Davos में बोर्ड ऑफ पीस और संयुक्त राष्ट्र की नई भूमिका(From L) Financial Times editor Martin Wolf, World Trade Organization (WTO) Director-General Ngozi Okonjo-Iweala, Colombia's President Gustavo Petro, Rwanda's President Paul Kagame, Microsoft co-founder Bill Gates and Netherlands' Prime Minister Mark Rutte attend a session at the World Economic Forum (WEF) meeting in Davos on January 17, 2024. (Photo by Fabrice COFFRINI / AFP)

Political Desk, Taj News | Updated: Saturday, 24 January 2026, 11:10 AM IST

संयुक्त राष्ट्र को वर्षों तक “बेकार टॉक शॉप” कहकर उपहास उड़ाने वाले डोनाल्ड ट्रंप द्वारा Davos में प्रस्ताव 2803 की छत्रछाया में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जैसी नई व्यवस्था खड़ी करने की पहल को लेखक बृज खंडेलवाल वैश्विक राजनीति के गहरे विरोधाभास के रूप में देखते हैं, जहाँ अमेरिका को अपनी एकतरफ़ा ताक़त को वैधता देने के लिए उसी यूएन की ज़रूरत पड़ रही है जिसे वह कमज़ोर बताता रहा है, और जहाँ भारत के सामने यह कठिन सवाल खड़ा है कि क्या इस मंच में शामिल होना रणनीतिक अवसर है या अमेरिकी प्रभाव के एक नए जाल में फँसने का जोखिम।

Davos में बोर्ड ऑफ पीस और संयुक्त राष्ट्र की नई भूमिका

22 January को Davos में एक नई UN की नींव पड़ी???

जो ट्रंप संयुक्त राष्ट्र संघ का मज़ाक उड़ाते थकते नहीं थे, अब उसी के झंडे तले क्यों कदम बढ़ा रहे हैं? क्या भारत इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होकर अमेरिकी जाल में फँसेगा?

ट्रंप की दुविधा: यूएन का मज़ाक, फिर उसी का सहारा

बृज खंडेलवाल

क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संयुक्त राष्ट्र (यूएन) से रिश्ता अब विरोधाभास की मिसाल बन गया है? पहले उन्होंने यूएन को ‘फूला-फूला, सुस्त और बेकार’ कहा। चुनावी रैलियों में इसे ‘टॉक शॉप’ करार दिया, जहाँ भाषणों की भरमार है, लेकिन फैसलों की कमी। प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर ट्वीट तक, ट्रंप ने यूएन को वैश्विक सहयोग की नाकाम मिसाल बताया।
लेकिन 2026 की शुरुआत में वही ट्रंप यूएन सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 के साए में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ बना रहे हैं। यह सिर्फ़ पाखंड नहीं, सत्ता का कड़वा सच है।
इतिहास को भी व्यंग्य पसंद है।
जब ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति को वैधता चाहिए, हथियारों को कानूनी नकाब, और अकेले कार्रवाई से वैश्विक विरोध का डर हो, तब ट्रंप यूएन की छत्रछाया लेते हैं। उनकी ज़ुबानी बहादुरी संस्थाओं का मज़ाक उड़ाने में है, लेकिन व्यावहारिक समझ यह जानती है कि यूएन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कमज़ोरियाँ हों या न हों, यूएन ही एकमात्र वैश्विक मंच है जो कानूनी और कूटनीतिक वैधता दे सकता है। आप इसे कोस सकते हैं, लेकिन इसकी जगह कोई नहीं ले सकता। सबसे बड़े आलोचक भी आख़िरकार इसके दरवाज़े पर पहुँचते हैं।

Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल

यूएन आज वह नैतिक प्रकाशस्तंभ नहीं रहा, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उसके संस्थापकों ने सपना देखा था। यह न युद्ध समय पर रोक पाता है, न ज़ालिमों को सज़ा देता है, न इंसाफ़ बराबर बाँटता है। लेकिन यह एक असहज भूमिका निभाता है, कच्ची ताक़त को वैध रूप देना। ट्रंप इसे अच्छी तरह समझते हैं। उनके लिए यूएन आदर्शों का मंदिर नहीं, बल्कि कानूनी ढाल है। सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव नैतिकता नहीं, रणनीतिक हथियार है।
यहाँ विरोधाभास गहरा हो जाता है। जिस यूएन को ट्रंप कमज़ोर बताते हैं, वही ताक़त को कानूनी चोला पहनाने के लिए अनिवार्य हो जाती है। आलोचक इसे यूएन की नाकामी कहते हैं, लेकिन उल्टा सच है। जो संस्था बेकार हो, उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। यूएन टिका है क्योंकि यह वैश्विक सहमति का भ्रम पैदा करता है, कोई महाशक्ति अकेले ऐसा नहीं कर सकती। ट्रंप का यूएन से रिश्ता वैचारिक नहीं, लेन-देन वाला है। मंच पर गालियाँ, पर्दे के पीछे इस्तेमाल। यह सियासी साफ़गोई है, नैतिक उलझन नहीं।
असल त्रासदी यूएन की है। यह ताक़त को काबू करने के लिए बना था, आज ज़्यादातर उसे जायज़ ठहराने का औज़ार बन गया। इसकी अहमियत अब इंसाफ़ से ज़्यादा ताक़तवरों की ज़रूरतों पर टिकी है। फिर भी अपरिहार्य। ट्रंप का यूएन झंडे तले कदम न इसे पाक-साफ़ बनाता है, न दुनिया को सुरक्षित। लेकिन यह दिखाता है, बिखरी दुनिया में सबसे ताक़तवर को भी इजाज़तनामा चाहिए। मज़ाक उड़ाइए, लेकिन दस्तख़त के लिए नज़रें न्यूयॉर्क पर ही जाती हैं।
2026 में यह सच्चाई साफ़ हुई जब अमेरिका ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ बनाया। प्रस्ताव 2803 के तहत यह बहुपक्षीय व्यवस्था से हटकर ताक़त और सौदों पर आधारित सिस्टम है। बड़ी शक्तियों की हिचकिचाहट सब कहती है। चीन का इंकार यूएन-केंद्रित निष्ठा जरूर दिखाता है, लेकिन उसे हाशिए पर धकेल सकता है। रूस की दुविधा और भारत की सावधानी एक सवाल पैदा करती है: अमेरिकी नियंत्रण वाली व्यवस्था में शामिल हों या विरोध कर असर और अवसर दोनों खो दें?
भारत के लिए यह दुविधा गंभीर है। बोर्ड में शामिल होकर क्या हम ग़ज़ा पुनर्निर्माण जैसे प्रोजेक्ट्स में मुनाफ़ाख़ोरी और नए उपनिवेशवाद का हिस्सा बनेंगे? रणनीतिक रूप से, यूएन जैसे मंचों की कमज़ोरी ताइवान, यूक्रेन में ग़लतफहमियाँ बढ़ाएगी, दुनिया को नए खेमों में बाँटेगी। हाँ, यह बोर्ड अस्थायी शांति दे सकता है, लेकिन नाज़ुक।
इस अनिश्चित दुनिया में यूएन का मज़ाक उड़ेगा और इस्तेमाल होगा। भारत को सावधानी बरतनी होगी।
क्या बोर्ड ऑफ पीस शांति लाएगा या नया जाल? ट्रंप की दुविधा हमारी परीक्षा है। जानकर लोगों का मानना है कि भारत को बोर्ड का सदस्य बनना चाहिए और पश्चिम एशिया के पुनर्निर्माण में स्टेक होल्डर, हिस्सेदार बनना चाहिए। परिस्थितियां कुछ ऐसी बन रही हैं कि न चाहते हुए भी भारत को ट्रंप का साथ देना पड़ सकता है। वैसे विश्व शांति के लिए कोई भी पहल करे, स्वागत करना चाहिए।

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✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
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By Thakur Pawan Singh

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