सभी समुदायों की सहभागिता देखने को मिलती रही है। काशी की गंगा आरती और अजमेर की दरगाह की कव्वाली, दोनों ही मानव-हृदय की शांति और आध्यात्मिक उन्नयन का माध्यम हैं। त्योहारों की साझी संस्कृति ने लोगों को एक-दूसरे के निकट लाया है। होली की रंगत में ईद की मिठास घुलती है, तो दीवाली की रोशनी में मुहर्रम की शोक-संवेदना का सम्मान भी बना रहता है। यह सहअस्तित्व केवल सहनशीलता नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागिता और परस्पर सम्मान का प्रतीक है।

उत्तर प्रदेश की स्थापत्य कला भी इस सांस्कृतिक समन्वय की गवाही देती है। वाराणसी के मंदिरों की शिखर शैली और आगरा के ताजमहल की संगमरमरी नक्काशी, दोनों ही भारतीय सौंदर्यबोध की चरम अभिव्यक्तियाँ हैं। फ़तेहपुर सीकरी में हिंदू और इस्लामी स्थापत्य का संगम स्पष्ट दिखाई देता है। लखनऊ के इमामबाड़े और रूमी दरवाज़ा, तथा काशी के घाट—ये सभी इस प्रदेश की विविध सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं। यहाँ की वास्तुकला केवल इमारतें नहीं, बल्कि इतिहास के जीवंत दस्तावेज़ हैं।

संगीत और कला के क्षेत्र में भी उत्तर प्रदेश का योगदान अनुपम है। बनारस घराना, आगरा घराना और लखनऊ घराना भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं। कथक नृत्य की लखनऊ शैली में जो नजाकत और भावाभिव्यक्ति दिखाई देती है, वह नवाबी संस्कृति की देन है। वहीं लोकगीतों और लोकनृत्यों में ग्रामीण जीवन की सादगी और उत्सवधर्मिता झलकती है। कव्वाली, भजन, ठुमरी और दादरा—ये सभी संगीत विधाएँ इस प्रदेश की सांस्कृतिक बहुलता को अभिव्यक्त करती हैं।

समाज सुधार और राष्ट्रीय आंदोलन में भी उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा है। महात्मा गांधी के आंदोलनों से लेकर चंद्रशेखर आज़ाद और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों की कर्मभूमि यही रही है। यहाँ की जनता ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया और राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया। यह भूमि केवल आध्यात्मिक चेतना की नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक जागरूकता की भी रही है।

गंगा-जमुनी तहज़ीब का मूल तत्व है—समन्वय, सहिष्णुता और साझा संस्कृति। आज के समय में जब सामाजिक विभाजन और संकीर्णता की चुनौतियाँ सामने हैं, तब उत्तर प्रदेश की यह परंपरा हमें पुनः स्मरण कराती है कि विविधता ही हमारी शक्ति है। सहअस्तित्व केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पहचान और गरिमा का सम्मान करने की प्रक्रिया है। उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत हमें सिखाती है कि भिन्नताओं के बावजूद एकता संभव है, और संवाद के माध्यम से सौहार्द की स्थापना की जा सकती है।

वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश तीव्र विकास की ओर अग्रसर है। शिक्षा, उद्योग, पर्यटन और अवसंरचना के क्षेत्र में प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक संरक्षण पर भी ध्यान दिया जा रहा है। काशी कॉरिडोर, अयोध्या का पुनर्विकास, और पर्यटन स्थलों का संरक्षण इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक विकास और सांस्कृतिक धरोहर का संतुलन संभव है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास की इस प्रक्रिया में गंगा-जमुनी तहज़ीब की मूल भावना—सहअस्तित्व और सौहार्द—को अक्षुण्ण रखा जाए।

उत्तर प्रदेश की पहचान उसकी बहुलता में निहित है। यहाँ गाँवों की चौपाल से लेकर शहरों की गलियों तक, मंदिरों की घंटियों से लेकर मस्जिदों की अज़ानों तक, और साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर संगीत समारोहों तक, हर जगह विविधता का मधुर संगम दिखाई देता है। यही संगम इस प्रदेश को विशिष्ट बनाता है। यह केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत सच्चाई है।

अंततः कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश संस्कृति, सहअस्तित्व और सौहार्द की भूमि है, जहाँ गंगा-जमुनी तहज़ीब केवल एक अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन का व्यवहारिक दर्शन है। यह प्रदेश हमें यह संदेश देता है कि जब विविध संस्कृतियाँ संवाद और सम्मान के साथ मिलती हैं, तब एक समृद्ध, जीवंत और सशक्त समाज का निर्माण होता है। उत्तर प्रदेश की यही पहचान उसे भारत की सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र बनाती है। यह भूमि न केवल इतिहास की धरोहर है, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का भी आधार है—जहाँ परंपरा और प्रगति, आस्था और आधुनिकता, विविधता और एकता मिलकर एक उज्ज्वल और समरस समाज का निर्माण करती हैं।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

#GangaJamuniTehzeeb #UttarPradesh #CulturalHarmony #IndianHeritage

also 📖: बौद्ध दर्शन: भारतीय ज्ञान परम्परा की आत्मा

स्वामी विवेकानंद: सेवा-चेतना द्वारा आध्यात्मिकता का सामाजिक रूपांतरण
✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
📧 pawansingh@tajnews.in
📱 अपनी खबर सीधे WhatsApp पर भेजें: 7579990777
👉 TajNews WhatsApp Channel
👉 Join WhatsApp Group
🐦 Follow on X
🌐 tajnews.in

By Thakur Pawan Singh

✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह 📧 pawansingh@tajnews.in 📱 अपनी खबर सीधे WhatsApp पर भेजें: 7579990777 👉 Taj News WhatsApp Channel

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *