भारत और यूरोपीय संघ के बीच एफटीए समझौते पर हस्ताक्षरIndia's Prime Minister Narendra Modi (C) poses for a photograph with European Commission President Ursula von der Leyen (R) and European Council President Antonio Costa before their meeting at the Hyderabad House in New Delhi on January 27, 2026. The leaders of India and the European Union will announce the "mother of all deals" when they meet in New Delhi to formalise a huge trade pact reached after two decades of negotiations. (Photo by Sajjad HUSSAIN / AFP via Getty Images)

Political Desk, Taj News | Updated: Wednesday, 28 January 2026, 08:10 PM IST

दो दशकों की कूटनीतिक रस्साकशी के बाद भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेखक बृज खंडेलवाल वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का बड़ा टर्निंग पॉइंट मानते हैं, जहाँ ट्रंप की टैरिफ धमकियों के बीच यूरोप से हाथ मिलाकर भारत ने न सिर्फ़ नए बाज़ार खोले हैं, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि क्या यह समझौता दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती देगा या चुनावी मौसम में पेश किया गया एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक भर साबित होगा।

भारत–यूरोपीय संघ एफटीए: सौदों की अम्मा या मोदी का मास्टरस्ट्रोक?

बृज खंडेलवाल

कल यानी 27 जनवरी 2026 की तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। दो दशकों के लंबे इंतजार, कूटनीतिक रस्साकशी और अनगिनत बैठकों के बाद आखिरकार भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने उस व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसे “सौदों की माँ” कहा जा रहा है। ब्रुसेल्स और दिल्ली के गलियारों में शैम्पेन की बोतलें खुलीं, नेताओं ने हाथ मिलाए और इसे एक नए युग की शुरुआत बताया। लेकिन बड़ा सवाल अब भी वही है: क्या यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए असली आतिशबाज़ी है या महज एक महँगा चुनावी पटाखा?

इस समझौते का पैमाना किसी की भी आँखें चौंधियाने के लिए काफी है। एक तरफ भारत के 1.4 अरब महत्वाकांक्षी लोग हैं, तो दूसरी तरफ यूरोप के 50 करोड़ समृद्ध उपभोक्ता। यह गठबंधन मिलकर दुनिया की जीडीपी का 25% और वैश्विक व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा नियंत्रित करता है। टैरिफ की दीवारें गिर चुकी हैं: यूरोप का 96.6% सामान अब बिना किसी शुल्क के भारतीय बंदरगाहों पर उतरेगा, जबकि भारत को धीरे-धीरे यूरोप के 99% बाज़ार तक पहुँच मिलेगी। यह व्यापारिक दुनिया का एक बड़ा “धमाका” है।

Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल

भारतीय निर्यातकों के लिए यह किसी लॉटरी से कम नहीं है। अब सूरत के बुनकर केवल स्थानीय बाज़ारों तक सीमित नहीं रहेंगे; उनके कपड़े लंदन और पेरिस के रैम्प पर जलवा बिखेरेंगे। आगरा के लेदर शूज अब सीधे मिलान और रोम के आलीशान शोरूम्स में चमकेंगे। जयपुर के रत्न और आभूषणों से अब यूरोपीय दुल्हनें सजेंगी संवरेगी।
दवाइयों और रसायनों के क्षेत्र में सन फ़ार्मा और डॉ. रेड्डीज़ जैसे जेनेरिक दिग्गज अब और भी मजबूती से उभरेंगे। आईटी सेवाओं की बात करें तो बेंगलुरु के कोडरों के लिए अब “वीज़ा” का रोड़ा कम होगा। यूरोपीय देशों ने स्किल शॉर्टेज का बहाना छोड़कर भारतीय प्रतिभाओं के लिए रास्ते आसान किए हैं।

यूरोप को इसके बदले क्या मिला? भारतीय सड़कों पर अब जर्मन कारें (मर्सिडीज़, ऑडी, बीएमडब्ल्यू) सस्ती होंगी। मुंबई और दिल्ली की हाई-प्रोफाइल पार्टियों में फ्रेंच वाइन और इटैलियन पनीर का स्वाद सस्ता होगा। लेकिन असली खेल तकनीक का है; इटैलियन और जर्मन मशीनें अब गुजरात और तमिलनाडु की फैक्ट्रियों में गरजेंगी, जिससे सालाना करीब €4 अरब की ड्यूटी बचेगी। सवाल यह है कि क्या यह ‘विन-विन’ स्थिति है या हमारे मध्यम वर्ग को यूरोपीय विलासिता का आदी बनाने की तैयारी?

इस डील की टाइमिंग किसी मंझे हुए शतरंज खिलाड़ी की चाल जैसी है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनके द्वारा भारतीय स्टील (जमशेदपुर) और झींगा (आंध्र प्रदेश) पर लगाए गए 50% तक के टैरिफ ने भारत को विकल्प खोजने पर मजबूर कर दिया। ट्रंप की टैरिफ दीवार ने भारत और यूरोप, दोनों को एक-दूसरे के करीब ला दिया है।
यह एफटीए भारत के लिए एक ‘एग्जिट रैम्प’ की तरह है: अमेरिकी अनिश्चितता से हटकर यूरोपीय स्थिरता की ओर। ट्रंप के तमतमाते मूड ने इस डील को वह ‘टर्बो बूस्ट’ दिया, जो पिछले 20 साल में नहीं मिल पाया था।

भारत अब किसी एक “बड़े भाई” के भरोसे नहीं है। पिछले साल न्यूज़ीलैंड के साथ हुआ समझौता रंग ला रहा है, कीवी बटर अब हमारी रोटियों पर है। ऑस्ट्रेलिया के साथ कोयले, वाइन और डॉक्टरों के लिए मोबिलिटी डील ने रिश्तों को गहरा किया है। नॉर्डिक देशों के साथ कुशल कामगारों के लिए बातचीत अंतिम चरण में है। भारत अब समानता और संतुलन के आधार पर रिश्ते बना रहा है।

दिल्ली की राजनीति इस पर बंटी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे “ऐतिहासिक जीत” बताया है, वहीं कांग्रेस और राहुल गांधी का सवाल है कि क्या इस चमक-धमक में हम अपने किसानों को भूल गए?
उद्योग जगत में उत्साह है; फिक्की ने इसे “निर्यात बूम” करार दिया है और अडानी पोर्ट्स पहले ही बढ़ते वॉल्यूम की तैयारी में हैं। लेकिन एमएसएमई (MSME) और डेयरी किसान सहमे हुए हैं। पंजाब और हरियाणा के डेयरी किसानों का कहना है, “अगर फ्रेंच बटर और यूरोपीय चीज़ बाज़ार में भर गया, तो हमारे दूध का क्या होगा?”

विजेता: भारत के आईटी पेशेवर, कपड़ा और आभूषण निर्यातक और मध्यम वर्ग, जिन्हें सस्ती प्रीमियम तकनीक मिलेगी। साथ ही यूरोप, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा उभरता बाज़ार मिल गया है।
चुनौतियां: छोटे किसान और स्थानीय ऑटो-पार्ट्स निर्माता, जिन्हें यूरोपीय दिग्गजों की गुणवत्ता और कीमत से सीधे मुकाबला करना होगा।
व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन कूटनीतिक रूप से यह मोदी का एक साहसिक कदम है। ट्रंप की धमकियों के बीच यूरोप से हाथ मिलाकर भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अब ग्लोबल सप्लाई चेन का केवल एक हिस्सा नहीं, बल्कि उसका एक मुख्य केंद्र (Hub) है।

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✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
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By Thakur Pawan Singh

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