स्त्री-अधिकार से मानवता की आवाज तक: माता सावित्रीबाई फुले का व्यापक नारीवाद

Friday, 03 January 2026, 6:45:00 AM. Agra, Uttar Pradesh

भारत की पहली महिला शिक्षिका और समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले को केवल स्त्री-अधिकारों की प्रतीक मानना उनके संघर्ष की व्यापकता को सीमित करना होगा। सावित्रीबाई फुले का नारीवाद स्त्रियों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह शोषित, वंचित और दलित मानवता की सामूहिक मुक्ति का विचार था। उन्नीसवीं सदी के रूढ़िवादी समाज में उन्होंने शिक्षा, करुणा और समानता को सामाजिक परिवर्तन का आधार बनाया।

“स्त्री-अधिकार से मानवता की आवाज तक: माता सावित्रीबाई फुले का व्यापक नारीवाद”
डॉ प्रमोद कुमार

माता सावित्रीबाई फुले का व्यक्तित्व और कृतित्व भारतीय समाज के इतिहास में केवल एक नारीवादी संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवता के व्यापक विमर्श का उद्घोष है। उन्हें केवल स्त्री-अधिकारों की प्रवर्तक के रूप में देखना उनके संघर्ष, दृष्टि और करुणा के साथ अन्याय होगा। सावित्रीबाई फुले उस नारीवाद की प्रतिनिधि हैं जो अपने सीमित दायरे से निकलकर मनुष्य-मात्र की मुक्ति, गरिमा और समानता के लिए संघर्ष करता है। उनका नारीवाद किसी वर्ग, जाति या लिंग की संकीर्ण परिधि में बंधा हुआ नहीं था, बल्कि वह मानवाधिकारों की सार्वभौमिक चेतना से अनुप्राणित था। यही कारण है कि उनका जीवन संघर्ष स्त्रियों के साथ-साथ शूद्रों, अतिशूद्रों, दलितों, वंचितों और शोषित मानवता की आवाज बनकर उभरा।

