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🔥 अंगीठी से अग्निकांड — पिता के सामने ही जिंदा जल गया बेटा, “मेरे लाल को बचा लो…” चीखता रह गया अशोक

राष्ट्रीय

Tuesday, 02 December 2025, 3:18:52 PM. New Delhi

दिल्ली के वसंत विहार स्थित कुली कैंप में सोमवार तड़के एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई जिसने पूरे इलाके का कलेजा दहला दिया। रैन बसेरा, जिसमें रात भर ठंड से बचने के लिए लोग अंगीठी जलाकर बैठे रहते हैं, अचानक भयंकर आग का शिकार हो गया। आग ने देखते ही देखते पूरी झोपड़ी जैसी संरचना को घेर लिया और भीतर मौजूद कई लोगों की जान खतरे में पड़ गई। इसी आग में 18 वर्षीय अर्जुन और 42 वर्षीय विकास की झुलसकर मौत हो गई। हादसे के बाद पूरे इलाके में दहशत, मातम और खामोशी पसर गई।

दमकल की चार गाड़ियों को आग पर काबू पाने में डेढ़ घंटे से अधिक समय लगा। आग बुझने के बाद जब दमकलकर्मी अंदर गए, तो दो शव बुरी तरह जले पड़े मिले।

यह हादसा एक परिवार के लिए और भी दर्दनाक इसलिए है क्योंकि 18 वर्षीय अर्जुन का पिता अशोक वहीं पास का शौचालय संभालता है। और हादसे के वक्त वह अपने बेटे को बचाने के लिए चीखता रह गया—
“कोई मेरे लाल को बचा लो… कोई मेरे अर्जुन को बाहर निकाल दो…”
लेकिन आग की लपटें इतनी भयंकर थीं कि कोई मदद नहीं कर पाया।


आग कैसे लगी? — अंगीठी की गर्मी ने रात को नरक में बदला

पुलिस और स्थानीय लोगों के बयान एक ही दिशा में इशारा करते हैं कि हादसे की शुरुआत अंगीठी से हुई। ठंड के मारे रैन बसेरे के अंदर लोगों ने अंगीठी जलाई थी।
कुछ देर बाद:

  • अंगीठी का तापमान बढ़ा
  • आसपास रखी वस्तुओं में आग लगी
  • धीरे-धीरे पूरी संरचना आग की चपेट में आ गई

आग इतनी तेजी से फैली कि रैन बसेरे के बाहर खड़ी मोटरसाइकिल भी जलकर राख हो गई, और उसके कारण निकलती चिंगारियां और धुआं भीतर फंसे लोगों की जान और खतरों में डालते गए।

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हादसा कब हुआ? — 3:28 AM, कुछ ही सेकंडों में तबाही

साउथ-वेस्ट दिल्ली के DCP अमित गोयल के अनुसार:

  • 3:28 AM पर PCR को आग लगने की सूचना मिली
  • दमकल की चार गाड़ियां तुरंत रवाना की गईं
  • रैन बसेरे से ऊंची लपटें निकल रही थीं
  • 90 मिनट में आग पर काबू पाया गया
  • उसके बाद दो जले हुए शव बरामद हुए

दमकलकर्मियों ने कई बार अंदर जाने की कोशिश की, लेकिन लकड़ी और प्लास्टिक जैसे सामानों ने आग को और भड़का दिया।


अर्जुन कौन था? — इकलौता बेटा, मां की मौत के बाद पिता ही सबकुछ

18 वर्षीय अर्जुन के बारे में पड़ोसियों ने जो बताया, उससे हर किसी की आंख नम हो गई:

  • मां की मौत कई साल पहले हो चुकी थी
  • पिता अशोक ने दूसरी शादी नहीं की, ताकि बेटा कभी अकेला महसूस न करे
  • अर्जुन काम पर लग गया था और रैन बसेरे में ही रहता था
  • पिता रोज रात को उससे मिलने आता था

उस रात उसका पिता वहीं पास के शौचालय के कमरे में सो रहा था।
दोनों अक्सर मिलकर खाना खाते, बातें करते और आने वाले दिनों के सपने देखते थे।


पिता ने कैसे जाना? — “संजय का फोन आया… और मेरी दुनिया उजड़ गई”

अर्जुन का पिता अशोक बदहवास होकर रोते हुए बस यही बताता रहा:

