अब बंगाल में हिंसा का रामराज्य! बीजेपी की जीत और लोकतंत्र की हार पर संजय पराते का तीखा प्रहार

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Article Desk, tajnews.in | Thursday, May 07, 2026, 11:30:15 AM IST

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Sanjay Parate Writer
संजय पराते
उपाध्यक्ष,
छत्तीसगढ़ किसान सभा
अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष संजय पराते ने पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद भड़की हिंसा और लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन पर एक अत्यंत गंभीर और तीखा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह आलेख टीएमसी की ऐतिहासिक गलतियों से लेकर संघ-भाजपा की फासीवादी राजनीति और चुनाव आयोग की संदिग्ध भूमिका को बेनकाब करता है।
HIGHLIGHTS
  1. संजय पराते का आरोप: भाजपा की जीत के तुरंत बाद बंगाल में हिंसा का नया दौर शुरू, संस्थागत ‘निष्क्रियता’ में संविधान तार-तार।
  2. ऐतिहासिक विडंबना: त्रिपुरा की तर्ज पर बंगाल में भी लेनिन की मूर्ति खंडित, वामपंथ के प्रति संघी गिरोह की नफरत फिर उजागर।
  3. ममता बनर्जी पर प्रहार: “जब हम जीते थे, हमने अत्याचार नहीं किया” – ममता का यह बयान झूठ है; तृणमूल शासन के 15 साल वामपंथ पर हमलों के साल थे।
  4. विशेष संपादकीय विश्लेषण: जनतंत्र के प्रहरी या सत्ता के मोहरे? ‘न्यू इंडिया’ में चुनाव आयोग और न्यायपालिका की चयनात्मक दृष्टि पर गंभीर सवाल।

अब बंगाल में हिंसा का रामराज्य!
(आलेख : संजय पराते)

भाजपा की नई सरकार ने अभी शपथ ग्रहण किया भी नहीं है कि प. बंगाल में हिंसा का नया दौर शुरू हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट का यह विश्वास धूल में मिल गया कि चुनाव के बाद बंगाल में हिंसा खत्म हो जाएगी। चूंकि बंगाल में पुलिस अभी भी चुनाव आयोग के मातहत है, इसलिए चुनाव नतीजों के बाद की हिंसा के लिए चुनाव आयोग को पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। आयोग ने हिंसक घटनाओं के प्रति शून्य सहनशीलता (‘ज़ीरो टॉलरेंस’) की बात कही है, लेकिन यह हिंसा केंद्र के अर्धसैन्य बलों की 2600 कंपनियों के 2 लाख से ज्यादा जवानों की उपस्थिति में और उसकी निष्क्रियता में हो रही है, इसलिए चुनाव आयोग की बातें बेमानी हो जाती है। ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग भाजपा के रामराज्य की जगह संविधान और कानून के राज को स्थापित करने की बिल्कुल इच्छा नहीं रखती。

अब पूरा बंगाल भाजपा के बुलडोजर राज को देखेगा। यही उसका रामराज्य भी है, जिसे उत्तरप्रदेश सहित देश के भाजपा शासित 20 राज्य पहले से देख रहे हैं। बंगाल इस स्वाद को चखने वाला 21वां राज्य होगा। अभी तो यह शुरूआत है। अगले पांच सालों में न जाने कितने राजनैतिक कार्यकर्ताओं को अपनी शहादत देनी होगी, न जाने कितने निर्दोषों के घर जलाए जाएंगे, न जाने कितने हजार लोगों को अपने घर-गांव और राज्य से विस्थापित होना पड़ेगा, न जाने कितने लोगों की जमीन और उनकी आजीविका कॉरपोरेटों के लिए छीनी जाएंगी। बंगाल के भाग्य में यही सब लिखा है。

जिस बंगाल में एक बड़ा वामपंथी आंदोलन आजादी के पहले से रहा है, वहां भाजपा की जीत के बाद लेकिन की मूर्ति तोड़कर गिरा दी गई है। पाठकों को याद होगा कि त्रिपुरा में भी भाजपा ने चुनाव जीतने के बाद पहला हमला लेनिन की मूर्ति पर ही किया था। त्रिपुरा की भाजपाई हिंसा को अब फिर बंगाल में दोहराया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों और कार्यकर्ताओं पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू हो चुके हैं, लेकिन वामपंथ भी इस हिंसा से अछूता नहीं है, जिसने इस चुनाव में मात्र दो सीटें ही जीती हैं। वामपंथ के प्रति संघी गिरोह की नफरत किसी से छुपी नहीं है, क्योंकि उसके हिंदू राष्ट्र के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट वही है, चाहे उसकी गिनती बंगाल या देश में कितनी भी कमजोर ताकत के रूप में क्यों न की जाएं!

