Saturday, 10 January 2026, 8:45:00 AM. India
यह कॉलम उस बदलती सामाजिक मानसिकता पर सवाल उठाता है जहाँ शिक्षा की जगह शोहरत और खेल को सफलता का एकमात्र पैमाना बना दिया गया है। ब्रज खंडेलवाल तर्क देते हैं कि खेल और मंच प्रदर्शन पैदा करते हैं, लेकिन विचार नहीं—और एक-आयामी सफलता समाज को सोच में कमजोर बनाती है
पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो… ब्रांड एम्बेसडर
पुरानी कहावत और नया भारत
लेखक: ब्रज खंडेलवाल
(Opinion Column)
हम बचपन में एक सीधी-सी, बेरहम कहावत सुनते थे—
“पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे खराब।”
आज यह कहावत पुरानी नहीं हुई है, बस उसका अर्थ बदल गया है।
अब खेलोगे-कूदोगे तो खराब नहीं बनोगे, करोड़पति बनोगे, विज्ञापन में दाँत दिखाओगे और बच्चों को पढ़ाई छोड़ने की प्रेरणा दोगे।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि पैसा मिलेगा या नहीं। पैसा चाहिए तो नेतागिरी करो।
मत पूछो, दिमाग का क्या होगा? अंग्रेज़ी कहावत है—Fortune favors fools!
भारत के अधिकांश खेल सितारे बचपन से ही मैदानों में डाल दिए गए। किताबें बैग में नहीं, अलमारी में पड़ी रहीं। कॉलेज, रिसर्च, बहस, दर्शन—ये सब उनके जीवन से बाहर रहे। इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। दिन में छह घंटे ट्रेनिंग के बाद कोई हेगेल या न्यूटन पढ़ने नहीं बैठता।
नतीजा साफ है।
शानदार खिलाड़ी तो पैदा हो रहे हैं—आईपीएल को ही देख लो। ठोकू बल्लेबाज़ छाए हैं, लेकिन एक भी वैज्ञानिक, इंजीनियर या विचारक नहीं। इंडियन आइडल हो या इंडिया गॉट टैलेंट, नचिकाइएं, मटकाइए, गाइए—पैसा ही पैसा है। पढ़-लिख कर क्या करोगे बाबूजी?

ज़रा सिनेमा की तरफ़ चलिए, जहाँ “पढ़ाई की ज़रूरत ही क्या है” वाला दर्शन पूरी शान से राज करता है। अमिताभ बच्चन कॉलेज छोड़कर सुपरस्टार बने। धर्मेंद्र सीधे खेत से फ़िल्म सेट पर आ गए। सलमान खान, अक्षय कुमार, कंगना रनौत, कैटरीना कैफ—किसी को भी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी ने नहीं गढ़ा। यहाँ शिक्षा नहीं, एक्सप्रेशन चलता है। तर्क नहीं, टाइमिंग बिकती है। ज्ञान नहीं, जिम बॉडी मायने रखती है। रिश्तेदारियां, संपर्क—यही काम आते हैं।
हमने एक ऐसा समाज बना लिया है जहाँ बच्चे कहते हैं—
“पढ़कर क्या करेंगे? विराट बनेंगे।”
“डिग्री क्यों चाहिए? हीरो बनेंगे।”
कोई नहीं कहता—“पढ़ेंगे ताकि सवाल पूछ सकें।”
“सीखेंगे ताकि सिस्टम बदल सकें।”
सच यह है कि मैदान और मंच एकाग्रता सिखाते हैं, लेकिन विचार नहीं। वे प्रदर्शन पैदा करते हैं, विवेक नहीं। जो बच्चा दस साल की उम्र में सिर्फ़ जीतना सीखता है, वह चालीस की उम्र में भी सिर्फ़ जीतना ही चाहता है—सोचना नहीं।
तो पुरानी कहावत गलत नहीं थी।
बस हमने उसे समझना छोड़ दिया।
पढ़ोगे-लिखोगे तो नवाब नहीं, नागरिक बनोगे।
खेलोगे-कूदोगे तो खराब नहीं, पर अक्सर एक-आयामी बनोगे। और एक-आयामी समाज, चाहे कितना ही फिट और फ़ेमस क्यों न हो, आख़िरकार सोच में कमजोर ही रहता है।
आज का भारत इस पूरी स्थिति पर गर्व करता है—
“देखो, वह दसवीं पास भी नहीं है, फिर भी करोड़ों कमाता है।”
मानो पढ़ा-लिखा होना शर्म की बात हो गई हो। टीवी डिबेट्स में खिलाड़ी और अभिनेता राष्ट्रीय मुद्दों पर राय देते हैं, और प्रसिद्धि को ज्ञान का प्रमाण मान लिया जाता है।
अब ज्ञान की जगह “अनुभव” ने ले ली है—वह अनुभव जो सिर्फ़ शूटिंग फ़्लोर या पिच तक सीमित है। किताबें भारी लगती हैं, सवाल असुविधाजनक, और सोचने वाले लोग “ओवरथिंकर” कहलाते हैं।
हम बच्चों को यह नहीं बताते कि हर विराट कोहली के पीछे लाखों ऐसे विराट हैं जो न खेल पाए, न पढ़ पाए। मैदान सबको नहीं अपनाता, लेकिन शिक्षा कम से कम दरवाज़ा तो खोलती है।
कहावत आज भी सही है—गलत हमने अपनी प्राथमिकताएँ कर ली हैं।
उदाहरण (खेल बनाम औपचारिक शिक्षा)
निम्न खेल व्यक्तित्वों ने अपने-अपने खेल में असाधारण सफलता पाई, पर औपचारिक शिक्षा सीमित रही—कई ने बचपन में ही पढ़ाई छोड़ी:
भारतीय नाम:
Sachin Tendulkar, MS Dhoni, Virat Kohli, Kapil Dev, Virender Sehwag, Harbhajan Singh, Hardik Pandya, Umesh Yadav, Rishabh Pant, Neeraj Chopra, Mary Kom, Milkha Singh, PT Usha, Deepika Kumari, Vijender Singh, Dhyan Chand, Saina Nehwal, Yogeshwar Dutt, Ravi Dahiya, Zaheer Khan।
अंतरराष्ट्रीय नाम:
Lionel Messi, Cristiano Ronaldo, Mike Tyson, LeBron James, Usain Bolt।
ये सभी अपने खेल के महानायक बने—आज ऐश में हैं—पर उच्च शिक्षा या अन्य बौद्धिक क्षेत्रों तक नहीं जा सके। सवाल पैसा नहीं, समाज की सोच है।
यह लेख वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार ब्रज खंडेलवाल द्वारा लिखा गया Opinion Column है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और समाज व शिक्षा पर स्वतंत्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।
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