Political Desk, Taj News | Updated: Wednesday, 28 January 2026, 09:20 PM IST
भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित नए UGC अधिनियम को उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और नियमन के सुधार के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन लेखक देवेंद्र गौतम अपने इस विचारात्मक लेख में स्पष्ट करते हैं कि किसी भी शिक्षा कानून की असली कसौटी यह होनी चाहिए कि वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग—गरीब छात्रों—को कितना सशक्त बनाता है, क्योंकि यदि शिक्षा सुधार समावेशी और गरीब-केंद्रित नहीं होंगे तो वे सामाजिक असमानता घटाने के बजाय उसे और गहरा करने का जोखिम पैदा करेंगे।

UGC अधिनियम: शिक्षा सुधार का रास्ता गरीब-केंद्रित क्यों हो
देवेंद्र गौतम
भारत सरकार द्वारा लाया गया नया UGC अधिनियम उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मंशा को दर्शाता है। उद्देश्य यह बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालयों में गुणवत्ता बढ़े, नियमन मजबूत हो और वैश्विक स्तर की शिक्षा व्यवस्था विकसित हो। लेकिन किसी भी शिक्षा कानून की सफलता इस बात से तय होती है कि वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग—गरीब—को कितना सशक्त बनाता है। यदि UGC अधिनियम लाना ही है, तो उसे गरीबों के लिए लेकर आना चाहिए, क्योंकि गरीब की कोई जाति नहीं होती।
भारतीय संस्कृति और इतिहास इस सत्य के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। गरीब ब्राह्मण सुदामा इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। सुदामा ब्राह्मण थे, लेकिन अत्यंत निर्धन थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उनके सामने न जाति देखी, न वर्ग, न वैभव—केवल उनकी गरीबी, सादगी और मित्रता को महत्व दिया। यह दर्शाता है कि भारतीय चिंतन में गरीबी मानवीय पीड़ा है, न कि किसी जाति विशेष की पहचान।

इसी प्रकार महर्षि वाल्मीकि का जीवन भी उल्लेखनीय है। प्रारंभ में वे एक सामान्य और उपेक्षित जीवन जी रहे थे, लेकिन ज्ञान और तपस्या ने उन्हें रामायण जैसा महान ग्रंथ रचने का अवसर दिया। शिक्षा और अवसर ने ही उन्हें समाज में सम्मान दिलाया। संत कबीर, रविदास और नामदेव जैसे संत भी साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आए, लेकिन ज्ञान और विचारों के बल पर उन्होंने पूरे समाज को दिशा दी।
भारतीय संस्कृति सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना पर आधारित रही है। इसका अर्थ यही है कि नीतियाँ ऐसी हों जो सबके कल्याण की बात करें, विशेषकर उनके लिए जो सबसे पीछे खड़े हैं। यदि शिक्षा केवल संपन्न वर्ग तक सीमित रह जाएगी, तो सामाजिक असमानता और गहरी होगी।
जब कोई सरकार गरीबों के लिए ईमानदारी से कानून लेकर आती है—चाहे वह शिक्षा शुल्क में राहत हो, छात्रवृत्तियों का विस्तार हो, ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में विश्वविद्यालयों की पहुँच हो—तो न किसी राजनीतिक दल को आपत्ति होती है और न ही किसी व्यक्ति को। गरीबों के हित में बना कानून राजनीति से ऊपर उठ जाता है। ऐसे कानून समाज को जोड़ते हैं, न कि बाँटते हैं।
इसके विपरीत, यदि शिक्षा नीति को जाति, वर्ग या संकीर्ण राजनीतिक दृष्टि से देखा जाएगा, तो देश में भ्रम और विभाजन की स्थिति बन सकती है। शिक्षा का उद्देश्य अवसरों को सीमित करना नहीं, बल्कि समान बनाना होना चाहिए। भारत तभी आगे बढ़ेगा जब हर गरीब छात्र—चाहे वह किसी भी जाति या समुदाय से हो—यह महसूस करे कि यह व्यवस्था उसके साथ खड़ी है।
अतः UGC अधिनियम को केवल प्रशासनिक सुधार का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का माध्यम बनाया जाना चाहिए। यदि यह कानून गरीब-केंद्रित, समावेशी और भारतीय संस्कृति की मूल भावना पर आधारित होगा, तो न देश बटेगा, न समाज कमजोर होगा, बल्कि शिक्षा के माध्यम से एक सशक्त और एकजुट भारत का निर्माण होगा।
देवेंद्र गौतम
( विभागाध्यक्ष, प्राथमिक शिक्षा डिप्लोमा, वर्द्धमान डिग्री कॉलेज आगरा )
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