अब यह पूरी तरह से साफ है कि बंगाल में चुनाव भाजपा नहीं लड़ रही थी, चुनाव लड़ रही थी केन्द्र की मोदी सरकार, जिसके साथ चुनाव आयोग और इस देश का सुप्रीम कोर्ट खुलकर खड़ा था। भाजपा ने यह चुनाव जीता है इस देश के लाखों नागरिकों को अवैध रूप से मतदाता सूचियों से बाहर करके, जिनके बारे में यह दुष्प्रचार किया गया कि वे तो कभी इस देश के नागरिक जी नहीं थे और घुसपैठिया है, जिन्हें देश से बाहर करने का पुनीत काम भाजपा कर रही है ; जबकि इस देश का चुनाव आयोग यह बताने तक कि स्थिति में नहीं है कि एसआईआर के बाद उसने कितने घुसपैठियों कि शिनाख्त की है। चुनाव प्रचार के दौरान जितना सांप्रदायिक विषवमन भाजपा ने किया, वह अभूतपूर्व था। भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही। चुनाव आचार संहिता की मोदी-शाह के नेतृत्व में धज्जियां उड़ाई गई, लेकिन चुनाव आयोग ने इस सबका संज्ञान तक लेना उचित नहीं समझा。

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आज ममता बनर्जी भाजपा के नाम पर तो रही है। एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने दावा किया है : “जब हम जीते थे, हमने सीपीएम के किसी भी पार्टी कार्यालय को हाथ नहीं लगाया था, अत्याचार नहीं किया था।” ममता आज झूठ बोल रही है। सभी जानते है कि वामपंथ को हराने錤 के लिए ममता ने भाजपा-आरएसएस के साथ कितना गहरा संबंध बनाया था कि संघी गिरोह ने उन्हें “मां काली” की उपमा तक दी थी और गदगदाई ममता मोहन भागवत से आशीर्वाद लेने से भी नहीं चुकी थी। बंगाल में भाजपा की सांप्रदायिक और फासीवादी राजनीति को पैर जमाने का मौका ममता ने ही दिया है。

बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई ममता का सबसे बड़ा दुश्मन वामपंथ ही था। तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने के पहले तीन महीनों में ही सीपीआई(एम) के जिन 30 नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी, उनमें से 10 अल्पसंख्यक, 3 आदिवासी और 11 अनुसूचित जाति से थे। इनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं। मरने वालों में खेतिहर मजदूर और गरीब किसान भी थे। बंगाल में तृणमूल शासन के 15 साल वामपंथ और विशेषकर माकपा पर अनवरत हमलों के साल थे। इन हमलों में सैकड़ों वामपंथी कार्यकर्ता शहीद हुए, वामपंथ के सैकड़ों दफ्तरों पर कब्जा किया गया या आग लगा दी गई, हजारों साधारण लोगों को अपने घरों और गांवों से पलायन करना पड़ा, हजारों कार्यकर्ताओं को केवल इसलिए निष्क्रियता की चादर ओढ़नी पड़ी कि उनकी मां-बहनों के बलात्कार की धमकियां दी गई। बलात्कार को एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, जो संघी गिरोह के पूजनीय सावरकर का सिद्धांत था। बंगाल की जनतांत्रिक संस्कृति को फासीवादी संस्कृति में ढालने का काम ममता बनर्जी ने किया। तो अब ममता के पतन पर रोने वाला कौन मिलेगा?

देश का राजनैतिक इतिहास बताता है कि जिस भी पार्टी ने भाजपा को अपना सगा माना, भाजपा ने उसे ठगा ही है और उसका पतन हुआ है। ममता बनर्जी की कहानी इससे अलग नहीं है। ममता आज सड़क पर संघर्ष की बात कर रही है, यह संघर्ष उसे वामपंथ पर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि वामपंथ ही सड़कों पर संघर्षों के कारण पलता-बढ़ता और जिंदा रहता है। ममता को आप और केजरीवाल की हालत पर गौर करना चाहिए और अब उसे अपने चुने हुए सांसदों और नव-निर्वाचित विधायकों को बचाने की चिंता करनी चाहिए। भाजपा की बंगाल फतह के बाद एक पार्टी के रूप में तृणमूल का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है。

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: रक्तरंजित राजनीति, संस्थागत पतन और बंगाल का भविष्य

संजय पराते जी का यह आलेख मात्र एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनतंत्र के शवगृह से उठती हुई एक भयानक चीख है। पश्चिम बंगाल, जो कभी देश की बौद्धिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना का केंद्र हुआ करता था, आज फासीवादी संस्कृतियों और सत्ता के खूनी खेल का एक खुला मैदान बन चुका है। लेखक ने बहुत ही तार्किक और बेबाक तरीके से रेखांकित किया है कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका इस पूरे चुनावी चक्र में किस तरह संदिग्ध रही है। सुप्रीम कोर्ट का यह ‘विश्वास’ कि चुनाव के बाद हिंसा खत्म हो जाएगी, या तो उसकी ज़मीनी हकीकत से अनभिज्ञता को दर्शाता है या फिर केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के प्रति उसके चयनात्मक ‘समर्पण’ को। जब सड़कों पर संविधान और कानून का राज तार-तार हो रहा हो, तब संस्थाओं का यह मौन नागरिकों के लिए मौत का परवाना बन जाता है।

