सेक्स, शादी और दहेज: इतना अदालती कन्फ्यूजन क्यों? कानून और समाज के द्वंद्व पर बृज खंडेलवाल का प्रखर आलेख

आर्टिकल Desk | tajnews.in | Tuesday, April 07, 2026, 12:15:00 PM IST

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Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद मारक आलेख में ‘सेक्स, शादी और दहेज’ से जुड़े अदालती फैसलों की उलझन का कड़ा विश्लेषण किया है। दरअसल, उन्होंने बताया है कि कैसे आज के आधुनिक कानून और हमारी पुरानी सामाजिक मान्यताओं के बीच एक बहुत गहरी खाई पैदा हो गई है। इसके अलावा, उन्होंने ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (Live-in Relationship) और धारा 498A के भारी दुरुपयोग पर भी सटीक सवाल उठाए हैं। इसलिए, पढ़िए यह विचारोत्तेजक आलेख:

मुख्य बिंदु

  • देश की अलग-अलग अदालतों के हालिया फैसलों ने सेक्स, शादी और दहेज के मामलों में एक बहुत बड़ी उलझन पैदा कर दी है।
  • मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि विवाह के भीतर ‘अप्राकृतिक यौन संबंध’ बिल्कुल अपराध नहीं है; यह फैसला सीधे ‘सहमति’ पर सवाल उठाता है।
  • इसके अलावा, इलाहाबाद हाई कोर्ट का मानना है कि शादीशुदा पुरुष का किसी अन्य वयस्क महिला के साथ ‘लिव-इन’ में रहना अपराध नहीं है।
  • आखिरकार, जब तक संसद समय के अनुकूल साफ और संतुलित कानून नहीं बनाएगी, तब तक समाज और अदालतों के बीच यह गहरा टकराव तय है।

रात के सन्नाटे में एक सवाल बार-बार गूंजता है। क्या कानून हमारी व्यक्तिगत आज़ादी का संरक्षक है। या निजी रिश्तों में घुस बैठा एक अदृश्य नियंत्रक। जवाब आसान नहीं। और शायद ईमानदार जवाब किसी के पास है भी नहीं。
भारतीय न्यायपालिका के हालिया फैसले इस उलझन को और गहरा रहे हैं। एक तरफ संविधान की आधुनिक रोशनी। दूसरी तरफ परंपराओं की धुंध। अदालतों के फैसले जैसे दो दिशाओं में भागती हुई रेलगाड़ियां। टकराव तय है。
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का फैसला कहता है कि विवाह के भीतर “अप्राकृतिक यौन संबंध” अपराध नहीं। तर्क सीधा है। शादी में सहमति का अर्थ अलग हो सकता है। लेकिन यहीं पहला विरोधाभास खड़ा होता है। शादी के बाहर “ना” का मतलब साफ-साफ “ना”। शादी के भीतर वही “ना” धुंधला क्यों पड़ जाता है। क्या विवाह एक अनुबंध है या स्थायी सहमति का लाइसेंस। यह सवाल चुभता है。
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने धारा 498A पर संतुलन की बात की। हर झगड़ा दहेज उत्पीड़न नहीं। यह फैसला उन लोगों के लिए राहत है जो झूठे मामलों में फंसते हैं। लेकिन दूसरा विरोधाभास देखिए। कानून सख्त हो तो दुरुपयोग का डर। कानून नरम हो तो पीड़ित की आवाज दबने का खतरा। सच बीच में कहीं दम तोड़ देता है। एक महिला जो वर्षों से प्रताड़ना झेल रही है, वह सबूत नहीं जुटा पाती। वहीं एक झूठा केस पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर देता है。
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि एक विवाहित पुरुष का किसी वयस्क महिला के साथ लिव-इन में रहना अपराध नहीं। निजी स्वतंत्रता का मामला है। सुनने में यह प्रगतिशील लगता है। लेकिन तीसरा विरोधाभास यहीं जन्म लेता है। शादी के बाहर संबंध स्वतंत्रता हैं। शादी के भीतर जिम्मेदारी बोझ क्यों लगने लगती है। क्या विवाह अब सिर्फ एक सामाजिक औपचारिकता बनकर रह जाएगा。
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने डिजिटल ब्लैकमेल पर कहा कि सिर्फ धमकी देना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। कानूनी कसौटी पर यह तर्क सही है। लेकिन आज के दौर में एक व्हाट्सएप मैसेज, एक वायरल वीडियो, एक सोशल मीडिया पोस्ट किसी की जिंदगी तोड़ सकता है। चौथा विरोधाभास साफ है। कानून सबूत मांगता है। समाज परिणाम देखता है। और पीड़ित इन दोनों के बीच पिस जाता है。
इन फैसलों को साथ रखिए। तस्वीर साफ दिखेगी। विवाह के बाहर स्वतंत्रता का विस्तार। विवाह के भीतर अधिकारों की उलझन। बाहर की दुनिया में निजता का सम्मान। घर के भीतर सहमति की अस्पष्टता। यह दोहरी सोच ही सबसे बड़ा संकट है。

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जमीनी उदाहरण और भी हैं। एक युवा जोड़ा शादी से पहले साथ रहता है, समाज उसे तिरछी नजर से देखता है, लेकिन कानून उसे संरक्षण देता है। वहीं शादी के बाद वही जोड़ा अगर निजी स्पेस मांगे, तो परिवार और समाज दोनों सवाल खड़े कर देते हैं। एक और दृश्य। दहेज के खिलाफ कानून है, फिर भी लेन-देन “गिफ्ट” के नाम पर चलता है। कानून मना करता है। समाज रास्ता निकाल लेता है。
कानून बनाना अदालत का काम नहीं। वह संसद का दायित्व है। अदालतें व्याख्या करती हैं। लेकिन जब कानून पुराने हों और समाज तेजी से बदल रहा हो, तब व्याख्या भी उलझन पैदा करती है। जरूरत है साफ, संतुलित और समय के अनुरूप कानूनों की。
ऐसे कानून जो अधिकार दें, पर जिम्मेदारी भी तय करें। जो पीड़ित को न्याय दें, पर निर्दोष को बचाएं। जो विवाह को कैद न बनाएं, लेकिन उसे मजाक भी न बनने दें。
जब तक रिश्तों, सहमति और अधिकारों के बीच की यह धुंध साफ नहीं होती, तब तक कानून आधा सच ही रहेगा। न पूरी आज़ादी देगा। न पूरी सुरक्षा。
सवाल अब भी वही है। कानून हमारा रक्षक है या हमारे रिश्तों का मौन नियंत्रक। जवाब हमें ही तय करना होगा。

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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