Dr. Pramod Kumar
डॉ प्रमोद कुमार


उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय समाज गहन रूढ़ियों, अंधविश्वासों और जातिगत तथा लैंगिक भेदभाव से ग्रस्त था। स्त्री को शिक्षा से वंचित रखना, उसे केवल घरेलू दायित्वों तक सीमित करना, विधवाओं की अमानवीय स्थिति, बाल-विवाह, सती प्रथा और जातिगत उत्पीड़न सामाजिक व्यवस्था के स्वीकृत सत्य बन चुके थे। ऐसे समय में सावित्रीबाई फुले का उभरना केवल एक स्त्री का साहस नहीं था, बल्कि वह सामाजिक क्रांति की चेतना का प्रतीक था। उन्होंने न केवल इन कुरीतियों का प्रतिरोध किया, बल्कि समाज की वैचारिक संरचना को चुनौती दी। उनका संघर्ष यह स्पष्ट करता है कि स्त्री-अधिकारों की लड़ाई तब तक अधूरी है जब तक वह मानव-मूल्यों से नहीं जुड़ती।
सावित्रीबाई फुले का नारीवाद आत्मकेंद्रित नहीं था। वह केवल यह नहीं कहता कि स्त्री को अधिकार चाहिए, बल्कि यह कहता है कि मनुष्य को मनुष्य होने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने समझा कि स्त्री की दुर्दशा केवल उसके लिंग के कारण नहीं है, बल्कि वह जाति, वर्ग और सामाजिक संरचना से गहराई से जुड़ी हुई है। इसलिए उनका संघर्ष स्त्री को शिक्षित करने के साथ-साथ समाज को शिक्षित करने का भी था। शिक्षा उनके लिए केवल साक्षरता नहीं, बल्कि चेतना का विस्तार थी। वह शिक्षा को मानव-मुक्ति का माध्यम मानती थीं, जिससे व्यक्ति अपने अधिकारों, कर्तव्यों और गरिमा को पहचान सके।
जब सावित्रीबाई फुले ने कन्या शिक्षा का बीड़ा उठाया, तब उन्हें सामाजिक तिरस्कार, अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ा। रास्ते में उन पर पत्थर और गोबर फेंका जाता था, लेकिन उन्होंने इसे व्यक्तिगत अपमान नहीं माना। उन्होंने इसे उस समाज की मानसिक विकृति के रूप में देखा, जिसे बदलना आवश्यक था। उनका यह दृष्टिकोण उनके मानववादी नारीवाद को रेखांकित करता है। वह प्रतिशोध की भाषा नहीं बोलती थीं, बल्कि करुणा और विवेक की भाषा में समाज से संवाद करती थीं। उनका विश्वास था कि अज्ञान ही शोषण की जड़ है और ज्ञान ही उसका समाधान।
सावित्रीबाई फुले ने विधवाओं की पीड़ा को केवल एक स्त्री-समस्या के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे मानवीय संकट के रूप में समझा। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और अनाथालय की स्थापना कर उन स्त्रियों को आश्रय दिया, जिन्हें समाज ने त्याग दिया था। यह कार्य उनके व्यापक नारीवाद का प्रमाण है, जिसमें स्त्री की मुक्ति समाज के नैतिक उत्थान से जुड़ी हुई है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि समाज तब तक सभ्य नहीं कहा जा सकता, जब तक वह अपने सबसे कमजोर सदस्यों के प्रति संवेदनशील न हो।
उनका संघर्ष केवल सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि वह नैतिक पुनर्निर्माण का प्रयास भी था। सावित्रीबाई फुले का नारीवाद नैतिकता, करुणा और समानता पर आधारित था। वह किसी प्रकार के वर्चस्व की पक्षधर नहीं थीं। उनके लिए नारीवाद का अर्थ पुरुष-विरोध नहीं, बल्कि अन्याय-विरोध था। उन्होंने पुरुषों को भी इस संघर्ष में सहभागी बनाया और यह बताया कि स्त्री की मुक्ति पुरुष की मुक्ति से अलग नहीं है। यह दृष्टि उन्हें संकीर्ण नारीवादी आंदोलनों से अलग करती है।
सावित्रीबाई फुले की कविताएँ और लेखन उनके विचारों की गहराई को प्रकट करते हैं। उनकी रचनाओं में आक्रोश के साथ-साथ संवेदना भी है। वह समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हैं, लेकिन समाधान के रूप में शिक्षा, नैतिकता और मानवीय मूल्यों को प्रस्तुत करती हैं। उनका लेखन केवल स्त्री के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो शोषण और अंधविश्वास से पीड़ित है। इस प्रकार उनका साहित्य भी मानवता की आवाज बन जाता है।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा नारीवाद वह नहीं है जो केवल अधिकारों की मांग करता है, बल्कि वह है जो कर्तव्यों और संवेदनाओं के साथ अधिकारों की बात करता है। सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन को सेवा और संघर्ष का माध्यम बनाया। उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर समाज के लिए स्वयं को समर्पित किया। यह त्याग किसी धार्मिक अनुष्ठान से नहीं, बल्कि मानवीय प्रतिबद्धता से उत्पन्न था। उनका मानववाद किसी दार्शनिक सिद्धांत तक सीमित नहीं था, बल्कि वह व्यवहारिक जीवन में प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ उनका संबंध केवल दांपत्य नहीं, बल्कि वैचारिक साझेदारी का भी था। दोनों ने मिलकर जिस सामाजिक क्रांति की नींव रखी, उसमें सावित्रीबाई की भूमिका समान रूप से निर्णायक थी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्त्री केवल सहचरी नहीं, बल्कि परिवर्तन की नेतृत्वकर्ता भी हो सकती है। उनका यह योगदान भारतीय नारीवाद को एक नई दिशा देता है, जिसमें स्त्री नेतृत्व मानवता के व्यापक हितों से जुड़ा हुआ है।
आज के संदर्भ में सावित्रीबाई फुले का व्यापक नारीवाद और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। समकालीन नारीवादी विमर्श कई बार केवल अधिकारों की राजनीति में उलझ जाता है, जहाँ मानवता, करुणा और सामाजिक समरसता पीछे छूट जाती है। सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें याद दिलाता है कि नारीवाद का अंतिम लक्ष्य केवल स्त्री की मुक्ति नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज का निर्माण है। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि जब तक समाज का हर वर्ग सम्मान और समानता के साथ नहीं जी सकता, तब तक किसी एक वर्ग की मुक्ति अधूरी है।
सावित्रीबाई फुले का नारीवाद समावेशी था। उन्होंने किसी को बाहर नहीं किया, बल्कि सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि मानवता की प्रगति सहयोग और सह-अस्तित्व से ही संभव है। यह दृष्टि उन्हें केवल एक नारीवादी नहीं, बल्कि एक महान मानववादी बनाती है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सच्ची क्रांति हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों, शिक्षा और करुणा से आती है।
अंततः माता सावित्रीबाई फुले का जीवन और विचार हमें यह समझाते हैं कि स्त्री-अधिकारों की आवाज तब ही प्रभावशाली बनती है जब वह मानवता की आवाज में परिवर्तित हो जाती है। उनका व्यापक नारीवाद आज भी हमें चुनौती देता है कि हम अपने संघर्षों को संकीर्ण दायरों से निकालकर व्यापक मानवीय सरोकारों से जोड़ें। वह हमें यह सिखाती हैं कि नारीवाद केवल स्त्री की मुक्ति का आंदोलन नहीं, बल्कि मानव-मुक्ति की यात्रा है। इसी में उनकी महानता, प्रासंगिकता और प्रेरणा निहित है।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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