“रात करीब साढ़े तीन बजे संजय का फोन आया—
‘अशोक भाई… रैन बसेरे में आग लगी है।’
मैं दौड़ा… दौड़ता ही जा रहा था…
वहां पहुंचा तो मेरा अर्जुन… अंदर फंसा हुआ चिल्ला रहा था।
मैं कूदने लगा… लेकिन लोगों ने पकड़ लिया…”

अशोक के शब्दों में इतना दर्द था कि आसपास मौजूद कई पुलिसकर्मी भी खुद को रोक नहीं पाए।


विकास कौन था? — बिना पहचान की लाश, परिवार लापता

दूसरा मृतक 42 वर्षीय विकास था।
उसके बारे में अभी बहुत कम जानकारी है:

  • वह अस्थायी मजदूरी करता था
  • कुछ दिनों से रैन बसेरे में ठहर रहा था
  • उसके परिवार का कोई पता नहीं लग पाया
  • पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है

पुलिस उसकी पहचान और रिश्तेदारों का पता लगाने की कोशिश कर रही है।


उस रात रैन बसेरा कैसे बना जाल?

घटना के समय वहाँ 8 लोग मौजूद थे।

  • आग लगते ही 6 लोग बाहर कूदकर निकल गए
  • लेकिन
    • रैन बसेरे के दरवाजे पर खड़ी बाइक जल उठी
    • प्रवेश/निकास का रास्ता धुआं और आग से भर गया
    • अर्जुन और विकास अंदर फंस गए

कुछ लोग चिल्लाते रहे,
दरवाजा हटाओ! बाइक हटाओ!
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।


पड़ोस में रहने वाले संजय की आंखों देखी

संजय ने बताया:

“मैं अपनी झुग्गी में था… धुंए की तेज बदबू आई… बाहर निकला तो देखा—
पूरा रैन बसेरा आग की लपटों में था।
मैं चिल्लाते हुए अशोक को फोन करता रहा…
बस 2–3 मिनट में आग बेकाबू हो गई।”

संजय की आवाज में अभी भी डर साफ झलक रहा था।


अग्निशमन विभाग की चुनौती — अंदर लकड़ी, कपड़ा, प्लास्टिक का ढेर

दमकल कर्मियों ने बताया कि:

  • रैन बसेरे के भीतर बेहद ज्वलनशील सामान था
  • लकड़ी, तिरपाल, गद्दे, रजाई, प्लास्टिक — सबने आग को बढ़ाया
  • लपटें 12–15 फीट तक उठ रही थीं
  • अंदर जाना लगभग नामुमकिन था

दमकल अधिकारी ने कहा:
अगर 10 मिनट और देर होती तो छह और शव मिल सकते थे।


इलाके में डर — मजदूर, रिक्शा चालक और गरीब परिवारों में दहशत

कुली कैंप एक घनी बस्ती है जहाँ:

  • दैनिक मजदूर
  • रिक्शा चालक
  • फुटपाथ और रैन बसेरे में रहने वाले परिवार

की बड़ी संख्या रहती है।

आग की खबर फैलते ही:

  • महिलाएँ बच्चों को लेकर बाहर भागती दिखीं
  • लोग एक-दूसरे को जगाते रहे
  • कई परिवार रात भर बाहर ही बैठे रहे

हर कोई बस एक ही बात पूछ रहा था—
फिर ऐसा न हो जाए?


पुलिस की जांच — हादसा या लापरवाही?

पुलिस अब दो पहलुओं पर जांच कर रही है:

  1. अंगीठी से लगी आग
  2. क्या किसी ने केरोसिन/प्लास्टिक जलाया था?

फॉरेंसिक टीम को कॉल किया गया है और रैन बसेरे के अवशेषों को सील कर लिया गया है।
कुछ CCTV फुटेज भी खंगाले जा रहे हैं।


पूरी दिल्ली के रैन बसेरे सवालों के घेरे में

इस हादसे के बाद एक बार फिर ये सवाल उठे हैं:

  • रैन बसेरों में सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं?
  • अग्निशमन की व्यवस्था क्यों नहीं?
  • क्या रात में चेकिंग होती है?
  • लोगों को अंगीठी जलाने की अनुमति क्यों?

NGOs और स्थानीय संगठनों ने इसे पूरी प्रणाली की विफलता बताया है।


भीड़ से एक ही आवाज — “अशोक का बेटा लौट आए…”

हादसे के बाद भीड़ में कई लोग रो रहे थे।
हर कोई बस यही कह रहा था—

अशोक का तो सब खत्म हो गया…
ऐसा दर्द किसी को न मिले…

✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
📧 pawansingh@tajnews.in
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