संस्थागत सांठगांठ और चुनाव आयोग की ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ का पाखंड:
राज्य में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 2600 कंपनियां और 2 लाख से ज्यादा सशस्त्र जवानों की मौजूदगी के बावजूद यदि राजनीतिक कार्यकर्ताओं के दफ्तर जलाए जा रहे हैं और मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं, तो यह विरोधाभास खुद-ब-खुद बहुत कुछ बयां करता है। यह इस बात का प्रमाण है कि सुरक्षा बलों की तैनाती का प्राथमिक उद्देश्य आम नागरिकों की रक्षा करना नहीं था, बल्कि एक विशेष नरेटिव को जमीन पर उतारना और सत्ता के हस्तांतरण को एक ‘प्रायोजित भय’ के साये में संपन्न कराना था। चुनाव आयोग का ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ का दावा एक भयानक पाखंड के अलावा और कुछ नहीं है। पराते जी का यह आरोप बेहद गंभीर और विचारणीय है कि वास्तव में चुनाव भाजपा नहीं, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार लड़ रही थी, जिसके पीछे राज्य की पूरी मशीनरी और संवैधानिक संस्थाएं एक ‘इलेक्शन मैनेजमेंट एजेंसी’ की तरह काम कर रही थीं। ‘न्यू इंडिया’ में अब चुनाव एक निष्पक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राज्य सत्ता द्वारा ‘मैन्युफैक्चर’ किया गया एक ‘इवेंट’ बन चुका है।

ममता का झूठ और टीएमसी के ‘कर्मा’ का फल:
आलेख ने ममता बनर्जी के उस सफ़ेद झूठ को भी पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि टीएमसी ने सत्ता में आने के बाद वामपंथ पर अत्याचार नहीं किया। राजनीतिक इतिहास गवाह है कि टीएमसी के 15 साल वामपंथी कार्यकर्ताओं की शवयात्राओं, दफ्तरों पर कब्ज़े और व्यवस्थित हिंसा के साल थे। पराते जी ने बहुत ही सटीक ऐतिहासिक संदर्भ दिया है कि कैसे ममता बनर्जी ने वामपंथ को सत्ता से उखाड़ने के लिए शुरुआती दौर में आरएसएस और भाजपा के साथ रणनीतिक सांठगांठ की। उन्होंने ‘मां काली’ की उपाधियां स्वीकार कीं और संघ के शीर्ष नेतृत्व से आशीर्वाद लिया। आज यह टीएमसी के लिए एक कड़वा ‘कर्मा’ (Karma) है कि जिस सांप्रदायिक और फासीवादी राजनीति को उन्होंने वामपंथ के खात्मे के लिए बंगाल में पैर जमाने का मौका दिया, आज वही भस्मासुर बनकर उन्हें निगलने के लिए खड़ी है। हिंसा को राजनीतिक हथियार बनाने की जिस संस्कृति को टीएमसी ने सींचा, आज उसी संस्कृति ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया है।

अगली आजमाइश: उत्तर प्रदेश और देश का भविष्य:
पराते जी ने स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि बंगाल अब भाजपा का 21वां ‘रामराज्य’ (जिसे वे बुलडोजर राज कहते हैं) बनने जा रहा है। उत्तरप्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों ने भाजपा शासित सरकारों में संस्थागत पतन, अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन और असहमति की आवाज़ों को कुचलने का जो मंज़र देखा है, अब बंगाल उसी क्रूर स्वाद को चखेगा। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बंगाल में ‘घुसपैठियों’ के नाम पर लाखों नागरिकों को मतदाता सूचियों से बाहर करके जो ‘जीत’ का मॉडल तैयार किया गया है, वह आगामी उत्तर प्रदेश और 2029 के आम चुनावों के लिए एक भयावह ‘प्रेसिडेंट’ (मिसाल) बन गया है। सांप्रदायिक विषवमन और ध्रुवीकरण को जब चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं का मौन संरक्षण मिल जाए, तो जनतंत्र केवल एक खोखला शब्द रह जाता है। संजय पराते का यह लेख हमें इस सच का सामना करने के लिए विवश करता है कि फासीवाद से लड़ने के लिए महलों की राजनीति नहीं, बल्कि सड़कों पर जनता का व्यापक संघर्ष ही एकमात्र रास्ता बचा है। और यह संघर्ष वामपंथ के बिना अधूरा है।

Pawan Singh

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Chief Editor, Taj News

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